Submit your post

Follow Us

ईरान की इविन जेल से आए दरिंदगी के वीडियोज़ को किसने लीक किया?

ईरान की राजधानी तेहरान में एक जेल है. इविन जेल. अब इसकी कुछ कहानियां सुन लीजिए.

नंबर एक-

‘ये जनवरी 1982 की बात है. रात के 9 बजे थे. तभी रेवोल्यूशनरी गार्ड्स के दो सैनिक मेरे घर में घुसे. उन्होंने मुझे घर से घसीटकर कार में डाल दिया. इसके बाद कार सीधे एक जेल में रूकी. उन्होंने मेरी आंख पर पट्टी बांध दी थी. फिर मुझसे एक लड़की के बारे में पूछा गया. मैं उसके बारे में नहीं जानती थी. इसके बाद दो लोगों ने मेरे हाथों में हथकड़ी बांध दी. फिर बिस्तर पर उल्टा लिटा दिया. इसके बाद उन्होंने मेरे तलवों पर चाबुक से बेतहाशा मारा. तब से रेप और टॉर्चर की घटनाएं आम हो गईं.’

ये क़िस्सा मरीना नेमत ने स्काई न्यूज़ में लिखे एक आर्टिकल में बयां किया था. दिसंबर 2017 में. मरीना को उस जेल में दो साल तक रहना पड़ा था. 1982 से 1984 के बीच. गिरफ़्तारी के वक़्त उनकी उम्र महज 16 साल थी. मरीना का कसूर बस इतना था कि उन्होंने इस्लामिक क्रांति के ख़िलाफ़ चल रहे प्रोटेस्ट में हिस्सा लिया था. मरीना नेमत 1991 में ईरान छोड़कर कनाडा चलीं गई. तब से वो ईरान के जेलों की बदहाली के ख़िलाफ़ प्रदर्शन कर रहीं है.

नंबर दो-

दूसरा क़िस्सा सुनाया था एक टैक्सी ड्राइवर ने. नाम फ़रज़ाद. उसके पास एक दिन पुलिस स्टेशन से फ़ोन आया. कहा गया कि थाने आकर हाज़िरी दें. फ़रज़ाद को लगा कि ये उसकी ड्राइविंग से जुड़ा मसला है. लेकिन आगे जो हुआ, वो उसकी सोच से बिल्कुल इतर था. फ़रज़ाद ने पुलिसवालों से वॉरंट दिखाने को कहा. इस बात का किसी ने जवाब नहीं दिया. उल्टा, फ़रज़ाद को नक़ाब पहनाकर जेल ले जाया गया.

वहां उसे वार्ड नं. 209 में रखा गया. इसे ईरान की इंटेलीजेंस मिनिस्ट्री चलाती है. फ़रज़ाद को पहले दिन सुबह आठ बजे एक कमरे में ले जाया गया. वहां उससे कुछ सवाल पूछे गए. जवाब नहीं देने पर बेइंतहा पिटाई की गई. ये सिलसिला अगले दो हफ़्ते तक चला. फिर एक दिन ट्रायल हुआ. जज ने पांच मिनट के भीतर फ़ैसला सुना दिया. सरकार-विरोधी एक संगठन से संबंध रखने के आरोप में पांच साल क़ैद. फ़रज़ाद को अपनी बात रखने का मौका तक नहीं दिया गया.

आपने दो अनुभव सुने. लेकिन पूरी कहानी यहीं तक सीमित नहीं है. इविन जेल को दुनिया की सबसे ख़तरनाक जेलों में से एक माना जाता है. इसमें हुए अत्याचार की कहानियां तेहरान के अलग-अलग हिस्सों में दफ़्न हैं. आज इस जेल की चर्चा क्यों?

