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'पीपली लाइव' को दार्शनिक ऊंचाई देने वाले 'चोला माटी के हे राम' गाने का हबीब तनवीर से क्या कनेक्शन है?

1 मार्च 1982 को बिहार के सिवान में जन्मे डॉ. पाण्डेय के नाटक, रंगमंच और सिनेमा विषय पर नटरंग, सामयिक मीमांसा, संवेद, सबलोग, बनास जन, परिंदे, जनसत्ता, प्रभात खबर जैसे प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में तीन दर्जन से अधिक लेख/शोध पत्र प्रकाशित हो चुके हैं. दिल्ली सरकार द्वारा ‘हिन्दी प्रतिभा सम्मान(2007)’ से सम्मानित डॉ. पाण्डेय दिल्ली सरकार के मैथिली-भोजपुरी अकादमी के कार्यकारिणी सदस्य रहे हैं. उनकी हिंदी प्रदेशों के लोकनाट्य रूपों और भोजपुरी साहित्य-संस्कृति में विशेष दिलचस्पी है. वे वर्तमान में सत्यवती कॉलेज (दिल्ली विश्वविद्यालय) के हिंदी-विभाग में सहायक प्रोफेसर हैं. यह लेख मुन्ना के. पाण्डेय ने हबीब तनवीर की पुण्यतिथि के मौके पर लिखा था. आज उनके जन्मदिन पर दी लल्लनटॉप इसे फिर पाठकों के लिए लेकर आया है.


बहादुर कलारिन : वह नाटक हबीब तनवीर के दिल के बेहद करीब था. तब के मध्यप्रदेश के रायपुर में 1 सितंबर 1923 को जन्मे थे – हबीब अहमद खान, बाद में हुए हबीब तनवीर. वालिद हाफ़िज़ मोहम्मद हयात खान पूरी तरह से धार्मिक आदमी थे. नमाज और कुरान में पूरी निष्ठा रखने वाले. जैसी सूचना है – परिवार में नाटक, गीत, संगीत, नृत्य वगैरह का कोई दखल न था. अलबत्ता ननिहाल का माहौल इससे उलट था. ‘रंग हबीब’ लिखने वाले भारत रत्न भार्गव अपनी किताब में कहते हैं,

‘मजहबी तौर पर इस्लाम और इल्म के बीच किसी किस्म की मुख़ालिफ़त नज़र नहीं आती थी. उनके जेहन में संगीत एक इल्म था और मजहब इंसान की अकीदत.’

हबीब की यात्रा का शुरुआती सिरा भी मूक फिल्मों ‘टिनटिन’ और इस जैसी ही अन्य फिल्मों से लेकर, नाटक ‘ह्यूबर्ट और प्रिंस ऑथर’ में ‘ह्यूबर्ट’ की भूमिका से लेकर नागपुर, अलीगढ़, बम्बई (तब) से ऑल इंडिया रेडियो, प्रगति लेखक संघ और इप्टा से शुरू हुई. फिर दिल्ली आकर जामिया में नज़ीर अकबराबादी की कविताओं पर आधार बनाकर बेहद ख़ास नाटक ‘आगरा बाज़ार’ किया, जिसमें उनका परिचय बेग़म कुदसिया ज़ैदी से हुआ. वह बेगम जैदी के हिंदुस्तानी थिएटर के निदेशक बने लेकिन फिर राडा की फेलोशिप ने एक और उड़ान लंदन की ली, पर जल्दी ही उन्हें बेहतर कल के लिए राजेश रेड्डी का शेर होना पड़ा-

घर से निकले थे हौसला करके, लौट आए खुदा खुदा करके

वह रंगमंच की शिक्षा लेने गए थे पर वहां जो सिखाया जा रहा था वह उन लोगों की रंग संस्कृति और रंगमंच था. हबीब आ गए. नियति ने उन्हें लिए कुछ और सोचा था. उनके रंगकर्म और चिंतन की धुरी भारतीय लोक नाट्य परम्पराएं थीं. सो, जो हबीब तनवीर 1954 में ‘रॉयल अकादमी ऑफ ड्रामेटिक आर्ट्स (राडा) में गए थे, वह साल बीतते अपनी पढ़ाई छोड़ वापिस अपने जड़ों के रंगमंच के लिए लौट गए. उन्होंने इस पर कहा था-

‘मैं जानता था कि परायी संस्कृति में मैं अपनी अभिव्यक्ति नहीं पा सकूंगा . मुझे यह बात साफ थी कि एक भिन्न भाषा संस्कृति, एक भिन्न दर्शक समूह के बीच मैं काम नहीं कर सकता.’

