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यूपी का वो मुख्यमंत्री जिसने अमिताभ बच्चन को कटघरे में खड़ा कर दिया

राजघराने से ताल्लुक रखते थे पर गरीबों के मसीहा के रूप में जाने जाते थे.

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25 जून 2018 (अपडेटेड: 25 जून 2018, 10:30 AM IST)
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यूपी में दो ऐसे मुख्यमंत्री हुए जिन्होंने भारत की राजनीति को बदल दिया. पहले थे चौधरी चरण सिंह और दूसरे थे विश्वनाथ प्रताप सिंह यानी वी पी सिंह. चरण सिंह ने इंदिरा गांधी की राजनीति के खिलाफ अपनी राजनीति जमाई और वी पी ने राजीव गांधी के खिलाफ. चरण सिंह किसान नेता थे और वी पी राजघराने से ताल्लुक रखने वाले नेता थे जिनको गरीबों का नेता कहा गया.
उस वक्त नारे लगते थे - राजा नहीं फकीर है, देश की तकदीर है. 
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25 जून 1931-27 नवंबर 2008

कांग्रेस पार्टी से ही वी पी यूपी के मुख्यमंत्री बने थे. उस वक्त यूपी में डाकुओं का बड़ा आतंक था. वी पी ने वादा किया था कि डाकुओं को खत्म नहीं कर पाए तो इस्तीफा दे दूंगा. पर दुर्भाग्य से उनके जज भाई को ही डाकुओं ने मार दिया. हालांकि ये अनजाने में हुआ था. पर वी पी ने रिजाइन कर दिया.
वी पी सिंह को उन तीन नेताओं में से एक माना जाता है जिन्होंने कांग्रेस के वोट बैंक में निर्णायक सेंध लगाई. लालकृष्ण आडवाणी और कांशीराम ने तो यूपी से सवर्ण और दलितों को कांग्रेस से छीन ही लिया. पर वी पी ने ओबीसी को भी कांग्रेस से भटका दिया. और तब से अब तक यूपी में कांग्रेस इससे उबर नहीं पाई है.
25 जून 1931 को इलाहाबाद में वी पी का जन्म हुआ था. इलाहाबाद और पुणे में पढ़ाई हुई. पढ़ने में वो अच्छे थे. वी पी ने खुद रामबहादुर राय से अपने इंटरव्यू में कहा था कि "मुझे तो वैज्ञानिक बनना था पर मैं राजनीति में आ गया". आना ही था. पूर्वांचल के समृद्ध परिवार से आते थे. किसी भी पार्टी के लिए बेहतर उम्मीदवार साबित होते. कांग्रेस ने उनको लपक लिया. इससे पहले वो 1947-48 में बनारस के यू पी कॉलेज में यूनियन प्रेसिडेंट रहे. इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में भी नेता रहे. बाद में 1957 में भूदान आंदोलन में भी सक्रिय रहे. अपनी जमीनें दान में दे दीं. इसके लिए पारिवारिक विवाद भी हुआ. कोर्ट तक गया मामला.
1936 में वी पी को मांडा के राजा बहादुर राय गोपाल सिंह ने गोद ले लिया था. 1941 में बहादुर राय की मौत के बाद वी पी को मांडा का 41वां राजा बना दिया गया था.
कांग्रेस में आने के बाद इनका कद बढ़ने लगा. 1969 में वो पहली बार यूपी विधानसभा पहुंचे. 1971 में सांसदी जीते. 1974 में कॉमर्स मिनिस्ट्री में जूनियर मिनिस्टर बन गए. 1977 तक इस पद पर रहे. ये वो दौर था जब इंदिरा के खिलाफ विपक्षी एकजुट हो गए थे. नहीं होते तो बहुत बुरा हाल होता. इमरजेंसी के दौर में सबने देख लिया था कि कभी-कभी एकजुट होना जरूरी होता है. 1977 में कांग्रेस बुरी तरह हारी. बहुत सारे नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी पर वी पी बने रहे. 1980 में इंदिरा गांधी ने फिर बाजी पलट दी. जनता पार्टी का एक्सपेरिमेंट फ्लॉप रहा.
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देश में 1980 में लोकसभा चुनाव और यूपी में विधानसभा चुनाव हुए. वी पी को यूपी का मुख्यमंत्री बनाया गया. इसी वक्त वी पी ने अपनी इमेज गरीबों के लिए लड़ने वाले की बनानी शुरू कर दी. इसी क्रम में मई 1980 में बांदा की तिंदवारी विधानसभा सीट पर उपचुनाव हुए. राजेंद्र सिंह कांग्रेस के कैंडिडेट थे. वी पी ने बुलेट पर राजेंद्र सिंह का प्रचार किया. मुख्यमंत्री होते हुए सरकारी फायदे नहीं लिए. कहा कि कम से कम खर्च हो इसलिए दो पहियों पर प्रचार कर रहा हूं, चार पहियों पर नहीं.
1982 में वी पी के सामने एक समस्या आ गई. उत्तर प्रदेश में डाकुओं का आतंक बहुत ज्यादा बढ़ गया था. फूलन देवी का गिरोह भी लगभग उसी वक्त काम कर रहा था. वी पी ने जनता से वादा कर दिया कि अगर डाकुओं को खत्म नहीं कर पाया तो रिजाइन कर दूंगा. पर एक दुर्भाग्यपूर्ण घटना हो गई. वी पी सिंह के भाई को ही डाकुओं ने मार दिया. वो जंगल घूमने गए थे. हालांकि ये अनजाने में हुआ था. डाकुओं को आइडिया नहीं था कि ये मुख्यमंत्री के भाई हैं. वी पी ने रिजाइन कर दिया.
