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टोक्यो ओलंपिक का ये मेडल दशकों चले सीक्रेट वॉर की याद दिलाता है

ओलिंपिक्स का गोल्ड मेडल. किसी भी खिलाड़ी के जीवन का सबसे प्रतिष्ठित क्षण. मगर क्या कोई मेडल दशकों एक सीक्रेट वॉर की कहानी सुना सकता है? बीते रोज़ तोक्यो ओलिंपिक में एक एथलीट ने गोल्ड मेडल जीता. और, इस मेडल ने उसकी पहचान के साथ जुड़ी एक सीक्रेट वॉर की कहानी दुनिया को रिमाइंड करा दी.

इस कहानी में कई पात्र हैं. है, एक विदेशी खुफ़िया एजेंसी. उसका एक ख़तरनाक ऑपरेशन. एक सुपरपावर का सबसे बड़ा कोवर्ट ऑपरेशन. एक सीक्रेट वॉर. पहाड़ पर रहने वाले वनवासी लड़ाकों की एक सीक्रेट आर्मी. करीब एक दशक लंबा युद्ध. युद्ध में हुई हवाई बमबारी. दुनिया की सबसे भीषण, सबसे सघन हवाई बमबारी. हर दिन, औसतन हर आठ मिनट पर आसमान से गिराए जाते बम. हज़ारों मौतें. टॉर्चर कैंप्स. जान बचाकर नदी में कूदते लोग. पीछे से बरस रहीं गोलियां. गोली खाकर मरते लोग. बहते ख़ून से लाल होता नदी का पानी. मास एक्सोडस. सरकार द्वारा प्रायोजित नरसंहार. इन सबका ओलिंपिक्स के एक गोल्ड मेडल से क्या संबंध है? विस्तार से बताते हैं आपको.

ये बात है करीब छह दशक पुरानी. 1960 का दौर था. दुनिया में दो विचारधाराओं की लड़ाई चल रही थी. अमेरिका किसी कीमत पर कम्युनिज़म के विस्तार को रोकना चाहता था. इसी संदर्भ में आया जनवरी 1961. राष्ट्रपति आइज़नहावर का कार्यकाल ख़त्म होने में गिनती के दिन बचे थे. इन्हीं आख़िरी दिनों में आइज़नहावर के सामने आया एक प्रपोज़ल. एक सीक्रेट ऑपरेशन का प्रस्ताव. जिसे भेजा था, अमेरिकी ख़ुफिया एजेंसी CIA ने. इस प्रपोज़ल का नाम था, ऑपरेशन मोमेंटम. आइज़नहावर ने इस ऑपरेशन को हरी झंडी दे दी.

ऑपरेशन मोमेंटम

क्या था ये ऑपरेशन मोमेंटम? इसकी आज़माइश होनी थी, अमेरिका से करीब 13 हज़ार किलोमीटर दूर बसे एक देश में. दक्षिणपूर्व एशिया में बसा करीब 21 लाख की आबादी वाला एक छोटा सा देश. जो बसा था- चीन, थाइलैंड, कंबोडिया और वियतनाम के बीच. इस लैंड लॉक्ड देश का नाम था- लाउस.

CIA ने जब ऑपरेशन मोमेंटम की प्लानिंग की, उस समय लाउस में एक गृह युद्ध चल रहा था. इस सिविल वॉर में एक तरफ़ थी, कम्युनिस्ट फ़ोर्स. इनका मुकाबला था, लाउस की राजशाही से. अमेरिका नहीं चाहता था कि कम्युनिस्ट्स जीतें. इसकी वजह थी, डोमिनो थिअरी. अमेरिका का मानना था कि साउथ-ईस्ट में किसी एक देश के कम्युनिस्ट होने का मतलब है कि आसपास के बाकी देश भी धीरे-धीरे कम्युनिस्ट हो जाएंगे. इसीलिए अमेरिका को लगा, लाउस में कम्युनिज़म को हर हाल में रोकना ही होगा.