हबीब तनवीर में इप्टा की संगत के दौरान ही यह समझ लिया था कि यदि अपनी नाट्यकला का विकास करना है तो संगीत, कविता, गीत आदि को उसके अनिवार्य अंग के रूप में स्वीकार करना होगा वह रंगकर्म में पश्चिमी अंधानुकरण से दुखी होते थे. उनकी मान्यता थी कि ‘हमारे अपने देश की मिट्टी में कहने के लिए इतनी कहानियां हैं कि पहले वो तो कह ली जाएं फिर हम पश्चिम के भी दुःख सुन लेंगे.’

उनकी अपने मूल रंगकर्म वाली जिद ही थी जो भारतीय पारंपरिक रंगकर्म की पहचान सिद्ध हुई. भारत रत्न भार्गव ने सच ही कहा है कि,

‘वे दिल से शायर हैं और दिमाग से मानवतावादी. दिल और दिमाग का ये रिश्ता उनके समूचे रंग-चिंतन में पूरी शक्ति के साथ उभरता है.’

उन्होंने अपने अंचल कि कथाएं ली और उसमें से ही उनका सबसे कम चर्चित किंतु सबसे क्रांतिकारी विषय पर आधारित कथा मिली-
“बहादुर कलारिन की कथा.”

यह कथा दुर्ग जिले की है. दुर्ग जिले के चिरचारी में बलोद-पुरूर मार्ग पर एक खण्डहरनुमा स्तंभों का एक मंडप है, जिसे स्थानीय लोग बहादुर कलारिन की माची कहते हैं. बहादुर कलारिन की इस माची को 14वीं शताब्दी के आसपास का बताया जाता है. उसी इलाके के सोरर चिरचारी की थी बहारी/बहादुर.

कलारिन कलार जाति की महिला थी. यहां मानते हैं कि कलार शराब बेचने वाली जाति होती है. वह थी बेहद सुंदर स्त्री और वहां शराब बेचा करती थी. हबीब साहब को इस कथा के सूत्र राजनांद गांव के साहित्यकार बलदेव प्रसाद मिश्र की किताब ‘दुर्ग परिचय’ में मिला था. हबीब ने अपने इस नाटक के परिचय में लिखा है ‘… उसका नाम था बहारी. उसको देखने के बहाने दूर-दूर के गांव के लोग आया करते थे, शराब पीने. चुनांचे उसकी दुकान बहुत तरक्की करती. उसने पैसा बहुत कमाया…उधर से एक राजा उसपर मोहित हो गया. दोनों में प्रेम हुआ और एक बच्चा पैदा हुआ छछान छाड़ू. छछान छाड़ू के नाम का मतलब है- बाज़…राजा चला गया दुबारा नहीं आया.’ उधर अकेली मां  ने अपने बेटे की छह आगर छह कोरी शादियां की. कोरी यानी बीस. मतलब एक सौ छब्बीस. लेकिन बेटा फिर भी सन्तुष्ट न हुआ. उसने एक रोज मां को ही कह दिया- “अतेक औरत मैं बिहावेव, फेर दुनिया भर में तोर असन औरत नई देखेंव.”

कथा नायिका को अपने इकलौते बेटे की यह बात सुन विक्षोभ, ग्लानि, आक्रोश जनित त्रासद स्थिति स्तब्ध करती है और इसी क्षण वह लोक में व्याप्त कथा के अनुरूप सतीत्व की रक्षा में सभी गांव वालों को चेतावनी देती है कि “सब झन ला मोर डाहर ले कहि देबे कि छछान कहूं पिये बार पानी मांगही, तो कोई वोला पानी मत दे…अउ अगर छछान है जादा सताप बर धरही ते कहि देबे के सब झन अपन दुआरी के कपाट दे दिही! फेर ओला एक बूंद पानी झन पिलाही.” – परिणामस्वरूप उस मां ने एक रोज तेज मिर्च वाला खाना अपने बेटे को खिलाती है और उसको कुएं में धकेल खुद खंजर मार कर खुदकुशी कर लेती है.

