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सरकार ने लॉकडाउन में ऐसा नियम बदला कि अब काटी जा सकेगी आपकी सैलरी

लॉकडाउन 4.0 चल रहा है. पहले से लेकर चौथे लॉकडाउन में सरकार ने बहुत सारे नियमों में बदलाव किए हैं. कई चीज़ों में ढील दे दी है. लेकिन चौथे लॉकडाउन में एक ऐसी छूट दे दी है, जो कर्मचारियों को भारी पड़ने वाली है. पहले लॉकडाउन में सरकार ने आदेश दिया था कि इंडस्ट्री, कंपनी या दुकान के मालिक अपने कर्मचारियों का वेतन नहीं काटेंगे. लेकिन अब उस आदेश को खत्म कर दिया गया है.

क्या था आदेश और अब क्या बदलाव हुए?

‘इंडिया टुडे’ के राहुल श्रीवास्तव की रिपोर्ट के मुताबिक, पहले लॉकडाउन की घोषणा के ठीक बाद 29 मार्च को सरकार ने एक आदेश दिया था. इस आदेश पर गृह सचिव अजय भल्ला के साइन थे. डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 के सेक्शन 10(2)(I) के तहत होम सेक्रेटरी ने नेशनल एक्जेक्यूटिव कमिटी के चेयरपर्सन के तौर पर आदेश दिए थे. आदेश में लिखा था,

‘सभी मालिक, चाहे वो किसी इंडस्ट्री से हों, या दुकानदार हों या किसी व्यावसायिक प्रतिष्ठान से हों, अपने कर्मचारियों को बिना किसी कटौती के लॉकडाउन के दौरान भी सैलरी देंगे.’

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ये वो ऑर्डर है जो 29 मार्च को सरकार ने जारी किया था. फोटो- इंडिया टुडे/राहुल श्रीवास्तव

डिजास्टर मैनेजमेंट ऐक्ट के तहत ये आदेश दिया गया था. यानी इसका पालन करना अनिवार्य था और जो भी इसका उल्लंघन करता उसके खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई भी हो सकती थी. यानी एक तरह से सरकार ने सभी कर्मचारियों को सुरक्षा दी थी.

फिर आया चौथा लॉकडाउन

17 मई को नई गाइडलाइन्स आईं और ऐसा लगा जैसे कर्मचारियों को मिला सुरक्षा कवच हटा दिया गया है. इस गाइडलाइन पर भी होम सेक्रेटरी अजय भल्ला के साइन थे. तीसरे पैराग्राफ में लिखा गया,

‘नेशनल एक्जेक्यूटिव कमिटी द्वारा डिजास्टर मैनेजमेंट एक्ट 2005 के सेक्शन 10(2)(I)के तहत जो भी आदेश प्रभाव में लाए गए थे, उन पर 18 मई से रोक लगाई जा रही है.’

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17 मई को दिया गया ऑर्डर. लाल घेरे में देखिए सरकार ने पुराने आदेश को वापस ले लिया. फोटो- इंडिया टुडे/राहुल श्रीवास्तव

ऐसा क्यों किया गया?

सरकार ने कोई स्पष्ट कारण नहीं बताया है. लेकिन सरकारी सूत्रों से पता चला है कि इसके पीछे की वजह सुप्रीम कोर्ट का एक आदेश है. 29 मार्च के आदेश के बाद बहुत सारे व्यावसायिक प्रतिष्ठानों के मालिकों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका डाली थी. इस आदेश के खिलाफ. कहा था कि लॉकडाउन में कर्मचारियों को पूरी सैलरी देना सरकार ने अनिवार्य कर दिया है, जो कि संविधान के आर्टिकल 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन है.

कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सरकार उन प्राइवेट कंपनियों के खिलाफ जबरदस्ती कार्रवाई नहीं कर सकती, जिन्होंने अपने कर्मचारियों को लॉकडाउन में पूरी सैलरी नहीं दी. तीन जजों की बेंच ने महसूस किया कि छोटे और प्राइवेट एंटरप्राइजेज के लिए लॉकडाउन के दौरान अपने कर्मचारियों को पूरा वेतन देना काफी मुश्किल है, क्योंकि वो खुद भी लॉकडाउन से प्रभावित हो रहे हैं. चूंकि सुप्रीम कोर्ट ने सरकार को दंडात्मक एक्शन लेने से रोक दिया, तो सरकार ने अपने आदेश को वापस लेने का फैसला कर लिया.

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मुंबई में कंस्ट्रक्शन का काम करते वर्कर्स. (फोटो- PTI)

सरकार के इस फैसले का कांग्रेस और लेफ्ट की पार्टियों के सपोर्ट वाले लेबर ऑर्गेनाइजेशन काफी विरोध कर रहे हैं. इसके अलावा RSS से जुड़ा लेबर ऑर्गेनाइजेशन भारतीय मज़दूर संघ (BMS) भी इसके विरोध में है. इस ऑर्गेनाइजेशन के जनरल सेक्रेटरी विर्जेश उपाध्याय का कहना है कि ये नाइंसाफी है और वो सरकार के फैसले को सपोर्ट नहीं करते. उन्होंने बताया कि BMS 20 मई को सड़कों पर उतरकर अपनी मांगें रखेगा.


वीडियो देखें: कोरोना सफ़र: दिल्ली से यूपी जा रहे मज़दूरों ने सरकार और चलाई जा रही बसों के बारे में क्या कहा?

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