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वो चुनाव, जब कांग्रेस ने राम मंदिर के नाम पर वोट मांग विधायक जितवाया था

कांग्रेस 1885 में बनी. सीधे स्वतंत्रता आंदोलन में. 1934 में कांग्रेस के अंदर ही एक सोशलिस्ट सेक्शन बना. इसे कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के नाम से जाना जाता था. राम मनोहर लोहिया, आचार्य नरेंद्रदेव जैसे तमाम नेता इसका हिस्सा थे. मगर सोशलिस्ट धड़े की मुख्य कांग्रेस से खटपट चलती रही. आजादी के बाद मार्च 1948 तक नौबत ये आ गई कि कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी ने खुद को कांग्रेस से एकदम अलग कर लिया. और तो और 13 सोशलिस्ट धड़े के विधायकों ने तुरंत यूपी विधानसभा से इस्तीफा दे डाला. इन विधायकों ने नैतिकता का हवाला देते हुए कहा- हम ऐसे पद पर नहीं रह सकते. नया जनमत लेकर फिर से आएंगे. माने अब होने थे उपचुनाव. और कहा जाता है कि जून 1948 के इसी चुनाव में जनता के सामने आया कांग्रेस का ‘मुस्लिम लीग’ वाला अवतार.

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क्लिक करके पढ़िए दी लल्लनटॉप पर अयोध्या भूमि विवाद की टॉप टू बॉटम कवरेज.

फैजाबाद से चुनाव लड़ रहे थे खाटी समाजवादी आचार्य नरेंद्रदेव. और नरेंद्रदेव की ये सीट बन गई उस वक्त की सबसे हॉट सीट. वजह थी सीएम साहब का इस सीट पर इंट्रेस्ट. सीएम कौन. गोविंद वल्लभ पंत. उनकी नरेंद्रदेव से जरा कम बनती थी. और मामला ये भी था कि नरेंद्रदेव पंत की कुर्सी के लिए एक बड़ा खतरा भी थे. 1937 के चुनाव में तो नेहरू के करीबी रहे नरेंद्रदेव ने सीएम पद ठुकरा भी दिया था. तो सीएम साहब ने खुद कमान संभाली नरेंद्रदेव को हराने की. खुद नहीं चुनाव लड़े. मगर पूरा फोकस वहीं. इस चुनाव में कांग्रेस ने उस साधु को प्रत्याशी के तौर पर खड़ा किया, जो उस टोली का हिस्सा थे जिसने 1949 में दिसंबर की एक ठिठुरती रात बाबरी मस्जिद के अंदर मूर्तियां रखीं. नाम राघवदास. राघवदास को पंत ने कांग्रेस के पूर्व कैंडिडेट सिद्धेश्वरी प्रसाद का टिकट काटकर प्रत्याशी बनाया. राघवदास को टिकट देने के पीछे मकसद था हिंदू वोटों का ध्रुवीकरण. खासतौर पर अयोध्या के हिंदुओं का वोट. उस अयोध्या का जो नरेंद्रदेव का घर था. नरेंद्रदेव आस्तिक भी थे. सो इस दांव के चलने के और चांस थे.

जवाहरलाल नेहरू के साथ गोविंद वल्लभ पंत.
जवाहरलाल नेहरू के साथ गोविंद वल्लभ पंत.

कृष्णा झा और धीरेंद्र के झा की किताब “अयोध्या द डार्क नाइट” के मुताबिक पंडित वल्लभ पंत आए दिन अयोध्या-फैजाबाद प्रचार करने आते. खास ज़ोर अयोध्या में रहता. वो लोगों के बीच सबसे ज्यादा आचार्य नरेंद्रदेव को आस्तिक बताते फिरते. कहते कि नरेंद्रदेव हिंदू धर्म को नहीं मानते. भगवान राम को नहीं मानते. पंत ने नरेंद्रदेव को मंदिर विरोधी भी बताया. नैशनल हेराल्ड में छपी रिपोर्ट के मुताबिक पंत लोगों के बीच कहते- मुस्लिम और जमींदार कांग्रेस को कमजोर कर रहे हैं. ये उर्दू को भारत की भाषा बनाना चाहते हैं. जबकि कांग्रेस हिंदी के साथ है.

इसके साथ ही राघवदास प्रचार के दौरान तुलसी की पत्तियां खिलाके लोगों को कसमें खिलवाते. चुनाव में हिंदु-मुस्लिम जम के हो रहा था. खुद सीएम पंत के भाषणों को सुन मुस्लिम इसलिए भी घबरा गए क्योंकि कुछ दिन पहले ही हिंदू महासभा ने रामजन्मभूमि का मुद्दा छेड़ा था. बाबरी मस्जिद को हर हाल में लेने की धमकी दी थी. फिर राघवदास ने रामजन्मभूमि का मुद्दा पहले से उठा रखा था. पंत भी इसके समर्थन में बोल रहे थे. गुजरात में सोमनाथ मंदिर का निर्माण कांग्रेस पहले ही करा चुकी थी. माने कांग्रेस खुलके हिंदुत्व की नैया पर सवार थी. उस वक्त देश के प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू नाराज हुए मगर फैजाबाद में कांग्रेस का मिशन नहीं रुका. नतीजा क्या हुआ. आप गेस कर ही चुके होंगे.

28 जून 1948 के दिन वोटिंग हुई. रिजल्ट आया तो बाबा राघवदास को मिले 5392 वोट. आचार्य नरेंद्रदेव को 4080 वोट. गोविंद वल्लभ पंत का कम्युनल कार्ड चल गया था. रामजन्मभूमि मुद्दा अपने पहले पॉलिटिकल टेस्ट में पास हो चुका था.


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