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'सभी उसको लेकर फैसला ले रहे थे, सुना रहे थे, नहीं जानती थी तो सिर्फ वो'

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रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे
रश्मि प्रियदर्शिनी पांडे

रश्मि प्रियदर्शिनी एक स्वतंत्र लेखक/पत्रकार हैं. मैथिली-भोजपुरी अकादमी की संचालन समिति की सदस्य हैं. उन्हें ज़ी नेटवर्क और हमार टीवी में पत्रकारिता का लंबा अनुभव प्राप्त है. कई मंचों से काव्य-पाठ करती आ रही हैं. आजकल ‘बिदेसिया फोरम’ नाम के डिजिटल प्लेटफॉर्म का संचालन कर रही हैं. दी लल्लनटॉप के लिए एक लंबी कहानी ‘शादी लड्डू मोतीचूर‘ लिख रही हैं. शादी लड्डू मोतीचूर कहानी शहर और गांव के बीच की रोचक यात्रा है. कहानी के केंद्र में है एक विवाहित जोड़ी जिन्होंने शादी का मोतीचूर अभी चखा ही है. प्रस्तुत है इसकी 20वीं किस्त-

Shadi Laddu Motichoor - Banner


भाग 20- 

एक दो नहीं पूरे बीस मिस्ड कॉल्स देखकर पूनम के माथे पर पसीने की बूंदें उभर आईं. उसने घबराकर जल्दी से चन्दर को कॉल मिलाया पर दो रिंग होते ही मोबाइल डिस्चार्ज होकर बंद हो गया. उधर चन्दर ने जैसे ही ‘बेगम’ नाम अपने मोबाइल की स्क्रीन पर चमकते देखा, वो सोचने लगा कि एक बार में नहीं. कम से कम दो-तीन कॉल्स के बाद ही रिसीव करूंगा. पर ये क्या! पूनम ने फ़ोन काट दिया! ये क्या है? उसने थोड़ी देर इंतज़ार किया पर जब पूनम का कॉल दुबारा नहीं आया तो उसका धैर्य जवाब देने लगा. उसने तनाव में कनपटी पर उभर आई नसों को दबाते हुए पूनम को कॉल मिलाया. स्विच ऑफ! पहले तो क्रोध से वो भन्ना उठा पर अगले ही पल उसे पूनम की चिंता हो गई.

‘सब ठीक तो है ! शाम हो गई है. अब तक तो पूनम ऑफिस से निकल गई होगी. कहीं वो किसी मुसीबत में तो नहीं !’

इतना सोचते ही उसने बाइक की चाभी उठाई और नॉएडा के लिए आनन-फानन में निकल पड़ा. उधर ऑफिस पहुंचते ही पूनम ने पर्स को टेबल पर उलट डाला. सारी चीज़ें टटोल लीं पर आज वो चार्जर लाना ही भूल गई थी. उसने पहले तो आसपास मौजूद लोगों से चार्जर लेने की सोची पर उसकी पहचान के अधिकतर लोग अब घर के लिए निकल रहे थे. बिचारी एकदम परेशान हो गई. थोड़ी देर पहले एडिट-बे पर भी उसकी पीटीसी को लेकर अच्छी-ख़ासी बहसबाजी हो चुकी थी. सिन्हा सर को पूनम की पीटीसी बहुत अच्छी लगी थी. उन्होंने उसे ही गालिब की स्टोरी में इस्तेमाल करने को कहा और दूसरे प्रोग्राम की ओर बढ़ गए. पर बंगाली नैंसी तो जैसे हत्थे से उखड़ गई-

‘सालभर से यहां दिन-रात काम में लगे हैं पर आजतक एक भी पीटीसी नहीं मिली. हमें तो कहा जाता है कि अभी स्क्रिप्टिंग पर ध्यान दो. पर दो दिन पहले आई लड़की की पीटीसी एडिटबे पर आ गई. यहां ये बिहारी अपनी अलग ग्रुपिंग कर रहे है, मुझे सब पता है.’

सुमित ने उसे टोकना चाहा पर वो तो जैसे काट खाने को थी. सब जानते थे कि सुमित का ननिहाल बिहार में था. नैंसी ने सुमित को भी सुना डाला-

‘तू कुछ मत बोल सुमित. मेरे साथ स्टोरी करने को सर ने कहा तो तू उस दिन अचानक बीमार हो गया! और यहां रुमाल लेकर कल की आई लड़कियों के आंसू पोंछते समय तेरी तबियत ठीक हो जाती है?’

