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क्या उत्तराखंड के जंगल पिछले चार दिन से धधक रहे हैं?

सोशल मीडिया पर कुछ न कुछ ट्रेंड करता रहता है. अभी उत्तराखंड बर्निंग (#UttarakhandBurning) और इससे मिलते-जुलते कई सारे शब्द ट्रेंड हो रहे हैं. लोग धधक-धधककर जलते हुए जंगलों की तस्वीरें डाल रहे हैं. कहा जा रहा है कि पिछले चार दिनों से ये जंगल जल रहे हैं और कोई इन पर ध्यान नहीं दे रहा.

पिछले साल एमेजॉन रेनफॉरेस्ट में भी भीषण आग लगी थी. इस मुद्दे को उठाते हुए कुछ लोग कह रहे हैं कि लोगों ने उस घटना पर ध्यान दिया, लेकिन उत्तराखंड के जंगलों में लगी आग पर किसी का ध्यान नहीं गया.

तस्वीरें और कई सारे हैशटैग सोशल मीडिया पर तेज़ी से वायरल हुए, जिसके बाद उत्तराखंड सरकार ने फेसबुक पोस्ट करके इस तरह की भीषण आग लगने के दावे को खारिज किया. कहा कि उत्तराखंड के जंगलों में आग लगने की फ़ेक न्यूज़ वायरल की जा रही हैं. आगे लिखा,

‘तस्वीरों का वेरिफिकेशन करने पर ये पाया गया कि ये या तो पुरानी हैं या फिर किसी दूसरी जगह की हैं. कुछ तस्वीरें हमने भी (नीचे) अपलोड की हैं. अपील है कि इस तरह की फ़ेक न्यूज़ न फैलाइए.’

हमने भी अपनी तरफ से खोजबीन की, तो पता चला कि सच में कुछ पुरानी तस्वीरें शेयर की जा रही हैं. हालांकि विन विभाग ने अपने FB पोस्ट में एक न्यूज़ वेबसाइट में साल 2017 में छपी एक खबर का स्क्रीनशॉट डाला था, ये बताते हुए कि जो तस्वीर शेयर हो रही है वो चिली की है. हमने जब पड़ताल की, तो पता चला कि वो तस्वीर साल 2016 की ज़रूर है, लेकिन चिली की नहीं है. उत्तराखंड की ही है. 2016 में जब भीषण आग लगी थी, तब की है. तस्वीर अनूप साह ने क्लिक की थी.

उत्तराखंड के प्रमुख वन संरक्षक हैं जय राज. ‘दी लल्लनटॉप’ ने उनसे बात की. उन्होंने बताया कि सोशल मीडिया पर जो भी गलत जानकारी फैला रहा है, उसके खिलाफ जल्द ही केस दर्ज किया जाएगा.

तो क्या उत्तराखंड में कोई आग नहीं लगी?

बिल्कुल लगी है. जय राज ने बताया कि आग लगने की घटनाएं हो रही हैं, लेकिन उस मात्रा या तीव्रता की नहीं, जितनी बातें सोशल मीडिया पर चल रही हैं. उन्होंने जानकारी दी कि 2020 में अब तक राज्य के अलग-अलग हिस्सों में 88 बार जंगलों में आग लग चुकी है. 111 हेक्टेयर जंगली ज़मीन इससे प्रभावित हो चुकी हैं और वन विभाग को तीन लाख का नुकसान भी हो चुका है. वहीं पिछले साल 1650 हेक्टेयर जंगली ज़मीन आग की चपेट में आई थी. जय राज कहते हैं,

‘इस बार आग ज्यादा नहीं फैल रही हैं. क्योंकि पहला तो लोग कोरोना वायरस के चलते ज्यादातर घर पर रह रहे हैं, इसलिए उनके द्वारा कोई एक्टिविटी नहीं हो रही है. दूसरा, पिछली बार बारिश अच्छी हुई थी, इसलिए अभी जंगलों में मौसम ऐसा बना हुआ है, जो आग को ज्यादा नहीं फैलने दे रहा. तीसरा, वन विभाग की टीम आग को फैलने के पहले ही कंट्रोल कर ले रही है.’

‘आज तक’ से जुड़े कमल नयन सिरोडी, जो चमोली में रहते हैं, उन्होंने भी बताया कि जंगलों में आग लगने की घटनाएं तो लगातार हो रही हैं, लेकिन वक्त रहते उन्हें कंट्रोल कर लिया जा रहा है. दो दिन पहले चमोली के थराली के जंगलों में आग लगी थी, जो तेज़ी से फैल रही थी, लेकिन विन विभाग वालों ने उसे बुझा दिया था.

वहीं कर्णप्रयाग के सिरण गांव के जंगलों में भी 27 मई की दोपहर आग लग गई. फॉरेस्ट रेंजर प्रदीप गौड़ ने बताया कि उन्हें कर्णप्रयाग की घटना की जानकारी मिल गई है, और उनकी टीम गांववालों की मदद से इसे बुझाने की कोशिश कर रही है. इसके अलावा भी उत्तराखंड की बहुत सी जगहों पर आग लगने की घटनाएं हो रही हैं.

Uttarakhand Forest Fire
चमोली के जंगलों में लगी आग. (फोटो- दिलीप सिंह)

क्यों लगती है आग?

जंगलों में गर्मी के मौसम में ही ज्यादा लगती हैं. क्योंकि मिट्टी में नमी नहीं होती और पत्ते-घास भी सूख जाते हैं. ऐसे में छोटी सी लापरवाही बड़ा रूप ले लेती है. खैर, आग लगने के एक नहीं चार-पांच बड़े कारण हैं-

पहला- जंगल के आस-पास रहने वाले लोग चलते-फिरते जली हुई बीड़ी-सिगरेट फेंक देते हैं. सूखे पत्ते इससे आग पकड़ लेते हैं. गर्मी के कारण आग तेज़ी से फैल जाती है.

दूसरा- पहाड़ी इलाकों में रहने वाले किसान गर्मी के बाद आन वाले मॉनसून में नई फसल बोने की तैयारी करते हैं. ऐसे में वो अपने खेतों में पड़े सूखे पत्तों और पुरानी फसल के अवशेषों को साफ करने के लिए उनमें आग लगाते हैं. कई बार ये आग खेतों से होते हुए जंगलों में फैल जाती है.

तीसरा- सूखी हुई घास की जगह नई और हरी घास आ जाएं, इसके लिए कई बार गांववाले खुद जंगली इलाकों में आग लगाते हैं, कई बार यही आग बड़ा रूप ले लेती है.

चौथा- चीड़ के पेड़ के पत्ते गिर-गिरकर इकट्ठे हो जाते हैं, इन्हें पीरुल कहते हैं. कई बार इसी पीरुल को खत्म करने के लिए भी आग लगाई जाती है. गर्मी में ये आसानी से फैल जाती है.

खासतौर पर 15 फरवरी के बाद से, जब गर्मी बढ़ती है, तब से जंगलों में आग लगने की घटनाएं दिखाई देने लगती हैं. कोरोना वायरस के चलते लोगों की बहुत-सी गतिविधियों में कमी आई है, इसलिए इस बार घटनाएं भी काफी कम हो रही हैं.


वीडियो देखें: असम के इस जंगल को बचाने के लिए ट्विटर पर आंदोलन किसने चलाया है?

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