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हैदराबाद एनकाउंटर पर जश्न मनाने वालों! तुम बड़ी ग़लती कर रहे हो

‘मर गए चारों कुत्ते’,
‘इंसाफ हो गया, इससे अच्छी सुबह नहीं हो सकती’,
‘हैदराबाद पुलिस को सलाम’,
‘भारत की बेटी को इंसाफ मिला’,
‘हमें आप पर गर्व है हैदराबाद पुलिस’,
‘कोर्ट इंसाफ नहीं देगी तो सड़क पर इंसाफ होगा’,

ये वो लाइनें हैं जो सोशल मीडिया पर दिन भर चलीं. कारण? सुबह एक ख़बर आई थी.

हैदराबाद गैंगरेप-मर्डर के चारों आरोपी एनकाउंटर में ढेर.

6 दिसंबर की सुबह नींद इसी खबर से खुली. वॉट्सऐप पर मैसेज था. एकबारगी लगा कि फेक न्यूज़ है. लेकिन खबर पक्की निकली.

ख़बर आते ही एक यूफोरिया का माहौल बन गया. झूमते-नाचते लोगों की तस्वीरें आने लगीं. जश्न मनाए जाने के विडियो आने लगे. हैदराबाद में औरतें पुलिस को राखी बांधने लगीं. भीड़ पुलिसवालों को कंधे पर उठाकर झुलाने लगी, उन पर फूल बरसाने लगी. पटाखे फोड़े जाने लगे. सोशल मीडिया तो और ज्यादा लहालोट हो गया है. वही बातें आई, जो आपने ऊपर पढ़ीं.

आम आदमी तो जो कह रहे हैं वो अपनी जगह. फिल्म स्टार्स, स्पोर्ट्स पर्सन और नेता, सब इस जश्न में शरीक हैं.

#क़ानूनी रास्ते से सज़ा नहीं मिली, फिर क्यों खुशी?

महिलाओं, लड़कियों, छोटे बच्चों के साथ यौन हिंसा की खबरों से अखबार पटे होते हैं. शायद ही कोई ऐसा दिन बीतता हो जिसमें इस तरह की कोई खबर न आती हो. रेप की हर खबर के साथ उठती है दोषियों को फांसी पर लटकाने की मांग. फास्ट ट्रैक कोर्ट बनते हैं, सज़ा सुनाई भी जाती है. लेकिन सज़ा डिलीवर होती नहीं दिखती.

उदाहरण देख लीजिए-

2012 में हुआ दिल्ली का बहुचर्चित गैंगरेप-मर्डर केस. यौन हिंसा का ऐसा वीभत्स केस जिसने पूरे देश को दहलाकर रख दिया था. छह आरोपी थे. एक ने जेल में सुसाइड कर लिया था. एक नाबालिग था. फास्ट ट्रैक कोर्ट ने सितंबर, 2013 में सभी आरोपियों को दोषी करार दिया. नाबालिग दोषी को रिमांड होम भेजा. और चार दोषियों को फांसी की सज़ा सुनाई. 2014 में हाईकोर्ट ने फांसी की सज़ा को बरकरार रखा. जून, 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने सज़ा-ए-मौत पर मुहर लगा दी. लेकिन हम 2019 के दिसंबर महीने में हैं. उस घटना को सात साल पूरे होने को हैं, सजा आज तक नहीं मिली है.

भंवरी देवी रेप केस का नाम सुना होगा आपने. 1992 में राजस्थान के एक गांव में पांच आदमियों ने भंवरी देवी का उनके पति के सामने रेप किया. पति को पीटा. 1995 में राजस्थान हाईकोर्ट ने इस मामले को रेप केस नहीं, महज़ असॉल्ट का केस माना. और पांचों दोषियों को सिर्फ 9 महीने की सज़ा दी. फैसले के विरुद्ध हाईकोर्ट में अपील हुई. BBC की 2017 में प्रकाशित एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1995 से 2017 के बीच हाईकोर्ट में इस मामले में सिर्फ एक बार सुनवाई हुई है. जबकि, भंवरी देवी रेप केस के बाद ही विशाखा गाइडलाइंस बनी हैं. ये गाइडलाइंस वर्कप्लेस में महिलाओं के साथ यौन शोषण से डील करती हैं.

इतने चर्चित मामलों में भी न्याय की रफ़्तार ऐसी है, जो किसी का भी भरोसा डिगा दे.

