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क्या कोरोना वैक्सीन लगवाने के दो साल के अंदर मौत हो जाएगी? सच जानिए

फ्रांस के नोबेल पुरस्कार विजेता लुच मोंतानिए का एक वीडियो सोशल मीडिया में वायरल हो रहा है. इस मैसेज में वह कहते दिखते हैं कि लोगों के वैक्सीनेशन के कारण वायरस के नए-नए वैरिएंट पैदा हो रहे हैं. उन्होंने कहा कि दुनिया के महामारी विज्ञानियों को इस घटना के बारे में जानकारी है लेकिन इसके बाद भी वह ‘चुप’ हैं. उन्होंने कहा कि इस घटना को ADE यानी ‘एंटीबॉडी डिपेंडेंट इनहेंसमेंट’ कहा जाता है.

अब वीडियो ही नहीं वायरल है. इस वायरल वीडियो के आधार पर एकाध जगह स्टोरी छपी दिखाई देती है. एक तो लाइफसाइट न्यूज़ नाम की वेबसाइट पर. हेडिंग लगी है कि कोरोना वैक्सीनेशन से बहुत बड़ी ग़लती हो रही है. और ये स्टोरी लोगों के इनबॉक्स में धड़ाधड़ पहुंच रही है. साथ में लिखा हुआ है कि जो लोग आज कोरोना की वैक्सीन लगवा रहे हैं, वो लोग 2 साल के अंदर मर जायेंगे.

लुच मोंतानिए फ्रांस के वायरोलॉजिस्ट हैं. AIDS वायरस पर किए उनके कामों के लिए साल 2008 में उन्हें नोबेल पुरस्कार भी मिला था. इस तरह का दावा क्यों करेंगे, जो दुनिया भर के वैज्ञानिकों के किए दावे से बिलकुल अलग है? यहां पर हम आपको साफ़ शब्दों में बता रहे हैं. ये मैसेज फ़ेक है. 100 परसेंट फ़ेक. भारत सरकार की संस्था PIB ने भी इसका फैक्टचेक किया है और ट्विटर पर लोगों को इस फेक मैसेज के बारे में जानकारी दी है.

अब जानते हैं कि सच क्या है. सबसे पहले लुच मोंतानिए के इंटरव्यू में क्या है? ये जानते हैं.

lifesitenews.com की एक खबर के मुताबिक लुच मोंतानिए ने कुछ वक्त पहले एक इंटरव्यू दिया था जिसे अमरीका के RAIR Foundation ने खासतौर पर ट्रांसलेट किया था. इस ट्रांसलेटेड इंटरव्यू में जो बातें कही गयी हैं, वो हमने आपको बतायीं.

इसी कथित इंटरव्यू में लुच मोंतानिए कहते हैं कि काफी महामारी विशेषज्ञ इन चीज़ों के बारे में जानते हैं, लेकिन चुप हैं. उन्होंने कहा,

“जो समस्या हमारे सामने है उसे ADE यानी एंटीबॉडी डिपेंडेंट इनहेंसमेंट कहा जाता है. दरअसल वैक्सीन एंटीबॉडी बनाती है. ये चीज वायरस को मरने के लिए मजबूर करती है या फिर दूसरा रास्ता खोजने के लिए. इसी तरह नए वैरिएंट बनते हैं. ये वैक्सीनेशन है जो नए वैरिएंट के लिए जिम्मेदार है.”

इस ट्रांसलेटेड इंटरव्यू के मुताबिक़, लुच का कहना है कि दुनिया भर के देशों में जैसे-जैसे वैक्सीनेशन हुआ है, वायरस के नए वैरिएंट सामने आए हैं और मौत के मामले बढ़े हैं. इन नए वैरिएंट पर वैक्सीन काम नहीं करती है. दुनिया भर में यही हो रहा है, ऐसा दावा सुनाई देता है.

सच क्या है?

सच ये है कि ये दावा ग़लत है. कई सारे वैज्ञानिक इस दावे को ग़लत मानते हैं. प्रोफेसर लुच मोंतानिए की इन बातों से विशेषज्ञ और फ़ैक्ट चेक करने वाली वेबसाइटें सहमत नहीं हैं. मार्च के महीने में Medpage Today में छपे एक आर्टिकल के मुताबिक,”वैज्ञानिकों का मानना है कि ADE का कोविड-19 वैक्सीन्स के साथ कोई संबंध नहीं है.”

हमने कुछ वैज्ञानिकों से बात की. एक पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट ने नाम नहीं छापने की शर्त पर हमसे कहा,

“ये वायरल मैसेज काफी हतोत्साहित करने वाला है. पहली बात तो ये कि प्रोफेसर ने ये कहा ही नहीं है कि वैक्सीन लगवाने वाला 2 साल में मर जाएगा. उन्होंने वैरिएंट पर अपना एक व्यू दिया है. ये बयान उनकी निजी सोच है. वे ऐसा मानते हैं. लेकिन दुनिया भर के वैज्ञानिक, डॉक्टर, एक्सपर्ट अगर इतनी बड़ी वैक्सीनेशन ड्राइव चला रहे हैं तो कुछ अच्छे के लिए ही चला रहे होंगे ना. प्रोफेसर लुच का बयान उनका अपना बयान है. बस. मैं उनके इस बयान से एकदम सहमत नहीं हूं.”