दरअसल, हैकर्स ने इसी इविन जेल के कुछ वीडियोज़ लीक किए हैं. इन वीडियोज़ में क़ैदियों को बुरी तरह से टॉर्चर करते देखा जा सकता है. सरकार ने कहा है कि ये वीडियो असली हैं. उन्होंने इसके लिए माफ़ी भी मांगी है. साथ ही, ये भी कहा है कि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई की जाएगी. ऐसा शायद पहली बार हो रहा है, जब ईरान ने ऐसे किसी मामले में माफ़ी मांगी है. इससे पहले भी इविन जेल में क़ैदियों के साथ बदसलूकी की ख़बरें बाहर आ चुकी हैं. लेकिन, ईरान ने कभी इसे स्वीकार नहीं किया था.

Iran
ईरान की जेल की एक तस्वीर. फोटो- AP

सवाल ये कि ये वीडियोज़ आख़िर किसने लीक किए? इस जेल की पूरी कहानी क्या है? और यहां क़ैद में रह चुके लोगों के क्या अनुभव रहे हैं?

पहले इतिहास की बात

ये 1970 के दशक के शुरूआती सालों की बात है. उस समय ईरान में मोहम्मद रेज़ा पहलवी का शासन चल रहा था. शाह के ख़िलाफ़ लोगों का गुस्सा बढ़ रहा था. सड़कों पर शाह के ख़िलाफ़ होने वाले प्रदर्शन भी बढ़ने लगे थे. ऐसे में शाह ने अपनी खुफिया एजेंसी को काम पर लगाया. हज़ारों की संख्या में विरोधियों को गिरफ़्तार किया गया. जब जेलों में जगह कम पड़ी तो नई जेल बनाई गई. तेहरान में इविन जेल का निर्माण भी शाह के दमन वाले अभियान के तहत किया गया था. जल्दी ही इविन जेल ‘टॉर्चर फ़ैक्ट्री’ के तौर पर कुख़्यात हो गई.

अप्रैल 1979 में ईरान में इस्लामिक क्रांति हुई. शाह पहले ही देश छोड़कर भाग चुके थे. इसी के साथ ईरान में राजशाही खत्म हो गई. ईरान को ‘इस्लामिक रिपब्लिक’ घोषित कर दिया गया. उम्मीद की जा रही थी कि क्रांति के बाद इविन जेल को बंद कर दिया जाएगा या कम-से-कम वहां चल रही बर्बरता पर लगाम लगाई जाएगी. लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. इस्लामिक क्रांति के बाद जेल का प्रबंधन रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स और रिवॉल्यूशनरी कोर्ट के पास पहुंचा. उनका काम था, जो कोई इस्लामिक रिपब्लिक के ख़िलाफ़ जाए, उसे सही रास्ते पर लाया जाए. इसके लिए कोई भी रास्ता अपनाया जा सकता था.

इसी दौर में मुजाहिदीन-ए-खल्क़ (MEK) नाम के एक संगठन का उभार हुआ. इसकी स्थापना साल 1965 में हुई थी. बतौर वामपंथी मुस्लिम गुट. इसने शाह के ख़िलाफ़ विरोध प्रदर्शनों में भी हिस्सा लिया था. MEK ने इस्लामिक क्रांति के दौरान अयातुल्लाह ख़ोमैनी का सपोर्ट किया. लेकिन जब MEK के मुखिया मसूद रजावी को पहला राष्ट्रपति चुनाव लड़ने से रोका गया तो ये गुट सरकार के ख़िलाफ़ हो गया.

MEK ने दावा किया कि वो ईरान में लोकतंत्र का समर्थन करता है. उसने महिलाओं की आज़ादी और अभिव्यक्ति की आज़ादी को मांग भी उठाई. MEK ने इस्लामिक रिपब्लिक के ख़िलाफ़ सशस्त्र विद्रोह का बिगुल फूंक दिया. इसे रोकने के लिए सरकार ने MEK समर्थकों के ख़िलाफ़ मोर्चा खोल दिया. रजावी देश छोड़कर भाग गए. उनके गुट ने ईरान-इराक़ की लड़ाई में सद्दाम की सेना के साथ मिलकर कई हमले भी किए.

