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योगी सरकार ने कोरोना से जुड़ी ये बातें क्यों नहीं बताईं?

बात यूपी के कोरोना मैनेजमेंट के उस चैप्टर की, जिसमें तमाम दावों के बावजूद भयानक दुर्व्यवस्था के क़िस्से भरे हुए हैं. जहां स्वास्थ्यकर्मी सामूहिक रूप से इस्तीफ़ा दे देते हैं और कोरोना के मरीज़ों को खुले में शौच में जाना पड़ता है. जहां इलाहाबाद हाईकोर्ट भी अपने आदेश में यूपी सरकार को आड़े हाथों लिया है. लेकिन सबसे पहले बात उन्नाव से.

ख़बर आयी कि उन्नाव जिले के सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों के 11 और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के 5 इंचार्जों ने अपना इस्तीफ़े का ज्ञापन जिले के मुख्य चिकित्सा अधिकारी को सौंप दिया. डॉक्टरों ने आरोप लगाया कि सीनियर प्रशासनिक अधिकारी उनके साथ गलत व्यवहार करते हैं. डांटते हैं. जेल भेजने की धमकी देते हैं. कोविड संकट में दिन-रात एक करने के बावजूद उन्हें परेशान किया जा रहा है. रोज़ाना की कोविड ड्यूटी के बाद उन्हें 30 किलोमीटर दूर समीक्षा के लिए बुलाया जाता है. डॉक्टरों ने आरोप लगाया है कि उन्हें महसूस कराया जाता है कि वो काम नहीं कर रहे हैं. इससे वो हतोत्साहित होते हैं.

प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों के 5 इंचार्ज इस्तीफ़ा क्यों दे रहे?

ये डॉक्टर कुछ दिन पहले फतेहपुर चौरासी और असोहा प्राइमरी हेल्थ सेंटरों के प्रभारी अधिकारियों को हटाए जाने से भी खफा हैं. डॉक्टरों ने ये भी दावा किया कि एक हेल्थ सेंटर के इंचार्ज को तो कोरोना पीड़ित होने के दौरान ही ट्रांसफर कर दिया गया. अब इस पूरे मामले पर प्रशासन का क्या कहना है? उन्नाव के ज़िलाधिकारी रविंद्र कुमार ने मीडिया को जानकारी दी कि बातचीत को सुलझा लिया गया है, और सभी डॉक्टरों ने अपना इस्तीफ़ा वापिस ले लिया है.

DM साहब ने ये तो दावा किया कि सबकुछ सौहार्दपूर्ण तरीक़े से सुलझा लिया गया. लेकिन आरोप बस इतने नहीं हैं. कई हेल्थ सेंटर इंचार्ज बताते हैं कि अधिकारियों द्वारा उन्हें टेस्ट, वैक्सीन के लिए प्रेशर डाला जाता है. टेस्ट के टारगेट दिए जाते हैं और वैक्सीन ना होने और टेस्ट के रिज़ल्ट देर से आने की वजह से जनता का दबाव झेलना पड़ता है.

यूपी के इस पूरे मैनेजमेंट की बानगी इटावा जिले से भी मिलती है. यहां के ज़िला अस्पताल का हाल इंडिया टुडे की संवाददाता प्रीति चौधरी ने अपनी रिपोर्ट के माध्यम से दिखाया. यहां के मरीज़ और उनके तीमारदार बताते हैं कि अस्पताल में मरीज़ों के लिए बाथरूम नहीं है. लिहाज़ा मरीज़ों को शौच के लिए खुले में जाना पड़ता है. इलाज और दवा का सारा इंतज़ाम मरीज़ों के ज़िम्मे ही है. डॉक्टर, बिजली और जांच का कहीं कोई भी अता पता नहीं. जिस कोविड वार्ड में PPE किट पहले डॉक्टर और स्टाफ़ को होना चाहिए था, वहाँ तीमारदार ख़ुद के मरीज़ों को पंखा झलते हुए दिखते हैं.

