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कहानी राहुल बजाज की, जिन्हें कभी कुख्यात बॉम्बे क्लब का मुख़िया कहा जाता था

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राहुल बजाज. जिनके एक सवाल पर हंगामा हो गया है. उनका एक वीडियो वायरल हो रहा है. इस वीडियो में तनिक तीखा सवाल पूछा जा रहा है. देश के गृहमंत्री अमित शाह से. मोदी सरकार में डर के माहौल पर.

ET नाउ का एक अवॉर्ड फंक्शन चल रहा था. मंच पर बैठे थे मोदी सरकार के तीन कद्दावर मंत्री – गृह मंत्री अमित शाह, वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण और रेल मंत्री पीयूष गोयल. जब दर्शकों के सवाल पूछने की बारी आई तो राहुल बजाज नामक एक शख्स ने माइक थामा. अपने सवाल की भूमिका में कहा – हममें से कोई ये बात नहीं पूछेगा. लेकिन मैं पूछ रहा हूं. उन्होंने पूछा और बवाल हो गया. एक ही वक्त में तारीफ़ और ट्रोलिंग दोनों की बारिश हो गई.

कौन हैं ये राहुल बजाज? जानते हैं उनके बारे में इन 5 किस्सों में –

आकुर्डी गांव

पुणे से 20 किलोमीटर की दूरी पर एक गांव है. नाम आकुर्डी. 2011 की जनगणना में यहां की जनसंख्या 184 थी. 40 घरों वाले इस गांव में ऐसा क्या है जो मैं इसकी इतनी बारीकियां बता रहा हूं. यहां बजाज ऑटो का प्लांट है. वही बजाज ऑटो जिसके मुखिया राहुल बजाज हैं. वही राहुल बजाज जो आकुर्डी आने के बाद यहीं के होकर रह गए. इसी गांव में उनका आशियाना है.

Rahul Bajaj Auto
राहुल बजाज आकुर्डी गांव में रहते हैं जहां बजाज ऑटो का प्लांट है.

थोड़ा फ्लैशबैक में चलते हैं. 10 जून 1938. वर्धा में कमलनयन बजाज और सावित्री के घर एक बच्चे का जन्म हुआ. नाम रखा गया राहुल. शुरुआती पढ़ाई-लिखाई मुंबई के कैथेड्रल एंड जॉन कॉनन स्कूल से हुई. स्कूल के दिनों में वो बॉक्सिंग चैंपियन थे. फिर सेंट स्टीफेंस कॉलेज से इकनॉमिक्स में बीए की डिग्री ली. मुंबई यूनिवर्सिटी से लॉ की डिग्री लेने के बाद अमेरिका चले गए. वहां हार्वर्ड बिजनेस स्कूल से एमबीए की डिग्री पूरी की. 1965 में भारत लौटे. अपना फैमिली बिजनेस जॉइन कर लिया. 1968 में बजाज ऑटो के सीईओ बनाए गए.

लाइसेंस राज में बजाज

देश में 1947 से 1991 तक लाइसेंस राज चलता था. उस वक्त प्राइवेट कंपनियों को सुई बनाने के लिए भी तकरीबन 80 सरकारी एजेंसियों से परमिशन लेनी पड़ती थी. अगर परमिशन मिल गई तो फिर सरकार का रोल शुरू होता था. सरकार प्रॉडक्शन कंट्रोल करती थी. मतलब कि कौन सी कंपनी कितने समय में कितना प्रॉडक्ट बनाएगी, ये सरकार तय करती थी.

बजाज की पहचान उसके स्कूटरों से बनी. लाइसेंस राज के दौरान, बजाज तय सीमा से ज्यादा स्कूटर नहीं बना सकती थी. खरीदने की चाहत रखने वाले रजिस्ट्रेशन करवाते थे. तब उन्हें पर्ची मिलती थी. स्कूटर की डिलीवरी के लिए. 10 साल आगे की तारीख वाली. लोग बजाज का स्कूटर खरीदने के लिए तय दाम से ज्यादा देने के लिए तैयार होते थे.

कुख्यात बॉम्बे क्लब

राहुल बजाज लाइसेंस राज के खिलाफ थे. लेकिन लोकल कंपनियों के लिए एक जैसे अवसर के पक्ष में भी थे. 1991 का साल भारतीय बाज़ार के लिए बिल्कुल नया था. भारत में उदारीकरण की शुरुआत हो रही थी. लाइसेंस राज के खात्मे के बाद भारत का बाज़ार विदेशी कंपनियों के लिए खोल दिया गया था.

विदेशी कंपनियों के पास अलग-अलग माहौल में काम करने का अनुभव था. उनके पास बेहतर तकनीक थी, मार्केटिंग के तरीके थे और उनके पास फाइनेंशियल बैकअप था. राहुल बजाज कुछ उद्योगपतियों के साथ फाइनेंस मिनिस्टर के पास पहुंचे. प्रेजेंटेशन दिया. प्रेजेंटेशन के बाद मिनिस्ट्री की तरफ से कहा गया कि इस बारे में खुले में कुछ न बोलें.

