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नवजोत सिद्धू के कांग्रेस छोड़ने की बातों में कोई दम भी है या फिर बस "शुरली" है?

नवजोत सिंह सिद्धू. पंजाब के पूर्व कैबिनेट मंत्री और कांग्रेस नेता. लंबे समय से शांत हैं. 15 जुलाई 2019 को उन्होंने आधिकारिक तौर पर पंजाब कैबिनेट से इस्तीफा दिया था. तब से अब तक इक्का-दुक्का मौकों पर ही नज़र आए हैं. बस ख़बरें आईं. जैसे- “सिद्धू बड़ा फैसला कर सकते हैं”, “सिद्धू पार्टी छोड़ सकते हैं” वगैरह-वगैरह. तब से अब तक क़रीब एक साल बीतने को है. “जित्तेगा पंजाब” नाम का यूट्यूब चैनल शुरू करने के अलावा कोई बड़ी अपडेट सिद्धू की ओर से नहीं आई है. लेकिन जून 2020 की शुरुआत से ही सिद्धू के बारे में तरह-तरह के कयास लगाए जा रहे हैं.

अपडेट क्या है?

2 जून से पंजाब के बड़े  न्यूज़ चैनलों, अख़बारों ने ख़बरें चलाईं कि चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर सिद्धू के संपर्क में हैं. पंजाब विधानसभा के चुनाव 2022 की शुरुआत में होने हैं. अभी से तैयारियां चालू हैं. प्रशांत किशोर ने 2017 में कांग्रेस पार्टी के लिए पंजाब में काम किया था. चर्चा है कि अबकी आम आम पार्टी (आप) के लिए काम कर सकते हैं. इसीलिए सियासी पंडित सिद्धू और आम आदमी पार्टी के बीच का तार टटोलने में लगे हैं.

लेकिन पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर सिंह ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि ऐसा नहीं है. उन्होंने कहा,

सिद्धू हमारी पार्टी का हिस्सा हैं. मैंने प्रशांत किशोर से बात की. उन्होंने कहा कि मैंने (प्रशांत किशोर) ऐसे कोई बात नहीं कही. ऐसा कभी नहीं हुआ.

कैप्टन ने ये भी कहा कि 2022 के कैंपेन के लेकर वो प्रशांत किशोर से बातचीत में हैं और उन्हें अच्छा रिस्पाॉन्स भी मिला है.

“शुरली”

आम बोलचाल की पंजाबी में ‘शुरली’ शब्द का मलतब होता है- ऐसा बयान जिसका कोई आधार न हो. यूं ही बोली गई बात, जिसका मकसद चर्चा छेड़ना या हलचल पैदा करना होता है. पंजाब की सियासत पर पकड़ रखने वाले वरिष्ठ पत्रकारों की नज़र में सिद्धू-प्रशांत किशोर के बीच बातचीत की बातें ‘शुरली’ ही हैं.

35 साल से पंजाब की राजनीति कवर रहे एक वरिष्ठ पत्रकार ने हमसे बातचीत में दावा किया कि ये बातें खुद फैलाई जा रही हैं. वो कहते हैं,

सिद्धू को साइडलाइन ज़रूर किया गया था. लेकिन कांग्रेस को उनकी अहमियत पता है. जुलाई 2019 के बाद से ही किसी कांग्रेसी नेता ने सिद्धू पर कोई सीधी टिप्पणी नहीं की है. सिद्धू की छवि ईमानदार नेता की है. इसलिए हर पार्टी को उनकी ताक़त का एहसास है. आम आदमी (पार्टी) को फेस चाहिए, इसलिए सिद्धू को उनसे जोड़कर ख़बर उड़ाना आसान है. सिद्धू भी नकार नहीं रहे, प्रेशर बन रहा है हाईकमान पर. चुनाव नज़दीक हैं, मझधार में फंसे सिद्धू भी अपना किनारा खोज रहे हैं. 100 फीसदी नहीं तो 99 फीसदी ये ‘शुरली’ ही है.

रिएक्शन क्या आए?

पंजाब के मुख्यमंत्री कैप्टन अमरिंदर ने इन बातों को अफवाह करार दिया है. उनके कैबिनेट के साथियों की राय भी मिलती-जुलती है.

‘द ट्रिब्यून’ की एक रिपोर्ट के मुताबिक, पंजाब के एक कैबिनेट मंत्री ने सिद्धू-प्रशांत की बातचीत की ख़बर को ‘दवाब की राजनीति’ बताया है. बिना नाम बताए, कैबिनेट मंत्री के हवाले से ट्रिब्यून ने लिखा है-

अगर सिद्धू को दोबारा सही जगह न दी गई तो वो बाहर भी जा सकते हैं. इन रिपोर्ट्स की टाइमिंग बताती है कि ये कांग्रेस लीडरशिप का ध्यान पाने के लिए इस्तेमाल की गए प्रेशर टेक्टिक्स हो सकती हैं.