लोक की यह कथा दूसरे रूपों में भी कमोबेश यही है. वर्तमान में इस इलाके में बहादुर कलारिन का दर्जा देवी/सती जैसा है. इस इलाके में मां बहादुर कलारिन के नाम से एक डिग्री कॉलेज है और स्थानीय लोग बहादुर कलारिन की पूजा देवी के रूप में करते हैं.

हबीब तनवीर ने इसी लोककथा का नाट्य रूपांतरण बहादुर कलारिन नाम से किया है. पर एक बात है कि लोककथा में राजा/प्रेमी/पति/पिता वापिस नहीं लौटता, पर नाटक में हबीब साहब ने उसकी वापसी करायी है. यहां वह इतेफ़ाक़ से उसी गांव वापिस आता है. वहां उसकी एक झगड़े में अपने ही बेटे के हाथों मौत हो जाती है. यह दृश्य इसलिए रचा गया क्योंकि हबीब ने इस कथा में इडिपस का किस्सा झांक लिया था जिस पर आगे की रचनात्मक जमीन तैयार हुई.

हबीब तनवीर ने इस नाटक को फ़िदा बाई के गुजर जाने के बाद करना बंद कर दिया. फिदाबाई नया थियेटर और भारतीय रंगजगत की बेहतरीन अभिनेत्रियों में शुमार रहीं हैं. उनकी मौत भी नया थियेटर समूह पर एक त्रासदी की तरह रही. ‘बस्तर बैंड के निदेशक, हबीब साहब के और उनके नया थियेटर के साथ तीन दशक से भी ऊपर तक काम कर चुके पद्मश्री अनूप रंजन पांडेय बताते हैं-

‘नाटक बहादुर कलारिन हबीब साहब के दिल के बेहद करीब था. इस नाटक को वह रिवाइव करना चाहते थे पर साथ ही हबीब साहब का मानना था कि बहादुर कलारिन की किरदार की जितनी परतें हैं वह सबके बस की बात नहीं. इसलिए फ़िदा बाई के गुजर जाने के बाद उन्होंने यह नाटक बंद कर दिया. फिदा बाई जैसी क्षमता की एक्ट्रेस का न मिलना इसके बाद में न होने की बड़ी वजह रही.’

हबीब साहब के रंगकर्म को नजदीक से जाने वाले यह बखूबी जानते हैं कि बहादुर कलारिन भले ही चरणदास चोर जितना मशहूर न हुआ हो पर यह नाटक हबीब तनवीर के दिल के काफी करीब था .

इन्सेस्ट और बहादुर कलारिन

इस लोक कथा में इडिपस की कथा और इन्सेस्ट जैसी मनोवैज्ञानिक स्थिति भी स्पष्ट थी, जो भारतीय परिवेश में मान्य नहीं. रंगमंच पर इसे लाने की अलग दुश्वारियां भी थीं. हबीब अपने इस नाटक में लिखते हैं-

मेरी समस्याएं यह थीं कि मां बेटे के आपस के यौन आकर्षण जैसे नाजुक मसले को किस अंदाज़ में पेश किया जाए. फिर इस नाटक में जिस इन्सेस्ट की ओर इशारा है और जिस वजह से यह कहानी इडिपस कॉम्प्लेक्स के साथ एक महान दुखांत की जमीन तैयार करती है. पहली बार जब बहादुर कलारिन कोरबा के खुले मंच पर खेला और कारखाने के कामगारों और देहातियों द्वारा देखा गया, तब यह ट्रेजेडी शुरू से आखिर तक सन्नाटें में देखी गयी थी. इसकी वजह साफ़ है कि नाटक के क्रियाव्यापार में प्रेक्षकों को अनुभव की तीव्रता और गहराई दिखाई दी.

