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पुलिस वालों के दाढ़ी रखने को लेकर क्या कहता है संविधान का आर्टिकल 25?

अयोध्या जिले के खांदासा थाने में तैनात पुलिस कांस्टेबल मोहम्मद फरमान. उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) में दो याचिकाएं लगाईं. दाढ़ी रखने के अधिकार को लेकर. हालांकि, उनकी दोनों याचिकाएं खारिज हो गईं. हाईकोर्ट के लखनऊ बेंच ने कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के बावज़ूद पुलिस बल में काम करने के दौरान दाढ़ी रखना संवैधानिक अधिकार नहीं है. कांस्टेबल फ़रमान ने ये दोनों याचिकाएं पुलिस विभाग से अपने निलंबन के खिलाफ दायर की थीं.

क्या है पूरा मामला

यूपी पुलिस के पुलिस महानिदेशक (DGP) की ओर से एक सर्कुलर जारी कर पुलिस फोर्स में रहते हुए दाढ़ी रखने पर रोक लगा दी गई थी. सर्कुलर जारी किये जाने के बाद भी पुलिस कांस्टेबल मोहम्मद फरमान ने दाढ़ी रखी हुई थी. इसके बाद आदेश का पालन न करने के चलते अयोध्या पुलिस ने उन्हें निलंबित कर दिया.

इस विभागीय कार्रवाई के ख़िलाफ़ फ़रमान ने दो याचिकाएं दायर कीं. पहली याचिका में उन्होंने अपने ख़िलाफ़ अयोध्या के डीआईजी द्वारा जारी किए गए निलंबन आदेश को और दूसरी याचिका में विभागीय अनुशासनात्मक कार्यवाही के आरोप पत्र को चुनौती दी थी.

कांस्टेबल फ़रमान ने तर्क दिया था कि संविधान हर नागरिक को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार देता है. उसी के तहत उन्होंने मुस्लिम सिद्धांतों के आधार पर दाढ़ी रखी है.

जस्टिस राजेश सिंह चौहान की सिंगल बेंच ने मोहम्मद फरमान की दोनों अलग-अलग याचिकाओं को खारिज करते हुए कहा,

“26 अक्टूबर, 2020 का सर्कुलर पुलिस बल में अनुशासन बनाए रखने के लिए जारी किया गया एक कार्यकारी आदेश है. जिसके मुताबिक़, पुलिस बल में काम करने के दौरान दाढ़ी रखना संवैधानिक अधिकार नहीं है.”

जस्टिस चौहान ने याचिका दायर करने वाले कांस्टेबल के खिलाफ दायर निलंबन आदेश और आरोपपत्र में हस्तक्षेप करने से भी इनकार कर दिया है.

ऐसे मामले और भी हैं

इसके पहले भी इस तरह के मामलों में अदालतों ने पुलिस या अन्य सुरक्षा बलों में काम करने वाले लोगों के दाढ़ी रखने के ख़िलाफ़ फैसला सुनाया है.

बागपत में तैनात सब इंस्पेक्टर इंतेसार अली को कई बार दाढ़ी मुंडवाने या फिर दाढ़ी़ रखने के लिए ज़रूरी अनुमति लेने को कहा गया था, जिसके लिए उन्होंने अनुमति नहीं ली और दाढ़ी रखना जारी रखा. उन्हें इस मामले में कारण बताओ नोटिस जारी करने के साथ-साथ निलंबित कर दिया गया था और उनके खिलाफ जांच का आदेश दिया गया था.

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ऐसे ही एक मामले में बागपत के सब इंस्पेक्टर इंतेसार अली को भी कारण बताओ नोटिस देने के साथ-साथ निलंबित कर दिया था. (फोटो: साभार इंडिया टुडे)

इसी तरह के एक और मामले में अक्टूबर 2008 में भारतीय वायुसेना में एयरमैन के पद पर कार्यरत अंसारी आफ़ताब अहमद की सेवाओं को एयरफोर्स द्वारा समाप्त कर दिया गया था. और कहा गया था,

“सभी मुस्लिम दाढ़ी नहीं रखते हैं, इस्लाम में दाढी रखने का रिवाज़ वैकल्पिक है, इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि इस्लाम धर्म इसके मानने वालों को बाल या दाढ़ी काटने से मना करता है.”

सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे टीएस ठाकुर की अध्यक्षता वाली पीठ ने भी मामले की सुनवाई करते हुए अहमद की बर्खास्तगी की पुष्टि की थी. उन्होंने कहा,

“भारत निस्संदेह एक धर्मनिरपेक्ष राष्ट्र है जिसमें हर धर्म के साथ समानता का व्यवहार किया जाना चाहिए, लेकिन इसे अनदेखा नहीं किया जा सकता है कि राष्ट्र की रक्षा के लिए जो बल खड़ा किया गया है, वह अनुशासन बनाए रखे.”

इसी बेंच के जस्टिस डी वाई चंद्रचूड़ और जस्टिस एल नागेश्वर राव ने कहा था ऐसा कुछ भी नहीं है जिससे ये ज़ाहिर हो कि इस्लाम के सिद्धांत बाल काटने या चेहरा शेव करने पर रोक लगाते हैं.

भारतीय संविधान के आर्टिकल 25 के मुताबिक़ किसी भी व्यक्ति को अपने धर्म के मुताबिक़ आचरण करने और अपने धर्म का प्रचार करने की स्वतंत्रता है. इस स्वतंत्रता के तहत उसे दाढ़ी रखने या दूसरी कोई धार्मिक पहचान अपनाने की आज़ादी है. लेकिन आर्टिकल 25 के ही मुताबिक़, पुलिस ड्रेस कोड में सिर्फ सिखों को दाढ़ी रखने की इजाज़त है, अगर इनके अलावा कोई और दाढ़ी रखना चाहता है तो उसे पुलिस विभाग से अनुमति लेनी होगी.

क्या कहते हैं संविधान के जानकार?

प्रोफेसर फैजान मुस्तफा एक वरिष्ठ संवैधानिक कानूनविद हैं जो वर्तमान में NALSAR यूनिवर्सिटी ऑफ लॉ, हैदराबाद के कुलपति हैं. उन्होंने अपने ऑफिशियल यूट्यूब चैनल पर एक वीडियो में इस मसले पर बात की है. उनका कहना है,

“अगर कोर्ट सिर्फ इतना कहती तो बात ख़त्म हो जाती, कि अगर आपको सुरक्षा बलों में या पुलिस में नौकरी करनी है तो आपको वहां के नियम मानने होंगे. लेकिन कोर्ट का यह निर्धारित करना गलत है कि किसी मुसलमान के लिए दाढी रखना ज़रूरी नहीं है या नहीं.”

मुस्तफ़ा कहते हैं कि सभी धर्मों के अन्दर भी धार्मिक विद्वानों में आपस में डायवर्जन ऑफ़ ओपिनियन होता है. किसी मुसलमान के लिए दाढ़ी रखना ज़रूरी भी हो सकता है, क्यूंकि कुरआन के बाद मुसलमान हदीसों को सबसे ज्यादा मानते हैं, जिसके हिसाब से दाढ़ी रखना ज़रूरी है.  उन्होंने कहा था मुसलानों की आधारभूत धार्मिक ज़रूरतें इस्लाम के विद्वान् तय करेंगे, न कि उन्हें किसी एक मुसलमान के आचरण या किसी सर्वे से तय किया जा सकता है.

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संविधान के जानकार और NALSAR हैदराबाद के कुलपति फैजान मुस्तफा के मुताबिक, कोर्ट का यह निर्धारित करना गलत है कि किसी मुसलमान के लिए दाढ़ी रखना ज़रूरी नहीं है या नहीं. (फोटो: साभार द वायर)

फैजान मुस्तफ़ा ने आगे कहा कि कोई चीज़ कुरआन में नहीं है तो यह कह देना कि वो मुसलमानों के लिए ज़रूरी नहीं है तो ये बात ग़लत है, ऐसे तो कुरआन की सब बातें मान ली जाएं तो यूनिफार्म सिविल कोड भी ग़लत है.

मुस्तफ़ा कन्क्लूड करते हुए कहते हैं कि आर्टिकल 25 अगर धार्मिक आज़ादी देता है तो उसकी ही दूसरी क्लाज़ में स्टेट्स को पॉवर हैं कि वो धार्मिक आज़ादी पर कंंट्रोल कर सकते हैं लेकिन यह कहकर किसी की धार्मिक आज़ादी छीनना गलत है कि ऐसा आचरण उसके आधारभूत धार्मिक सिद्धांतों में नहीं है, किसी भी धर्म के आधारभूत धार्मिक सिद्धांत उस धर्म के विद्वानों को तय करने दें.


 

(ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहे शिवेंद्र ने लिखी है.)


वीडियो- जिस फोटो के लिए लोगों ने यूपी पुलिस पर गालियों की बौछार कर दी, उसका सच तो जान लीजिए!

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