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जब 'जिन्ना' मुसलमानों से बोले, जश्न मनाओ, 'कांग्रेस मुक्त' हुए!

1931 में लाहौर जेल से भगत सिंह ने एक पत्र लिखा. जिसमें वो समझौते की ज़रूरत को लेकर बात करते हैं. वो कहते हैं,

“समझौता एक ऐसा जरूरी हथियार है, जिसे संघर्ष के साथ-साथ इस्तेमाल करना जरूरी है. लेकिन इस दौरान एक चीज का हमेशा ध्यान रहना चाहिए. वह है आन्दोलन का उद्देश्य. जिन उद्देश्यों की प्राप्ति के लिए हम संघर्ष कर रहे हैं, उनके बारे में हमें पूरी तरह स्पष्ट होना चाहिए.”

भगत सिंह आगे लिखते हैं,

“आप अपने शत्रु से सोलह आना पाने के लिए लड़ रहे हैं. आपको एक आना मिलता है, उसे जेब में डालिए और बाकी के लिए संघर्ष जारी रखिए. नर्म दल के लोगों में जिस चीज की कमी हम देखते हैं वह उनके आदर्श की है. वे इकन्नी के लिए लड़ते हैं और इसलिए उन्हें मिल ही कुछ नहीं सकता.”

भगत सिंह की फांसी के बाद क्रांतिकारियों का प्रभाव ऐसा बढ़ा कि कांग्रेस को भी अपने रुख़ में परिवर्तन लाना पड़ा. 1933 के बाद कांग्रेस में नरम दल का असर कम हो चुका था. नेहरू और बोस जैसे नेताओं का उभार हो रहा था.

कांग्रेस ने समझौता किया

इकन्नी को छोड़ कांग्रेस पूर्ण स्वराज की मांग को लेकर आगे बढ़ रही थी. लेकिन जब 1935 में ब्रिटिश सरकार ने गवर्मेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट पास किया. तो कांग्रेस ने इसे ‘एक-आना’ समझ कर स्वीकार कर लिया. समझौते के पीछे सोच ये थी कि सरकार बनाकर वो अपना प्रभाव और ज़्यादा डाल पाएगी. यही सोच मुस्लिम लीग की भी थी.

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लाहौर जेल में शहीद-ए-आज़म भगत सिंह (फ़ाइल फोटो)

गवर्मेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के तहत 11 सूबों में मुसलमानों के लिए कुछ सीट आरक्षित थी. मुस्लिम लीग को लगा इन्हें जीतकर वो कम से कम दो या तीन सूबों में सरकार बनाने में सफल हो जाएंगे. लेकिन पासा उल्टा पड़ा. कांग्रेस आधे से ज़्यादा सीटें जीतने में सफल रही. वहीं मुस्लिम लीग सिर्फ़ गिनी चुनी सीटें जीत पाई. कांग्रेस ने सिंध, पंजाब और बंगाल छोड़ 8 सूबों में अपनी सरकार बनाई. जबकि मुस्लिम लीग सिर्फ़ बंगाल में सरकार में शामिल थी. वो भी छोटे पार्टनर के रूप में. मुहम्मद अली जिन्ना, जो अब तक मुस्लिम लीग को मुसलमानों का सरमाया समझ रहे थे. उन्हें भी लगने लगा था कि मुस्लिम लीग के दिन पूरे हो चुके हैं.

लेकिन 1939 में फिर कुछ ऐसा हुआ कि डूबते को तिनके का सहारा मिल गया. वैश्विक परिस्थितियां ऐसी बनी कि मुस्लिम लीग ना सिर्फ़ ज़िंदा हुई बल्कि धीरे धीरे उसने मुसलमानों में अपनी पकड़ को भी मज़बूत किया. इसी घटना के बाद पाकिस्तान बनाने की आधिकारिक घोषणा हुई. ये घटना थी द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत. 1939 में WW2 की शुरुआत हुई और भारत को भी इसमें खींच लिया गया. अगर पूछा जाए कि द्वितीय विश्व युद्ध की शुरुआत कैसे हुई. तो आम जवाब मिलता है, हिटलर ने पोलेंड पर हमला किया. और WW2 की शुरुआत हो गई.

