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फिल्म रिव्यू- ईब आले ऊ

कोरोना वायरस की वजह से इस बार दुनिया के तमाम फिल्म फेस्टिवेल्स को रद्द करना पड़ा. इसका जुगाड़ ये निकला कि दुनिया के 20 मशहूर फिल्म फेस्टिवल्स ने मिलकर ‘वी आर वन’ (We Are One) नाम का एक ऑनलाइन फिल्म फेस्ट शुरू कर दिया है. इस फेस्ट में दिखाई जा रही फिल्मों को आप We Are One के यूट्यूब चैनल पर जाकर देख सकते हैं. जो 20 फिल्म फेस्टिवल इसे क्यूरेट कर रहे हैं, उनमें MAMI (Mumbai Academy Of Moving Image) यानी मुंबई फिल्म फेस्टिवल भी शामिल है. इस फेस्ट में इंडिया की कुल चार फिल्में दिखाई जानी हैं. इनमें से पहली फिल्म है प्रतीक वत्स डायरेक्टेड ‘ईब आले ऊ’.

‘ईब आले ऊ’, आवाज़ के अलग-अलग आरोह-अवरोह में इन तीन शब्दों का इस्तेमाल बंदरों को भगाने के लिए किया जाता है. लेकिन ये फिल्म पूरी तरह से बंदरों को भगाने के बारे में ही नहीं है. बंदर इस फिल्म के रूपक हैं. दूसरे राज्यों से आए झुग्गीवाली बस्तियों में रहने वाले निचले आर्थिक वर्ग के लोगों की कहानी के. साधारण लोगों की असाधारण कहानी, जो बिलकुल किसी फिल्म जैसी नहीं लगती. उस असलियत सी लगती है, जिसे हम देखना नहीं चाहते.

राष्ट्रपति भवन के सामने से अपनी ड्यूटी करता हुआ मस्ती में लौटता अंजनी.
राष्ट्रपति भवन के सामने से अपनी ड्यूटी करता हुआ मस्ती में लौटता अंजनी.

लुटियंस दिल्ली में बंदरों का भारी कहर है. उन्हें भगाने के लिए नगर निगम ने ठेका दे रखा है. वो ठेकेदार बंदर भगाने के लिए काम की तलाश में दूसरे शहरों से आए लोगों को ढूंढते हैं. ऐसा ही एक ठेकेदार है नारायण. अंजनी नाम का एक कम पढ़ा-लिखा लड़का नौकरी की तलाश में अपनी दीदी-जीजा के पास दिल्ली आता है. दीदी पेट से है और जीजा एक अम्यूज़मेंट पार्क में सिक्योरिटी गार्ड. जीजा ठेकेदार से बात करके अंजनी को बंदर भगाने वाला काम दिला देता है. अंजनी इस पेशे में ही नहीं शहर में भी नया. इसलिए उसे महिंदर नाम का एक लड़का ट्रेनिंग देता है, जो आवाज़ निकालकर बंदर भगाने का एक्सपर्ट है. जहां सारा स्ट्रगल खत्म होना था, वहां से अंजनी का असल संघर्ष शुरू होता है. क्योंकि वो तमाम कोशिशों के बावजूद उस अंदाज़ में ‘ईब आले ऊ’ की आवाज़ नहीं निकाल पाता. वो गैर-रवायती तरीके से अपना काम करने की कोशिश करता है. लेकिन ये बात उसके कॉन्ट्रैक्टर के गले नहीं उतरती. अंजनी बहुत सारी कोशिशें करता है, अपनी नौकरी ढंग से करने और उसे बचाए रखने की. इस लड़के, उसके परिवार, समाज और उन्हें देखने के हमारे नज़रिए की कहानी है फिल्म ‘ईब आले ऊ’.

अपने दोस्त और सीनियर महिंदर से बंदर भगाने के गुर सीखता अंजनी.
अपने दोस्त और सीनियर महिंदर से बंदर भगाने के गुर सीखता अंजनी.

आप इस फिल्म को सटायर या डार्क कॉमेडी जैसे जॉनरों में तोड़ नहीं सकते. बस इसे देखकर समझने की कोशिश कर सकते हैं. ये फिल्म क्या कहना चाहती है. या ये फिल्म ऐसा क्या कहना चाहती है. लेकिन आप निराश होते हैं. क्योंकि फिल्म बस एक कहानी दिखा रही है. वो आपसे कुछ कह नहीं रही. लेकिन उसे देखते वक्त भी आप उसे सुन नहीं पा रहे, तो ये आपकी समस्या है. ‘ईब आले ऊ’, उन सभी सिनेमाई स्टीरियोटाइप्स को तोड़ने का काम करती है लेकिन उसका मक़सद सिर्फ उतना ही नहीं है. एक निम्न वर्गीय परिवार कैसा होता है, ये आपने तमाम फिल्मों में देखा होगा. लेकिन वो असल में कैसा होता है, वो आप यहां देखते हैं.