इसके अलावा लाउस में अमेरिकी दिलचस्पी की एक और बड़ी वजह थी. इस वजह का नाम था, हो ची मिन्ह ट्रेल. ये मिलिटरी सप्लाई से जुड़ा एक सर्पाकार रूट था. ये उत्तरी वियतनाम से होकर, लाउस और कंबोडिया होते हुए साउथ वियतनाम जाता था. वियतनाम युद्ध के दौरान इसी रूट के मार्फ़त नॉर्थ वियतनाम के कम्युनिस्ट साउथ वियतनाम के अपने समर्थकों को हथियार जैसी ज़रूरी सैन्य सप्लाई भेजते थे. अमेरिका इस सप्लाई रूट को तोड़ना चाहता था. चूंकि ये रूट लाउस से भी होकर गुज़रता था, सो अमेरिका की लाउस में दिलचस्पी थी.

Laos
नक्शे पर लाउस देश.

अमेरिका लाउस में सैन्य ऑपरेशन तो चलाना चाहता था, मगर वो सार्वजनिक तौर पर ऐसा कर नहीं सकता था. इसलिए कि लाउस आधिकारिक तौर पर ख़ुद को न्यूट्रल कहता था. इसीलिए अमेरिका ने गुप-चुप तरीके से सैन्य दखलंदाज़ी करने का फ़ैसला किया. इसके लिए उसने जो तरीका खोजा, उसी का नाम था- ऑपरेशन मोमेंटम.

लाउस का बागी समुदाय – मॉन्ग

इसके तहत, अमेरिका ने लाउस में एक ऐंटी-कम्युनिस्ट विद्रोह को भड़काने की साज़िश की. विद्रोह भड़काने के लिए CIA को लाउस के ही एक समुदाय की ज़रूरत थी. जिन्हें हथियार, ट्रेनिंग और फंड देकर गुरिल्ला आर्मी बनाई जा सके. CIA की ये तलाश ख़त्म हुई, लाउस के पहाड़ों में. यहां घने जंगलों के बीच एक समुदाय रहता था. एक ऐसा समुदाय, जिसकी तबीयत ही बाग़ी थी. आज़ाद तबीयत के चलते उनके पास संघर्षों का एक लंबा इतिहास था. इस समुदाय का नाम था, मॉन्ग.

कौन हैं मॉन्ग? ये एक प्राचीन एथनिक समुदाय है. जिनकी मूलभूमि है, चीन. प्राचीन चाइनीज़ सोर्सेज़ में मॉन्ग समुदाय को विद्रोही बताया गया है. कहते हैं कि पहले वो चीन के मैदानी इलाकों में रहते थे. मगर दो से ढाई हज़ार ईसा पूर्व के करीब उन्हें यहां से खदेड़कर भगाया जाने लगा. उनके इलाकों में हान समुदाय के लोग बस गए. मॉन्ग्स को अपना इलाका छोड़कर पलायन करना पड़ा. वो दक्षिणी चीन की तरफ चले गए. यहां वो पहाड़ की ऊंचाइयों पर जंगलों में जाकर बस गए.

मॉन्ग्स की भाषा, उनकी संस्कृति चाइनीज़ बहुसंख्यकों से अलग थी. हान समुदाय, जो कि चीन का बहुसंख्यक वर्ग है, मॉन्ग्स को नीची नज़र से देखता था. उन्हें असभ्य कहता था. मॉन्ग्स उपेक्षा और भेदभाव के शिकार रहते थे. उन्हें टारगेट किया जाता. उन्हें ग़ुलाम बनाया जाता. मॉन्ग चुपचाप अत्याचार सहने वालों में नहीं थे. वो सत्ता के खिलाफ़ विद्रोह करते रहते थे. क्रूरता के दम पर उनके विद्रोह को दबा दिया जाता. 18वीं सदी में चिंग साम्राज्य के दौर में मॉन्ग पर अत्याचार बढ़ा. उनसे उनके जंगल और खेत छीने जाने लगे. उनपर अपनी संस्कृति और भाषा छोड़ने का दबाव बनाया जाने लगा. मॉन्ग समुदाय इन अत्याचारों का विरोध ना करे, ये सुनिश्चित करने के लिए राजशाही ने आतंक फैलाया. मॉन्ग विद्रोहियों के सिर काटकर लटका दिए जाते. अपनी जान बचाने के लिए बड़ी संख्या में मॉन्ग्स ने चीन से पलायन किया. वो थाइलैंड, वियतनाम और लाउस जैसी जगहों पर जाकर बस गए.