दरअसल ये जवाब अधूरा है. पोलेंड पर हमला केवल हिटलर ने नहीं किया था. स्टालिन भी इसमें बराबर शरीक था. युद्ध कि बाद जब नाज़ियों को सजा देने के लिए न्यूरमबर्ग ट्रायल हुए. तो उसमें एक ख़ूफ़िया दस्तावेज सामने आया. पता चला कि युद्ध से पहले सोवियत और जर्मनी के बीच एक संधि हुई थी. मोलोट्रोव रिबेनट्रोप पैक्ट. इस पैक्ट में ये तो तय हुआ ही था कि दोनों देश एक दूसरे पर आक्रमण नहीं करेंगे. साथ ही खुफ़िया तौर पर दोनों देशों ने पोलेंड को आधा-आधा बांट भी लिया था. इस एक तथ्य ने राजनैतिक विमर्श में एक नई थियरी को जन्म दिया. हॉर्स शू थियरी. हॉर्स शू यानी घोड़े की नाल. क्या है ये थियरी?.

शुरू से शुरुआत

गवर्मेंट ऑफ़ इंडिया एक्ट के तहत 1937 में 11 सूबों में चुनाव हुए. लगभग 1500 सीटों में से आधे से ज़्यादा में कांग्रेस ने जीत दर्ज की. जबकि मुस्लिम लीग के हिस्से सिर्फ़ 118 सीट आई. 482 सीट मुसलमानों के लिए आरक्षित थी. इसमें भी मुस्लिम लीग सिर्फ़ 109 में जीत पाई. मुसलमान आरक्षित सीटों पर कांग्रेस ने सिर्फ़ 58 पर प्रत्याशी उतारे और 26 में जीत दर्ज की.

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भारत शासन अधिनियम 1935 के अनुसार अखिल भारतीय संघ की स्थापना की गयी, जिसमें राज्यों और रियासतों को एक इकाई की तरह माना गया (तस्वीर: padmad.org) )

11 में से आठ सूबों में कांग्रेस की सरकार बनी. ऑल इंडिया मुस्लिम लीग एक भी सूबे में सरकार नहीं बना सकी. चुनाव परिणाम से ये तो तय था कि अधिकतर मुसलमान कांग्रेस को अपना लीडर नहीं मानते थे. लेकिन मुस्लिम लीग का ये भ्रम भी टूट गया कि वो मुसलमानों की अकेली आवाज़ हैं. मुस्लिम आरक्षित सीट पर अधिकतर लोकल मुस्लिम पार्टियां जीती थीं.

1937 चुनाव के बाद मुस्लिम लीग राजनैतिक रूप से शक्तिविहीन हो चुकी थी. उन्हें सरकार में शामिल करने के लिए कांग्रेस ने शर्त रखी कि मुस्लिम लीग को कांग्रेस में विलय कर लेना चाहिए. जिन्ना नहीं माने. इसके बाद नेहरू हिंदू-मुस्लिम एकता बढ़ाने के लिए मुसलमानों के बीच कांग्रेस को स्थापित करने में जुट गए. जिन्ना भी मुस्लिम लीग के प्रचार प्रसार में लग गए. और उन्होंने अलग-अलग सूबों में मुस्लिम लीग के संगठन तैयार किए. फिर दो घटनाएं ऐसी हुई, जिन्होंने जिन्ना को एक और मौक़ा दे दिया.

विद्या मंदिर और वंदे मातरम

बिहार और यूनाइटेड प्रोविंस की सरकार ने 1937 में डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन की अध्यक्षता में एक कमिटी का गठन किया. इसका काम था, भारत में बेसिक शिक्षा के लिए नीति बनाना. 1938 में कमेटी ने अपनी रिपोर्ट पेश की. जिसके तहत बेसिक शिक्षा को लेकर कुछ ज़रूरी नियम बनाए गए. मसलन 7 से 14 साल के हर बच्चे को अनिवार्य शिक्षा, लड़कियों की शिक्षा, आदि. कमिटी ने जो रिपोर्ट पेश की उसे कांग्रेस ने स्वीकार करते हुए ‘वरधा स्कीम ऑफ़ एज्यूकेशन‘ का नाम दिया.

