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मूवी रिव्यू: AK vs AK

अपने अनयूजुअल प्रमोशन टैक्टिक्स की वजह ‘AK vs Ak’ का भरपूर बज़ था. ट्रेलर से ही ज़ाहिर था कि हिंदी सिनेमा की दुनिया में ये कुछ नया प्रयोग है. स्टार कास्ट में अनिल कपूर और अनुराग कश्यप जैसे धुरंधर थे. डायरेक्टर के खाने में विक्रमादित्य मोटवानी जैसा तगड़ा नाम लिखा हुआ था. ज़ाहिर है इस फिल्म से तगड़ी उम्मीदें होनी थीं. क्या इन उम्मीदों को पूरा किया है इस फिल्म ने? आइए जानते हैं.

# कहानी सचमुच फ़िल्मी है

कहानी फ़िल्मी है, क्योंकि फिल्मवालों की है. आत्ममुग्ध डायरेक्टर अनुराग कश्यप गुज़रे ज़माने के सुपरस्टार अनिल कपूर से खफा है. क्यों? क्योंकि अनुराग के स्ट्रगल के दिनों में अनिल ने उनकी फिल्म ‘ऑल्विन कालीचरण’ को करने से इनकार किया था. खुद को देसी टेरेंटिनो समझने वाले अनुराग को विश्वास है कि अनिल कपूर का स्टारडम इतिहास की बात है. अब वो इररिलेवंट एक्टर है. उधर अनिल कपूर का दावा है कि अनुराग कश्यप का ‘मैं ब्रम्ह हूं’ वाला ऐटीट्यूड फर्ज़ी है और उसकी फ़िल्में दर्शक देखना ही नहीं चाहते. दिलों की ये कड़वाहट एक पब्लिक फंक्शन में झगड़े के रूप में सामने आती है और अनुराग कश्यप के बुरे दिन शुरू हो जाते हैं.

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अनुराग और अनिल की आपसी रंजिश दिलचस्प ढंग से दिखाई गई है. (फोटो – AK vs AK ट्रेलर)

तिलमिलाया अनुराग कश्यप बदला लेने के लिए एक यूनिक आईडिया ले आता है. वो अनिल की बेटी सोनम कपूर का अपहरण करता है. फिर अनिल कपूर के पास पहुंचकर कहता है कि अपनी बेटी को बचाने के लिए उसके पास सुबह सूरज निकलने तक का वक्त है. अनिल को अपनी बेटी रात भर में खोजनी है और इस तमाम वक्त कैमरा ऑन रहेगा. इसके बाद अनिल की जो भागदौड़ शुरू होती है, वो क्लाइमैक्स तक चलती है. अनिल-अनुराग के बिछी इस बाज़ी में हुकुम का इक्का किसके पास निकलता है, ये जानने के लिए फिल्म देख डालिए. निराश नहीं होंगे.

# कनेक्ट करती फिल्म

‘AK vs Ak’ की सबसे बड़ी ताकत इसका कॉन्सेप्ट ही है. हम हिंदी वालों को बॉलीवुड ज़्यादातर एक ही ढर्रे पर बना माल परोसता रहता है. ऐसे में सिनेमा में कुछ नया प्रयोग होता दिखाई देता है, तो उसका होना भर अच्छा लगता है. वो प्रयोग एंगेजिंग भी निकल आए तो सोने पे सुहागा. ‘AK vs Ak’ ऐसा ही एक एक्सपेरिमेंट है, जो बहुत हद तक कामयाब रहा है. फिल्म के पहले हाफ में तो यकीनन. फिल्म के सामने ये चैलेंज था कि जो चल रहा है, वो स्क्रिप्टेड होने के बावजूद असली लगे. रियल और रील का फर्क मिटता हुआ दिखाई तो दे, लेकिन उसकी वजह से दर्शक का मज़ा खराब न हो. इस बैलेंस को विक्रमादित्य मोटवानी कुशलता से मेंटेन करते हैं.

ज़्यादातर वक्त हम फिल्म को डायरेक्टर के लेंस से नहीं, फिल्म में अनिल का पीछा करते कैमरामन की नज़रों से ही देखते हैं. जो घट रहा है, वो अनिल के साथ-साथ हमारे लिए भी अप्रत्याशित है और हम रियल टाइम में उसके गवाह बन रहे हैं. ये एक दर्शक के तौर पर हमारे लिए नया अनुभव साबित होता है और इसीलिए फिल्म से कनेक्ट बनाए रखता है. हालांकि फिल्म के सेकंड हाफ में ये कनेक्शन थोड़ा कमज़ोर पड़ता है और फिल्म, फिल्म जैसी लगने लगती है. एक थ्रिलर फिल्म लेकिन फिल्म ही.

