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बिहार : महीनों से बिना सैलरी के पढ़ा रहे हैं गेस्ट टीचर, मांगकर खाने की आ गई नौबत!

जल्द चुनाव में जा रहे बिहार में शिक्षा के क्षेत्र में काफ़ी हलचल है. और इस ख़बर में बिहार के अतिथि शिक्षकों की दिक्कतों के बारे में बात करेंगे. बिहार के विश्वविद्यालयों से संबद्ध कॉलेजों में पोस्टेड इन गेस्ट टीचर्स का कहना है कि इन्हें पिछले छह महीनों से तनख़्वाह नहीं मिली है. यूजीसी से वेतनमान दोगुना करने का आदेश आया था, लेकिन आदेश ने बिहार में आकर दम तोड़ दिया. और इस मामले को ताक पर रखकर बिहार सरकार नयी स्थायी नियुक्तियों की तैयारी कर रही है. 

क्या है मामला?

साल 2018. बिहार में शिक्षकों की क़िल्लत को पूरा करने के लिए बिहार सरकार ने राज्य के विश्वविद्यालयों के कॉलेजों में अतिथि शिक्षकों की नियुक्ति का सिलसिला चलाया था. 

अतिथि शिक्षकों को हर एक लेक्चर का एक हज़ार रुपए मिलना तय हुआ. और महीने में अधिकतम 25 क्लास हर अतिथि शिक्षक को लेना था. यानी मासिक मानदेय 25 हज़ार. कुछ दिनों तक तो सब कमोबेश सामान्य चला, लेकिन 2020 शुरू होते-होते अतिथि शिक्षकों की दिक्कतें कथित तौर पर बढ़ने लगीं. समय पर वेतन नहीं, और यूजीसी के निर्देश पर राज्य सरकार की ओर से कोई कार्रवाई नहीं.

भागलपुर यूनिवर्सिटी के एसएम कॉलेज में बॉटनी पढ़ाने वाली आलोका कुमारी कहती हैं,

“हमें एक हज़ार रुपए प्रति क्लास मिलना निर्धारित हुआ था, लेकिन वो भी समय पर नहीं मिलता है. फ़रवरी 2020 तक का वेतन तो मिला, लेकिन मार्च के महीने से अब तक वेतन नहीं मिला है. महामारी बिना पैसे के गुज़र गयी, अब तो पैसा मिल ही जाना चाहिए.”

समस्तीपुर महिला कॉलेज के गृह विज्ञान विभाग में कुमारी माधवी ने मार्च 2020 में बतौर अतिथि शिक्षक काम शुरू किया था. उसके पहले दूसरे कॉलेज में बतौर अतिथि शिक्षक काम करती थीं. ‘लल्लनटॉप’ से बातचीत में बताती हैं,

“जब से आए हैं, तब से पैसा नहीं मिला है. छह महीने से पेंडिंग है.” 

कुमारी माधवी का कॉलेज ललित नारायण मिथिला यूनिवर्सिटी, दरभंगा से सम्बद्ध है. कहती हैं कि कॉलेज में बक़ाया तनख़्वाह के लिए बात करने का कोई फ़ायदा नहीं है, क्योंकि हम लोगों का पैसा विश्वविद्यालय से आएगा. और विश्वविद्यालय से पूछने पर कोई जवाब नहीं आ रहा है.

बच्चा रज़क, अतिथि शिक्षक संघ के महासचिव हैं. दरभंगा के मिथिला विश्वविद्यालय के सम्बद्ध हैं. कहते हैं,

“छह महीने से पगार नहीं मिली है. मांगकर खाने की नौबत आ गयी है, जबकि हम लोग रेगुलर शिक्षकों जितना ही काम कर रहे हैं. कोरोना के समय में ऑनलाइन क्लास ले रहे हैं. जब कॉलेज खुला था, तो भी सारा काम कर रहे थे.”

