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आदर्श ग्राम योजना : न मोदी के मंत्रियों ने काम किया, न सांसदों ने

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सांसद आदर्श ग्राम योजना. नरेंद्र मोदी की बड़ी महत्त्वाकांक्षी स्कीम. जिस साल सत्ता में आए, यानी 2014 में, उसी साल इस स्कीम की लॉन्चिंग हुई. सभी सांसदों को अपने संसदीय क्षेत्रों में एक-एक गांव गोद लेना था. उन गांवों को “आदर्श ग्राम” की तरह विकसित करना था.  ताकि दूसरे गांवों के लिए ये गांव एक मिसाल बन सकें.

पांच साल गए. सरकार चुनकर फिर से वापिस आ गयी. दावा ये कि सांसद आदर्श ग्राम योजना सुपरहिट. लेकिन जिस मंत्रालय के अधीन ये योजना चल रही है, उसने ही बताया है कि योजना के अधीन दिए गए लगभग आधे प्रोजेक्ट ही पूरे हो सके हैं. आधे काम अधूरे.

बात हो रही है ग्रामीण विकास मंत्रालय की. ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अपनी नयी परफॉरमेंस और एक्शन प्लान रिपोर्ट अपनी वेबसाइट पर जारी की है. इस रिपोर्ट में मंत्रालय ने बताया है कि इस प्रोजेक्ट के अंदर आने वाले 35 प्रतिशत प्रोजेक्ट अभी तक शुरू नहीं हो सके हैं.

इसके अलावा मंत्रालय ने खुद ही जानकारी दी है कि सांसद आदर्श ग्राम योजना के तहत 13 प्रतिशत प्रोजेक्ट अभी भी अधूरे हैं. गणित के हिसाब से देखें तो लगभग 52 प्रतिशत यानी लगभग आधे प्रोजेक्ट ही पूरे हो सके हैं. और ऐसा हम नहीं कह रहे, सांसद आदर्श ग्राम योजना का कामकाज देखने वाले मंत्रालय ने खुद ही बताया है.

ऐसा काम देखकर मोदी चक्कर में पड़ गए होंगे.
ऐसा काम देखकर मोदी चक्कर में पड़ गए होंगे.

इसका सीधा मतलब ये भी लगाया जा सकता है कि सांसदों ने – चाहे किसी भी पार्टी के हों – आधा काम किया ही नहीं. सांसद आदर्श ग्राम योजना के बारे में ये बातें भी हो रही हैं कि इस योजना के पहले चरण तक सांसदों ने बहुत उत्साहित होकर काम किया. लेकिन योजना के तीसरे चरण तक आते-आते सांसदों का उत्साह संभवतः कम हो गया, और एक-तिहाई सांसदों ने ही गांवों को गोद लेने में रुचि दिखाई.

क्या है सांसद आदर्श ग्राम योजना?

साल 2014. सरकार चुने जाने के कुछेक महीने बाद का ही समय. नरेंद्र मोदी स्वतंत्रता दिवस पर अपना भाषण दे रहे थे. भाषण के साथ ही नरेंद्र मोदी ने सांसद आदर्श ग्राम योजना की शुरुआत कर दी.

इस स्कीम में सभी सांसदों को गांव गोद लेने थे और उन्हें आदर्श ग्राम योजना के तहत डेवलप किया जाना था. तरीका ये था कि सभी सांसद 2014 से 2019 के बीच तीन गांवों को गोद लें और अगले पांच साल यानी 2024 तक पांच गांव गोद लेने थे.

ग्रामीण विकास मंत्रालय ने अपनी रिपोर्ट में योजना के बारे में जानकारी दी है. मंत्रालय ने लिखा है,

“संसद के सम्मानित सदस्यों ने प्रधानमंत्री की योजना का उत्साह से स्वागत किया है. और सभी सांसद मिलकर देश में 1,475 ग्राम पंचायतों  का विकास कर रहे हैं.”