सिद्धू-प्रशांत किशोर की ख़बरें आने से कुछ दिन पहले भी सिद्धू कैंप से ऐसे इशारे आए हैं. 19 मई को सिद्धू की पत्नी और पूर्व विधायक नवजोत कौर ने आम आदमी पार्टी के एक ट्वीट को री-ट्वीट किया था. ‘आप’ के इस ट्वीट में दावा किया गया था कि दिल्ली सरकार रोज़ाना 10 लाख लोगों को खाना दे रही है. एक चैनल के साथ इंटरव्यू में दिल्ली के सीएम अरविंद केजरीवाल ने ये दावा किया था. इसे री-ट्वीट करते हुए नवजोत कौर ने अंग्रेजी में जो लिखा, उसका मोटा-माटी अनुवाद होगा,

सत्य की यही ताक़त होती है. आम आदमी के लिए काम करने वाले हर शख़्स पर रब मेहर करे.

इसके अलावा उन्होंने हाल-फिलहाल में कांग्रेस पार्टी की खिंचाई करते कई ट्वीट पोस्ट किए हैं. ये ट्विटर हैंडल वेरिफाइड नहीं है. लेकिन इसके बायो में नवजोत कौर सिद्धू का नाम और डीटेल्स लिखी हुई हैं. इस हैंडल को नवजोत सिंह सिद्धू भी फॉलो करते हैं.

केजरीवाल ने कहा- स्वागत है

‘आप’ सुप्रीमो और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने नवजोत सिंह सिद्धू का ‘स्वागत’ किया है. एक टीवी इंटरव्यू में केजरीवाल ने कहा, ‘मुझे नहीं पता कि वो आ रहे हैं.’ सिद्धू के बारे में उनकी राय पूछने पर कहा, ‘स्वागत है’. इससे ज़्यादा केजरीवाल नहीं बोले. लेकिन इतने में बड़ा संदेश दे गए.

पर सिद्धू ही क्यों? 

पंजाब विधानसभा में बड़ी विपक्षी पार्टी ‘आप’ है. लेकिन ‘आप’ की पंजाब यूनिट हमेशा निर्णायक नेतृत्व के लिए जूझती रही है. पंजाब में ‘आप’ के दो मौजूदा नेता हैं- भगवंत मान और अमन अरोड़ा. भगवंत के बारे में आम धारणा है कि वो “CM स्टफ” नहीं हैं. अमन अरोड़ा की भगवंत के मुक़ाबले न तो फॉलोइंग है, न वो सिख चेहरा हैं.

कांग्रेस जॉइन करने से पहले भी सिद्धु केजरीवाल के संपर्क में थे. बाद में आम आदमी की जगह कांग्रेस को चुना था.
कांग्रेस जॉइन करने से पहले भी सिद्धु केजरीवाल के संपर्क में थे. बाद में आम आदमी की जगह कांग्रेस को चुना था.

दूसरी पार्टी है शिरोमणी अकाली दल (बादल). यहां नेतृत्व तय है. सुखबीर बादल सीएम का चेहरा हैं. सिद्धू का बादलों से छत्तीस का आंकड़ा है.

सत्ताधारी दल कांग्रेस में फिलहाल कैप्टन अमरिंदर को चुनौती देता कोई नज़र नहीं आता. लेकिन 2017 के चुनाव में कैप्टन इस तरह से प्रचार कर रहे थे कि उनका आखिरी चुनाव है. 2020 में वो इस बात को नकार रहे हैं. लेकिन फिर भी एक बार के लिए मान लिया जाए कि वो अगला चुनाव नहीं लड़ेंगे, तो कांग्रेस के पास भी मज़बूत नेतृत्व की कमी होगी.

इसलिए सिद्धू हर लिहाज से फिट बैठते हैं. ईमानदार छवि है. पढ़े-लिखे वर्ग में पहुंच है. आजकल उदारवादी सिख की पहचान गूढ़ करने में लगे हैं. महफिल लूटने की कला खूब है. बादल और कैप्टन के साथ एक फ्रेम में रखें तो रुआब कम नहीं होता. इसलिए आम आदमी पार्टी चाहेगी कि वो आएं. आने पर ‘आप’ की पंजाब यूनिट उनके पांव जमने देगी या नहीं, ये वक्त बताएगा.

कैप्टन के बाद कौन निर्णायक नेतृत्व देगा कांग्रेस को, ये पेच भी है. नाम गिनने को तो मनप्रीत बादल, प्रताप बाजवा, सुनील जाखड़ जैसे कई नाम ले सकते हैं. लेकिन ये धड़ेबाज़ नहीं हैं.