रजावी तो देश छोड़कर जा चुके थे. लेकिन जो पीछे छूट गए थे, उनका जीना हराम होने वाला था. लोगों को प्रोटेस्ट में हिस्सा लेने के लिए या किसी तरह का सरकार-विरोधी साहित्य रखने के आरोप में अरेस्ट किया जाने लगा. इनमें से अधिकतर इविन जेल में रखे गए. इस जेल को पहले 300 क़ैदियों को रखने के लिए बनाया गया था. बाद में कैपिसिटी बढ़ाकर 15 सौ कर दी गई. लेकिन इसमें एक समय 15 हज़ार से अधिक लोगों को क़ैद में रखा गया था.

1988 में ईरान-इराक़ युद्ध खत्म हो गया. तब सुप्रीम लीडर ने फतवा जारी किया. कहा गया कि जो कोई इस्लामिक रिपब्लिक के ख़िलाफ़ है, वो अल्लाह के ख़िलाफ़ है. ऐसे लोगों को एक ही सज़ा मिलनी चाहिए. सज़ा-ए-मौत. इसके बाद एक ड्रामा शुरू हुआ. अचानक से पूरे ईरान में जेलों के दरवाज़े बंद होने लगे. फ़ैमिली विजिट्स पर बैन लगा दिया गया. रेडियो, टीवी और न्यूज़पेपर पर रोक लगा दी गई. किसी भी तरह का बाहरी संपर्क काट दिया गया. उन दिनों में सिर्फ़ कुछ पगड़ीधारी अधिकारी अंदर जेलों में आते थे. वे क़ैदियों से एक-दो सवाल पूछते और उनके भविष्य का फ़ैसला कर दिया जाता था. ये सवाल विरोधी गुट से रिश्ते की पुष्टि के लिए किया जाता था.

Jail 2
इविन जेल. फोटो- AP

जिनकी पुष्टि हो जाती, उन्हें सीधे फांसी वाली जगह पर भेज दिया जाता था. फांसी पर लटकाने के बाद लाशों को अज्ञात क़ब्रों में दफ़्न कर दिया जाता था. ये नरसंहार अगले पांच महीने तक चला. तब तक लगभग तीस हज़ार क़ैदियों को फांसी पर चढ़ाया जा चुका था. इविन जेल भी इस बर्बरता का गवाह बनी. वहां एक दिन में दो सौ लोगों को असेंबली हॉल में फांसी पर चढ़ा दिया गया था. ये सिलसिला कम भले ही हुआ है. लेकिन आज तक रुका नहीं है. क़ैदियों के साथ टॉर्चर की घटनाएं आम हैं. हमने ऐपिसोड की शुरुआत में जो दो कहानियां सुनाईं, वो इसका एक छोटा सा हिस्सा भर है.

आज इविन जेल की चर्चा क्यों?

अभी तक लोगों ने इविन जेल के अंदर की डरावनी कहानियां भर सुनीं थी. अब उसकी सच्चाई लोगों के पास पहुंच गई है. सीसीटीवी फुटेज़ की शक्ल में. कैसे? हैकर्स का एक ग्रुप है. जस्टिस फ़ॉर अली. इसने पिछले साल इविन जेल के सीसीटीवी कैमरों को हैक कर लिया था. अगस्त 2021 में उसने इन वीडियोज़ को न्यूज़ एजेंसी एपी और रेडियो फ़्री यूरोप के हवाले किया. वहां से ये वीडियोज़ पब्लिक डोमेन में आ गए.

इन वीडियोज़ में क्या दिख रहा है?

एक वीडियो में एक क़ैदी को लातों से मारा जा रहा है. उसी समय जेल के कुछ और गार्ड्स वहां आते हैं और फिर सब मिलकर क़ैदी को पीटने लगते हैं. दूसरे वीडियो में एक क़ैदी कार पार्किंग में गिर जाता है. उसके बाद कुछ गार्ड्स आकर उसे घसीटकर ले जाते दिखते हैं. एक और वीडियो है, जिसमें एक मौलवी, क़ैदी के ऊपर कूदता दिख रहा है. हैकर्स ग्रुप का कहना है कि ये तो सिर्फ़ नमूना भर है. इविन जेल में रह चुके पूर्व क़ैदियों ने भी कहा कि उनके साथ जो कुछ हुआ, उसकी तुलना में ये कुछ भी नहीं है.