सुमित सन्न रह गया. धम-धम पैर पटकती, कैफ़ेटेरिया की ओर जाती नैंसी को पूनम चाहकर भी नहीं रोक पाई. अचानक उसे अपनी पड़ोसन, अपनी हमनाम पूनम याद आ गई. मीडिया को लेकर उसका दर्द और फ्रस्ट्रेशन याद आ गया.

‘नहीं, उसे वो पूनम नहीं बनना. ये प्रतिस्पर्धा तो चलती रहती है कार्यक्षेत्र में !’

नैंसी से ज़्यादा उसे इस बात की चिंता थी कि मोबाइल स्विच ऑफ पाकर चन्दर के दिमाग में न जाने क्या-क्या खिचड़ी पक रही होगी. सुमित ने देख लिया था कि पूनम ने नैंसी की सारी बातें सुन ली हैं. पता नही क्यों ये लड़की पूनम उसे बहुत अच्छी लगती थी. सीधी-सादी, भावुक पर बेहद प्रतिभाशाली और मेहनती. वो नहीं चाहता था कि करियर के शुरुआती दिनों में ही वो आफिस पॉलिटिक्स का शिकार बने या हिम्मत खो कर वापस घर-गृहस्थी की चौखट के अंदर ही पूरी ज़िंदगी बिता दे. वो भी उसके पीछे-पीछे आया और दोनों साथ-साथ चलने लगे. इधर दो चीज़ें एक साथ हुईं. पूनम की चिंता में उसके ऑफिस तक आ पहुंचे चन्दर ने जहां अपनी बाइक खड़ी की, उससे दो कदम की दूरी पर ही एक ऑटो खड़ा था. इससे पहले कि चन्दर, पूनम को आवाज़ देता, वो और सुमित किसी बात पर खिलखिलाते हुए उसी ऑटो पर एक साथ मेट्रो स्टेशन की ओर चल पड़े. ‘हां, पूनम ही तो थी!‘ ना चाहते हुए भी चन्दर के मन मे सिर्फ एक बात आई- ‘ओह! तो ये कारण है मोबाइल बंद होने का!’

पूनम घर पहुंची तो आदतन उसने दरवाजे पर थपकी दी, लेकिन दरवाज़े पर तो ताला लटका हुआ था. ‘अरे! ये अभी तक नहीं आये!‘ उसने जल्दी से मोबाइल निकाला पर मोबाइल तो स्विच ऑफ था! पूनम ने छत पर पड़े गमले से चाभी निकाली और घर में घुसते ही सबसे पहले मोबाइल को चार्ज में लगाया. थोड़ी ही देर बाद चन्दर की बाइक की आवाज़ आई. जैसे ही वो कमरे में आया पूनम एकदम उसके गले लग गई. वो लगातार बोले जा रही थी- सॉरी, सॉरी. देखिए गुस्सा मत करिएगा. मेरा मोबाइल डिस्चार्ज हो गया था और शूट पर जाने की वजह से मोबाइल को साइलेंट पर रखना पड़ गया था. इसलिए बात नहीं कर पाई.

चन्दर ने शांत गहरी आंखों से पूनम को देखा. पूनम न जाने क्यों सिहर सी गई. या तो चन्दर के चेहरे पर उसने प्यार देखा है या गुस्सा. आज चन्दर की आंखों के ये अजीब भाव उसे विचलित कर रहे थे. उधर पूनम के बच्चों से मासूम चेहरे ने चन्दर को चाहते हुए भी उसपर शक न करने दिया. ‘ये इतना सादा चेहरा, ये दर्पण सी साफ आंखें जो किताबों की तरह वो बोलती हैं जो दिल मे होता है, कभी किसी के साथ धोखा नहीं कर सकती.‘ उसने धीरे से पूनम के माथे को चूमते हुए बस इतना कहा- ‘चिंता होती है तुम्हारी. ऐसी लापरवाही फिर मत करना.

पूनम जो कि चन्दर के क्रोध से रास्ते भर डरती आई थी, वो इस प्यारे नरम लहजे से जैसे पिघलती गई. उसकी आंखें डबडबा गई और गीली आंखों से ही उसने हामी भरी कि फिर ऐसी गलती नहीं होगी. इससे पहले कि चन्दर की आंखों में कुछ शरीर रंग भरते, मैसेज नोटिफिकेशन ने उन दोनों का ध्यान भंग किया. वाट्सऐप पर सुमित का मैसेज था. पूनम ने बिना देखे मोबाइल को पलट कर रख दिया और किचन में जाकर चाय की तैयारी करने लगी. लेकिन चन्दर ये जानना चाहता था कि ये सुमित नाम का बंदा है कौन जिसके मैसेज को देखकर मोबाइल पलटकर रखने की नौबत आ गई. उसने पूनम का फ़ोन लिया और सुमित नाम के शख्स का चेहरा स्क्रीन पर चमक उठा. ये वही था जिसके साथ पूनम आज ऑटो में थी!

