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प्रशांत के पक्ष में पूर्व जजों का समर्थन गिनाया तो SC ने कहा- प्लीज़, इस पर हमसे कुछ न कहलवाइए

अवमानना के दोषी सीनियर वकील प्रशांत भूषण की सजा पर 20 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट में जोरदार बहस हुई. जस्टिस भूषण रामकृष्ण गवई, जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस कृष्ण मुरारी की बेंच के सामने तीखी दलीलें दी गईं. इस दौरान भूषण की ओर से कहा गया कि वह माफी नहीं मांगेंगे. कोर्ट का जो भी फैसला होगा, उन्हें मंजूर होगा.

जस्टिस मिश्रा और एडवोकेट राजीव धवन के बीच जोरदार बहस

प्रशांत भूषण के वकील राजीव धवन ने कोर्ट में दलीलें देते हुए कहा कि कई बड़े जजों ने भी इस मामले में उनका समर्थन किया है. Live Law वेबसाइट के अनुसार, उन्होंने पूर्व चीफ जस्टिस आरएम लोढ़ा के अलावा रिटायर्ड जस्टिस मदन लोकुर, कुरियन जोसफ और एपी शाह के नाम गिनाए. उन्होंने कोर्ट से पूछा-

क्या इन जजों को भी कोर्ट की अवमानना के मामले में शामिल किया जाएगा? यदि नहीं तो फिर प्रशांत भूषण को दोषी क्यों ठहराया गया? इन्होंने भी भूषण के बयानों का समर्थन किया था. इन्होंने भी माना कि कार्यवाही गलत थी.

इस पर जस्टिस बीआर गवई ने कहा कि जस्टिस लोढ़ा का बयान केवल प्रक्रिया को लेकर था. राजीव धवन ने जवाब दिया कि बाकियों ने तो भूषण के बयानों का सपोर्ट किया था. 1000 से ज्यादा वकीलों ने भी उनके प्रति समर्थन जताया है.

इस पर जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा,

हमसे इस बारे में मत बुलवाइए. प्लीज ये सब दलीलें मत दीजिए.

राजीव धवन ने फिर कहा,

कथित अवमानना वाला एक बयान, यदि दोहराया जाता है तो वह भी अवमानना होगी. अवमानना का समर्थन करना भी अवमानना होगी. ये सारे अखबारों और पब्लिकेशंस पर भी लागू होता है.

जस्टिस मिश्रा ने पूछा,

आप सजा पर बहस कर रहे हैं या दोषी करार दिए जाने पर?

इस पर धवन ने कहा कि कंटेंप्ट ऑफ कोर्ट्स एक्ट के सेक्शन 12 के अनुसार, एक माफी को केवल इसलिए खारिज़ नहीं किया जा सकता कि वह शर्तिया है या माफी के काबिल है. उसका वास्तविक होना प्रासंगिक है.

जस्टिस मिश्रा का जवाब आया,

सजा पर सुनवाई के दौरान वास्तविकता की बात अगर होती है तो फिर व्यक्ति को यह अहसास होना चाहिए कि उससे गलती हुई है. यह अहसास उस व्यक्ति को होना जरूरी है. किसी को सजा देकर हमें मजा नहीं आता. मेरे लिए सजा का मतलब है रोकथाम. गलती किसी से भी हो सकती है. ऐसे मामलों में उस व्यक्ति को इस बात का ख्याल होना चाहिए और इसे स्वीकार करना चाहिए.

इस पर राजीव धवन ने दलील दी कि हाई कोर्ट के ऐसे कई फैसले हैं, जिनमें कहा गया है कि हाई कोर्ट जजों की आलोचना अवमानना नहीं है.

जस्टिस मिश्रा ने पूछा,

संस्थान की भूमिका पर आपका क्या कहना है?

जस्टिस गवई ने कहा कि फैसले में यह माना गया है कि प्रशांत भूषण के ट्वीट से कुछेक जजों पर नहीं बल्कि पूरे संस्थान पर असर पड़ा है. जस्टिस मिश्रा ने भी इस बात को आगे बढ़ाते हुए कहा,

जहां तक अवमानना की बात है तो आपको गलती को ठीक करना होगा.

धवन का जवाब था,

गलती ठीक करने का सवाल केवल सिविल कंटेंप्ट में ही उठता है.

जस्टिस मिश्रा ने टिप्पणी की,

जब बात सजा देने की आती है तो हम तभी नरम हो सकते हैं, जब कोई व्यक्ति माफी मांग लेता है और असल में गलती को मानता है.

अटॉर्नी जनरल ने भी भूषण का पक्ष लिया

सुनवाई के दौरान देश के अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने भी भूषण को सजा न देने की अपील की. उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जजों को लेकर दलील दी. कहा कि उनके पास कोर्ट के पांच पूर्व जजों के नाम हैं, जिन्होंने कहा था कि सुप्रीम कोर्ट में लोकतंत्र नाकाम हुआ है. उनके पास रिटायर्ड जजों के बयान हैं, जिनमें कहा गया था कि उच्च न्यायपालिका में भ्रष्टाचार था.

इसी दौरान वेणुगोपाल को बीच में ही रोकते हुए जस्टिस मिश्रा ने कहा,

मिस्टर अटॉर्नी, हम यहां मेरिट की बात नहीं कर रहे हैं.

14 अगस्त को दोषी करार दिए गए थे प्रशांत भूषण

इसके बाद कोर्ट ने प्रशांत भूषण को अपने बयान पर फिर से विचार करने के लिए 2-3 दिन का समय देने की बात कही. एक बार फिर बता दें कि प्रशांत भूषण के खिलाफ ये मामला उनके दो ट्वीट्स को लेकर चल रहा है. इनमें एक ट्वीट चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) एसए बोबडे की सुपरबाइक वाली तस्वीर से जुड़ा था. दूसरे ट्वीट में उन्होंने देश के पिछले चार मुख्य न्यायाधीशों पर टिप्पणी की थी. अब सबकी नजरें इस पर हैं कि क्या प्रशांत भूषण अपना रवैया बदलकर अदालत से माफी मांगेंगे या सुप्रीम कोर्ट अपना रुख नरम करेगा.


Video: अदालत की अवमानना के वो मामले जब जजों पर टिप्पणी करने की वजह से लोगों पर केस दर्ज हो गया

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