एक फुटेज़ में इविन जेल का कंट्रोल रूम दिख रहा है. हैकर्स ने स्क्रीन हैक कर उस पर लिखा है – इविन जेल, इब्राहिम रईसी की काली पगड़ी और सफ़ेद दाढ़ी पर धब्बा है. रईसी इस समय ईरान के राष्ट्रपति हैं. 1988 में ईरान की जेलों में हुए नरसंहार के दौरान जज थे. उस दौरान रईसी ने कई विरोधियों के मौत का फ़रमान लिखा था.

फुटेज़ लीक होने के बाद भारी बवाल मचा. ईरान के जेल सिस्टम की आलोचना हुई. 24 अगस्त को ईरान की प्रिज़न सर्विस के मुखिया मोहम्मद मेहदी हज-मोहम्मदी ने कहा कि सभी फुटेज असली हैं. उन्होंने इस बर्बरता की पूरी ज़िम्मेदारी ली. मोहम्मदी ने ये भी कहा कि इस तरह की घटना आगे कभी नहीं होगी. साथ ही, दोषियों पर कार्रवाई भी की जाएगी. संभवत:, ये पहली बार हुआ है कि ईरान में जेलों की हालत पर किसी ज़िम्मेदार व्यक्ति ने माफ़ी मांगी हो.

इतना तो तय है कि सरकार को पहले से इविन जेल की सच्चाई पता थी. पहले भी सामाजिक संगठनों और जेल में रह चुके लोगों ने वहां की हक़ीक़त बयां की. लेकिन उस तरफ कोई ध्यान नहीं दिया गया. अब जबकि सरकार ने अपनी ग़लती स्वीकार कर ली है, देखना दिलचस्प होगा कि आगे इससे क्या बदलाव आता है.

अफ़ग़ानिस्तान में क्या चल रहा है

आपने ईरान की सबसे कुख़्यात जेल की कहानी सुनी. अब चलते हैं अफ़ग़ानिस्तान की तरफ़. जहां की सत्ता एक कुख़्यात संगठन के हाथ लग चुकी है. और, पूरा देश जेल में तब्दील हो गया है. लोगों को घुटन महसूस हो रही है. उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय दिख रहा है. हज़ारों की संख्या में लोग बाहर निकलने के लिए बेताब हैं. लगभग पूरी दुनिया इस वक़्त अफ़ग़ानिस्तान संकट के इर्द-गिर्द सिमट चुकी है. इसी मसले को लेकर 24 अगस्त को जी-7 देशों की बैठक हुई. इसमें एयरलिफ़्ट कैंपेन की डेडलाइन और तालिबान की सरकार को मान्यता देने पर विचार होना था.

अमेरिका ने ज़रूरतमंदों को बाहर निकालने के लिए 31 अगस्त की डेडलाइन तय कर रखी है. लेकिन जिस तेजी से लोगों की संख्या बढ़ रही है, इस तारीख़ तक सबको बाहर निकाल पाना असंभव लग रहा है. जी-7 की बैठक में ब्रिटेन और फ़्रांस ने अमेरिका पर दबाव डाला कि वो डेडलाइन बढ़ाए. ताकि जो कोई अफ़ग़ानिस्तान से बाहर निकलना चाहता है, उसे निकाला जा सके. इस मांग पर अमेरिका ने कोई भरोसा नहीं दिया. बाद में सरकार की तरफ से जारी बयान में कहा गया कि वो 31 अगस्त को लेकर प्रतिबद्ध है. इससे पहले, तालिबान ने साफ़ कर दिया था कि वो 31 अगस्त के बाद किसी तरह की मोहलत नहीं देगा. तालिबान ने गंभीर परिणाम भुगतने की धमकी भी दी थी.