ये जब चीन छोड़कर बाहर आए, तब भी ज़्यादातर इनकी बसाहट ऊंचाई वाले इलाकों में ही रही. क्या थी इसकी वजह? जब बाहर से आया कोई नया ग्रुप किसी नई जगह पर आकर बसता है, तो उस जगह पर पहले से रह रहे लोग वेलकमिंग नहीं होते. पुरानों को लगता है, नए वालों के साथ संसाधन साझा करने होंगे. ऐसे में वो नए समुदाय के प्रति आक्रामकता दिखाते हैं. मॉन्ग्स के साथ भी ऐसा ही होता था. ऐसे में वो निर्जन इलाके खोजते थे. चूंकि मैदानी इलाकों में पहले से बसाहट थी, सो मॉन्ग्स ऊपरी इलाकों में जाते. वहां जंगलों के बीच अपने रहने और खेती लायक जगह बनाते.

CIA से मिले मॉन्ग्स

ये बैकग्राउंड बताने के बाद फिर लौटते हैं, लाउस पर. 18वीं सदी में चीन से पलायन करके आए कई मॉन्ग लाउस में भी रहते थे. इनकी ज़्यादातर रिहाइश थी, उत्तर-पूर्वी लाउस के पहाड़ी इलाकों में. ऑपरेशन मोमेंटम के तहत CIA ने इन्हीं मॉन्ग्स को मोहरा बनाया. इस काम में CIA के मददगार बने, मेजर जनरल वैंग पाओ. वो लाउस की शाही सेना में एक जनरल थे.

वैंग पाओ मॉन्ग समुदाय से आते थे. रॉयल आर्मी में सबसे ऊंचा ओहदा पाने वाले मॉन्ग थे वो. मॉन्ग कम्युनिटी पर भी उनकी बहुत पकड़ थी. CIA ने राष्ट्रपति आइज़नहावर से ग्रीन सिग्नल मिलने के पहले ही 1960 में जनरल वैंग से संपर्क किया था. जनरल वैंग लाउस रॉयल आर्मी का हिस्सा थे. वो पहले से ही कम्युनिस्ट्स के साथ लड़ रहे थे. इसके अलावा वियतनाम के कम्युनिस्ट्स जब सीमा लांघकर लाउस में आते, तब जनरल वैंग उनसे भी लड़ते.

CIA ने जनरल वैंग से हाथ मिलाया. अमेरिका के दिए फंड्स और हथियारों की बदौलत वैंग ने फ़ुर्ती में हज़ारों मॉन्ग्स की एक गुरिल्ला आर्मी खड़ी कर दी. इस गुरिल्ला आर्मी ने अमेरिकियों के लिए कम्युनिस्ट्स से युद्ध लड़ा. कॉम्बैट ऑपरेशन्स के दौरान जनरल वैंग ख़ुद गुरिल्ला आर्मी का नेतृत्व करते. अपने साथी लड़ाकों से कहते-

अगर हम मरे, तो साथ मरेंगे. अपने किसी साथी को पीछे छोड़कर नहीं जाएंगे. पीठ नहीं दिखाएंगे.