बाथरूम से निकलकर चहकी-महकी सी पूनम चाय लिए छत पर आ गई. चन्दर फ़ोन पर किसी से बात कर रहा था. पता चला बुआजी, जो कि स्टेशन पर पहुंच चुकी हैं, कुछ ही देर में घर पहुंचने वाली हैं. चन्दर खुश हो गया और कुछ देर के लिए सुमित प्रकरण पर पर्दा पड़ गया. इन्हीं बुआ के यहां रहकर चन्दर ने मुज़फ्फरपुर से अपनी कॉलेज की पढ़ाई पूरी की थी. चन्दर में बुआजी की जान बसती थी. अपने बच्चों से बढ़कर माना था उन्होंने चन्दर को. एम्स में दिखाना था इसलिए फूफाजी सहित दिल्ली आ रही थीं. पूनम बुआजी के आने का सुनते ही आधीअधुरी चाय छोड़कर बेडरूम में भागी और जल्दी से नाममात्र को लगाए सिंदूर की रेखा को मांगभर लंबी किया. वैनिटी बॉक्स से बड़ी सी लाल बिंदी निकाली और माथे के बीचोबीच लगा लिया. जीन्स और कुर्ती जो बाथरूम में टंगे थे उन्हें तुरंत दीवान के हवाले किया और लाल बंधेज की साड़ी में सेकंडों में तैयार हो गई. कमरे में अंदर आता चन्दर, पूनम को देखकर हंसने लगा- ‘जी, आप कौन?’

पूनम बनावटी गुस्से से उसे देखते हुए बोली- ‘आप ही की बेगम हैं. पहचानें नहीं क्या?’

चन्दर हंसते हुए बुआजी के लिए समोसे और जलेबी लाने निकल गया. वो लौटा ही था कि बुआजी-फूफाजी कई सारे थैले, बोरे और झोलों के साथ आ गए. किसी थैले से डंका आम निकल रहा है तो किसी से मर्चा का चूड़ा, किसी झोले में से ठेकुओं की खुशबू आ रही है तो किसी से आम के भरवा अचारों की. अरवी के पत्ते देखकर तो चन्दर खुश हो गया. ‘अरे बुआ! ये भी?‘ बुआ ने उसे ममताभरी आंखों से देखते हुए कहा- ‘क्यों? बियाह के बाद तोर पसंद कुछ और हो गया है क्या रे? पहले तो ये तेरा मनपसन्द होता था !’

चन्दर हंसते हुए बुआ के आंचल में हांथ पोंछते हुए कहता है – ‘क्या बात करती हो बुआ! पसंद अब भी वही है लेकिन ये आजकल की लड़कियां कहां वो सब बना पाती हैं जो जादू तुम्हारे हाथ में है.’

पूनम और बुआ मुस्कुराने लगीं. बुआ हंसते हुए उठ खड़ी हुई- ‘ढेर मत चरा हमको! सब समझ रहे हैं!’

रात में खाना खाकर बुआजी और फूफाजी के साथ चन्दर छत पर आ गया. उधर सरसो तेल कटोरी में गर्म कर पूनम ने सोचा- ‘बुआजी के पैरों की मालिश कर देते हैं! बिचारी थक गई होंगी.’

वो साड़ी के पल्लू से गरम कटोरी को सावधानी से पकड़े छ्त की तरफ आ ही रही थी कि बुआजी की सरगोशी करती आवाज़ उसके कानों तक पहुंची- ‘का रे! बहुरिया नौकरी कर रही है? अब ईहे सब होगा घर मे?’

चन्दर की आवाज़ थोड़ी देर बाद आई- ‘अरे बुआ, का दिक्कत है? दिनभर बोर होती रहती है! पढ़ी-लिखी है. कुछ दिन नौकरी कर लेगी तो क्या हर्ज है?’