जी-7 की बैठक शुरू होने से ठीक पहले एक और दिलचस्प ख़बर सामने आई. एपी और वॉशिंगटन पोस्ट ने छापा कि अमेरिकी खुफिया एजेंसी सीआईए के मुखिया विलियम बर्न्स काबुल में हैं. उन्होंने वहां तालिबानी नेता मुल्ला अब्दुल ग़नी बरादर से मुलाक़ात की. हालांकि, इस मुलाक़ात की पूरी जानकारी सामने नहीं आ पाई. जब ये सवाल सीआईए से पूछा गया तो उसने कहा कि वो अपने बॉस की ट्रैवल डिटेल्स शेयर नहीं करते.

इस बीच तालिबान ने काबुल एयरपोर्ट से पांच किलोमीटर दूर एक चेकपॉइंट बना दिया है. जिन भी लोगों के पास बाहर जाने के लिए ज़रूरी दस्तावेज नहीं है, उन्हें पहले ही रोका जा रहा है. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, काबुल एयरपोर्ट के पास परिस्थितियां तेजी से बदल रही है.

दूसरा मुद्दा तालिबान की सरकार को मान्यता देने से जुड़ा था. क्या जी-7 देश तालिबान को मान्यता देंगे?

जवाब है- फिलहाल तो नहीं. ग्रुप में शामिल सभी देशों ने एकमत से कहा कि ये फ़ैसला पूरी तरह से तालिबान के रवैये पर निर्भर करेगा. मसलन, महिलाओं की आज़ादी, ड्रग्स की स्मगलिंग और आतंकियों को पनाह देना आदि.

तीसरा मुद्दा अफ़ग़ानिस्तान में आतंकियों का सुरक्षित बेस तैयार होने की आशंका से जुड़ा था.

तालिबान ने अफ़ग़ानिस्तान की जेलों में बंद कई ईनामी आतंकियों को छुड़ा लिया है. उनमें से कई विदेशी धरती पर हमले के आरोपी हैं. पिछली बार के शासन के दौरान तालिबान ने अल-क़ायदा को सुरक्षित रिहाइश मुहैया कराई थी. उसी संरक्षण में अल-क़ायदा ने 9/11 हमले की प्लानिंग की और अंज़ाम भी दिया. अमेरिका ने कहा है कि भले ही अफ़ग़ानिस्तान में उसका मिशन पूरा हो गया है, लेकिन वो आंतकवाद के ख़िलाफ़ लड़ाई लड़ता रहेगा. मतलब ये कि ज़रूरत पड़ने पर अमेरिका, अफ़ग़ानिस्तान में एयरस्ट्राइक करने से पीछे नहीं हटेगा.

फिलहाल, अमेरिका और नाटो का ध्यान लोगों को बाहर निकालने पर है. अमेरिका इसमें अग्रणी भूमिका निभा रहा है. उसके तीन हज़ार से अधिक सैनिक काबुल एयरपोर्ट पर तैनात हैं. काबुल पर तालिबान के क़ब्ज़े के बाद से लगभग 70 हज़ार लोगों को बाहर निकाला जा चुका है. इसमें विदेशी नागरिक और नाटो सेनाओं के लिए काम कर चुके अफ़ग़ान भी शामिल हैं.

अब एक खुलासे की बात

ये मामला न्यूज़ एजेंसी रॉयटर्स के भारतीय फ़ोटो-पत्रकार दानिश सिद्दीक़ी की हत्या से जुड़ा है. दानिश अफ़ग़ानिस्तान में रिपोर्टिंग करने गए थे. 16 जुलाई को तालिबानियों के हमले में उनकी जान चली गई. उस दिन वो अफ़ग़ान स्पेशल फ़ोर्सेज़ के साथ सफ़र कर रहे थे. स्पिन बोल्डक इलाके में. अब रॉयटर्स ने पूरे मसले पर एक विस्तृत रिपोर्ट पब्लिश की है. सेटेलाइट इमेज़्स, विशेषज्ञों और उस दिन के फ़ोन लोकेशंस के सहारे दानिश सिद्दीक़ी की हत्या की कड़ी जोड़ने की कोशिश की गई है.

रिपोर्ट से क्या-क्या मालूम चला है?