अब इटावा से चलते हैं रायबरेली

यहां का गांव है सुल्तानपुर खारा. यहां के रहवासी बताते हैं कि यहाँ पर बीते एक हफ़्ते के अंदर यहां के 17 लोगों की मौत हो चुकी है. 2 दर्जन से ज़्यादा लोग बीमार हैं. सभी के लक्षण कोरोना वाले. लेकिन ज़िला प्रशासन और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर आरोप है कि तमाम मिन्नतों और शिकायतों के बाद कुछ नहीं हुआ.

यूपी में जो हो रहा है, उसका प्रभाव कहीं न कहीं भय के रूप में सामने आ रहा है. इस भय के कारण कभी लोग मृतकों को हाथ लगाने नहीं आते तो कभी उन्हें नदी में बहा देते हैं या नदी के किनारे रेत में दफ़्न कर देते है. यूपी और बिहार बॉर्डर की बात करते हैं. यहां पर गंगा में लाशें उतराती हुई दिखीं. दोनों राज्यों ने एक दूसरे पर आरोप मढ़े. बिहार के सीमावर्ती जिले बक्सर के प्रशासन ने एक गुप्त अभियान चलाने का दावा किया. नदी में जाल बिछाया और उस जाल में लाशें पकड़ी गयीं. फिर बक्सर पुलिस की टीम नदी के रास्ते यूपी के ग़ाज़ीपुर तक गयी और उन्होंने देखा कि वहाँ लाशों को गंगा में डाला जा रहा है. जिस व्यक्ति को बिहार पुलिस ने पकड़ा, उस व्यक्ति ने बताया कि लाशों को पानी में डालने के लिए पुलिस चौकी से आदेश दिए गए थे.

वहीं उन्नाव में मृतकों की लाशें बहती नहीं मिलीं तो दफ़्न मिलीं. बालू में. ढेर सारी लाशें एक के बाद एक. तस्वीरें और ख़बरें जब इंटरनेट पर कौंधीं तो इस तथ्य से सामना होना लाजिम था कि ये उन लोगों की लाशें हैं, जिनके परिजनों के पास अंतिम संस्कार का सामान ख़रीदने के लिए पैसे नहीं थे, ऐसी ख़बरें चलीं. ये अब तक साफ़ नहीं है कि ये लाशें कोरोना संक्रमित लोगों की है या नहीं. लेकिन प्रशासन ने कह दिया कि हम मामले की जांच कराएंगे. और हम आशा करते हैं कि जिस राज्य में कोरोना संक्रमितों का अंतिम संस्कार का ख़र्च उठाने का दावा राज्य सरकार करती हो, उस राज्य में हो रही इस प्रशासनिक जांच में कोई तो दावा या परिणाम सामने आए, जिसकी फिर से पड़ताल की जा सके.
इन सभी आरोपों के साथ यूपी सरकार लगातार कोरोना के केस और मृत्युदर के कम होने का दावा कर रही है. कांटैक्ट ट्रेसिंग पर ज़ोर दिया जा रहा है, और कहा जा रहा है कि प्रशासन शहरों के साथ-साथ गांवों में भी ध्यान दे रहा है. मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ख़ुद कई जिलों का दौरा कर रहे हैं, और स्वास्थ्य व्यवस्थाओं का जायज़ा ले रहे हैं. आज तो केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय की मीटिंग में वाराणसी के कोविड मैनेजमेंट मॉडल की सराहना भी हुई. लेकिन ये भी तथ्य है कि उनकी ही पार्टी से आने वाले विधायक और सांसद उन पर कोरोना की स्थितियों को लेकर पत्र लिख रहे हैं. बरेली से सांसद और केंद्रीय मंत्री संतोष गंगवार ने ख़ुद CM योगी को ख़त लिखकर कहा था कि स्वास्थ्य विभाग के अफ़सर फ़ोन तक नहीं उठाते हैं. और ऑक्सिजन की क़िल्लत की बात भी होती रहती है.

