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फिल्म रिव्यू: शकुंतला देवी

ह्यूमन कंप्यूटर के नाम से जानी जाने वाली मैथ्स जीनियस शकुंतला देवी की लाइफ पर बेस्ड फिल्म ‘शकुंतला देवी’ एमेज़ॉन प्राइम वीडियो पर रिलीज़ हो चुकी है. फिल्म की कहानी शुरू होती है, उस घटना से जब शकुंतला की बेटी अनुपमा उन पर एक लीगल केस कर कोर्ट ले आई हैं. यहां से सीधा फ्लैशबैक शकुंतला के बचपन में पहुंच जाता है. एक लड़की जो कभी स्कूल नहीं गई. लेकिन बड़े से बड़ा सवाल सेकंडों में हल कर देती है. लंदन से शुरू कर दुनिया के तमाम यूनिवर्सिटीज़-कॉलेजों में मैथ्स का शो करती है. सबसे बड़े नंबर वाला सवाल, सबसे कम समय में हल कर वर्ल्ड रिकॉर्ड बना देती है. फिल्म में ये सब इसी रफ्तार और रूटीन से चल रहा होता है. शकुंतला की शादी के बाद मामला थोड़ा थमता तो है लेकिन तब तक कहानी सिनेमा बन चुकी होती है. खैर, शकुंतला मां बनती है लेकिन चेन ऑफ इवेंट्स की वजह से उसकी बेटी से कभी नहीं बनती. इनके बीच मामला इतना खराब हो चुका है कि फिल्म कोर्ट में शुरू होती है. इसके बाद ढेर सारी डायलॉगबाज़ी, मां-बेटी के बीच इमोशनल सीन्स और पिक्चर खत्म.

ओरिजिनल मैथ्स जीनियस शकुंतला देवी, जिनका किरदार फिल्म में विद्या बालन ने निभाया है.
ओरिजिनल मैथ्स जीनियस शकुंतला देवी, जिनका किरदार फिल्म में विद्या बालन ने निभाया है.

फिल्म में विद्या बालन ने शकुंतला देवी का किरदार निभाया है. हमने विद्या को ये वाला करते देखा है. ‘डर्टी पिक्चर’ से लेकर ‘तुम्हारी सुलु’ में. लेकिन फिर भी उन्हें देखकर मज़ा आता है. खामियों से भरा हुआ अन-अपोलोजेटिक किरदार, जिसे विद्या ने पूरे सैवेज अंदाज़ में निभाया है. उनके पति परितोष बैनर्जी के रोल में हैं जिशू सेनगुप्ता. वो फिल्म के लिए सबसे ज़रूरी काम करते हैं, उसकी हड़बड़ाहट खत्म करते हैं. बेटी अनुपमा के कैरेक्टर में सान्या मल्होत्रा नज़र आई हैं. मां की इगो और इनसिक्योरिटी की शिकार बच्ची, जिसका पूरा बचपन अपने पिता से दूर बिना स्कूल गए निकल गया. अब वो सब उसे खल रहा है, इसलिए मां से चिढ़ी हुई रहती है. सान्या इस रोल में कंन्विंसिंग लगती हैं. अनुपमा के पति अजय का रोल अमित साध ने किया है. छोटा मगर फाइन काम.

शकुंतला देवी यानी वो महिला, जो गणित में कंप्यूटर से भी तेज और एक्यूरेट थीं.
शकुंतला देवी यानी वो महिला, जो गणित में कंप्यूटर से भी तेज और एक्यूरेट थीं.

‘शकुंतला देवी’ की अच्छी बात ये है कि उसका मुख्य किरदार फ्लॉलेस नहीं है. उसे पता है कि उसका किया गलत है. लेकिन उसके मन में जो आता है, उसे जो ठीक लगता है, करती है. लेकिन फिल्म इसे रोमैंटिसाइज़ नहीं करती. हर फिल्म देखने वाले को पता है कि शकुंतला जो कर रही है, वो गलत है. वो जब सुनती है कि उसकी बेटी ने पहला शब्द ‘पापा’ कहा है, तो वो बेचैन हो जाती है. और अपने पति से छीनकर अनुपमा को ले आती है.

