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क्या आर्मी चीफ बिपिन रावत ने अपने ताज़ा बयान से लाइन क्रॉस की है?

आर्मी चीफ जनरल बिपिन रावत 31 दिसंबर को रिटायर होने वाले हैं. इससे पहले उनके एक बयान पर विवाद हो गया है. उन्होंने एक बड़े पद पर रहते हुए CAA प्रोटेस्ट का नाम लिए बग़ैर इस पर अपने ‘विचार’ रखे. 26 दिसंबर को उन्होंने एक कार्यक्रम में कहा, ”नेता को नेतृत्व से ही जाना जाता है. अगर आप प्रगति के रास्ते पर ले जाते हैं, तो आपके पीछे हर कोई हो जाता है. नेता वही है, जो लोगों को सही दिशा में ले जाता है. नेता वो नहीं होता, जो ग़लत दिशा में ले जाए. हम देख रहे हैं कि कॉलेज और यूनिवर्सिटी में जो विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं, उनमें हिंसा और आगजनी हो रही है. ये कोई लीडरशिप नहीं है.”

उनके इस बयान पर राजनीतिक पार्टियां, एक्टिविस्ट और सेना के ही पूर्व अधिकारी नाराज़ हो गए. इसे सेना प्रमुख की तरफ़ से ‘राजनीतिक’ बयान कहा जा रहा है. कुछ लोगों ने आरोप लगाया कि देश के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (CDS) के लिए जनरल रावत का नाम सबसे आगे चल रहा है, इसलिए वो ऐसा बोल रहे हैं.

लोकसभा में कांग्रेस के नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा, “आर्मी चीफ की CAA पर टिप्पणी काफी आपत्तिजनक, अनैतिक है. वो किसी भाजपा नेता की तरह लग रहे हैं, जिन्हें CDS पद पर प्रमोट किया जाना है या इसका इनाम दिया जाना है. उन्हें हमारी सेना की निष्पक्षता को बरकरार रखना चाहिए.”

टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, इसे लेकर आर्मी हेडक्वार्टर के एक सीनियर अधिकारी ने कहा, “अपनी स्पीच में जनरल रावत ने ‘लीडरशिप क्वालिटी’ की बात की है. कोई राजनीतिक बयानबाजी नहीं थी. उन्होंने न तो CAA का ज़िक्र किया, न ही NRC का. उन्होंने सिर्फ लॉ एंड ऑर्डर को लेकर अपनी चिंता जाहिर की है, जिसका असर राष्ट्रीय सुरक्षा पर पड़ता है.” कुछ दूसरे रिटायर्ड अधिकारियों ने कहा कि जनरल रावत ने सार्वजनिक रूप से स्टैंड लेकर एक बार फिर लाइन क्रॉस की है. पूर्व नेवी चीफ एडमिरल एल रामदास (रिटा.) ने कहा कि जनरल रावत की टिप्पणी ‘ग़लत’ थी. उन्होंने इस पर जोर दिया कि सैन्य बलों को ‘देश की सेवा, न कि राजनीतिक शक्तियों की सेवा’ के दशकों पुराने सिद्धांत पर अडिग रहना चाहिए. टाइम्स ऑफ इंडिया के मुताबिक, एक कार्यरत अधिकारी ने कहा, “क्रॉस बॉर्डर सर्जिकल स्ट्राइक से लेकर बालाकोट एयरस्ट्राइक तक और यूपी सीएम का ये कहना कि ये ‘मोदी की सेना’ है… सेनाओं का राजनीतिकरण बढ़ गया है.” कांग्रेस नेता दिग्विजय सिंह ने ट्वीट कर लिखा, ”आर्मी चीफ ने CAA प्रोटेस्ट पर कहा कि नेता वो नहीं होता, जो आगजनी का नेतृत्व करता है. जनरल साहब, मैं आपकी बात से सहमत हूं, लेकिन वो लोग भी नेता नहीं होते, जो अपने फॉलोअर्स को सांप्रदायिक हिंसा के नरसंहार में लिप्त होने देते हैं. क्या आप मुझसे सहमत हैं जनरल साहब?”

इस पर AIMIM प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने कहा, “आर्मी चीफ का बयान मोदी सरकार को ही कमज़ोर करता है. हमारे प्रधानमंत्री अपनी वेबसाइट पर लिखते हैं कि जब वो छात्र थे, तब उन्होंने आपातकाल के दौरान प्रदर्शन में हिस्सा लिया था. तब तो आर्मी चीफ के बयान के हिसाब से वो भी ग़लत था.” उन्होंने आगे कहा, ”अपने कार्यालय की सीमाओं को जानना भी एक नेतृत्व ही है. नेतृत्व वो होता है जो नागरिकता को ऊंचे स्थान पर रखे और उस संस्था की अखडंता को बरकरार रखें, जिसकी आप अगुवाई कर रहे हो.”