इसी स्कीम के तहत एक और स्कीम जुड़ी हुई थी. विद्या मंदिर स्कीम. जिसके तहत छोटे-छोटे क़स्बों में कम खर्च वाले स्कूल खोले जाने थे. और शिक्षा का माध्यम मूल भाषा, जैसे हिंदी, उर्दू आदि होना था. पहली दिक़्क़त इन स्कूलों के नाम से खड़ी हुई. स्कूल के नाम में मंदिर जुड़े होने के चलते, मुस्लिम लीग ने इसका भरपूर विरोध किया. बात फैली कि कांग्रेस मुसलमानों की संस्कृति की नष्ट करना चाहती है. कुछ मुसलमान परिवारों ने अपने बच्चे स्कूल भेजने से मना कर दिया. इस समस्या का हल निकला कि कुछ स्कूलों का नाम उर्दू विद्या मंदिर रखा जाने लगा. तब भी विरोध ज्यों का त्यों रहा.

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मुस्लिम लीग के विरोध पर हल निकाला गया कि वंदे मातरम के शुरू के केवल दो अंतरे गाए जाएंगे जिनमें कोई धार्मिक पहलू नहीं है (फ़ाइल फोटो : India Today)

फिर एक दूसरी समस्या भी थी. स्कूलों में ‘वन्दे मातरम’ का गाया जाना. इसे लेकर कुछ मुस्लिम हलकों से विरोध उठा. तो मुस्लिम लीग ने उसे खूब उछाला. साथ ही ये भी आरोप लगाया कि स्कूल अधिकारियों की तैनाती में हिंदुओं को प्रमुखता दी जा रही है. एक ख़ास दिक़्क़त थी गांधी की तस्वीर से, जो स्कूल ऑफ़िस में लगाई जाती थी. इसे लेकर भी मुस्लिम लीग ने खूब विरोध किया.

इन सब मामलों के चलते 1938 और 1939 के दौरान मुस्लिम लीग ने दो रिपोर्ट पेश कीं. पीरपुर रिपोर्ट और शरीफ़ रिपोर्ट. दोनों रिपोर्ट में यूनाइटेड प्रोविंस और बिहार सूबे की कांग्रेस सरकार में मुस्लिमों के प्रति दुराग्रह को दर्ज़ किया गया था. कुछ ऐसे मामले थे जिसमें स्थानीय हिंदु संगठनों ने मुसलमानों को डराया-धमकाया था. हालांकि ये बात दोनों तरफ़ से थी. लेकिन चूंकि सरकार कांग्रेस की थी. इसलिए संदेश गया कि ये सब कांग्रेस की मिली भगत के चलते हो रहा है. और मुसलमानों को दबाया ज़ा रहा है.

डे ऑफ डिलीवरेंस’

कांग्रेस ने रिपोर्ट को पूर्वाग्रह से ग्रसित बताते हुए जांच का आश्वासन दिया. लेकिन तब तक गाड़ी स्टेशन से निकल चुकी थी. इस सब घटनाओं ने मुस्लिम लीग को एक नया जीवनदान दिया. जिन्ना को कांग्रेस के ख़िलाफ़ एक ख़ास तबके से भी समर्थन मिला. डॉक्टर आम्बेडकर से, जो कांग्रेस को उच्च जातियों की पार्टी कहा करते थे. उन्होंने भी जिन्ना का समर्थन किया.

फिर आया साल 1939. पहले हिटलर और फिर स्टालिन ने पोलेंड पर आक्रमण किया. और दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत हो गई. ब्रिटेन भी युद्ध में कूदा. 3 सितंबर 1939 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथिगो ने घोषणा कर दी कि भारत भी इस युद्ध में ब्रिटेन की तरफ़ से शामिल होगा. इस निर्णय में सूबे की सरकारों से कोई सलाह मशवरा नहीं किया गया था. वायसराय के इस फैसले से कांग्रेस काफी नाराज थी. उसका कहना था कि भारत के लोगों से पूछे बिना उन्हें दूसरे विश्व युद्ध में कैसे झोंका जा सकता है.