अपनी मां के साथ रार ठानकर अपनेे पसंद के लड़के से शादी करती शकुंतला की बेटी अनुपमा बैनर्जी. ये किरदार में सान्या मल्होत्रा ने निभाया है.
अपनी मां के साथ रार ठानकर अपनेे पसंद के लड़के से शादी करती शकुंतला की बेटी अनुपमा बैनर्जी. ये किरदार में सान्या मल्होत्रा ने निभाया है.

ये फिल्म एक मैथेमैटिकल जीनियस की कहानी है. लेकिन फिल्म में शकुंतला की इस काबिलियत को गॉड-गिफ्ट मानकर साइड लाइन कर दिया जाता है. क्योंकि उनके प्रोसेस या प्रैक्टिस की कहीं कोई बात नहीं होती. फिल्म का एक सीन है, जहां छोटी सी बात पर शकुंतला की उसके पति से लड़ाई हो जाती है. परितोष गुस्से में फट पड़ता है. लेकिन उसके इस फ्रस्ट्रेशन को बिल्ड होते हुए कहीं नहीं दिखाया गया. इन्हीं वजहों से शकुंतला देवी ‘सेमी-रियल’ लगती है. यहां चीज़ों को लॉजिक से नहीं इमोशन और स्वैग से डील किया जाता है. इसलिए फिल्म के पास इतना स्पेस रहता है कि वो क्रिएटिव लिबर्टी लेकर असलियत से दूर हो सके.

आज़ाद ख्यालातों वाले परितोष बैनर्जी, जिन्हें शकुंतला ने भरी महफ़िल में होमोसेक्शुअल करार दिया था.
आज़ाद ख्यालातों वाले परितोष बैनर्जी, जिन्हें पत्नी शकुंतला ने अपनी किताब बेचने के लिए होमोसेक्शुअल बता दिया था.

फिल्म के डायलॉग्स, बिलकुल ‘डायलॉग्स’ वाली शैली में ही लिखे गए हैं. दो लोग बात कर रहे हैं लेकिन ऐसा लगता है हर वाक्य बोलकर उन्हें माइक ड्रॉप करना है. लेकिन विद्या को ऐसा करता देख गिल्टी-प्लेज़र वाली फीलिंग आती है. फिल्म की शुरुआत में बैक टु बैक सीन्स में शकुंतला हमें किसी मंच पर खड़ीं मैथ के सवाल सॉल्व करती दिखाई देती हैं. ये बहुत थकाऊ और रिपीटिटीव हो जाता है. और इस दौरान फिल्म इतनी तेज़ी से आगे बढ़ रही होती है कि आपका उसके साथ चलना मुश्किल हो जाता है. जब हमें किसी की कहानी सुनाई जाती है, तो हम उस इन्सान को सिर्फ देखना नहीं, बेहतर तरीके से समझना भी चाहते हैं. लेकिन फिल्म के पास इन चीज़ों के लिए समय नहीं है.

मां-बेटी, शकुंतला और अनुपमा. इनका झगड़ा कोर्ट तक पहुंच गया था.
मां-बेटी, शकुंतला और अनुपमा. इनका झगड़ा कोर्ट तक पहुंच गया था.

ऊपर बताई तमाम बातों के बावजूद इस फिल्म को देखने का एक्सपीरियंस मज़ेदार है. एक रियल लाइफ पर्सनैलिटी, जिनके बारे में आपको ज़्यादा पता नहीं है, उनकी कहानी आंखों के सामने घटते हुए देखना अद्भुत अनुभव है. आप ‘शकुंतला देवी’ को बहुत फिल्मी बता सकते हैं लेकिन ये नहीं कह सकते इसे देखकर एंटरटेन नहीं हुए. आप हंसे या इमोशनल नहीं हुए. फिल्म थोड़ी गहराई में जाती, तो फन डबल हो जाता है. लेकिन जो मिला वो भी काफी फील गुड है.

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