डिफेंस एनालिस्ट सी उदय भास्कर ने ट्वीट किया, “CAA के बारे में नागरिकों से ही चर्चा होनी चाहिए और अपेक्षा की जाती है कि सैनिक इससे दूर रहें.” इस पर वाइस एडमिरल जग्गी बेदी (रिटा.) ने कहा, “पूरी तरह सहमत. CAA पर सैनिक का कोई रोल नहीं है. इसका पूरा मतलब सरकार से है. बेहतर हो कि इसे नेताओं और बाबुओं पर छोड़ दिया जाए.” कांग्रेस नेता मनीष तिवारी ने कहा, ”आर्मी चीफ कब से आंतरिक मामलों में टिप्पणी करने लगे. ये सिविल-मिलिट्री संबंध को कमज़ोर करता है, जिसकी बुनियाद ये है कि आर्म्ड फोर्स घरेलू राजनीति में टिप्पणी और हस्तक्षेप नहीं करते हैं.”

मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी ने कहा, ”आर्मी चीफ का बयान बताता है कि कैसे मोदी सरकार में स्थिति खराब हो गई है, जहां वर्दी में ऊंचे पद पर बैठा शख्स भी खुलकर संस्था के रोल का उल्लंघन कर सकता है. इसीलिए ये सवाल उठाना ज़रूरी है कि सेना का राजनीतिकरण कर क्या हम पाकिस्तान के रास्ते पर हैं. लोकतांत्रिक संघर्षों के मामलों पर मिलिट्री के ऊंचे पदों पर बैठे लोगों की तरफ से हस्तक्षेप के बारे में आज़ाद भारत के इतिहास में पहले नहीं सुना गया है.” साथ ही पार्टी ने कहा है कि जनरल रावत को इसके लिए देश से माफी मांगनी चाहिए.

स्वराज इंडिया के योगेंद्र यादव ने कहा, ”मैं उनसे सहमत हूं. हां, नेताओं को सही दिशा में नेतृत्व करना चााहिए. मुझे पूरा विश्वास है कि इसके बारे में बात करते हुए उनके दिमाग में प्रधानमंत्री रहे होंगे.”

क्या बिपिन रावत ने वाकई लाइन क्रॉस की है

आर्मी रूल बुक के आर्मी रूल 21 में लिखा गया है कि राजनीतिक सवालों के ऊपर कोई बयान सार्वजनिक तौर पर आर्मी का कोई सदस्य नहीं देगा. ये रूल प्रेस को बयान देने के बारे में है. इसके लिए केंद्र सरकार की इजाज़त ज़रूरी है और नियम में लिखा है कि बिना इजाज़त कोई भी सैनिक या अधिकारी राजनीतिक मामलों पर बात नहीं कर सकता है. इसके अलावा ये रूल किसी राजनीतिक विषय पर भाषण देने या वायरलेस ऐड्रेस देने से भी रोकता है.

पहले भी जनरल रावत के बयानों पर विवाद हुआ है

9 अप्रैल, 2017 को कश्मीर में फारुक अहमद डार को जीप पर बांधकर घुमाने वाले मामले पर जनरल रावत ने कहा था, ”ये एक छद्म युद्ध है और छद्म युद्ध डर्टी वॉर होते हैं. उन्हें उसी तरह से लड़ा जाता है. रूल्स ऑफ इंगेजमेंट की बात वहां आती है, जहां दुश्मन सामने से आकर लड़ता है. लेकिन यहां तो डर्टी वॉर की स्थिति है. यहीं पर इनोवेशन काम आते हैं. आप डर्टी वॉर से लड़ने के लिए इनोवेशन का सहारा लेते हैं.”

पीटीआई को ही दिए एक इंटरव्यू में जनरल रावत ने कहा था, ”मैं मनाता हूं कि ये लोग (कश्मीरी प्रदर्शनकारी) हम पर पत्थर चलाने के बजाय गोली चलाएं. तब मैं वो कर पाऊंगा जो…”

उन्होंने ये भी कहा था, ”आपके दुश्मन को आपसे डर लगना चाहिए और डर आम लोगों को भी लगना चाहिए. हम एक दोस्ताना फौज हैं. लेकिन जब हमें कानून व्यवस्था को पटरी पर लाने की ज़िम्मेदारी दी जाती है, तब लोगों को हमसे डर लगना चाहिए.”


चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ बिपिन रावत ने CAA प्रोटेस्ट पर जो कहा, उसमें दिक्कत कहां है ?

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