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छतौना का 'बुद्धू', जो महंत नरेंद्र गिरि बना तो सत्ता-विपक्ष सब उसके आगे नतमस्तक रहे

कुछ महीने पहले प्रयागराज में एक शादी का मौका. इस शादी का वीडियो पूर्वांचल के राजनीतिक हलकों में बहुत वायरल हुआ. इसमें डांसर डांस कर रही थीं. नोट उड़ रहे थे. वीडियो में  गेरुआ वस्त्र पहने एक संतनुमा इंसान भी नजर आ रहे हैं. नाम महंत नरेंद्र गिरि (Mahant Narendra Giri). वही नरेंद्र गिरि जिनकी मौत मीडिया-सोशल मीडिया से लेकर हर जगह चर्चा का विषय बन गई है. क्या आम और क्या खास, महंत नरेंद्र गिरि को श्रद्धांजलि देने वालों की बाढ़ आ गई है. पीएम मोदी से लेकर सीएम योगी, प्रियंका गांधी से लेकर अखिलेश यादव, सबने महंत की असमय मौत पर दुख जताया है.

तो आखिर कौन थे ये महंत नरेंद्र गिरि जिन्हें सब इतनी शिद्दत से याद कर रहे हैं. आखिर कौन हैं ये मंहत नरेंद्र गिरि जिनका इतना रौला है. सब बताएंगे.

बजरंगबली मंदिर के महंत, संत समाज के बाहुबली

इलाहाबाद जिसे अब प्रयागराज नाम से जाना जाता है, वहां संगम जाने के रास्ते में एक हनुमान मंदिर है. ये मंदिर इस लिहाज से खास है कि यहां हनुमान की लेटे हुए प्रतिमा है. इसी लेटे हनुमान के महंत थे नरेंद्र गिरि.

ये उनके परिचय की शुरुआत है. महंत नरेंद्र गिरि अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के राष्ट्रीय अध्यक्ष भी थे. मतलब वो संस्था, जिसके अधीन भारत के सभी अखाड़े आते हैं. कुश्ती-पहलवानी वाले नहीं, संत समाज के अखाड़े. मतलब आधिकारिक तौर पर साधु-संन्यासी बनने और संत समाज को लेकर नियम-कायदे तय करने का जिम्मा महंत नरेंद्र गिरि पर ही था. संत समाज पर उनकी जितनी मजबूत पकड़ थी उतनी ही राजनीतिक पार्टियों पर भी थी.

राजनेताओं पर जबरदस्त पकड़

महंत नरेंद्र गिरि की मौत की खबर के बाद जिस तरह से नेताओं की तरफ से शोक संदेशों की बाढ़ आई, उससे एक बात तो आप अच्छी तरह से समझ गए होंगे कि दिवंगत महंत का राजनीतिक दलों में तगड़ा दबदबा था. नेता उनसे मिलते, आशीर्वाद लेते थे.

संत समाज में नरेंद्र गिरि क़ायदे के ताक़तवर इंसान थे. लेकिन इससे अलग भी उनका बहुत रुतबा रहा. ख़ासकर समाजवादी पार्टी में. सूबे के पूर्व CM अखिलेश यादव कई मौक़ों पर नरेंद्र गिरि  के पैर छूते देखे गए थे. अखिलेश के चाचा शिवपाल सिंह यादव ने तो गुरु पूर्णिमा के मौक़े पर अखाड़े के बाघंबरी पीठ में बाक़ायदा हेलीकॉप्टर से फूलों की बारिश करवाई थी. जानने वाले बताते हैं कि नरेंद्र गिरि की बैठकी में मुलायम और अखिलेश समेत सपा के कई नेताओं के साथ तस्वीरें लगी हुई हैं. वहां जाने वालों को महंत नरेंद्र गिरि दिखाकर बताते थे कि ये लोग उनके शिष्य हैं. इसके अलावा चर्चा ये भी है कि सज़ायाफ़्ता माफ़िया-राजनेता अतीक अहमद से भी नरेंद्र गिरि के अच्छे संबंध थे.