आरोपों और खतोकिताबत के मसले से चलते हैं इलाहाबाद हाईकोर्ट

यहां कोरोना मैनेजमेंट को लेकर सुनवाई हो रही थी. हाईकोर्ट ने लॉकडाउन लगाने के लिए करबद्ध प्रार्थना की. नहीं सुना गया. लेकिन पंचायत चुनाव के नतीजे आने के बाद से अब तक यूपी में लॉक्डाउन जारी है. अब 11 मई को आए हाईकोर्ट के आदेश में भी यूपी सरकार की नीतियों की आलोचना हुई है. कोर्ट ने कहा है कि यूपी सरकार के हलफ़नामे से साबित होता है कि सरकार ने राज्य में कोरोना की टेस्टिंग कम कर दी है.

कोर्ट ने कहा कि चुनाव आयोग, सरकार और अदालतें चुनाव कराने का ख़तरा भांपने में असफल रहीं. इसके साथ ही कोरोना के मैनेजमेंट को लेकर हाईकोर्ट ने सीधे लगाम अपने हाथ में ले ली है. हाईकोर्ट ने कहा है कि हर जिले में कोरोना से जुड़ी शिकायतों को सुनने के लिए 3 सदस्यों की महामारी लोक शिकायत समिति बनाई जाए.

समिति में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट या जिला न्यायाधीश द्वारा नामित समान रैंक के न्यायिक अधिकारी हों. मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य द्वारा नामित प्रोफेसर हों. यदि कोई मेडिकल कॉलेज नहीं है, तो जिला अस्पताल के मुख्य चिकित्सा अधीक्षक द्वारा जिला अस्पताल के नामित डॉक्टर को रखा जाए. जिला मजिस्ट्रेट की ओर से नामित अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट के रैंक का एक प्रशासनिक अधिकारी भी इस कमिटी में शामिल हो.

ऑफलाइन रजिस्ट्रेशन कैसे हो?

कोर्ट ने ये भी आदेश दिया कि इस आदेश के पारित होने के 48 घंटे के भीतर ये 3 सदस्यीय महामारी लोक शिकायत समिति अस्तित्व में आ जाए. यह महामारी जन शिकायत समिति शिकायतें सुनेगी, साथ ही कोरोना को लेकर लगातार सामने आ रहे वीडियो और वायरल खबरों का भी संज्ञान लेगी.

कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वे कोर्ट के सामने एक प्लान पेश करें. बताएं कि 18 से 44 साल के उन अशिक्षित मजदूरों और ग्रामीणों का टीकाकरण कैसे करेंगे, जो ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन नहीं करवा पा रहे हैं.

हाई कोर्ट ने ये भी कहा कि मतदान कराने की प्रक्रिया के दौरान कोरोना की चपेट में आकर जिन अधिकारियों की मौत हो गई, उन्हें दिया जाने वाला मुआवजा बहुत कम है. ये रकम कम से कम 1 करोड़ होनी चाहिए. प्रदेश सरकार ने हर ऐसे मृतक को 30 लाख रुपये का मुआवजा देने की बात कही थी.

राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत- फाइल फोटो
राजस्थान के सीएम अशोक गहलोत- फाइल फोटो

लेकिन ख़बर चल रही है कि विश्वस्वास्थ्य संगठन यानी WHO ने योगी के प्रयासों की तारीफ़ की है. WHO की वेबसाइट पर छपी ख़बर भी है और ट्वीट भी है. लेकिन ये साफ़ करना ज़रूरी है कि WHO ने बस इतना बताया है कि यूपी सरकार क्या कर रही है और WHO से उन्हें कितना सहयोग मिला है. इसमें तारीफ़ और आलोचना का कोई बिंदु अभी नहीं तलाशा जा सकता है.

यूपी के बाद अब राजस्थान चलते हैं

यहां भी स्थिति सरकारी बयानों में कुछ और है, जमीन पर कुछ और. सरकारी आंकड़ों में स्थिति नियंत्रण में बताई जा रही है जबकि गांवों में बीमार लोगों की टेस्टिंग ही नहीं हो पा रही है. ग्रामीण इलाकों में बुखार, ज़ुकाम, खांसी के रोगियों की संख्या में लगातार वृद्धि हो रही है. ख़बरें हैं कि इलाज के लिए ग्रामीण झोलाछाप डॉक्टरों पर निर्भर हैं. मुख्यमंत्री अशोक गहलोत, आला अधिकारियो को गांव में सर्वे कराने का निर्देश दे रहे हैं. जो बीमार हैं उन्हें मेडिकल किट देने को कह रहे हैं. जिला प्रशासन की ओर से भी आंगनबाड़ी कार्यकर्ता, आशा सहयोगी, ग्राम पंचायत सचिव और बीएलओ को टीम बना कर सर्वे करने के लिए कह दिया गया है.

