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प्रमोशन में आरक्षण सही या गलत? सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में केंद्र सरकार ने बता दिया

“आजादी के 75 साल बाद भी हम अनुसूचित जाति और जनजाति को योग्यता के समान स्तर पर लाने की स्थिति में नहीं हैं.”

ये कहना है अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल का. आप समझ गए होंगे कि मामला आरक्षण से जुड़ा है. वो भी प्रमोशन में आरक्षण का मुद्दा. दरअसल केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में प्रमोशन में आरक्षण देने की आवश्यकता को सही करार दिया है. इस मुद्दे पर केंद्र सरकार का पक्ष रख रहे अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने यहां तक कहा कि ये एक तथ्य है कि 75 साल बाद भी अनुसूचित जाति-जनजाति को ‘सेम लेवल ऑफ़ मेरिट’ पर नहीं लाया जा सका है, लिहाजा सरकारी नौकरियों में SC/ST लोगों को प्रमोशन में आरक्षण देना सही है.

क्या है पूरा मुद्दा?

सरकारी नौकरियों के प्रमोशन में आरक्षण देने के मुद्दे पर केंद्र और राज्य सरकारों की कई याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट में दायर हैं. ये याचिकाएं सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ के दो फैसलों से जुड़ी हैं. इन फैसलों में सरकारों के लिए गाइडलाइन दी गई थीं कि उन्हें किस तरह सरकारी नौकिरयों में प्रमोशन में आरक्षण देना है. लेकिन इन्हें लागू करने में केंद्र और राज्य सरकारों को कई तरह की दिक्कतों का सामना करना पड़ रहा है. इसीलिए उन्होंने शीर्ष अदालत में याचिकाएं डाली हैं. इनमें कहा गया है कि प्रमोशन में रिज़र्वेशन के मामले में अभी अस्पष्टता है, जिस कारण तमाम नियुक्तियां रुकी हुई हैं.

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक़, मंगलवार 5 अक्टूबर को इन याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से कहा था कि वो इस बात का पता लगाए कि क्या अनुसूचित जाति/जनजातियों का सरकारी नौकरियों में अपर्याप्त प्रतिनिधित्व है और प्रमोशन में रिज़र्वेशन देने से कोई विपरीत असर तो नहीं होगा. कोर्ट ने अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल से पूछा था,‌

“हमें आंकड़े दिखाएं. आप प्रमोशन में आरक्षण को कैसे सही ठहराते हैं और आपने अपने फ़ैसले को सही ठहराने के लिए क्या प्रयास किए?”

इसके बाद बुधवार को केंद्र ने अदालत के समक्ष आंकड़े पेश किए. कहा कि ये आंकड़े ये बताने के लिए पर्याप्त हैं कि सरकारी नौकरियों में अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या कम है. एडिशनल सॉलिसिटर जनरल (ACG) बलबीर सिंह ने न्यायमूर्ति एल नागेश्वर राव की अध्यक्षता वाली 3 सदस्यीय बेंच को बताया कि 19 मंत्रालयों में ग्रुप ए, बी और सी श्रेणी की नौकरियों में शेड्यूल कास्ट कर्मचारियों की कुल संख्या 15.34 प्रतिशत और एसटी की 6.18 प्रतिशत है.

इसके आगे ACG सिंह ने कहा कि सरकार की तरफ से इकट्ठा किया गया डेटा नौकरियों में आरक्षित समुदायों के पर्याप्त प्रतिनिधित्व से जुड़े सवालों का जवाब देता है. उन्होंने ये भी कहा कि अदालत को केवल तभी हस्तक्षेप करना चाहिए जब केंद्र के फैसले में कोई मनमानी दिखाई दे. इसके आगे अदालत को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए.

वहीं, कोर्ट ने आंकड़े और इसके आधार पर दी गई सरकार की दलील पर आपत्ति जताई. उसने कहा कि जो आंकड़ा सरकार ने पेश किया है उसमें कुछ वर्गों को निर्धारित सीटों से अधिक पर प्रतिनिधित्व मिला हुआ है. कोर्ट ने कहा,

अगर आप की दलील यही है तो कुछ श्रेणियों के रिज़र्वेशन को तत्काल बंद करना पड़ेगा. ग्रुप ए में प्रतिनिधित्व ग्रुप बी और सी के मुक़ाबले कम है. ऐसा लगता है की ग्रुप ए की कम संख्या को बी‌ और सी में अजस्ट किया गया है, जो कि न्यायिक नहीं है.

कोर्ट के ऐसा कहने पर अटॉर्नी जनरल ने प्रमोशन में रिजर्वेशन को जस्टिफाई करने वाला बयान दिया. उन्होंने कहा,

“ये तो सत्य है कि (आजादी के) 75 सालों बाद भी हम एससी और एसटी को योग्यता के समान स्तर पर नहीं ला पाए हैं. वे नौकरियों के शुरुआती स्तर तक पहुंचते हैं. उसके बाद कोई आरक्षण नहीं है. माननीय समय आ गया है कि एससी, एसटी और ओबीसी के लिए सरकारी नौकरियों में मजबूत आधार तैयार किया जाए.”

हालांकि इस पर कोर्ट ने कहा कि वो ओबीसी आरक्षण पर सुनवाई नहीं कर रहा है. उसने साफ किया कि वो केवल एससी और एसटी से जुड़े आरक्षण से डील कर रहा है.


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