उनके रसूख़ की ये बातें यहीं नहीं रुकती हैं. भाजपा के भी कई क़द्दावर नेता नरेंद्र गिरि से मिलते रहे हैं. इनमें सीएम योगी आदित्यनाथ से लेकर देश के गृह मंत्री अमित शाह तक शामिल हैं. साल 2019 में प्रयागराज में कुम्भ आयोजन से पहले पीएम नरेंद्र मोदी को गंगा पूजन कराने का काम महंत नरेंद्र गिरि ने किया था. इस दौरान पीएम मोदी के साथ नरेंद्र गिरि की नजदीकियां देशभर के लोगों ने देखी थीं.

मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ संत परंपरा से आते हैं. इस कारण उनके सीएम बनने के पहले से ही महंत नरेंद्र गिरि से अच्छे रिश्ते थे. सीएम के प्रयागराज आने पर महंत गिरि उनके भोजन का इंतजाम और हनुमान मंदिर में पूजन कराते थे. जब भी महंत नरेंद्र गिरि लखनऊ जाते तो सीएम ऑफिस जाकर मुलाकात का सिलसिला भी बना रहा. डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य भी नरेंद्र गिरि के करीबी शिष्य कहे जाते हैं.

जैसे ही नरेंद्र गिरि की मौत की खबर आई केशव प्रसाद मौर्य ने दुख व्यक्त करते हुए कहा कि

“मुझे विश्वास नहीं हो रहा है कि पूज्य महंत नरेंद्र गिरि जी महाराज ने ख़ुदकुशी की होगी, स्तब्ध हूँ निःशब्द हूँ आहत हूँ, मैं बचपन से उन्हें जानता था. साहस की प्रतिमूर्ति थे. मैंने कल ही सुबह 19 सितंबर को उनका आशीर्वाद प्राप्त किया था. उस समय वह बहुत सामान्य थे. बहुत ही दुखद असहनीय समाचार है !”

एक टीवी चैनल पर महंत नरेंद्र गिरि के बारे में बोलते हुए यूपी के डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्य इतने भावुक हो गए कि उनका गला रुंध गया.

यूपी में फिलहाल योगी सरकार है और महंत नरेंद्र गिरि योगी सरकार की तारीफ भी करते रहते थे. लेकिन यूपी के राजनीतिक गलियारों में ये चर्चा आम थी कि नरेंद्र गिरि समाजवादी पार्टी के ही ज़्यादा क़रीब थे. यूपी के कुछ अधिकारी बताते हैं कि जब सूबे में सपा की सरकार थी, उस समय नरेंद्र गिरि का शायद ही कोई काम कभी रुका हो. ऐसा कहा जाता है कि ये सहूलियत भाजपा सरकार आने के बाद कुछ कम हो गई.

Mahant Narendra Giri Keshav Prasad Maurya Akhilesh Yadav
डिप्टी सीएम केशव प्रसाद मौर्या हों या पूर्व सीएम अखिलेश यादव, प्रयागराज आने पर महंत नरेंद्र गिरि से आशीर्वाद लेना नहीं भूलते थे.
(फोटो-आजतक)

ये भी पढ़िए. कहानी उन अखाड़ों की, जो बाबाओं को सर्टिफिकेट देते हैं

एक था ‘बुद्धू’

इंडिया टुडे की पत्रकार शिल्पी सेन बताती हैं कि कैसे एक साधारण परिवार का बेटा देश के संतों की सबसे बड़ी पंचायत का मुखिया बना. कहानी की शुरुआत इलाहाबाद में फूलपुर के पास छतौना गांव से होती है. वहां एक लड़का रहता था, नाम था बुद्धू. लोग अक्सर उससे कहते कि तुम कुछ न कर पाओगे. नाना के सबसे दुलारे बुद्धू अक्सर गांव में खेलते-खेलते वहां आने वाले साधु-संन्यासियों के साथ घुल मिल जाते. बुद्धू के पिता भानु प्रताप सिंह बाहर रहते थे. ऐसे में बुद्धू का फूलपुर के पास ‘गिर्दकोट’ गांव में नाना के घर पर ही रहना होता था. नाना और मामा ही उनकी देखभाल करते थे.