लेकिन धरातल पर ना तो सर्वे हो रहा है और ना ही मरीजों तक मेडिकल किट पहुंच रही है. सरकारी सिस्टम कागजी खानापूर्ति में लगा हुआ है और लोग अपने आधे अधूरे ज्ञान, अपनी मजबूरी और सीमित संसाधनों के साथ इस महामारी से लड़ने की कोशिश में हैं. हम आपको उदाहरण दिखाते हैं. धौलपुर के अजीतपुर गांव के लोगों की बात सुनिए. लोग बताते हैं कि कई लोगों को खांसी,बुखार और जुकाम की शिकायत है लेकिन परिस्थितियाँ इन साफ़ समझ में आते लक्षणों के संतुलन में नहीं दिखती हैं

गांव के सरपंच रवि पोषवाल का कहना है कि गांव में न तो सर्वे हुआ है और ना ही किसी को मेडिकल किट मिला है. लोग झोलाछाप डॉक्टरों से इलाज कराने को मजबूर हैं.

जांच कराई जाए तो 50 फ़ीसदी लोग पॉजिटिव निकलें!

ग्रामीणों और सरकारी कर्मचारियों के दावों में जमीन-आसमान का अंतर है. अब आप खुद अंदाजा लगा लीजिए कि स्थिति क्या है. और अब भी अंदाज़ न लगे तो हम आपको राजस्थान के करौली जिले के गांव भोपुर लिए चलते हैं. देश कोरोना महामारी से जंग लग रहा है और भोपुर गांव के लोग स्वास्थ्य सेवा की बदहाली से लड़ रहे हैं. गांव में वायरस का जबर्दस्त प्रकोप है. ग्रामीणों का कहना है कि 15 गांवों से जुड़े इस गांव में न तो पीएचसी है और ना ही कोई डॉक्टर. हर घर में आदमी बीमार है. अगर जांच कराई जाए तो 50 फ़ीसदी लोग पॉजिटिव निकलें.

मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के गृहनगर जोधपुर की भी स्थिति कुछ अलग नहीं है. जिले के मथानिया अस्पताल के प्रभारी डॉ. सुल्तान सिंह चारण ने इंडिया टुडे की टीम को बताया कि रोजाना कोरोना टेस्ट में करीब 30 फीसदी की दर से मरीज सामने आ रहे हैं. बालरवा गांव में एक माह में 13 लोगों की मौत हो चुकी है. इनमें से सिर्फ दो मौत कोरोना संक्रमण से दर्ज की गई है. ग्रामीणों का कहना है कि बाकी लोगों की मौत पर उनका कोरोना टेस्ट नही किया गया.

गांव से निकलकर शहर और क़स्बों में आएँ तो वहाँ भी टेस्टिंग, इलाज और बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी राजस्थान जूझता दिखेगा. वैक्सीन की क़िल्लत का आलम ये है कि राजधानी जयपुर के टीकाकरण केंद्रों के बाहर नो वैक्सीन डे का बोर्ड लगा दिया गया है. टीकाकरण केंद्रों पर भारी भीड़ लगी हुई है. राज्य के स्वास्थ्यमंत्री का कहना है कि क़ानून व्यवस्था की समस्या पैदा हो गई है मगर केंद्र सरकार से कुछ भी पता नहीं चल पा रहा है कि वैक्सीन कब तक मिल पाएगी. और इस अनुपलब्धता के पूरे जंजाल में लोग पैदल चल के वैक्सीनेशन सेंटर पर आ रहे हैं, और फिर एक तख़्ती टंगी देखकर लौट जा रहे हैं.


विडियो- कोरोना से म्यूकोरमाइकोसिस के बीच वैक्सीनेशन की कमी की वजहों को खंगालती ग्राउंड रिपोर्ट

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