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फिल्म रिव्यू 'पिंक': जरूर देखें, न देखने का ऑप्शन न रखें

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फिल्म रिव्यू: पिंक

डायरेक्टर: अनिरुद्ध रॉय चौधरी

कास्ट: अमिताभ बच्चन, पीयूष मिश्रा, तापसी पन्नू, कीर्ति कुल्हारी, एंड्रिया तारिंग

‘नहीं’. ये एक शब्द नहीं, एक वाक्य है. जिसका मतलब होता है नहीं, NO. रुक जाओ. मैं तुम्हें आगे बढ़ने की इजाजत नहीं देती हूं. फिर चाहे वो आपकी गर्लफ्रेंड हो, एक्स-गर्लफ्रेंड, कोई अजनबी, कोई सेक्स वर्कर, या आपकी पत्नी. अमिताभ बच्चन जब अदालत में ये कहते हैं, उनकी आंखों के साथ आपकी भी आंखें भर उठती हैं.

फिल्म को देखने वाले दर्शक नहीं, जज हैं. उन्होंने नहीं देखा उस रात क्या हुआ, जिस रात का जिक्र बार-बार फिल्म में होता है. आपको इतना मालूम है कि तीन लड़कियां साथ रहती हैं. साउथ दिल्ली का इलाका है. लड़कियां कमाती हैं, खुश रहती हैं. एक रात पार्टी करने सूरजकुंड (फरीदाबाद, हरियाणा) जाती हैं एक रॉक कॉन्सर्ट के लिए. वहां से भागकर वापस आती हैं. मीनल ने एक लड़के पर हमला कर दिया था, शराब की बोतल से. लड़का परेशानी में है. उसकी आंख जा सकती थी. शायद जान भी जा सकती थी. मीनल के ऊपर अटेम्प्ट टू मर्डर का आरोप है.

लेकिन हजारों लड़कियों की तरह दिल्ली में रहने वाली एक औसत, समझदार लड़की ऐसा क्यों करेगी? ये आप समझेंगे फिल्म के दौरान. सिर्फ यही नहीं, और भी बहुत कुछ समझेंगे, जिसको लेकर आपकी आंखों के आगे पर्दा पड़ा हुआ है.

मीनल के साथ रहती हैं फलक और एंड्रिया. फलक लखनऊ के एक औसत परिवार से आती हैं, जिनका छोटा भाई किसी बीमारी से जूझ रहा है. अपने घर में कमाने वाली वो इकलौती इंसान है. सैलरी भी कुछ खास नहीं है. लेकिन लगातार भाई का इलाज करा रही है. बार-बार उसके अकाउंट में 25 हजार रुपये आते हैं, लगभग हर महीने. जरूर कुछ गलत काम कर रही होगी वो पैसे कमाने के लिए, है न?

एंड्रिया नॉर्थ ईस्ट से है. होगा कुछ असम, मणिपुर. नहीं, मेघालय से है. क्या फर्क पड़ता है, नॉर्थ ईस्ट तो पूरा एक सा है. नॉर्थ ईस्ट की है तो शराब और सेक्स तो उसकी रोज की आदतें होंगी. दिल्ली में सारी सेक्स वर्कर्स नॉर्थ ईस्ट से ही तो आती हैं.

मीनल तो दिल्ली में खुद का घर होते हुए भी अलग फ्लैट लेकर रहती है. जरूर कुछ ऐसा करती होगी जो अपने घर पर नहीं कर सकती. लेकिन ऐसा क्या हो सकता है? सेक्स.

फिल्म ऐसे ही सवालों और दलीलों से बार-बार आपका सामना करवाती है. और आपको बताती है कि आपके दिमाग में कितनी गंध भरी हुई है.

दीपक सहगल (अमिताभ बच्चन) एक मशहूर वकील है. पर बायपोलर डिसऑर्डर होने की वजह से उसका दिमाग अस्थिर है. उसने वकालत छोड़ दी है. पत्नी ने बिस्तर पकड़ लिया है, मरने की हालत में है. रोज अपनी बालकनी से लेकर जॉगिंग पार्क तक वो इन लड़कियों को देखता रहता है, एकटक. जानें क्यों. शायद उसे उनकी लाइफ, उनकी इंडिपेंडेंस देखकर अपना कल याद आता है. शायद उसे उन लड़कियों को देखकर याद आता है कि उसकी पत्नी एक समय इसी तरह खुश और चेतना से भरी रहा करती थी. शायद उसे उन्हें देखकर लगता है कि अगर उसकी बच्चियां होतीं, तो आज इसी उम्र की होतीं. हम नहीं जानते कि दीपक के मन में क्या है.