फिर अचानक एक दिन बुद्धू घर से भाग गया. काफ़ी खोज बीन हुई और उसके बाद बुद्धू घर वापस लाया गया. क्लास 6 की पढ़ाई के बाद बुद्धू फिर भाग गए. एक बार फिर खोज बीन के बाद बुद्धू जब घऱ लौटे तो पता चला कि कहीं योगियों से घुल मिल गए थे. इस बार बुद्धू को बहुत समझाया बुझाया गया कि अब घर छोड़ कर कहीं नहीं जाना है. बात बुद्धू की समझ में आई और उन्होंने हाई स्कूल का एग्जाम पास कर लिया. उसके बाद बुद्धू ने बैंक ऑफ बड़ौदा में नौकरी पा ली. तब आसपास वालों को भी पता चला कि बुद्धू का असल नाम तो नरेंद्र सिंह है. अब तक आसपास के सब बुद्धू नाम से ही बुलाते थे.

सब कुछ सामान्य चल रहा था. एक दिन घर पर उनकी शादी की बात चली. शिल्पी सेन की रिपोर्ट के मुताबिक, इसके बाद नरेंद्र सिंह एक बार फिर कहीं चले गए. जाते-जाते बैंक के गार्ड को अपनी चाबी सौंपना नहीं भूले. नरेंद्र गिरि के मामा प्रोफ़ेसर महेश सिंह उस दिन को याद करते हुए कहते हैं,

“अचानक एक दिन फ़ोन आया. उधर से आवाज़ आई कि ‘मैं महंत नरेंद्र गिरि बोल रहा  हूं.’ तब जाकर हम लोगों को पता चला कि बुद्धू तो महंत नरेंद्र गिरि बन गए हैं. उसके बाद हमारे इसी घर में जहां उनका पालन पोषण हुआ था वो एक बार संन्यासी के वेश में आए. जब प्रणाम करने लगे तो मेरी पत्नी यानी नरेंद्र गिरि की मामी ने कहा कि आप जिस वेश में आए हैं. हमको आपको प्रणाम करना चाहिए.”

महेश सिंह आगे कहते हैं,

“संन्यासी बनने के बाद अपने पूर्व परिवार से जुड़ाव नहीं रहता. नरेंद्र गिरि पर जो लोग सवाल उठा रहे हैं, वो ये सोच लें कि अपने नाना के नाम पर बने अमीपुर के सरयू प्रसाद सिंह इंटर कॉलेज में हमेशा कार्यक्रमों में आने वाले नरेंद्र गिरि ने कभी एक फ़रलांग की दूरी पर स्थित अपने घर में कदम नहीं रखा.”

महेश सिंह इस बात को भी याद करते हैं कि नरेंद्र गिरि में अपने संघर्ष की वजह से इतनी जिजीविषा (जीने की इच्छा) थी कि लगता नहीं है कि वो आत्महत्या कर सकते हैं. उच्चतर शिक्षा सेवा आयोग के सचिव रहे महेश सिंह रिपोर्टर शिल्पी सेन से बातचीत में कहते हैं,

“घर वो नहीं आते थे और आम आदमी की तरह मैं कभी-कभी गद्दी (बाघंबरी) में होने वाले कार्यक्रमों में जाता था. लेकिन महंत नरेंद्र गिरि अपने नाना के नाम पर बने स्कूल में लगातार सक्रिय रहे . 27 नवम्बर को नाना के नाम पर बने अमीपुर के सरयू प्रसाद सिंह इंटर कॉलेज का स्थापना दिवस होता है. आख़िरी बार बात हुई थी तो कहा कि इस बार के समारोह में मुख्यमंत्री योगी जी को आमंत्रित करेंगे. ये 5-6 दिन पहले की बात है. अब ये हो गया.”

Mahant Childhood
महंत नरेंद्र गिरि का बचपन अपनी ननिहाल में बीता. जब घरवालों ने उनकी शादी का प्लान बनाया तो वो घर छोड़ कर चले गए और साधु बन गए.
तस्वीर में साधु जीवन से पहले अपने परिवार के साथ सबसे लेफ्ट में नजर आ रहे हैं महंत नरेंद्र गिरि. (फोटो-शिल्पी सेन)

महंत नरेंद्र गिरि के साथ जुड़ा है विवादों का लंबा इतिहास

महंत नरेंद्र गिरि का नाम कई बार विवादों में आया. आइए उनमें से कुछ के बारे में आपको बताते हैं.