कांग्रेस की आठ सूबाई सरकारों ने वायसराय के इस फैसले के खिलाफ आवाज उठाई और इस्तीफा दे दिया. गांधी इससे सहमत नहीं थे. उनका मानना था कि इससे ब्रिटिश मिलिट्राइजेशन यानी फ़ौज में लोगों की भर्ती और मुस्लिम लीग दोनों को मज़बूती मिलेगी. दूसरी तरफ़ वायसराय लिनलिथगो और मोहम्मद अली जिन्ना दोनों इस इस्तीफे से खुश थे. जिन्ना ने मुसलमानों से अपील की कि वो दूसरे विश्व युद्ध में ब्रिटिश सरकार का समर्थन करें. बदले में जिन्ना ने वायसराय लिनलिथगो से मुसलमानों पर हो रहे अत्याचारों पर कार्रवाई का वादा लिया. 2 दिसंबर 1939 को जिन्ना ने पूरे देश के मुस्लिमों से एक और अपील की. उन्होंने कहा,

‘मैं चाहता हूं कि भारत के मुसलमान शुक्रवार, 22 दिसंबर का दिन ‘डे ऑफ डिलीवरेंस’ के तौर पर मनाएं क्योंकि कांग्रेस की सरकारों ने इस्तीफा दे दिया है और देश को कांग्रेस से निजात मिल गई है.’

 ‘यौम ए निजात’ को आंबेडकर का समर्थन

जैसा की लाज़मी ही था, जिन्ना के इस फैसले की कांग्रेस ने जमकर निंदा की. गांधी भी समझ रहे थे कि एक यूनाइटेड संदेश के अभाव में जनता एकमुश्त रूप से विरोध नहीं करेगी. जिन्ना की अपील के एक हफ़्ते बाद, 9 दिसंबर 1939 को गांधी ने जिन्ना को एक ख़त लिखा. उन्होंने मुस्लिम लीग और कांग्रेस के एक होने का प्रस्ताव रखा और इस सम्बंध में एक मीटिंग बुलाई. ये सब चर्चा पहले से ही चल रही थी लेकिन गांधी चाहते थे कि ‘एक होने’ के लिए ‘मीटिंग’ को देखते हुए जिन्ना इस जश्न को रद्द कर दें. कांग्रेस नेता अबुल कलाम आजाद ने भी इस उत्सव का विरोध किया.

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मुस्लिम लीग के अधिवेशन में जिन्ना, पेरियार और आम्बेडकर (तस्वीर: velivada.com)

9 और 14 दिसंबर के बीच नेहरू और जिन्ना के बीच भी कई पत्र भेजे गए थे. लेकिन जिन्ना टस से मस नहीं हुए. वो मुसलमानों के एक तबके को ये संदेश देने में सफल हो रहे थे कि कांग्रेस हिंदुओं की पार्टी है. आयरनी. डे ऑफ डिलीवरेंस के लिए खास तौर पर 22 तारीख़ का दिन चुना गया. कारण कि जुम्मे का दिन था. और मुस्लिम लीग कांग्रेस के सामने शक्ति प्रदर्शन करना चाहती थी. डे ऑफ डिलीवरेंस’ की सफलता का मतलब था पार्टिशन के लिए एक प्लैटफ़ॉर्म मिलना.

इसके बाद आज ही के दिन यानी 22 दिसंबर को देश भर में ‘डे ऑफ डिलीवरेंस’ यानी ‘यौम ए निजात’ के तौर पर मनाया गया. भिंडी बाज़ार मुंबई में जिन्ना ने एक सभा को लीड किया और कांग्रेस को खूब खरी खोटी सुनाई. डॉक्टर आम्बेडकर भी इस सभा में शामिल हुए. इसके एक दिन पहले आम्बेडकर ने सभा में जुड़ने की मंशा ज़ाहिर की थी. लेकिन साथ ही उन्होंने ये भी कहा कि जिन समुदायों के लिए वो काम कर रहे हैं, वो मुसलमानों से 20 गुना ज़्यादा प्रताड़ित हैं. और इस सब में कांग्रेस की नीतियों का दोष है.  ‘यौम ए निजात’ सफल रहा. जिन्ना के हाथ वो चाभी लग गई थी. जिससे वो पाकिस्तान का दरवाज़ा खोल सकते थे. इसके बाद उन्होंने सभी भाषाई पर्दों को किनारे रखते हुए मुस्लिम लीग के 1940 में हुए लाहौर अधिवेशन में साफ़ तौर पर कहा,

“हिंदू और मुस्लिम दोनों के धार्मिक विचार, दर्शन, सामाजिक रीति-रिवाज, साहित्य अलग-अलग हैं. दोनों ना आपस में शादी करते हैं. और ना ही साथ मिल बैठ कर खाते-पीते हैं. हिंदु और मुस्लिम दो अलग-अलग और परस्पर विरोधी विचार हैं. जीवन को लेकर उनके दृष्टिकोण अलग हैं. दोनों के इतिहास अलग हैं. महाकाव्य अलग हैं. यहां तक की नायक भी अलग अलग ही हैं. जो एक का नायक है, वो दूसरे का दुश्मन होता है और इसी तरह, अक्सर एक की जीत दूसरे की हार है.”