बुआ ने कहा- ‘हर्ज तो कवनो बात में नहीं है बबुआ लेकिन जीन्स पहन के अपने घर की बहु आफिस जाएगी, मर्दाना लोग के साथ उठेगी-बैठेगी तो गांव-जवार में लोग क्या कहेगा? ठीक है हमलोग एडभान्स हैं, हमारा घर पूरे गांव में सबसे माडर्न है. पर गांव में बहु को लेकर कोई कुछ बोलेगा तो कल को तुमरे खून खौल जाएगा. बोलो, गलती कह रहे हैं कि सही?’

पूनम सांस रोके सारी बातें सुन रही थी. उसे चन्दर के बोलने का इंतेज़ार था. तब तक बुआ फिर शुरू हो गईं- ‘और बोर हो रही है से क्या मतलब है? हमलोग तो आजतक बोर नहीं हुए. घर-आंगन में हज़ार काम होते हैं. अचार-पीठिया पारे, सिलाई-बुनाई करे. बोर क्या होना है? और हां, कवनो नया समाचार है कि नहीं? कि आजकल के फैशन की तरह तुमलोग भी एन्जॉय करने में लगे हो?’

‘अरे बुआ! क्या बोलती जा रही हो? हद है.’

अबकी चन्दर बहुत तेज़ बोल पड़ा. पूनम भी बुआजी की बातों से हैरान हुई जा रही थी. तब तक चन्दर की आवाज़ दुबारा आई- ‘तुम तो कह-सुन के चली जाओगी. यहां अगर नौकरी छुड़वा के उसको घर बैठा दिए तो सुबह-शाम मनहूस चेहरा बना के बैठी रहेगी. कल को नया समाचार होगा तो अपने आप नौकरी छोड़ के लोरी गाने में लग जाएगी. काहे टेंशन लेती हो.’

पूनम कुछ देर अपने हाथ मे थामी गरम कटोरी भूल गई. अचानक जब अंगूठे में तेज जलन का एहसास हुआ तो उसने हड़बड़ा कर कटोरी पास पड़े टेबल पर रख दिया. सब उसके बारे में निर्णय ले रहे थे. निर्णय सुना रहे थे. उसके भविष्य का सबको पता था. कल को वो क्या करेगी, क्या होगा उसके साथ ये चन्दर जानता था और घर के बाकी लोग. नहीं जानती थी तो सिर्फ वो!

अब छत से ठहाकों की आवाज़ आ रही थी.


…टू बी कंटीन्यूड!


भाग 1 दिल्ली वाले दामाद शादी के बाद पहली बार गांव आए हैं!

भाग 2 दुल्हन को दिल्ली लाने का वक़्त आ गया!

भाग 3 हंसती खिलखिलाती सालियां उसके इंतज़ार में बाहर ही बरसाती में खड़ी थीं

भाग 4 सालियों ने ठान रखा है जीजाजी को अनारकली की तरह नचाए बिना जाने नहीं देंगे

भाग 5 ये तो आंखें हैं किसी की… पर किसकी आंखें हैं?

भाग 6 डबडबाई आंखों को आंचल से पोंछती अम्मा, धीरे से कमरे से बाहर निकल गई!

भाग 7 घर-दुआर को डबडबाई आंखों से निहारती पूनम नए सफ़र पर जा रही थी

भाग 8 काश! उसने अम्मा की सुन ली होती

भाग 9 औरतों को मायके से मिले एक चम्मच से भी लगाव होता है

भाग 10 सजना-संवरना उसे भी पसंद था पर इतना साहस नहीं था कि होस्टल की बाउंडरी पार कर सके

भाग 11 ये पीने वाला पानी खरीद के आता है? यहां पानी बेचा जाता है?

भाग 12 जब देश में फैशन आता है तो सबसे पहले कमला नगर में माथा टेकते हुए आगे बढ़ता है

भाग 13 अगर बॉस को पता चला कि मैंने घूमने के लिए छुट्टी ली थी, तो हमेशा के लिए छुट्टी हो जाएगी

भाग 14 बचपन से उसकी एक ही तो इच्छा थी- ‘माइक हाथ में थामे धुंआधार रिपोर्टिंग करना’

भाग 15 उसे रिपोर्टर बनना था रिसेप्शनिस्ट नहीं

भाग 16 ज्यादा से ज्यादा क्या होगा? जॉब नहीं मिलेगी? यही न? बिंदास जा. इंटरव्यू दे. जो होगा, देखा जाएगा

भाग 17 इंटर्नशिप मिलने के बाद भी क्यों परेशान थी पूनम?

भाग 18 क्या होता है जब एक लड़की, जिसकी नई शादी हुई है, नौकरी ढूंढने जाती है

भाग 19 क्या स्त्रियों की आज़ादी पर उसके दावे खोखले थे?


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