जब डीआईजी धरने पर बैठ गए

बात 2004 की है. मुलायम सिंह यूपी के चीफ मिनिस्टर थे. महंत नरेंद्र गिरि मठ बाघंबरी गद्दी के महंत बने. उनका तत्कालीन आईजी आरएन सिंह से विवाद हो गया. मामला एक जमीन का था. मुलायम सिंह से सीधे संबंध के कारण स्थानीय पुलिस नरेंद्र गिरि के खिलाफ किसी कार्रवाई की हिम्मत नहीं जुटा पा रही थी. डीआईजी इतना परेशान हो गए कि वह हनुमान मंदिर के पास महावीर मार्ग पर धरने पर बैठ गए.

डीआईजी के धरने पर बैठने की खबर से सरकार की खूब फजीहत हुई. उन्हें मनाने एसएसपी समेत तमाम अधिकारी धरना स्थल पर पहुंचे. खूब मिन्नतें कीं, हाथ पैर जोड़े, लेकिन डीआईजी टस से मस नहीं हुए थे. नरेंद्र गिरि ने इसकी शिकायत तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह से कर दी. वे डीआईजी पर काफी नाराज हुए. उन्होंने डीआईजी आरएन सिंह को सस्पेंड कर दिया. तब जाकर यह विवाद शांत हुआ. इस घटना के पटाक्षेप के साथ ही महंत नरेंद्र गिरि को लेकर प्रशासन को अपनी सीमाएं भी पता चल गईं.

बार-डिस्को संचालक को बनाया महामंडलेश्वर

नरेंद्र गिरि पर मठों के संचालन को लेकर जो एक्शन लिए गए, उनकी वजह से भी वह विवादों में रहे. साल 2015. महंत नरेंद्र गिरि ने बीयर बार-डिस्को संचालक को महामंडलेश्वर बना दिया. नोएडा स्थित दिल्ली-एनसीआर के सबसे बड़े डिस्को और एक बीयर बार के संचालक सचिन दत्ता को सच्चिदानंद गिरि का नाम दिया गया. बाघंबरी गद्दी में तत्कालीन कैबिनेट मंत्री शिवपाल यादव और पर्यटन मंत्री ओमप्रकाश सिंह की मौजूदगी में नरेंद्र गिरि ने सचिन का पट्टाभिषेक कर निरंजनी अखाड़े का महामंडलेश्वर बनाया था. तब दैनिक जागरण अखबार ने मठ के ही एक साधू के हवाले से रिपोर्ट दी थी कि सचिन दत्ता को ये पद पैसों के बदले मिला है.

यह खुलासा नाम न छापने की शर्त पर इलाहाबाद के एक संत ने किया था. जिनकी महामंडलेश्वर बनाने की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका थी. उन्होंने दैनिक जागरण अखबार को बताया था कि महामंडलेश्वर बनाने का पूरा खेल पैसे से होता है. इसके लिए 20 से 50 लाख रुपये लिए जाते हैं. अखबार ने इस बातचीत की रिकार्डिंग होने का दावा किया था. खबर यहां पढ़ सकते हैं.

किन्नर और महिला अखाड़ों को नहीं दी मान्यता

एक तरफ बार-डिस्को संचालक को महामंडलेश्वर बनाने का मामला तो दूसरी ओर कुछ अखाड़ों को मान्यता न देकर भी महंत नरेंद्र गिरि विवादों में बने रहे. असल में महंत नरेंद्र गिरि ने कभी किन्नर और महिलाओं के अखाड़ों को मान्यता देने पर राजी नहीं हुए. उनका कहना था कि जगतगुरु शंकराचार्य ने 13 अखाड़ों की स्थापना की थी. किसी को भी 14वें अखाड़े के रूप में मान्यता नहीं दी जा सकती.