– तालिबानी एक-एक कर नए शहरों पर क़ब्ज़ा कर रहे थे. अफ़ग़ान सेना शहरों को बचाने की लड़ाई लड़ रही थी. स्पिन बोल्डक में भी ऐसा ही हुआ. वहां अफ़ग़ान स्पेशल फ़ोर्स तालिबानियों को खदेड़ने के लिए गई. लेकिन दांव उल्टा पड़ा. उन्हें वापस भागना पड़ा. जिस गाड़ी में दानिश आए थे, उसके ड्राइवर ने उनको गोली लगते देखा. उन्हें दो सैनिकों के साथ काफ़िले की तरफ भागते हुए भी देखा गया. काफ़िले के कमांडर को लगा कि सभी लोग आ चुके हैं. वे वापस लौट आए. लेकिन, दानिश पीछे छूट गए थे. इसी ग़लतफहमी के कारण वो तालिबान के क़ब्ज़े में आ गए. जहां उनकी हत्या कर दी गई.

– सोशल मीडिया पर जारी तस्वीरों की समीक्षा से पता चला कि दानिश सिद्दीक़ी की मौत के बाद भी उन्हें कई गोलियां मारीं गई. एक ख़बर ये भी चली थी कि उनकी लाश को भारी वाहन से कुचला भी गया था. शुरुआती जांच में इस दावे की पुष्टि नहीं हो पाई.

– पहले ये रिपोर्ट आई थी कि स्पेशल फ़ोर्स और तालिबान के बीच गोलीबारी में दानिश की मौत हुई. लेकिन अब पता चला है कि मुठभेड़ के दौरान उन्हें रॉकेट का एक छर्रा लगा था. जिसके बाद उन्हें पास की मस्जिद में इलाज के लिए ले जाया गया. वहीं से वो पीछे छूट गए.

– जब पीछे हट रहे काफ़िले को दानिश और दो स्पेशल कमांडोज़ के पीछे छूटने के बारे में पता चला, कमांडर ने अपने कमांडो को फ़ोन किया. उसका फ़ोन एक तालिबानी लड़ाके ने उठाया. कमांडर ने दानिश का परिचय देकर उनकी जान बख़्शने की गुज़ारिश की. लेकिन तब तक उनकी हत्या हो चुकी थी.

रॉयटर्स की रिपोर्ट में संस्था के अंदर की कई खामियों को भी उजागर किया गया है. दानिश की मौत के समय, रॉयटर्स का काबुल या दक्षिण एशिया में कोई सिक्योरिटी एक्सपर्ट नहीं था. मार्च 2021 में ग्लोबल सिक्योरिटी एडवाइज़र की पोस्ट खाली हुई थी. उसे अभी तक भरा नहीं गया है. इसके अलावा, दक्षिण एशिया में उनके एडिटर्स को भी स्पिन बोल्डक मिशन के बारे में कोई जानकारी नहीं थी. रॉयटर्स ने कहा है कि वो सभी तथ्यों की पुष्टि करने की कोशिश कर रहा है. उम्मीद जताई जा रही है कि इससे भविष्य में पत्रकारों की सुरक्षा व्यवस्था बेहतर बनाने में मदद मिलेगी. ताकि कोई और अपनी ड्यूटी करते हुए नृशंसता का शिकार न बने.

दुनिया की बड़ी खबरें-

एशियाई देशों की यात्रा पर कमला हैरिस

अमेरिका की उप-राष्ट्रपति कमला हैरिस इन दिनों एशियाई देशों की यात्रा पर हैं. 24 अगस्त को उन्हें सिंगापुर से वियतनाम के लिए उड़ान भरनी थी. लेकिन ऐन मौके पर वियतनाम में मौजूद दो अमेरिकी अधिकारियों के बीमार होने की ख़बर आ गई. सुरक्षा जांच पूरी होने तक उन्हें सिंगापुर में रोककर रखा गया. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों अधिकारी ‘हवाना सिंड्रोम’ की चपेट में आए हैं. हवाना सिंड्रोम एक रहस्यमयी बीमारी का नाम है. इसमें पीड़ित को एक अजीब सी आवाज़ सुनाई देती है. इसके बाद उसका सिर बोझ से फटने लगता है.

