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ट्रिपल तलाक़ : खत्म, खत्म, खत्म, लेकिन एक पेच फंस गया

एक बार में ट्रिपल तलाक और निकाह हलाला इस्लाम का मूल हिस्सा है या नहीं?
तीन तलाक महिलाओं के संवैधानिक अधिकारों का हनन करता है या नहीं?
दोनों मसलों को औरतों के मौलिक अधिकारों से जोड़ा जा सकता है या नहीं?
इसे मौलिक अधिकार करार देकर कोर्ट आदेश लागू करवा सकता है या नहीं?

ये वो सवाल थे जो ट्रिपल तलाक पर फैसला आने से पहले मन में घुमड़ रहे थे. ट्रिपल तलाक सोशल मीडिया से लेकर गली नुक्कड़ की बहसों तक में ही नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव तक में राजनीतिक मुद्दा बन गया था. मुसलमान तलाक के इस रूप को धर्म से जुड़ा और शरीयत का हिस्सा बताते हैं. लेकिन अब सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुना दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ट्रिपल तलाक असंवैधानिक है. फ़िलहाल ट्रिपल तलाक पर 6 महीने की रोक लगा दी गई है. 6 महीने के अंदर केंद्र सरकार कानून बनाए.   

यानी सुप्रीम कोर्ट ने गेंद अपने पाले से केंद्र सरकार के पाले में डाल दी है. अब इसमें केंद्र सरकार फंस गई है. क्योंकि जो राइट विंग ट्रिपल तलाक का विरोध कर रहा था. अब अगर वो कानून बनाते हैं तो उसका जबरदस्त विरोध होगा. जिसके राजनीतिक असर देखने को मिलेंगे.

फैसला सुनते हुए तीन जज ने तीन तलाक को असंवैधानिक कहा, जबकि जस्टिस खेहर और जस्टिस नज़ीर ट्रिपल तलाक को असंवैधानिक घोषित करने के फेवर में नहीं थे. चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने सबसे पहले इस पर अपना फैसला सुनाते हुए कहा कि तीन तलाक धार्मिक प्रक्रिया और भावनाओं से जुड़ा मामला है, इसलिए इसे एकदम से खारिज नहीं किया जा सकता. इस मुद्दे पर सबसे महत्वपूर्ण पक्ष है संसद और सरकार, उन्हें इसपर कानून बनाना चाहिए. चीफ जस्टिस खेहर ने कहा कि छह महीने तक के लिए कोर्ट अनुच्छेद 142 के तहत विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए तीन तलाक पर तत्काल रोक लगाती है. इस अवधि में देशभर में कहीं भी तीन तलाक मान्य नहीं होगा.

पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने 11 मई से 18 मई तक हुई सुनवाई के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया था. ये पांच जज अलग-अलग धर्मों के थे. सुनवाई के दौरान कोर्ट ने कहा था कि मुस्लिम कम्युनिटी में ट्रिपल तलाक शादी तोड़ने के लिए सबसे खराब तरीका है. ये गैर-ज़रूरी है. कोर्ट ने सवाल किया था कि क्या जो धर्म के मुताबिक ही घिनौना है, वो कानून के तहत वैध कैसे ठहराया जा सकता है? सुनवाई के दौरान यह भी कहा गया कि कोई पापी प्रथा आस्था कैसे हो सकती है.

सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस जेएस खेहर की अगुवाई वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने कहा था कि वह तीन तलाक की संवैधानिक वैधता को परखेगा. सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में कुरान, शरीयत और इस्लामिक कानून के इतिहास पर जोरदार बहस हुई. इसके अलावा संविधान के इन अनुच्छेदों पर विस्तार से दलीलें पेश की गईं.

संविधान का अनुच्छेद-13 : संविधान के दायरे में कानून
अनुच्छेद-14 : समानता का अधिकार
अनुच्छेद-15 : जेंडर, धर्म, लिंग आदि के आधार पर भेदभाव के खिलाफ अधिकार
अनुच्छेद-21 : मान सम्मान के साथ जीने का अधिकार
अनुच्छेद-25 : पब्लिक ऑर्डर, हेल्थ और नैतिकता के दायरे में धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार

क्या था मामला?

मार्च, 2016 में शायरा बानो ने तीन तलाक को ख़त्म करने की मांग के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल की थी. शायरा बानो उत्तराखंड में काशीपुर की रहने वाली हैं. उनका निकाह 2002 में हुआ था. शायरा का आरोप है कि उसके शौहर ने शुरुआत से ही उन पर जुल्म करना शुरू कर दिया था. 10 अक्टूबर 2015 को शायरा के शौहर ने उनके पास रजिस्ट्री से तीन तलाक का फरमान भेज दिया. शायरा ने तब ट्रिपल तलाक के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर दी. और पहुंच गईं सुप्रीम कोर्ट.