मॉन्ग्स ने बहुत बहादुरी दिखाई इस युद्ध में. 35 हज़ार से ज़्यादा मॉन्ग लड़ाके इस युद्ध में मारे गए. ऐसा नहीं कि मॉन्ग कम्युनिटी केवल अमेरिकी पैसों के लिए ही ये युद्ध लड़ रहे हों. उनके भीतर भी कम्युनिस्ट्स से बहुत नाराज़गी थी. हमने आपको बताया था कि मॉन्ग्स पहाड़ी इलाकों में रहते थे. नीचे के इलाकों में रहने वालों के साथ उनका संघर्ष चलता रहता था. कम्युनिस्ट फ़ोर्स की लीडरशिप में लोलैंडर्स की बहुतायत थी.

इसलिए मॉन्ग्स भविष्य को लेकर डरते थे. उन्हें डर था कि अगर कम्युनिस्ट जीतकर सत्ता में आ गए, तो मॉन्ग्स से उनकी ज़मीनें, उनके जंगल छीन लिए जाएंगे. मॉन्ग्स के पुरखों ने बहुत कुछ झेला था. बहुत दमन भोगा था. बहुत भागने-दौड़ने के बाद उन्होंने लाउस में नया जीवन शुरू किया था. मॉन्ग्स इसे खोना नहीं चाहते थे. ये भी एक बड़ी वजह थी कि वो इस युद्ध में शामिल हुए.

सबसे हैवली बॉम्ब्ड देश

एक तरफ़ जहां मॉन्ग कम्युनिटी अमेरिका की तरफ़ से ज़मीन पर युद्ध लड़ रही थी. वहीं अमेरिका आसमान के रास्ते लाउस पर बमबारी कर रहा था. 1964 से 1973 के बीच अमेरिका ने यहां 20 लाख टन से ज़्यादा वजन के बम गिराए. नौ सालों में करीब छह लाख बॉम्बिंग मिशन्स.

Laos War
लाउस में अमेरिका के गिराए बमों के दुष्परिणाम अगले दो दशक तक दिखते रहे.

इसका हिसाब लगाइए, तो औसतन हर आठ मिनट पर अमेरिका ने यहां एक बम गिराया था. नौ साल. इन नौ सालों का हर दिन. दिन के चौबीसों घंटे. हर घंटे औसतन आठ मिनट के अंतराल पर होने वाली हवाई बमबारी. इसीलिए लाउस को दुनिया का सबसे हैवली बॉम्ब्ड देश कहा जाता है. अमेरिका ने किसी और देश पर ऐसी बमबारी नहीं की. इन बमों से मरने वाले 80 पर्सेंट लोग आम नागरिक थे. सबसे भीषण तो ये है कि जितने बम गिराए गए, उनमें से एक तिहाई तब फूटे ही नहीं. लाउस युद्ध ख़त्म होने के बाद के दशकों में 20 हज़ार से ज़्यादा लोग इन अनएक्लप्लोडेड बॉम्ब्स के संपर्क में आकर मरे.

ख़ैर, वापस चलते हैं अमेरिका के सीक्रेट लाउस वॉर पर. एक तरफ़ जहां लाउस में इतनी बर्बादी हो रही थी. वहीं अमेरिका में किसी को इसकी भनक नहीं थी. इसलिए कि अमेरिकी सरकार और CIA ने इस युद्ध को अपनी जनता से छुपाकर रखा था. यहां तक कि अमेरिकी संसद को भी इसकी जानकारी नहीं दी गई थी.

