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शादी बिना सरोगेसी से मां बनने की मांग पर सुप्रीम कोर्ट ने कहा, 'साइंस ने बहुत तरक्की की, लेकिन...'

कोर्ट ने कहा, "देश में विवाह संस्था की रक्षा और उसका संरक्षण किया जाना चाहिए. हम पश्चिमी देशों की तर्ज पर नहीं चल सकते जहां शादी के बिना बच्चे पैदा करना असामान्य बात नहीं है."

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6 फ़रवरी 2024 (अपडेटेड: 6 फ़रवरी 2024, 05:33 PM IST)
supreme court on surrogacy
महिला ने सरोगेसी से मां बनने की अनुमति मांगने के लिए कोर्ट में याचिका दायर करवाई थी.
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"देश में विवाह संस्था की रक्षा और उसका संरक्षण किया जाना चाहिए. हम पश्चिमी देशों की तर्ज पर नहीं चल सकते जहां शादी के बिना बच्चे पैदा करना असामान्य बात नहीं है."

ये टिप्पणी सुप्रीम कोर्ट ने 5 फरवरी को एक अविवाहित महिला की याचिका की सुनवाई के दौरान दी है. महिला ने सरोगेसी से मां बनने की अनुमति मांगने के लिए कोर्ट में याचिका दायर करवाई थी. भारत में शादी के बिना सरोगेसी से बच्चा पैदा करने की अनुमति नहीं है.

टाइम्स ऑफ़ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक़ याचिकाकर्ता एक मल्टीनेशनल कंपनी में काम करती है. 44 साल की है. अविवाहित है. उसने अपने वकील श्यामल कुमार के जरिए सरोगेसी (विनियमन) एक्ट की धारा 2 (S) की वैधता को चुनौती दी थी. इस एक्ट के तहत भारतीय तलाकशुदा और विधवा महिलाएं, जिनकी उम्र 35 से 45 साल के बीच है, सरोगेसी के जरिए मां बन सकती हैं. मतलब जो महिलाएं सिंगल हैं, उन्हें सरोगेसी से मां बनने की अनुमति नहीं है.

सुनवाई की शुरुआत में जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने याचिकाकर्ता से कहा कि मां बनने के और भी तरीके हैं. जैसे वो वह शादी कर सकती है या बच्चा गोद ले सकती है. लेकिन वकील ने कहा कि याचिकाकर्ता शादी नहीं करना चाहती है. और बच्चा गोद लेने के लिए काफ़ी समय इंतजार करना पड़ता है. इस पर पीठ ने कहा,

“यहां शादी के दायरे में आकर मां बनना आदर्श है. शादी से बाहर मां बनना कोई आदर्श नहीं है. हम इसके बारे में चिंतित हैं. हम बच्चे के पालन-पोषण के बारे में बात कर रहे हैं. देश में शादी की संस्था जीवित रहनी चाहिए या नहीं? हम पश्चिमी देशों की तरह नहीं हैं. शादी की संस्था को बचाना चाहिए. आप हमें रूढ़िवादी कह सकते हैं. हम इसे स्वीकार करेंगे.”

ये भी पढ़ें: सरोगेसी रेगुलेशन बिल में ऐसा क्या है कि राज्यसभा में उस पर बवाल मचा हुआ है

आगे पीठ ने कहा, 

“44 साल की उम्र में सरोगेसी से पैदा हुए बच्चे का पालन-पोषण करना बहुत मुश्किल है. आपको ज़िंदगी में सब कुछ नहीं मिल सकता है. याचिकाकर्ता ने अविवाहित रहने का फ़ैसला लिया. हम समाज और शादी की संस्था के बारे में चिंतित हैं. हम पश्चिम देशों की तरह नहीं हैं, जहां कई बच्चे अपनी मां और पिता के बारे में नहीं जानते हैं.”

कोर्ट ने कहा,

 “साइंस ने बहुत तरक्की कर ली है, लेकिन समाज के नियम नहीं बदले हैं. और कुछ खास कारणों से ऐसा होना भी जरूरी है.”

वहीं याचिकाकर्ता के वकील श्यामल ने कहा कि यह भेदभावपूर्ण है, क्योंकि कानून के मुताबिक़ सरोगेसी योग्य बनने के लिए अविवाहित महिला पहले शादी करे और बाद में तलाक ले. इस पर कोर्ट ने कहा कि इस याचिका को उन दूसरी याचिकाओं के साथ सुना जाएगा, जो इससे संबंधित हैं. 

वीडियो: सैरोगेसी रेगुलेशन बिल का राज्यसभा में विरोध क्यों हो रहा है

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