लेकिन राहुल बजाज ने इसकी परवाह नहीं की. उन्होंने बात पब्लिक कर दी. राहुल बजाज को बॉम्बे क्लब का मुखिया बताकर कुख्यात बना दिया गया. बॉम्बे क्लब का नाम उन उद्योगपतियों के ग्रुप को दिया गया था जो उदारीकरण का विरोध कर रहे थे. बाद में राहुल बजाज ने साफ किया कि वो उदारीकरण का विरोध नहीं कर रहे थे बल्कि देशी कंपनियों के लिए समान अवसर की बात कर रहे थे.

गांधी कनेक्शन

जमनालाल बजाज. राहुल बजाज के दादाजी. बजाज ग्रुप के फाउंडर. महात्मा गांधी उनको अपना पांचवा बेटा कहते थे. जमनालाल एक गरीब मारवाड़ी के घर पैदा हुए थे. आज के राजस्थान और तब के जयपुर रियासत के सीकर में. केवल चौथी कक्षा तक पढ़े थे. अंग्रेजी नहीं आती थी. बचपन में ही एक अमीर परिवार ने उनको गोद ले लिया. नया परिवार पैसों की चमक में यकीन रखता था. जमनालाल इससे परे थे. एक बार अनबन हुई तो घर छोड़कर निकल गए थे. फिर घरवालों ने पुचकारकर वापस बुलाया. लेकिन धन-दौलत के पीछे कभी भी भागे नहीं.

Jamnalal Bajaj Stamp
जमनालाल बजाज को गांधी अपना पांचवा बेटा कहते थे.

1915 में गांधीजी भारत लौटकर आए. जमनालाल उनसे काफी प्रभावित थे. जब गांधीजी ने साबरमती मेें आश्रम बनाया, तब जमनालाल भी वहां पहुंचे. गांधीजी के काम को करीब से देखा और फिर अपना सर्वस्व समर्पित कर दिया. वो ऐसे ही व्यक्ति को अपना गुरु बनाना चाहते थे, जिनकी कथनी और करनी में कोई अंतर न हो. 1921 में वर्धा आश्रम की स्थापना जमनालाल बजाज की मदद से ही हुई थी. आज़ादी की लड़ाई के दौरान कांग्रेस को खूब दान दिया. खुद भी इस लड़ाई में हिस्सा लिया. कई बार जेल भी गए.

राहुल बजाज की ज़िंदगी पर अपने दादा की छाप पड़ी है. मशहूर मैगजीन फोर्ब्स को दिए एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था,

‘मैं कोई संत नहीं हूं. लेकिन मुझे इस बात का गर्व है कि मैंने पैसे कमाने के लिए किसी गलत तरीके का इस्तेमाल नहीं किया.’

हमारा बजाज

80 का दशक खात्मे की तरफ बढ़ रहा था. भारत के विज्ञापन जगत में दो बहुत ही खास चीजें हो रही थीं. दो बुलावे आए थे.

पहला, प्रधानमंत्री राजीव गांधी के ऑफिस से. मशहूर ऐड एजेंसी ओगिल्वी एंड मेदर के नेशनल क्रिएटिव डायरेक्टर सुरेश मलिक को. ब्रीफ दी गई कि एक यूनिटी एंथम बनना है. मलिक ने ऑफिस पहुंचकर ब्रीफ डिस्कस की. और पीयूष पांडे नाम के एक अकाउंट मैनेजर को काम सौंपा. गाने की लिरिक्स के लिए गीतकार से को-ऑर्डिनेट करने का. पीयूष पांडे ने दो काम किए. ब्रीफ को ध्यान से सुना और उसके आधार पर खुद ही एक गाना लिख दिया. जब सुरेश मलिक ने ये पढ़ा तो वो हैरान हुए. ये गाना बहुत कम एडिटिंग के साथ गवाया गया. और सुपरहिट हुआ. गाना था – मिले सुर मेरा तुम्हारा. 1988 में आया ये एंथम आज भी लोगों की धमनियों में बहता है. पीयूष पांडे के करियर का सबसे बड़ा ब्रेक था.

Hamara Bajaj Ad
ये ऐड बजाज की पहचान बन गया.

दूसरा बुलावा आया 1989 में बजाज ऑटो के ऑफिस से. एलिक पद्मसी को. वो लिंटास नाम की एक ऐड एजेंसी चला रहे थे. राहुल बजाज चाहते थे कि लोग ब्रांड के साथ अपनापन फील करें. फिर जो ऐड फिल्म बनकर आई उसने बजाज की लोकप्रियता को सातवें आसमान में टांक दिया. बुलंद भारत की बुलंद तस्वीर. हमारा बजाज. वो ऐड जिसकी धुन सुनते ही ब्रांड की पहचान हो जाती है.

आज राहुल बजाज एक बयान देकर चर्चा के केंद्र में आ गए हैं. उनकी बात को कहीं सराहा जा रहा है तो कहीं लताड़ा जा रहा है. आप किस खेमे में हैं?


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