लेकिन मामला बस इतना ही नहीं है. 28 जनवरी 2019 को विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने देशभर के विश्वविद्यालयों में पढ़ा रहे गेस्ट टीचरों के मानदेय के लिए निर्देश जारी किया था. सचिव रजनीश जैन की तरफ़ से जारी किए गए इस आदेश में UGC ने कहा था कि अतिथि शिक्षकों के लिए मानदेय 1000 प्रति लेक्चर से बढ़ाकर 1500 प्रति लेक्चर कर दिया जाए. और अधिकतम 50 हज़ार रुपए प्रति माह. इस आदेश में ये बात नत्थी थी कि जिस तारीख़ को ये आदेश जारी किया जा रहा है, उस दिन से ही इसे लागू माना जाए.

Ugc Order
मानदेय बढ़ाने के लिए दिया गया यूजीसी का ऑर्डर

लेकिन बिहार में संभवत: अभी तक ये आदेश लागू नहीं किया जा सका है. अगर लागू होता, तो 25 हज़ार प्रति माह पा रहे शिक्षक इसका ठीक दोगुना पा रहे होते. पटना के राजकीय संस्कृत महाविद्यालय के अतिथि शिक्षक रामप्रवेश पासवान ने बताया,

“राज्य सरकार ने पता नहीं क्यों UGC का नियम लागू नहीं करवाया है. कई-कई बार हमने मांग उठायी है. एक से अधिक मौक़ों पर शिक्षा मंत्री और उपमुख्यमंत्री से मिलकर अपनी बात रखी है, लेकिन अब तक कोई भी फ़ायदा नहीं हुआ है.”

मामला कहां अटका हुआ है? बच्चा रज़क बताते हैं कि हम लोग हर हफ़्ते मुख्यमंत्री और शिक्षा मंत्री को ईमेल लिखते हैं. बिहार में लॉकडाउन है, तो कहीं से जवाब नहीं मिल रहा है. ये कुछ इक्का-दुक्का लोगों की दिक़्क़त नहीं है, बिहार के क़रीब 1800 अतिथि शिक्षकों की दिक़्क़त है. नियम लागू होना तो दूर, 1800 लोगों को पिछले छह महीने से एक पैसा नहीं मिला. 

और कुछ शिक्षकों के लिए ये मियाद छह महीने से ज़्यादा की है. दरभंगा के मिथिला विश्वविद्यालय से ही जुड़े हुए पुष्कर कुमार बताते हैं कि इसी विश्वविद्यालय के छह महाविद्यालयों में जनवरी से वेतन नहीं मिला है. यानी कुल आठ महीनों से शिक्षक बिना वेतन के हैं. और बाक़ी के बारे में बताते हैं कि उन्हें यही जानकारी मिल सकी है कि राज्य के वित्त मंत्रालय में उनके वेतन की फ़ाइल अटकी पड़ी है. 

सरकार का क्या कहना है?

इस बारे में हमने सरकार का पक्ष जानने की कोशिश की. उपमुख्यमंत्री सुशील मोदी, जिनके पास शिक्षा विभाग है, और शिक्षा मंत्री केएनपी वर्मा ने मैसेज और फ़ोन का जवाब नहीं दिया. फिर हमारी बात अपर मुख्य सचिव, शिक्षा आरके महाजन से हुई. उन्होंने कहा,

“अगर गेस्ट टीचरों को तनख़्वाह नहीं मिली है, तो इसमें विश्वविद्यालय की गड़बड़ी है. क्योंकि जहां तक मुझे मालूम है कि हमारी तरफ़ से कोई दिक़्क़त नहीं है. अगर आप बता रहे हैं, तो मैं राज्य के सारे विश्वविद्यालयों में एक बार पता कर लेता हूं. अगर उनके पास फ़ंड की कमी है, तो तुरंत फ़ंड रिलीज़ किया जाएगा, वरना उनसे कहा जाएगा कि जल्द से जल्द वेतन रिलीज़ करें. मुश्किल से पांच-सात दिन के भीतर उनका वेतन बंटवाने की कोशिश करता हूं.”

यूजीसी की गाइडलाइन लागू करने के सवाल पर आरके महाजन ने कहा, 

“उसे अभी बिहार में लागू नहीं किया जा सका है. कोविड वग़ैरह को देखते हुए उसे अभी लागू करना मुश्किल भी लग रहा है. फ़िलहाल उन्हें पुराने मानदेय पर ही वेतन देने का प्रयास किया जाएगा.”


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