 

Protest
हैदराबाद की घटना के खिलाफ कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक हर जगह प्रदर्शन हुए. फोटो जम्मू की है. (PTI)

इस तरह के लगातार आते मामलों और न्याय में देरी के चलते लोगों में आम धारणा बन गई है कि कोर्ट-कचहरी में टाइम ही बर्बाद होता है, पीड़ितों को इंसाफ नहीं मिलता, दोषी बच जाते हैं, जेल में ऐश करते हैं. कुछ लोग ऐसी भी दलील देते हैं कि देश की अदालतों में लाखों मामले पेंडिंग हैं. ऐसे में पीड़ितों को न्याय मिलने में बहुत अधिक वक़्त लगता है. उन्हें लगता है कि बेहतर तरीका यही है कि पुलिस आरोपियों को पकड़े और कोर्ट-कचहरी जाने की बजाए अपने लेवल पर ही मामला निपटा दे. उनके हिसाब से जो हैदराबाद में हुआ वही होना सही है, वही होना चाहिए था.

तभी एक सांसद लिंचिंग की मांग करती है. तभी अरब के देशों के उदाहरण दिए जाते हैं, फेसबुक पर हमें चीन और माओ की कहानी सुनाई जाती है. चौराहे पर जलाने, काटने, नपुंसक बना देने की बातें बार-बार कही जाती हैं. न्याय का मतलब बर्बरता हो जाता है. लोगों को किसी को तड़पता हुआ देखना है. उसे वही दर्द पाते देखना है, जो किसी विक्टिम ने सहा है.

इस वजह से इस एनकाउंटर को लोग सेलिब्रेट कर रहे हैं. जश्न मना रहे हैं कि आरोपी मारे गए.

#लेकिन इसका एक दूसरा पक्ष भी है

2017 की बात है. गुरुग्राम में रेयान इंटरनैशनल स्कूल है. यहां 7 साल के स्टूडेंट प्रद्युम्न ठाकुर की हत्या हो गई थी. स्कूल के वॉशरूम में. धारदार हथियार से उसका गला रेता गया था. पुलिस पर प्रेशर था. इतने बड़े स्कूल में बच्चे की हत्या हो गई थी. सुरक्षा का क्या. पुलिस ने स्कूल बस के कंडक्टर को गिरफ्तार कर लिया. बताया कि कंडक्टर ने वॉशरूम में बच्चे को मॉलेस्ट करने की कोशिश की, बच्चा चीखने लगा तो उसने उसे मार दिया. क्लीनर ने भी दबाव में गुनाह कुबूल कर लिया. बयान दिया-

मैं उसके साथ गलत काम करना चाहता था. वो नहीं माना तो मैंने उसको मार दिया.

Pradyumna Thakur Case
सितंबर, 2017 में प्रद्युम्न ठाकुर (लेफ्ट) की हत्या हुई थी. इस केस में सीबीआई जांच में पुलिस की थ्योरी पूरी तरह गलत निकली थी. फोटो में दाईं तरफ हत्या का नाबालिग आरोपी है.

प्रद्युम्न के पिता इस थ्योरी से संतुष्ट नहीं थे. उन्होंने सीबीआई जांच की मांग की. हरियाणा सरकार पहले ही काफी दबाव में थी. सीबीआई जांच बिठाई गई. इसमें पता चला कि हत्या स्कूल के ही 11वीं क्लास के एक बच्चे ने की थी. उस दिन स्कूल में होने वाला टेस्ट पोस्टपोन करने के लिए.

इस मामले में पुलिस की थ्योरी पूरी तरह गलत साबित हुई थी. अगर हैदराबाद के केस में ऐसा ही हुआ हो तो? इस केस में भी पुलिस पर जबर दबाव था. ऐसे में हो सकता है कि गिरफ्तारी, एनकाउंटर पब्लिक सेंटिमेंट्स को शांत करने के लिए किया गया कदम हो. हो ये भी सकता है कि पुलिस की थ्योरी सही हो. मारे गए आरोपी ही असल दोषी हों. उसके बाद भी एनकाउंटर को जस्टिफाई नहीं किया जा सकता है.

#दिक्कत क्या है?

100 दोषी बच जाएं तो कोई बात नहीं, लेकिन निर्दोष को सज़ा नहीं होनी चाहिए.