हमने वायरॉलॉजिस्ट दिलीप तिवारी से बात की. उन्होंने हमसे कहा,

“एक कॉन्सपिरेसी थ्योरी है जो ये कहती है कि वैक्सीन लगवाने से बच्चे को ऑटिज्म हो जाता है. कुछ लोग इसको सच मानते हैं और बच्चों को वैक्सीन नहीं लगवाना चाहते हैं लेकिन ये वैज्ञानिक तौर पर साबित हो चुका है कि बचपन में कई तरह के वैक्सीन लगवाना बच्चों के लिए कितना जरूरी हैं. बेशक लुच मोंतानिए बड़े वैज्ञानिक हैं, उन्हें नोबेल मिला है, उनका पूरा सम्मान है लेकिन वे गलत बात कह रहे हैं, गलत डेटा बता रहे हैं.”

दिलीप तिवारी आगे कहते हैं,

“लुच मोंतानिए जो कहें डेटा तो ये बताता है कि जहां-जहां वैक्सीनेशन हुआ है, वहां नए वैरिएंट खत्म हुए हैं और लोग सामान्य जीवन की ओर बढ़े हैं. आप इजरायल को देखिए, अमेरिका को देखिए, ब्रिटेन को देखिए, चीन को देखिए, कहां है नया वैरिएंट, कहां लोगों की मौत हो रही है? समझिए बात को कि वैक्सीन तो संक्रमण की चेन को तोड़ती है. अगर चेन टूटी तो नया वैरिएंट बनेगा ही नहीं. डेटा यही कहता है, साइंस यही कहता है.”

हमने एक और वायरॉलॉजिस्ट से बात की. सैन फ्रांसिस्को में रह रहे वायरोलॉजिट्स उज्जवल राठौर कहते हैं,

“प्रोफेसर लुच मोंतानिए काफी पहले ही साइंस से नाता तोड़ चुके हैं. वो पिछले लंबे वक्त, साल 2010 से ऐसी ही कॉन्सपिरेसी थ्योरी बताते रहे हैं. वे जो डेटा बता रहे हैं, असली डेटा उसके एकदम उलट है. वो जिस ADE यानी ‘एंटीबॉडी डिपेंडेंट इनहेंसमेंट’ की बात कर रहे हैं उसका भी अभी तक कहीं कोई प्रमाण नहीं है. वैक्सीन पहले जानवरों पर टेस्ट की जाती है, उसके बाद इंसानों पर कई चरणों में क्लीनिकल ट्रायल होते हैं. दुनिया में बहुत बड़े-बड़े वैज्ञानिक इस वैक्सीनेशन के, वैक्सीन बनाने के काम से जुड़े हुए हैं. जिन देशों में वैक्सीनेशन हुई है वहां हालात सुधरे हैं नाकि खराब हुए हैं. ये बयान पूरी तरह गलत है, वैक्सीन पूरी तरह सुरक्षित हैं.”

इसके अलावा कुछ फ़ैक्ट चेकर्स ने भी लुच के दावे पर गम्भीरता से सवाल उठाए हैं. फ़ैक्ट चेक करने वाली वेबसाइट ऑल्ट न्यूज़ के को-फाउंडर प्रतीक सिन्हा ने ट्वीट किया,

“ऑल्ट न्यूज़ को सैकडों ऐसी रिक्वेस्ट मिल रही हैं जिनमें ये दावा चेक करने को कहा जा रहा है, कि वैक्सीन लगवाने वाले लोग दो सालों में मर जाएंगे. लेकिन लोग ऐसे दावों को बिना फैक्ट चेक के ही खारिज क्यों नहीं कर देते हैं. अगर ऐसा होगा तो पूरे के पूरे देश खाली हो जाएंगे.”

न्यूज़ एजेंसी फ़्रांस प्रेस यानी AFP ने भी एक लम्बा चौड़ा फ़ैक्ट चेक किया है. सिर्फ़ इस दावे को लेकर नहीं, बल्कि लुच मोंतानिए के कई बयानों को उन्होंने केंद्र में रखा है. कहा है कि लुच मोंतानिए भ्रम फैला रहे हैं. ये दावा कहीं से भी सही नहीं है.

बात क्या निकली? बात ये निकली कि लुच मोंतानिए का दावा झूठा है. ग़लत है. तो आप एकदम तैयारी से वैक्सीन लगवाइए. अपना ख़याल रखिए. एकदम बेधड़क.


 

वीडियो- 18 से 44 साल वालों को बिना रजिस्ट्रेशन के कोरोना वैक्सीन लेने के लिए क्या करना होगा?

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