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दिल्ली हाई कोर्ट को Uniform Civil Code की पैरवी करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

दिल्ली हाई कोर्ट ने भारत में यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) लागू करने की पैरवी की है. गुरुवार 8 जुलाई को तलाक से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए हाई कोर्ट की न्यायाधीश प्रतिभा एम सिंह ने समान नागरिक संहिता की जरूरत पर जोर दिया. मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, हाई कोर्ट ने कहा कि भारतीय समाज धीरे-धीरे ‘सजातीय’ हो रहा है, धर्म, समुदाय और जाति से जुड़ी ‘पारंपरिक बाधाएं’ खत्म हो रही हैं. कोर्ट ने कहा कि इन बदलावों के मद्देनजर यूनिफॉर्म सिविल कोड का होना उचित है. इसके साथ ही हाई कोर्ट ने सरकार से कहा कि वो इस मुद्दे पर जरूरी कदम उठाए.

जजमेंट देते हुए जस्टिस प्रतिभा सिंह ने ये भी कहा कि अदालतों को बार-बार पर्सनल लॉ से जुड़ी दिक्कतों से जूझना पड़ रहा है. उन्होंने माना कि जो लोग अलग-अलग समुदयों, जातियों और धर्मों में शादी करते हैं, उन्हें पर्सनल लॉ के कारण बाद में संघर्ष करना पड़ता है. जस्टिस सिंह ने कहा,

“भारत के अलग-अलग समुदायों, कबीलों, जातियों या धर्मों से आने वाले युवाओं को पर्सनल लॉ से जुड़े विवादों के कारण समस्या नहीं होनी चाहिए, विशेषकर शादी और तलाक के संबंध में.”

हाई कोर्ट की टिप्पणी की वजह

आजतक के रिपोर्टर संजय शर्मा ने बताया कि दरअसल सुनवाई में हाई कोर्ट के सामने ये सवाल खड़ा हो गया था कि तलाक को हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत मान्यता दी जाए या मीणा जनजाति के नियमों के मुताबिक. पति हिंदू मैरिज ऐक्ट के मुताबिक तलाक चाहता था, जबकि पत्नी का कहना था कि वो मीणा जनजाति से आती है, लिहाजा उस पर हिंदू मैरिज ऐक्ट लागू नहीं होता. इस आधार पर पत्नी ने पहले से मांग की थी कि उसके पति द्वारा दायर फैमिली कोर्ट में तलाक की अर्जी खारिज की जाए. इसी दलील के खिलाफ पति ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी. इसमें हिंदू मैरिज ऐक्ट, 1955 की प्रासंगिकता का जिक्र किया गया था.

रिपोर्ट के मुताबिक, हाई कोर्ट ने पति की अपील को स्वीकार कर लिया, लेकिन साथ ही यूनिफॉर्म सिविल कोड की जरूरत पर टिप्पणी भी कर दी. कोर्ट ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 44 में यूनिफॉर्म सिविल कोड की बात कही गई है, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने भी समय-समय पर दोहराया है. कोर्ट के मुताबिक, सिविल कोड सब के लिए एक जैसा होगा और शादी, तलाक और उत्तराधिकार के मामलों में एक समान नियमों (या व्यवस्था) को लागू करने में सक्षम होगा. यूसीसी के महत्व पर जोर देते हुए कोर्ट ने आगे कहा,

“इससे समाज के अंदरूनी झगड़े और अंतर्विरोध कम होंगे, जो कई पर्सनल लॉ होने के कारण पैदा होते हैं.”

इससे पहले मार्च 2020 में एक नामी वकील और भारतीय जनता पार्टी के सदस्य अश्विनी उपाध्याय ने सुप्रीम कोर्ट में पांच याचिकाएं दायर कर यूनिफॉर्म सिविल कोड बनाए जाने की मांग की थी. तब शीर्ष अदालत ने भारत में धार्मिक रूप से निष्पक्ष और उत्तराधिकार संबंधी कानून लाने को लेकर केंद्र सरकार से जवाब तलब किया था. अब दिल्ली हाई कोर्ट की टिप्पणी से इस मुद्दे को फिर हवा मिल सकती है.

Court Order
संविधान के अनुच्छेद 44 में समान नागरिक संहिता का जिक्र है.

यूसीसी और पर्सनल लॉ का मुद्दा क्या है?

भारत के संविधान के अनुच्छेद 44 में यूनिफॉर्म सिविल कोड यानी समान नागरिक संहिता का उल्लेख है. इस संहिता से मतलब है कि कानून पूरे देश में एक समान रूप से लागू होगा. मतलब किसी भी धर्म, जाति, जनजाति या अन्य समुदायों के लिए अलग कानून नहीं होंगे. सबको एक ही तरह से ट्रीट किया जाएगा. विवाह, तलाक, उत्तराधिकार जैसे मुद्दे UCC को लेकर होती रही बहस के केंद्र में रहे हैं. अनुच्छेद 44 के हवाले से कहा जाता है कि यूनिफॉर्म सिविल कोड सभी धार्मिक समुदायों में शादी, तलाक, उत्तराधिकार, किसी को गोद लेने आदि से संबंधित कानूनों में भी एकरूपता लाने का प्रावधान करता है.

लेकिन UCC को आज तक देश में लागू नहीं किया जा सका है. क्यों? इस सवाल से जुड़ी बहस बहुत लंबी-चौड़ी है. समय-समय पर इस बहस ने जोर पकड़ा है. लेकिन अभी तक इस पर अमल नहीं किया जा सका है. जबकि अनुच्छेद 44 ये कहता है कि राज्य, यानी कि सरकार पूरा प्रयास करेगी कि सिविल कोड को देश के सभी नागरिकों के लिए लागू किया जाए.

खैर, अब बात करते हैं उन कानूनों की जो UCC के नहीं होने की सूरत में विवाह, तलाक जैसे मुद्दों से जुड़े मामलों पर लागू होते हैं. ये कानून देश के अलग-अलग धर्म या संप्रदायों के लिए बनाए गए थे. हिंदुओं में शादी और तलाक के मामले हिंदू मैरिज ऐक्ट के तहत आते हैं. सिख, जैन और बौद्ध धर्म के लोग भी इसके अंतर्गत आते हैं. उत्तराधिकार या विरासत के मामलों में हिंदू सक्सेशन ऐक्ट लागू होता है. ईसाइयों में शादी इंडियन क्रिश्चियन मैरिज ऐक्ट के तहत होती हैं. वहीं, पारसियों के लिए पारसी मैरिज ऐक्ट एंड डाइवोर्स ऐक्ट बनाया गया था.

लेकिन मुस्लिम समाज के लिए बनाया गया मुस्लिम पर्सनल लॉ किसी कानून या संहिता के तहत कोडिफाई नहीं हैं और धार्मिक व्याख्या पर आधारित हैं. हालांकि कुछ मुस्लिम पर्सनल लॉ स्पष्ट रूप से मान्यता प्राप्त हैं. जैसे शरियत ऐप्लिकेशन ऐक्ट और डिसलूशन ऑफ मुस्लिम मैरिज ऐक्ट.


वीडियो- कोर्ट के इन फैसलों को जाने बिना लिव इन रिलेशनशिप में रहना भारी पड़ सकता है! 

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