इस बयान के बाद अधिवेशन में पाकिस्तान नाम के एक अलग राष्ट्र का प्रस्ताव पारित हुआ. मुसलमानों के लिए एक अलग देश. अब यहीं पर आती है. हॉर्स शू थियरी. क्या है ये. एक उदाहरण से समझते हैं.

इक्वेटर का हिज्र

मालदीव की किसी सर्द रात की बात है. प्रेमी और प्रेमिका एक बेंच पे बैठे हुए हैं. आख़िरी पल है. बिछड़ने की बेला नज़दीक है. पौ फटते ही दोनों का सफ़र शुरू होता है. उल्टी दिशाओं में. दोनों पूर्व और पश्चिम दिशा की ओर बढ़ जाते हैं. दोनों ने खुद के वादा किया है कि तब तक चलते रहेंगे. जब तक एक दूसरे से जितना सम्भव हो, उतना दूर ना हो जाएं.

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मोलोटोव-रिबेंट्रोप संधि नाजी जर्मनी और सोवियत संघ के बीच एक गैर-आक्रामकता संधि थी जिसके तहत दोनों देशों ने आपस में पोलेंड को बांट लिया (तस्वीर: Wikimedia Commons)

चलते चलते दोनों लगभग 4 हज़ार मील का सफ़र पूरा कर लेते हैं. दोनों को लगता है एक दूसरे से जितना दूर जा सकते थे, जा चुके हैं. तभी मन में किसी कोने में दोनों को एक दूसरे की याद उठती है. एक अंतिम बार ही सही, ये सोचकर दोनों एक-दूसरे का नाम पुकारते हैं. और पाते हैं कि दोनों एक दूसरे से महज़ कुछ मीटर की दूरी पर खड़े हैं. अब तक आपको शायद समझ आ गया होगा कि ऐसा कैसे हुआ. दो लोग भूमध्य रेखा यानी इक्वेटर की लाइन पर किसी एक बिंदु से शुरू कर उल्टी दिशा में चलते रहें तो बीच में मिल जाएंगे. हालांकि दोनों बिल्कुल उल्टी दिशा में चले थे.

यही हॉर्स शू थियरी है. फ़्रेंच लेखक जॉन पियरे ने ये थियरी दी थी. जिसके अनुसार राजनीति में एक्ट्रीम लेफ़्ट या एक्ट्रीम राइट एक दूसरे के विपरीत धाराएं लग सकती हैं. लेकिन कुछ दूर जाने पर इनमें घोड़े की नाल की तरह मोड़ आता है. और ये दोनों एक दूसरे के सामने खड़ी हो जाती हैं.

हिटलर की नाज़ी पार्टी और स्टालिन और माओ की कम्म्यूनिस्ट पार्टियां पहली नज़र में एक दूसरे की विपरीत नज़र आती हैं. लेकिन तीनों ही अपने मूल गुण में ताना शाही हैं. और तीनों ही लाखों लोगों की मृत्यु का कारण बनती है. अकारण ही नहीं, बल्कि स्टेट एक्शन से. दूसरे विश्व युद्ध की शुरुआत में स्टालिन और हिटलर की क्या मिली भगत थी. ये हम शुरुआत में आपको बता चुके हैं. इसी प्रकार लाहौर अधिवेशन में जिन्ना के बयान की तब के हिंदु चरमपंथी संगठनों से तुलना करें तो अंतर बताना मुश्किल जान पड़ता है. दोनों का रास्ता अलग चाहे अलग अलग हो, तर्क अलग अलग हों. लेकिन मंज़िल यही थी कि हिंदु और मुसलमान एक साथ नहीं रह सकते हैं.


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