शायरा बानो.
शायरा बानो.

उन्होंने कोर्ट में याचिका दायर कर तीन तलाक, हलाला-निकाह और बहु-विवाह की व्यवस्था को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की. शायरा ने मुस्लिम पर्सनल लॉ (शरीयत) एप्लीकेशन कानून 1937 की धारा 2 की संवैधानिकता को चुनौती दी. कोर्ट में दाखिल याचिका में शायरा ने कहा है कि मुस्लिम महिलाओं के हाथ बंधे होते हैं और उन पर तलाक की तलवार लटकी रहती है. जबकि पति के पास बिना किसी रोक टोक के अधिकार होते हैं. यह भेदभाव और असमानता है. जो एकतरफा तीन बार तलाक बोल देने पर सामने आती है.

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट में किसने क्या कहा था?

कोर्ट में याचिका डालने वाली शायरा बानो के वकील थे अमित चड्ढा. उन्होंने सुनवाई के दौरान कहा कि संविधान के अनुच्छेद-25 में धार्मिक प्रैक्टिस की बात है. इसलिए इस अनुच्छेद में ट्रिपल तलाक संरक्षित नहीं हो सकता. धार्मिक दर्शनशास्त्र में ट्रिपल तलाक को बुरा और पाप कहा गया है. ऐसे में इसे धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार के तहत कैसे संरक्षित किया जा सकता है.

राम जेठमलानी ने तीन तलाक के खिलाफ दलील पेश की. कहा कि अनुच्छेद-13 के तहत कानून की बात है, जो भी कानून है वह संविधान के दायरे में होगा. मूल अधिकार का जो कानून, रेग्युलेशन या परंपरा उल्लंघन करेगा वह मान्य नहीं हो सकता.

ऑल इंडिया मुस्लिम महिला पर्सनल लॉ बोर्ड की ओर से दलील दी गई कि तीन तलाक इस्लाम का मूल हिस्सा नहीं है. कुरान में तलाक के लिए पूरी प्रक्रिया बताई गई है. पैगंबर मुहम्मद साहब की मौत के बाद हनीफी में जो लिखा गया, वह बाद में आया है. उसी में तीन तलाक का जिक्र आया है. कुरान में तीन तलाक का कहीं भी जिक्र नहीं है. अगर किसी बात पर कोई संशय होता है तो वह कुरान को देखा जाता है, क्योंकि वो इस्लामिक शास्त्र है. अल्लाह ने भी कुरान को ही देखने को कहा है.

आरिफ (याचिकाकर्ताओं के वकील) ने कहा कि इस्लाम में पैगंबर मुहम्मद साहब के बाद राजशाही प्रणाली शुरू हो गई. उनके बाद जो कुछ लिखा गया, उसमें काफी बदलाव है. कुरान और पैगम्बर के सिद्धांत मानने चाहिए. इनका ट्रिपल तलाक पर भरोसा नहीं था. मुहम्मद साहब के इस दुनिया से चले जाने के सालों के बाद हजरत हनीफी आए. उन्होंने तीन तलाक को सही बताया. पर्सनल लॉ बोर्ड हनीफी की मान्यताओं पर आधारित है. इसे पर्सनल लॉ बोर्ड नहीं, हनीफी पर्सनल बोर्ड कहें तो उचित होगा. जबकि हनीफी के अलावा हंबली, शाफ़ई और मलिकी भी हैं. इनकी मान्यताएं दरकिनार कर दी गई हैं.

(हनफी सुन्नी इस्लाम के चार पन्थों में से सबसे पुराना और सबसे ज़्यादा अनुयायियों वाला पन्थ है. इनके अलावा तीन पंथ हंबली, शाफ़ई और मलिकी हैं. इस वजह से इस्लाम में अलग-अलग विचारधाराओं का जन्म हुआ. इस वजह से मुस्लिम समुदाय में अलग-अलग रीति रिवाज भी देखने को मिलते हैं.)