ये युद्ध 1975 में ख़त्म हुआ. इसके दो साल पहले 1973 में ही अमेरिका ने लाउस से हाथ खींच लिए. इस वक़्त तक स्पष्ट हो चुका था कि कम्युनिस्ट्स ये युद्ध जीत रहे हैं. मॉन्ग्स ने अमेरिकियों का साथ दिया था. कम्युनिस्ट्स से लड़ाई की थी. इसीलिए ठोस अंदेशा था कि कम्युनिस्ट सत्ता मॉन्ग्स को निशाना बनाएगी. चूंकि मॉन्ग्स ने अमेरिका के लिए कुर्बानियां दी थीं, इसलिए अमेरिका ने सैकड़ों मॉन्ग्स को अपने यहां जगह दी. 70 और 80 के दशक में लाखों मॉन्ग्स लाउस छोड़कर अमेरिका आ गए. अनुमान है कि इस दौर में करीब तीन लाख मॉन्ग्स अमेरिका आकर बसे. इन्हें मॉन्ग अमेरिकन कम्युनिटी कहा जाता है. इस कम्युनिटी के करीब 92 पर्सेंट लोगों को अमेरिकी नागरिकता मिल चुकी है. 

अमेरिका में इनकी बसाहट के मुख्य इलाके हैं- मिनेसोटा, कैलिफॉर्निया और विस्कॉन्सिन. अमेरिका की वाइट आबादी में शरणार्थियों को लेकर बहुत गर्मज़ोशी नहीं है. रिफ़्यूज़ी कम्युनिटी, अफ्रीकन अमेरिकन्स और एशियाई मूल के लोगों के साथ भेदभाव वहां आम हैं. मॉन्ग समुदाय भी इससे अछूता नहीं है. इसके अलावा, जीवन स्तर और मौकों में भी भेदभाव साफ़ दिखता है. अमेरिकी मॉन्ग्स की करीब 60 पर्सेंट आबादी कम-आयवर्ग वाले ग्रुप में आती है. मॉन्ग अमेरिकन्स, संयुक्त राष्ट्र अमेरिका के सबसे वंचित, सबसे हाशिये पर पड़े एशियन-अमेरिकन्स ग्रुप्स में गिने जाते हैं.

अब बात सुनीसा ली की

अब सवाल है कि ये सब हम आपको आज क्यों बता रहे हैं? ये इतिहास सुनाने की वजह है, तोक्यो ओलिंपिक्स. 29 जुलाई को यहां जिम्नास्टिक्स का एक मुकाबला हुआ. इसमें ‘विमिन्स आर्टिस्टिक इनडिविज़ुअल ऑल-अराउंड’ कैटगरी में गोल्ड मेडल जीता, अमेरिका की एक जिम्नास्ट ने. इनका नाम है, सुनीसा ली.

Sunisa Lee
सुनीसा ली ने टोक्यो ओलंपिक में ‘विमिन्स आर्टिस्टिक इनडिविज़ुअल ऑल-अराउंड’ कैटगरी में गोल्ड मेडल जीता.

सुनीसा मॉन्ग अमेरिकन कम्युनिटी का हिस्सा हैं. उनके माता-पिता वियतनाम वॉर के बाद लाउस से भागकर अमेरिका आए थे. सुनीसा की जीत पूरे मॉन्ग अमेरिकन कम्युनिटी के लिए बहुत मायने रखती है. इसलिए कि आज भी अमेरिका के कई लोग मॉन्ग्स का योगदान नहीं जानते. उन्हें नहीं पता कि अमेरिका के लिए, उसके सीक्रेट वॉर के लिए मॉन्ग्स ने कितनी कुर्बानियां दी हैं. सुनीसा की जीत के चलते मॉन्ग कम्युनिटी की कहानी, उनका अतीत, उनके संघर्षों को प्लेटफॉर्म मिला है.

सुनीसा ली मॉन्ग अमेरिकन कम्युनिटी की पहली सदस्य हैं, जिन्हें ओलिंपिक टीम में जगह मिली. ऊपर से उनका गोल्ड मेडल जीतना, इससे पूरी मॉन्ग कम्युनिटी ख़ुश है. वो जश्न मना रहे हैं. अमेरिकन वाइट कम्युनिटी के बीच भी एकाएक मॉन्ग्स के बारे में जानने का ट्रेंड बढ़ा है. मॉन्ग्स को उम्मीद है कि इस ट्रेंड से बेहतरी आएगी. शायद अब वो ‘अनसुने, अनदेखे’ ना रहें.