फिल्म 'ईब आले ऊ' के एक सीन में फिल्म का नायक अंजनी, जिनका किरदार शार्दुल भारद्वाज ने निभाया है.
फिल्म ‘ईब आले ऊ’ के एक सीन में फिल्म का नायक अंजनी, जिनका किरदार शार्दुल भारद्वाज ने निभाया है.

एक परिवार है, जो पैसे और सर्वाइवल के नाम पर हमारी-आपकी तरह सबकुछ या कुछ भी करने पर उतारू नहीं है. वो कॉम्प्रोमाइज़ नहीं करना चाहते. उनके लिए उनकी डिग्निटी सबसे ऊपर है. अंजनी बंदर भगाने का काम करने को तैयार है लेकिन उस तरीके से करने को तैयार नहीं है, जैसे उसे कहा जा रहा है. उसके पास उससे बेहतर और कारगर तरीके हैं लेकिन उसे अमल में लाने की परमिशन नहीं है. जैसे फिल्म में एक सीन जहां अंजनी अपनी दोस्त से ऑनलाइन नौकरी ढूंढने में मदद मांगता है. उसे झाड़ू-कटका करने जैसी नौकरियां दिखाई देती हैं लेकिन वो ये सब नहीं करना चाहता. जब ऑनलाइन काम नहीं बनता, तब वो मार्केट में दुकानों पर घूमकर कुछ भी काम करने को तैयार हो जाता है. हर घर के ताले और गाड़ियों पर हाथ से अपना फोन नंबर लिखकर चिपका आता है. उसे नहीं पता कि उसे क्या काम मिलने वाला है लेकिन उसे झाड़ू-पोछा नहीं करना है.

अपनी बहन की चंपी करता हुआ, उन्हें अपना वायरल वीडियो दिखाता अंजनी.
अपनी बहन की चंपी करता हुआ, उन्हें अपना वायरल वीडियो दिखाता अंजनी.

एक निम्न आर्थिक वर्ग का जो रोमैंटिसाइजेशन होता है, वो यहां नहीं है. अगर आप गरीब परिवार से हैं, तो आप धूर्त, मक्कार या खूनी कुछ भी हो सकते हैं. और वो कहीं न कहीं जस्टिफाई हो जाएगा. ऐसा हमारी फिल्मों ने हमें सिखाया है. ‘ईब आले ऊ’ देखना उन सभी फिल्मों को अनलर्न करने जैसा है. जब हम ये फिल्म देख रहे होते हैं, तब एक बार को हमें भी ये लगने लगता है कि अंजनी वो सब क्यों नहीं कर लेता, जो उसे करने को कहा जा रहा है. लेकिन सारी लड़ाई ही वो नहीं करने की है. जो बचा है उसे बचा लेने की है. उसे बचाने के लिए लड़ने की है. उस समय आपको भान होता है कि आप कितने प्रिविलेज्ड हैं. लेकिन ये रियलाइजेशन आपको बिलकुल खुश नहीं करता.

फिल्म की राइटिंग बड़ी शानदार और माइन्यूट है. वो आपसे कोई चीज़ बोलकर नहीं कहती. वो इस काम में अपने किरदारों की मदद लेती है. किरदारों से याद आया फिल्म में अंजनी का रोल शार्दुल भारद्वाज नाम के एक्टर ने किया है. अगर परफेक्ट जैसा कुछ होता है, तो ये लड़का उसके काफी करीब था. कुछ फिल्में ऐसी होती हैं, जिसका हर डिपार्टमेंट एक-दूसरे से आगे निकलने की फिराक में रहता है. ‘ईब आले ऊ’ वैसी ही एक फिल्म है. आप फिल्म के सीन्स या डायलॉग्स को तोड़कर नहीं देख सकते. क्योंकि उससे हज़ार चीज़ें निकलेंगी, जिनका आप सिर्फ ज़िक्र करके आगे नहीं बढ़ सकते. इसलिए ‘ईब आले ऊ’ को एक मुकम्मल फिल्म के तौर पर देखा जाना चाहिए. समझा जाना चाहिए. और याद रखा जाना चाहिए कि इस मार्केटिंग के दौर में भी कोई फिल्म अपना ईमान नहीं बेचना चाहती है. वो खालिस आर्टवर्क बनी रहना चाहती है, जिसे हर इंसान अपनी समझ के हिसाब से समझे.

फिल्म ‘ईब आले ऊ’ का ट्रेलर आप यहां देख सकते हैं:


 

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