बहादुर कलारिन में गीतों की योजना उसके कथा विस्तार को ताकत देती है.

अईसन सुन्दर नारी के ई बात ,कलारिन ओकर जात
चोला माटी का हे राम एकर का भरोसा
होगे जग अंधियार,राजा बेटा तोला का होगे

इस तरह के गीत इस ट्रेजेडी को एक सार्थक ऊंचाई देते हैं. लोक आख्यान ‘बहादुर कलारिन’ का नाट्य रूप तैयार करते समय नाटककार हबीब तनवीर के सामने राजा ईडिपस की कथा थी, तो दूसरी ओर इन्सेस्ट का मनोरोग भी. इन्सेस्ट की इसी मनोवृति ने इस नाटक को त्रासद रूप दिया क्योंकि उन्होंने इस नाटक के कथानक के सफल बुनावट के लिए मनोविज्ञान के इसी आदिपक्ष इडिपस कॉम्प्लेक्स और आत्मरति ग्रंथि यानि न्यूरोसिस कॉम्प्लेक्स के सिद्धांत को बेहद संजीदगी से अपनाया है.

इसलिए हबीब तनवीर को नजदीक से जानने वाले कहते हैं कि जो लोग भारतीय रंगमंच पर हबीब साहब की पहचान, चरणदास चोर, आगरा बाज़ार और जिन लाहौर नहीं वेख्या तक ही समझते हैं, उनको इस छतीसगढ़ी इडिपस की कथा ‘बहादुर कलारिन’ को देखना-पढ़ना चाहिए. छतीसगढ़ के एक अंचल की कथा और लोकरंग से युक्त होने के बावजूद अपने कथ्य और प्रभाव में हबीब तनवीर का यह नाटक ग्रीक नाटकों – सी ऊंचाई लिए हुए हैं.

हबीब की रंगयात्रा के विविध रंग हैं और फिर उन सब चाहने वालों में सबका अपना दावा है कि “हमने हबीब को देखा है”. ऐसे में अगर उनके केवल मुख्य तीन नाटकों की एक रंगत्रयी बनाएं तो उसमें ‘बहादुर कलारिन’ अनिवार्यत: रहेगी. आप उनके केवल अधिक खेले और चर्चित नाटकों के वृत में ही उनको पूरी तरह नहीं देख समझ सकते.

चलते-चलते बता दें कि आपको आमिर खान प्रोडक्शन की ‘पीपली लाइव’ याद तो होगी ही. उसका अंतिम दृश्य याद कीजिए. नायक नत्था गुरुग्राम के किसी कंन्ट्रक्सन साइट पर उदास बैठा है और उसके गांव से लौटते मीडिया समूहों, नेताओं के कोलाज के बीच एक गीत धीरे-से नगीन तनवीर की आवाज में उभरता है और यहां फ़िल्म के अंत को एक दार्शनिक ऊंचाई मिल जाती है. वह गीत हबीब तनवीर के ही नाटक बहादुर कलारिन का है-

चोला माटी के हे राम
एकर का भरोसा चोला माटी के हे राम

इस गीत को खास इसी नाटक के लिए हबीब साहब ने गंगाराम शिवारे से लिखवाया था. हबीब तनवीर 1982 में पद्मश्री, 2002 में पद्मभूषण, 2006 में भारत सरकार द्वारा नेशनल प्रोफेसर की उपाधि से सम्मानित हुए. आपको मालूम हो कि इसके पहले इस बाकमाल रंगधुनि को 1972-78 में राज्यसभा के लिए मनोनीत किया जा चुका था और जहां तक नेशनल प्रोफेसर की बात है तो यह जान लीजिए कहते हैं उस वक़्त तक भारत सरकार ने केवल दो लोगों को यह उपाधि दी थी – एक अपने हबीब और दूसरी महाश्वेता देवी रहीं थीं. आज इस रंगऋषि, रंगधुनि का जन्मदिन है.


विडियो- भोजपुरी एक्ट्रेस ने कहा, जब तक थिएटर की हालत सही नहीं, तब तक नए गाने नहीं सुनने को मिलेंगे

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