जब भी हम मॉडर्न जस्टिस सिस्टम की बात करते हैं. ये लाइन हमारे कानों में ज़रूर पड़ती है. जो चार लोग एनकाउंटर में मारे गए वो ‘आरोपी’ थे. उनका दोष सिद्ध नहीं हुआ था. हमारा कानून हर आरोपी को ये मौका देता है कि वो खुद को निर्दोष साबित कर सके. लेकिन इस मामले में उन चारों आरोपियों को ये मौका नहीं मिला.

एनकाउंटर का जश्न मनाना इस बात की ओर इशारा करता है कि न्यायपालिका से लोगों का भरोसा खत्म हो रहा है. गिरफ्तारी, पेशी, सुनवाई, फैसला और अपील. ये भारत में न्याय की प्रक्रिया है. ताकि पीड़ित, आरोपी और पुलिस अपना-अपना पक्ष कोर्ट में रख सकें. लेकिन ये प्रक्रिया वक्त मांगती है, ताकि सही मायनों में न्याय हो सके.जूडिशल सिस्टम से भरोसा ख़त्म हो जाना. या न्यायिक प्रक्रिया में आस्था न रह जाना. उसकी साख और विश्वसनीयता ख़त्म होना. ये ही स्थितियां हैं, जो इस तरह के भीषण शॉर्टकट और ‘टू-मिनट जस्टिस’ की भावना जस्टिफाई कर रही हैं.

अगर ऐसा है, तो ये हम सबके लिए बहुत परेशान होने वाली बात है. देश चलाने के लिए सिस्टम है एक. मतलब, कई चीजों का सिस्टम मिलाकर देश चलता है. न्यायपालिका का बहुत अहम रोल है इस सिस्टम में. एक मॉडर्न स्टेट की निशानी है उसका जूडिशियल सिस्टम. उसमें लोगों का भरोसा बना रहना चाहिए. इसीलिए इसकी जो कमियां हैं, इसके जो दोष हैं, उन्हें ख़त्म करने की ईमानदार कोशिश की जानी चाहिए. हम तालिबान राज में तो रहते नहीं हैं न.

Encounter Site
एनकाउंटर को लेकर लोगों में इतना यूफोरिया था कि खबर मिलते ही साइट पर काफी लोग इकट्ठे हो गए थे. (PTI)

सबसे बड़ा सवाल. 

क्या हम लिंचिस्तान की तरफ बढ़ रहे हैं? क्या दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र भीड़तंत्र की तरफ बढ़ रहा है? रेप का हर मामला सामने आने के बाद मांग उठती है कि रेपिस्ट का लिंग काट दिया जाए. उसे सरेराह फांसी पर लटका दिया जाए, इससे नज़ीर पेश होगी. बीते कुछ सालों में मॉब लिंचिंग के कई मामले सामने आए हैं, सिर्फ शक के आधार पर लोगों को पीट-पीटकर मार दिया गया. ऐसी घटनाएं नज़ीर पेश नहीं करतीं. बढ़ावा देती हैं उस मानसिकता को जो हिंसक है, और गैरकानूनी भी. लिंच करना या भीड़ के हाथों ‘इंसाफ़’ करने जैसी बातें बेहद मध्यकालीन, बर्बर और क्रूर सोच है. दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र पर ये कतई नहीं फबती.

दोषियों को सज़ा मिलनी चाहिए. क़ानून के हिसाब से. और रेप-हत्या, बच्चों के साथ यौन-हिंसा जैसे मामलों में तो कड़ी से कड़ी सज़ा होनी चाहिए. चाहे सज़ा मौत की हो या उम्रकैद की. लेकिन फैसला करने, सज़ा देने का काम न्याय पालिका का है. पुलिस का नहीं. न ही आम जनता का. हमें ये बात पल-पल याद रखनी चाहिए. लोकतंत्र का नागरिक होने की बड़ी जिम्मेदारी होती है. आप थोड़े से लाइन से भटके नहीं कि पूरे सिस्टम के बर्बाद होने का जोख़िम हो जाता है. अगर आपको लिंचिंस्तान शब्द पर आपत्ति है, तो आपको ऐसी स्थितियां पैदा करनी होंगी कि हिंदुस्तान और लिंचिंग ये दो शब्द कभी एक वाक्य में साथ न आएं.


वीडियोः तेलंगाना रेप-मर्डर केस: पीड़ित परिवार ने कहा, ना निर्भया केस के बाद हालात बदले, ना अब बदलेंगे

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