धड़ेबाज़ तो सिद्धू भी नहीं हैं, फिर?

सिद्धू ने जिस पार्टी से सियासत शुरू की, उसका पंजाब में कभी बड़ा वजूद नहीं रहा. बीजेपी हमेशा शहरी इलाके तक महदूद रही. सिद्धू भी केंद्र की राजनीति में रहे. पूरे पंजाब में अपने पांव पसारने का मौका नहीं बना पाए.

कैप्टन की कैबिनेट में स्थानीय निकाय मंत्रालय संभालते वक्त उनके पास मौका था. उन्होंने कोशिश भी की. बावजूद इसके आज देखें तो पंजाब कांग्रेस का कोई प्रभावशाली नेता उनके साथ सार्वजनिक तौर पर खड़ा नहीं है. सबसे ऊंची कुर्सी पाने के लिए आपको लाइन में लगे लोगों से अलग होना पड़ता है. सिद्धू इसे समझते हैं.

नवजोत सिंह सिद्धु का यूट्यूब चैनल.
नवजोत सिंह सिद्धू का यूट्यूब चैनल.

धड़ेबाज़ न होकर दूसरा तरीका सिद्धू अपना रहे हैं. इमेज बिल्डिंग. वन मैन आर्मी. अपने यूट्यूब चैनल ‘जित्तेगा पंजाब’ में रेत माफिया, एक्साइज़ नीति, राशन सप्लाई जैसे मामलों से लेकर धर्म और महाराजा रणजीत सिंह जैसा राज पंजाब में स्थापित करने की बातें बोल रहे हैं. अपनी विचारधारा जनता के सामने रख रहे हैं. करतारपुर कॉरिडोर खुलने के बाद सिद्धू का किसी हीरो की तरह स्वागत हुआ था. इन सब खूबियों को एक सूत्र में पिरोने का काम अब उन्होंने ने शुरू कर दिया है.

क्या कैप्टन का मुकाबला हैं सिद्धू

दो शब्दों में जवाब दें तो – अभी नहीं. कैप्टन की छवि राष्ट्रवादी सिख लीडर की है. पाकिस्तान को कई बातों पर सुनाते रहते हैं. इसी वजह से केंद्र के साथ भी ठीक पटरी बैठती है. कांग्रेस की टॉप लीडरशिप से संबंध ठीक हैं. स्टेट में ऐसा कोई नहीं दिखता जो कैप्टन के लिए ख़तरा हो. ऐसा भी कोई नहीं जिसकी चर्चा ज़्यादा हो.

कैप्टन फिलहाल कह रहे हैं कि 2022 के चुनाव में वही सरदार हैं. पहले 2017 के चुनाव को अपनी आखिरी पारी बताया था. एक बार के लिए मान लें कि वो अपनी बात पर कायम रहते हैं. 2022 का चुनाव नहीं लड़ते. ऐसे हालात में उनका ज़ोर रहेगा कि अपने पसंदीदा कैंडिडेट को मुख्यमंत्री प्रोजेक्ट करें.

इतना ही मौका कांग्रेस की टॉप लीडरशिप के पास होगा कि वो अपना पसंदीदा कैंडिडेट चुनें. जो सीधा उन्हें रिपोर्ट करे. नवजोत सिंह इस लिहाज से परफेक्ट हैं. सेंट्रल लीडरशिप को इतना मानते हैं कि 15 जुलाई, 2019 को अपना इस्तीफा मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह को सौंपने से 35 दिन पहले मंत्री पद छोड़ने का लेटर राहुल गांधी को लिखा था.

वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है, अगर सिद्धू ताक़तवर और सुलझे नेता की छवि बनाने में कामयाब होते हैं और कैप्टन चुनाव नहीं लड़ते हैं, तो पंजाब की सरदारी सिद्धू सौंपने में टॉप लीडरशिप कतई गुरेज़ नहीं करेगी.

आजकल क्या कर रहे हैं?

टिकटॉक. जी! यूट्यूब, ट्विटर के बाद सिद्धू टिकटॉक पर भी ऑफिशियली आ गए हैं. लोगों से बात कर रहे हैं, शायरी सुना रहे हैं और सोशल मीडिया के ज़रिए पंजाबियों की नब्ज़ टटोल रहे हैं. सिद्धू पर्सनल ट्विटर हैंडल पर एक्टिव नहीं हैं. हालांकि ज़िंदगी के साथ-साथ राजनीति में उनकी साथी नवजोत कौर सिद्धू प्रदेश की कांग्रेस सरकार के फैसलों पर लगातार सवाल कर रही हैं.

सिद्धू-प्रशांत की बातें ‘शुरली’ है या दम है इसमें, ये कुछ ही महीनों में साफ हो जाएगा.

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