शरलॉक टीवी सीरीज में शरलॉक होम्स मानसिक अस्थिरता से जूझ रहे आर्मी डॉक्टर जॉन वॉटसन से कहता है, ‘ये युद्ध की बुरी यादें नहीं हैं जो तुम्हें डिस्टर्ब करती हैं. तुम असल में युद्ध को मिस कर रहे हो.’ अपनी वकालत छोड़ चुके दीपक का भी यही हाल है. बुढ़ाते शरीर और खाली पड़े दिमाग में एक अजीब सी बेचैनी है. वो लड़कियों को पहले अपनी राय देता है कि केस को कैसे डील करें. फिर एक दिन अपना कोट पहनकर तैयार हो जाता है, केस लड़ने के लिए. सिर्फ न्याय और सच्चाई के पक्ष में नहीं, बल्कि एक समाज, एक सोच और उन हजारों आदतों के खिलाफ जो हमारे अंदर हैं. उन लड़कों के खिलाफ जिन्हें लगता है कि अगर लड़की सज-संवर कर किसी पार्टी में आई है, हंस कर बात कर रही है, शराब पी रही है, तो वो जरूर ‘हिंट’ दे रही है. अगर वो ‘नो’ कह रही है, तो उसके कोई मायने नहीं हैं. ‘ना’ कहना होता तो एक कमरे में बैठकर लड़कों के साथ शराब क्यों पीती, लिपस्टिक क्यों लगाती, ‘नॉनवेज’ जोक क्यों सुनाती. उन लड़कों के खिलाफ जिन्हें लगता है कि लड़की ने अगर धमकी का जवाब धमकी से दिया है तो उसके ‘चुल्ल’ उठ रही है, जिसे शांत करना चाहिए. उस लोगों के खिलाफ जो रात को लेट आने वाली लड़कियों का चरित्र जज करते हैं. जो पड़ोस की बालकनी में झांक-झांक लड़कियों के रंगीन ब्रा देखते हैं.

फिल्म ‘कंसेंट’ शब्द पर जोर देती है, सहमति पर. इस बात पर जोर देती है कि हो सकता है लड़की ने हजार बार सेक्स किया हो, पैसे लेकर या न लेकर. इसका ये मतलब नहीं कि 1001वीं बार भी वो करने को राजी होगी. फिल्म ‘अच्छी’ और ‘बुरी’ लड़कियों के बीच के इस फर्क को तोड़ने की कोशिश करती है.

तापसी, कीर्ति और एंड्रिया ने मीनल, फलक और एंड्रिया के रोल्स को शानदार तरीके से निभाया है. अमिताभ बच्चन और उनके विपक्षी वकील पीयूष मिश्रा के बारे में क्या कहें, आप तो सब जानते हैं.

स्क्रिप्ट टाइट है, एक भी सेकंड के लिए ढीली नहीं पड़ती. हालांकि थोड़े नंबर अदालत में अमिताभ की स्पीच के काट सकते हैं, जो अदालत के लिहाज से जरा लंबी खिंची. लेकिन कहीं भी बोरिंग नहीं हुई. कोई खुले सिरे नहीं है, फालतू सीन्स नहीं हैं. घर, अस्पताल और अदालत में भी पूरी फिल्म कट जाती है. फिल्म का दूसरा भाग पूरा का पूरा अदालत में शूट हुआ है, पर कहीं भी अझेल नहीं लगता.

हालांकि हम ये सवाल कर सकते हैं कि औरतों के हक़ में बोलने के लिए एक पुरुष के शरीर और आवाज की जरूरत क्यों पड़ी. लेकिन ये फिल्म ‘चक दे’ जैसी नहीं जो एक पुरुष हीरो के बारे में हो. जिसमें लड़कियों का किरदार और उनकी ताकत पुरुष से आती हो. फिल्म में औरतें औरतों को संभालती हैं. हंसती हैं. रोने से लजाती नहीं. डरती हैं, सॉरी भी बोलती हैं. इमोशनल ब्रेकडाउन से भी जूझती हैं. अमिताभ की दिमागी कमजोरी से जूझने में बिस्तर पर पड़ी उनकी पत्नी उनका साथ देती हैं.

फिल्म जरूर देखें. न देखने का ऑप्शन न रखें. इसलिए देखें क्योंकि एक समाज के तौर पर हर उम्र के लोगों को इसे देखने की जरूरत है.

 

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