इन सभी गांवों के विकास के लिए राज्य और केंद्र सरकार की योजनाओं का तो इस्तेमाल किया ही जा सकता है. साथ ही साथ सांसद विकास निधि और इलाके के विधायक को मिलने वाली विकास निधि का उपयोग करके गांवों का विकास किया जा सकता है. मतलब इस योजना में खर्च के लिए कोई अलग से पैसा नहीं मिलता है.

लोकसभा सांसद अपने संसदीय क्षेत्र में गांव गोद लेंगे, जबकि राज्यसभा सांसद अपने राज्य में – जहां से वे चुनकर राज्यसभा में भेजे गए हैं – किसी भी एक जिले के अंदर गांव गोद ले सकते हैं.

पश्चिम बंगाल और ओडिशा में मामला पूरा ख़राब है

हां. पश्चिम बंगाल और ओडिशा में सांसद आदर्श ग्राम योजना के मामले में सबसे खराब उपस्थिति है. इन राज्यों में 76 प्रतिशत प्रोजेक्ट शुरू ही नहीं हो सके हैं. इन दोनों राज्यों में भाजपा के विपक्षियों की सरकार है, लेकिन इससे कोई सीधा समीकरण नहीं बनाया जा सकता है कि इसी वजह से काम नहीं हो पाया है.

ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक.
ओडिशा के मुख्यमंत्री नवीन पटनायक.

इसके अलावा उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, तमिलनाडु और गुजरात आदर्श ग्राम योजना के मामले में सबसे आगे चल रहे हैं. सबसे अच्छी स्थिति में उत्तर प्रदेश है, जहां 90 प्रतिशत प्रोजेक्ट पूरे हो चुके हैं.

आदर्श ग्राम योजना के तहत पूरे हुए कामों या अधूरे कामों का लेखाजोखा ही बड़ा मसला नहीं है. एक और बड़ा मसला है इसको लेकर सांसदों की उदासीनता. रिपोर्ट बताती है कि लोकसभा और राज्यसभा के कई सांसदों ने आदर्श ग्राम गोद नहीं लिए.

ममता बनर्जी धरने पर बैठी हैं. ये वहीं की तस्वीर है (फोटो: रॉयटर्स)
ममता बनर्जी इन बंगाल.

‘दी प्रिंट’ में पिछले साल प्रकाशित एक रिपोर्ट बताती है कि मोदी के पिछले कैबिनेट के मंत्रियों ने ही गांव गोद नहीं लिए थे. इस रिपोर्ट के मुताबिक़, मोदी के 26 में से 12 मंत्रियों ने योजना के तीसरे चरण में कोई गांव ही गोद नहीं लिया था. इस लिस्ट में नितिन गडकरी, धर्मेन्द्र प्रधान, रविशंकर प्रसाद, स्मृति ईरानी, थावर चंद गहलोत, प्रकाश जावड़ेकर, सुरेश प्रभु, सदानंद गौड़ा, अनंत कुमार और अरुण जेटली तक का नाम शामिल था.

और कुछ लोगों ने तो पहले चरण के बाद ही कोई गांव गोद नहीं लिया था. लेकिन यह योजना पूरे कार्यकाल के दौरान चलती रही. और इस बात भी सांसदों को प्रोत्साहित किया जा रहा है कि जाओ भाई, गांव गोद लो और आदर्श ग्राम बना दो.

गुलाल फिल्म याद है? अनुराग कश्यप ने बनायी थी. गाने तो एक से बढ़कर एक थे. लेकिन इसमें एक शेर था –

“इस मुल्क ने हर शख्स़ को जो काम था सौंपा
हर शख्स़ उस काम की माचिस जलाकर छोड़ दी”

लगता है कि मोदी ने हर शख्स को जो काम दिया था, हर शख्स तो नहीं, लेकिन आधे ने तो काम की माचिस जलाकर रख ही दी. माचिस भी जलाई तो बहुत ताकतवर स्कीम की, जो मोदी को गांवों तक पहुंचाने के प्लान से प्रकाश में आई थी.


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