मॉन्ग भाषा में एक कहावत है. कुछ इस भाव का कि तुम मॉन्ग हो, तो तुम्हारे दिल में बाकी मॉन्ग्स के लिए मुहब्बत तो होनी ही चाहिए. क्योंकि हम ही हैं एक-दूसरे के लिए. और कौन हमें चाहेगा?

मॉन्ग कम्युनिटी के लिए बड़ा दिन

कहावतें रातोरात नहीं बनतीं. इनमें कई पीढ़ियों के साझा अनुभवों की झुर्रियां होती हैं. उनकी ख़ुशियां, उनके दुख, उनकी भोगी बीमारियां, जीवन-मरण, भोजन…बहुत सारे भाव और तत्व मिलकर कहावतों को जनते हैं. और कौन हमें चाहेगा? इस एक पंक्ति से आप मॉन्ग समुदाय के संघर्षों का अंदाज़ा लगा सकते हैं. उनका अतीत दमन, युद्ध, पलायन और क्षति से भरा है. ऐसे में अपने बीच की एक 18 साल की लड़की को, ओलिंपिक्स के स्टेज पर, गोल्ड मेडल पहनकर खड़े देखना…मॉन्ग कम्युनिटी के लिए इस पल की ख़ुशी कितनी ज़ियादा होगी, इसका हम केवल अंदाज़ा ही लगा सकते हैं.

Celebration
सुनीसा ली का मेडल जीतना मॉन्ग कम्युनिटी के लिए बड़ी बात है.

इस कहानी का, सुनीसा के मेडल जीतने का एक और ज़रूरी पहलू है. मॉन्ग कम्युनिटी परंपरावादी है. वहां लड़कियों पर कई तरह की पाबंदियां होती हैं. खाना बनाना, शादी करना, मां-बाप और पति की इज्ज़त बनना. सोसायटी लड़कियों पर कई तरह के नियंत्रण रखती है. ऐसे में सुनीसा ली का जीता मेडल शायद और भी कई मॉन्ग अमेरिकन लड़कियों के लिए दरवाज़े खोलेगा.

सुनीसा के परिवार ने, उनके माता-पिता ने अपनी बेटी को बहुत सपोर्ट किया. उसके स्पोर्टिंग टैलेंट को बहुत प्रोत्साहन दिया. जिम्नास्टिक्स की ट्रेनिंग बहुत महंगी होती है. सुनीसा के माता-पिता विदेश आकर बसे फर्स्ट-जनरेशन रिफ़्यूज़ी हैं. उनके लिए ट्रेनिंग का भारी-भरकम ख़र्च जुटाना बहुत मुश्किल था. मगर फिर भी उन्होंने हाथ नहीं खींचे.

सुनीसा ने अपने माता-पिता के सपोर्ट को वर्ल्ड स्टेज पर जगह दिला दी. सुनीसा का इस मकाम तक पहुंचना शायद और भी मॉन्ग अमेरिकन पैरेंट्स को प्रेरित करे. ज़रूरी नहीं कि सारी लड़कियां ओलिंपिक्स मेडल ही जीत लें. मगर वो अपने मन का करियर चुन सकेंगी, आत्मनिर्भरता से जी सकेंगी, ये भी बहुत प्यारी बात है. सोचिए. एक मेडल से कितने किरदार, कितनी कहानियां जुड़ी हैं.

जाते-जाते, उन मॉन्ग्स की बात, जो लाउस में बचे रह गए. कम्युनिस्ट सत्ता ने उन्हें बहुत टारगेट किया. हज़ारों मॉन्ग मार डाले गए. कइयों को टॉर्चर कैंप्स में रखा गया. वहां के मॉन्ग्स आज तक सत्ता द्वारा प्रायोजित हिंसा के शिकार हो रहे हैं.


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