केंद्र सरकार की तरफ से अटॉर्नी जनरल बोले-

अगर सुप्रीम कोर्ट तीन तलाक को असंवैधानिक करार देती है तो केंद्र सरकार मुस्लिम समुदाय में विवाह को नियमित करने के लिए नया कानून भी ला सकती है. उन्होंने मुस्लिम पर्सनल लॉ के दूसरे पहलू निकाह हलाला और बहुविवाह पर भी सुप्रीम कोर्ट से विचर करने की गुज़ारिश की. अटॉर्नी जनरल के मुताबिक संविधान कहता है कि जो भी कानून मौलिक अधिकार के खिलाफ है, वह कानून असंवैधानिक है. कोर्ट को इसे संविधान के दायरे में देखना चाहिए. यह मूल अधिकार का उल्लंघन करता है. तीन तलाक महिलाओं के मान-सम्मान और समानता के अधिकार में दखल देता है. ऐसे में इसे असंवैधानिक घोषित किया जाए. पर्सनल लॉ धर्म का हिस्सा नहीं है. अनुच्छेद-25 के दायरे में शादी और तलाक नहीं हैं. शरीयत ऐक्ट 1937 में बनाया गया था. अगर कोई कानून लिंग समानता, महिलाओं के अधिकार और उसके सम्मान को प्रभावित करता है तो वह कानून अमान्य होगा और ऐसे में तीन तलाक मान्य नहीं हो सकता.

ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड का बचाव

बोर्ड की तरफ से वकील कपिल सिब्बल ने कहा कि अनुच्छेद-25 यानी धार्मिक स्वतंत्रता के तहत परंपरा की बात है और संविधान पर्सनल लॉ को संरक्षित करता है. 1400 साल से आस्था चली आ रही है. सरकार चाहे तो पर्सनल लॉ को रेग्युलेट करने के लिए कानून बना सकती है. हिंदुओं में आस्था है कि राम अयोध्या में पैदा हुए हैं. ये आस्था का विषय है. अनुच्छेद-14 स्टेट कार्रवाई की बात करता है पर्सनल लॉ की नहीं. सिब्बल ने कहा कि तीन तलाक पाप है और अवांछित है. हम भी बदलाव चाहते हैं, लेकिन पर्सनल लॉ में कोर्ट का दखल नहीं होना चाहिए. निकाहनामा में तीन तलाक न रखने की शर्त के बारे में लड़की कह सकती है कि पति तीन तलाक नहीं कहेगा. मुस्लिम का निकाहनामा एक कॉन्ट्रैक्ट है. सहमति से निकाह होता है और तलाक का प्रावधान उसी के दायरे में है.

मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा था,

ज़्यादातर भारतीय मुसलमान मुस्लिम पर्सनल लॉ में किसी भी तरह का बदलाव नहीं चाहते हैं. बोर्ड में एक महिला विंग का गठन किया गया है जो कि ट्रिपल तलाक़ के मामलों पर निगरानी रखेगी. ट्रिपल तलाक़ की वजहों की पड़ताल की जाएगी और महिलाओं को न्याय दिलाया जाएगा. बेवजह तलाक़ देने वालों के सामाजिक बहिष्कार की कोशिश की जाएगी. हम नहीं चाहते कि धार्मिक मामलों और पर्सनल लॉ से जुड़े मुद्दों यानी निकाह, हलाला और तीन तलाक पर सरकार कोई दखल दे.

सुनवाई के दौरान जस्टिस जोसेफ ने कहा था कि इस पर कोई विवाद नहीं कि तीन तलाक पाप है. जो पाप है वह जायज कैसे हो सकता है? तीन तलाक एक प्रथा है. यह कानून नहीं हो सकता. अभी हम कुछ नहीं कह सकते, क्योंकि यह मामला खतरनाक मोड़ पर है. ये कहकर तब फैसला सुरक्षित रख लिया गया था.

शाहबानो केस में सरकार ने दखलअंदाजी न की होती तो ये नौबत नहीं आती

शायरा बानो से पहले साल 1978 में शाहबानो केस सामने आया था. 62 साल की शाहबानो को उसके शौहर ने ‘तलाक, तलाक, तलाक’ कहकर अपनी जिंदगी से बेदखल कर दिया था. पांच बच्चों की मां शाहबानो ने गुजारा भत्ता पाने के लिए कानूनी लड़ाई लड़ी, लेकिन सुप्रीम कोर्ट में केस जीतने के बाद भी उन्हें पति से हर्जाना नहीं मिल सका था. सुप्रीम कोर्ट के फैसले का ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने शाहबानो केस में पुरजोर विरोध किया. माहौल ऐसा बना दिया गया था कि सुप्रीम कोर्ट का वो फैसला मुसलमानों को उनकी संस्कृति और धर्म में हस्तक्षेप लगा. विरोध प्रदर्शन हुए थे. तब कट्टर मुस्लिम संगठनों की नाराजगी के बाद 1986 में तत्कालीन राजीव गांधी सरकार ने संसद में एक कानून बनाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेअसर कर दिया था.

क्या था ये पूरा मामला पढ़िए : कुरान की वो दो आयतें, जो शाहबानो के तलाक केस में सुप्रीम कोर्ट में सुनाई गईं


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