1984 में इंदिरा गांधी की हत्या हो गई. इसके बाद राजीव गांधी देश के प्रधानमंत्री बने. वी पी सिंह राजीव गांधी की सरकार में वित्त मंत्री और फिर बाद में रक्षा मंत्री रहे. पर राजीव की सरकार में नए लोग बहुत ज्यादा आ गए थे. इनका पुराने नेताओं से मामला फिट नहीं बैठता था. वी पी की भी तकरार होती रहती थी. ऐसा माना जाता था कि वी पी खुद को प्रधानमंत्री पद के काबिल समझते थे और भीतर ही भीतर सपना संजो रहे थे. राजीव के समर्थकों ने उनके कान भरने शुरू कर दिए. कहा जाता है कि वी पी के पास सूचना थी कि कई भारतीय विदेशी बैंकों में खूब पैसा जमा कर रहे हैं. इस पर वी पी ने एक अमेरिकी खुफिया एजेंसी फेयरफैक्स की नियुक्ति कर दी.
इसी बीच स्वीडन ने 1987 में एक सूचना पब्लिक कर दी कि बोफोर्स की 410 तोपों का सौदा भारत के साथ हुआ था जिसमें 64 करोड़ रुपए कमीशन के तौर पर दिए गए. अब ये भारतीय मीडिया में मुख्य खबर बन गई. इसे बोफोर्स घोटाला कहा गया. इसमें राजीव गांधी, अमिताभ बच्चन समेत कांग्रेस के कई नेताओं का नाम आया. मिस्टर क्लीन के नाम से फेमस राजीव गांधी की सरकार के लिए बड़ा झटका था. विपक्ष का कहना था कि राजीव सरकार इस बात की जांच से दाएं-बाएं कर रही थी. कोर्ट से भी उनको राहत मिल गई. पर वी पी के लिए यही सही मौका था जब खुद को राजीव गांधी से अलग दिखाया जा सकता था. वी पी ने राजीव के खिलाफ मोर्चा खोल दिया.
जनता में ये बात फैल गई कि बोफोर्स तोपें अच्छी नहीं हैं, दलाली में खरीदी गई हैं. राजीव की सरकार भ्रष्ट है. हालांकि राजीव के खिलाफ कोई डायरेक्ट इल्जाम साबित नहीं हो पाया था. 1987 में वी पी को कांग्रेस से बाहर कर दिया गया. अब वी पी ने राजीव को जनता की अदालत में खड़ा कर दिया. वी पी ने कहा कि बोफोर्स दलाली की रकम लोटस नाम के विदेशी बैंक में जमा कराई गई है. वी पी चुनाव में छात्रों के साथ रहते. युवा वर्ग को भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ने की बात करने वाला नेता मिल गया था. वी पी बाइक पर भी बैठकर निकल लेते.
कांग्रेस से इस्तीफा देते वक्त कहा था - तुम मुझे क्या खरीदोगे मैं बिल्कुल मुफ्त हूं.
वी पी ने 1988 में नई पार्टी बना ली - राष्ट्रीय मोर्चा. 1989 में लोकसभा चुनाव हुए. पर किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला. तो वी पी ने केंद्र में गठबंधन सरकार बनाई, जिसे एक तरफ से भारतीय जनता पार्टी और दूसरी तरफ से वामपंथी पार्टियों का समर्थन प्राप्त था. लेकिन राष्ट्रीय मोर्चा की यह सरकार 11 महीनों से ज़्यादा नहीं चल सकी. 1991 में रथयात्रा के समय बीजेपी नेता लालकृष्ण आडवाणी की गिरफ़्तारी के बाद पार्टी ने वी.पी. सिंह सरकार के समर्थन वापस ले लिया था.
"मैं प्रधानमंत्री बन गया तो अनिष्ट ही हुआ मानिए. इसलिए इस सवाल पर बहस यहीं खत्म हो तो बेहतर". - वी पी सिंह (टाइम्स ऑफ इंडिया)
पर प्रधानमंत्री रहते हुए वी पी सिंह ने वो काम कर दिया जो किसी ने नहीं सोचा था. ओबीसी को आरक्षण पर मंडल कमीशन की रिपोर्ट दस सालों से पड़ी हुई थी. कोई इसे हाथ नहीं लगाना चाहता था. वी पी सिंह की सरकार ने इसे लागू कर दिया. भारत के सोशल-इकॉनमिक स्ट्रक्चर को इस फैसले ने हिला दिया. ये सब कुछ बदलने वाला फैसला था. यहीं से यूपी में मुलायम सिंह यादव और बसपा से कांशीराम उभरे. यूपी की राजनीति ही बदल गई.
वी पी सिंह ने मंडल के मुद्दे पर खुद कहा था -  गोल करने में मेरा पांव जरूर टूट गया, लेकिन गोल तो हो गया.
उन्होंने कुछ कविताएं भी लिखी थीं -
1. काश उसका दिल एक थर्मस होता एक बार चाह भरी गरम की गरम बनी रहती पर कमबख्त यह केतली निकली.
2. उसने उसकी गली नहीं छोड़ी अब भी वहीं चिपका है फटे इश्तेहार की तरह अच्छा हुआ मैं पहले निकल आया नहीं तो मेरा भी वही हाल होता.
3. मुफ़लिस से अब चोर बन रहा हूं मैं पर इस भरे बाज़ार से चुराऊं क्या यहां वही चीजें सजी हैं जिन्हें लुटाकर मैं मुफ़लिस बन चुका हूं.


 

ये स्टोरी 'दी लल्लनटॉप' के लिए ऋषभ ने की थी.




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