हालांकि 2019 के कुंभ में मेला प्रशासन ने किन्नर अखाड़े को जमीन और सुविधाएं दी थीं. उज्जैन में 13 अक्तूबर 2015 को किन्नर अखाड़े की स्थापना हुई थी. बाद में 2016 के उज्जैन कुंभ में अखाड़े ने स्वतंत्र रूप से पेशवाई की जगह देवत्व यात्रा निकाली थी. इसी तरह से महंत नरेंद्र गिरि महिलाओं के परी अखाड़े के अस्तित्व को भी नहीं मानते थे.

हत्या और जमीन-जायदाद विवाद में आया नाम

कुछ वक्त से महंत नरेंद्र गिरि की अपने शिष्य आनंद गिरि से खटपट चल रही थी. उनकी मौत के बाद आनंद गिरि पर ही FIR दर्ज हुई है. इसी साल मई के महीने में आनंद गिरि ने अपने गुरु के दो वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल किए थे. उनका आरोप था कि गुरु महंत नरेंद्र गिरि मंदिर के रुपयों का दुरुपयोग कर रहे थे. एक वीडियो में बार-बालाएं थिरक रही थीं और उनके साथ बड़े हनुमान मंदिर व मठ से जुड़े लोग डांस कर रहे थे. बार-बालाओं पर नोटों की बारिश भी की जा रही थी. दूसरे वीडियो में मंत्रोच्चार के बीच नोटों की बारिश हो रही थी. इसमें महंत नरेंद्र गिरि दूल्हा-दुल्हन को आशीर्वाद दे रहे थे.

इसके अलावा 2012 में सपा नेता और हंडिया से विधायक रहे महेश नारायण सिंह से जमीन की खरीद फरोख्त से जुड़े विवाद में भी नरेंद्र गिरि का नाम सामने आया था. फरवरी 2012 में महंत ने सपा नेता महेश नारायण सिंह, शैलेंद्र सिंह, हरिनारायण सिंह और 50 अज्ञात के खिलाफ जॉर्ज टाउन में मुकदमा दर्ज कराया था. वहीं, दूसरे पक्ष ने भी नरेंद्र गिरि, आनंद गिरि और दो अन्य के खिलाफ रिपोर्ट दर्ज कराई थी.

पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के सचिव महंत आशीष गिरि की 17 नवंबर 2019 को संदिग्ध स्थिति में मौत होने पर भी सवाल उठे थे. मूल रूप से पिथौरागढ़ के रहने वाले आशीष गिरि दारागंज स्थित पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी के आश्रम में रहते थे. उनकी मौत के बाद कुछ लोगों ने महंत नरेंद्र गिरि पर भी सवाल उठाए थे. हालांकि बाद में पुलिस जांच में कुछ नहीं निकला.

20 साल की उम्र में बने थे नागा संन्यासी

नरेंद्र गिरि मूलरूप से प्रयागराज के ही हंडिया के रहने वाले थे. वे 20 साल के थे जब एक साधु के तौर पर पंचायती अखाड़ा श्री निरंजनी से उनका नाता जुड़ा. वह हरिद्वार के कुंभ मेले में ही पहली बार महात्मा और फिर अखाड़े की परंपरा के अनुसार नागा संन्यासी बने. इसके बाद वह बतौर सेवादार राजस्थान के खीरम स्थित अखाड़े के आश्रम में रहे. साल 1998 में हरिद्वार में ही नरेंद्र गिरि अखाड़े के अष्टकौशल में कारबारी यानी उप महंत के रूप चुने गए.

फिर साल 2001 में वह अष्टकौशल के श्रीमहंत बने. मठ बाघंबरी गद्दी के महंत भगवान गिरि के नहीं रहने पर उन्हें उनका उत्तराधिकारी घोषित किया गया. 2004 में उन्हें मठ का महंत बनाया गया. साल 2015 में उज्जैन कुंभ के दौरान अखाड़े की ओर से पहले उन्हें सचिव बनाया गया था. और फिर उज्जैन कुंभ में ही वह अखिल भारतीय अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष बने.


वीडियो – अखाड़े से निष्कासन के बाद आनंद गिरि ने नरेंद्र गिरि पर क्या कहा?

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