कई लोगों में चक्कर आने की समस्या देखी गई. जबकि कुछ लोग पांच मिनट पहले की चीज़ें भी याद नहीं रख पाते थे. इस तरह का पहला मामला पहली बार साल 2016 में क्यूबा की राजधानी हवाना में सामने आया था. वहां सीआईए के स्टेशन में काम कर रहे कुछ एजेंट्स इसका शिकार हुए थे. हवाना के बाद इस तरह की घटनाएं रूस, जॉर्जिया, पोलैंड. ताइवान, जॉर्जिया और ऑस्ट्रिया में भी सामने आईं. अब इस लिस्ट में वियतनाम का भी नाम जुड़ गया है. अमेरिका अभी तक इन घटनाओं की असली वजह का पता नहीं लगा पाया है.


वीडियो- नेशनल मोनेटाइजेशन पाइपलाइन क्या है, जिससे कई सेक्टर्स में निजी कंपनियों की भागीदारी बढ़ेगी?

लगातार लल्लनटॉप खबरों की सप्लाई के लिए फेसबुक पर लाइक करें

कौन हो तुम

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

10 साल पहले भी शाहरुख़ का समीर वानखेड़े से सामना हुआ था, समीर ने ठोका था तगड़ा जुर्माना

जगह थी मुंबई एयरपोर्ट. अब दस साल बाद फिर से दोनों का नाम एक साथ सुर्ख़ियों में है.

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

'स्क्विड गेम' के प्लेयर नंबर 199 'अली' की कहानी, जिनके इंडियन होने ने सीरीज़ में एक्स्ट्रा मज़ा दिया

अली का रोल करने वाले इंडियन एक्टर अनुपम त्रिपाठी का सलमान-शाहरुख़ कनेक्शन क्या है?

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

IPL का कित्ता ज्ञान है, ये क़्विज़ खेलकर चेक कल्लो!

ईमानदारी से स्कोर भी बताते जाना. हम इंतज़ार करेंगे.

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

'मनी हाइस्ट' वाले प्रोफेसर की पूरी कहानी, जिनकी पत्नी ने कहा था, 'कभी फेमस नहीं हो पाओगे'

अलवारो मोर्टे ने वेटर तक का काम किया हुआ है. और एक वक्त तो ऐसा था कि बकौल उनके कैंसर से जान जाने वाली थी.

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

एक्टर शरत सक्सेना की कहानी, जिन्होंने 71 साल की उम्र में ज़बरदस्त बॉडी बनाकर सबको चौंका दिया

हीरो बनने आए शरत सक्सेना कैसे गुंडे का चमचा बनने पर मजबूर हुए?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

'भीगे होंठ तेरे' वाले कुणाल गांजावाला आजकल कहाँ हैं?

एक वक़्त इंडस्ट्री में टॉप पर थे कुणाल और उनके गाने पार्टियों की जान हुआ करते थे.

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

राज कुंद्रा की पूरी कहानी, 18 की उम्र में शॉल बेचने से शुरुआत करने वाले राज यहां तक कैसे पहुंचे?

IPL स्कैंडल, मॉडल्स के आरोप, अंडरवर्ल्ड कनेक्शंस के आरोप, एक्स वाइफ के इल्ज़ाम सब हैं इस कहानी में.

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रैनसन: जिन्होंने पहले अंतरिक्ष के दर्शन करके जेफ बेजोस का मजा खराब कर दिया

रिचर्ड ब्रेन्सन की कहानी, जहां भी गए तहलका मचा दिया.

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

'सिंघम' IPS से तमिलनाडु BJP के सबसे युवा अध्यक्ष बने अन्नामलाई की कहानी

पहला चुनाव हार गए थे, बीजेपी ने राज्य की जिम्मेदारी सौंपी है.

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

'तड़प-तड़प के' जैसा प्रेमियों का ब्रेकअप एंथम देने वाले सिंगर के के आजकल कहां हैं?

उनके गाए 'पल' गाने के बगैर आज भी किसी कॉलेज का फेयरवेल पूरा नहीं होता.