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अनिल कपूर का सर्च मिशन शुरू-शुरू में बहुत रियल लगता है, बाद में प्रेडिक्टेबल हो जाता है. (फोटो – AK vs AK ट्रेलर)

# USP क्या है?

फिल्म की सबसे ख़ास बात है इसके चुटीले रेफ्रेंसेस. जो बात-बात पर आते हैं. चाहे अनुराग के भाई अभिनव कश्यप का बॉक्स ऑफिस पर ज़्यादा सफल होना हो, या हर्षवर्धन कपूर का ‘भावेश जोशी’ के लिए विक्रमादित्य मोटवानी को कोसना. या फिर तापसी पन्नू का ट्विटर पर अनुराग के खिलाफ लिखना. एक सीन में अनुराग कश्यप नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी को याद दिलाते हैं कि उनका करियर अनुराग कश्यप की फिल्मों ने बनाया है. इन्हीं छोटे-छोटे संदर्भों में दर्शकों का फिल्म से कनेक्शन स्ट्रोंग होता जाता है. लेकिन जैसा कि मैंने पहले भी कहा लेखन की ये स्मार्टनेस ज़्यादातर पहले हाफ में है. दूसरे हाफ में फिल्म लीनियर हो जाती है.

# कौनसा AK भारी है?

एक्टिंग की बात की जाए तो किसी एक AK को ज़्यादा पॉइंट्स देना दूसरे के साथ ज़्यादती होगी. एक्टिंग के मामले में ये ‘AK vs Ak’ कम और ‘AK कॉम्प्लिमेंट्स AK’ ज़्यादा है. अनिल कपूर सुपरस्टार का दंभ और लाचार बाप की बेबसी, एक जैसी सहजता से पेश करते हैं. एक सीन में उन्हें सोनम की तलाश का क्लू हासिल करने के लिए जनता के सामने ‘वन टू का फोर’ पर नाचना पड़ता है. वो सीन शानदार निभाया है इस चिरयुवा सुपरस्टार ने.

अनुराग कश्यप उतने ही शातिर लगे हैं, जितनी रोल की डिमांड थी. बेटी को खोजते अनिल कपूर की परेशानी से आनंदित होते हुए उनके होंठों पर जो एक कुटिल मुस्कान रहती है, वो रियल लगती है. ट्विटर पर उनकी बेबाक मौजूदगी ने उनकी पर्सनालिटी का जो चित्र बनाया है, ये रोल उसके बहुत करीब जान पड़ता है. एरोगेंट, आत्ममुग्ध जीनियस. फिल्म में एक ऐसा पॉइंट आता है, जब अनुराग कश्यप का अपनी स्क्रिप्ट पर से कंट्रोल छूटने लगता है. उस वक्त उनका अभिनय और निखरकर सामने आता है.

फिल्म में बाकी जिस-जिस की हाज़िरी लगी है, सब कहानी को आगे बढ़ाने में सहायक साबित होते हैं. सोनम कपूर, हर्षवर्धन कपूर, बोनी कपूर वगैरह.

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‘माय नेम इज़ लखन’ पर नाचते हुए अनिल ने अपना फ्रस्ट्रेशन बाखूबी दिखाया है. (फोटो – AK vs AK ट्रेलर)

विक्रमादित्य मोटवानी को इस दौर का हरफनमौला डायरेक्टर कहा जाए, तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी. उनके सीवी पर ‘उड़ान’, ‘लुटेरा’, ‘ट्रैप्ड’ और ‘भावेश जोशी’ जैसी फ़िल्में हैं. जिसमें से हर एक दूसरी से अलग है. इसी लिस्ट में अब ‘AK vs Ak’ का नाम भी जोड़ लीजिए. मोटवानी का डायरेक्शन ज़्यादातर अरसा आपको चिपकाए रखता है. बस आखिरी आधे घंटे में फिल्म थोड़ी प्रेडिक्टेबल हो जाती है. जब गिने-चुने किरदार हों, तो थोड़ा सा दिमाग लगाने पर ही आप असल माजरा भांप लेते हैं. इस जगह आकर फिल्म थोड़ी ढीली पड़ जाती है, अन्यथा एक रफ़्तार बनाए रखती है.

कुल मिलाकर ‘AK vs Ak’ एक उम्दा प्रयोग है, जो कमज़ोर आखिरी आधे घंटे के बावजूद देखा जाना चाहिए.


वीडियो: 

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