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सावित्री बाई फुले : बीजेपी से इस्तीफा देने वाली वो सांसद, जिसे खुद मोदी ने टिकट दिया था

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20 मार्च, 2018. सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी ऐक्ट को लेकर एक फैसला दिया. और इस फैसले के साथ ही पूरे देश में एससी-एसटी का गुस्सा फूट पड़ा. इस गुस्से की सबसे बड़ी आवाज उभरी बीजेपी की ही सांसद सावित्री बाई फुले की, जो बहराइच से सांसद हैं. 1 अप्रैल को कांशीराम स्मृति उपवन में आयोजित संविधान और आरक्षण बचाओ रैली में उन्होंने कहा-

‘मैं देश की सांसद हूं. इस बात से फर्क नहीं पड़ता कि मैं सांसद रहती हूं या नहीं लेकिन मैं संविधान और आरक्षण में कोई बदलाव सहन नहीं करूंगी.’

भगवा झंडे वाली पार्टी की सांसद नीले रंग के मंच से बीजेपी के खिलाफ बोल रही थीं. उसी वक्त ये तय हो गया था कि सावित्री बाई फुले का बगावत का वक्त नज़दीक आ रहा है.

बिना किसी नेता का नाम लिए वो बोलीं –

’67 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे जिंदगी जीने को मजबूर हैं. अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों को सम्मान और सुरक्षा नहीं मिल पा रही है. हमारे समाज के आदमी को घोड़े पर बैठने पर मार दिया जा रहा है. बाबा साहेब की मूर्तियां तोड़ी जा रही हैं. ऐसा करने वालों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है.’

और इस बयान के तकरीबन आठ महीने बाद 6 दिसंबर, 2018 को लखनऊ में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में सावित्री बाई फुले ने एक ऐलान किया. कहा कि वो बीजेपी से इस्तीफा दे रही हैं और जब तक जीवन रहेगा, वो बीजेपी में वापस नहीं जाएंगी. उन्होंने कहा है कि बीजेपी समाज में बंटवारे की राजनीति कर रही है और मंदिर-मस्जिद का डर दिखाकर आपसी भाईचारे को खत्म करने की कोशिश कर रही है.

सावित्री बाई फुले ने बीजेपी से इस्तीफे का ऐलान किया है. हालांकि उन्होंने कहा है कि वो अपने संसदीय कार्यकाल को पूरा करेंगी.

जिस बीजेपी ने सावित्री बाई फुले को संसद की सीढ़ियां चढ़ाईं, उसी बीजेपी के खिलाफ सावित्री बाई फुले ने 6 दिसंबर को खुली बगावत कर दी. और सावित्री बाई फुले को जानने वाले लोगों को इस बात पर आश्चर्य बिल्कुल भी नहीं हुआ, क्योंकि सावित्री बाई फुले पहले से भी बगावती तेवरों के लिए जानी जाती हैं.

6 साल की उम्र में शादी, विदाई का वक्त आया तो बन गईं संन्यासी

6 साल की उम्र में ही सावित्री बाई फुले की शादी हो गई थी.

सावित्री बाई की शादी 6 साल की उम्र में ही हो गई थी. मगर विदाई नहीं हुई. विदाई का वक्त आया तो इन्होंने इनकार कर दिया. परिवार वालों ने इस विद्रोह को देखते हुए इनकी बहन की शादी उस लड़के से करवा दी. करवानी ही पड़ती. क्योंकि सावित्री बाई के मन में समाजसेवा का भूत सवार था. राजनीति का भूत सवार था. इसकी शुरुआत तब हुई जब वो 8वीं क्लास पास हुई थीं. एक सरकारी योजना के तहत इनके नाम 480 रुपये का वजीफा आया, जिसे स्कूल के प्रिंसिपल डकार गए. इन्होंने इसके खिलाफ बवाल काट दिया. वजीफा तो नहीं मिला, पर स्कूल से नाम जरूर कट गया. यहीं से तय हो गया था कि वो चूल्हे चौके के लिए नहीं, कुछ बड़ा करने के लिए हैं. बहन की शादी के बाद इन्होंने संन्यास ले लिया. और यहीं से 1 जनवरी 1981 को बहराइच के नानपारा के हुसैनपुर मृदांगी गांव में जन्मी सावित्री देवी की जिंदगी बदलनी शुरू हो गई. उनको नया नाम भी मिल गया. वही नाम जिस नाम से सब आज उन्हें जानते हैं. सावित्री बाई फुले. ये नामकरण किया उनके गुरु अक्षयवरनाथ कनौजिया ने. अक्षयवरनाथ कनौजिया उनके पिता के दोस्त थे. कांशीराम के करीबी थे. उन्होंने सावित्रीबाई को गोद ले लिया. राजनीति में भी आगे बढ़वाया. मायावती से मिलवाया. इस मुलाकात की कहानी भी दिलचस्प है.

मंच पर भाषण देने आई 14 साल की लड़की, मायावती ने पार्टी में बुला लिया

मायावती ने 14 साल की सावित्री बाई फुले का भाषण सुना और फिर उन्हें पार्टी में शामिल कर लिया.

बात 1995 की है. मायावती मुख्यमंत्री थीं. एक कार्यक्रम के लिए बहराइच आई हुईं थीं. इस कार्यक्रम को तब 14 साल की रहीं सावित्रीबाई ने भी संबोधित किया. मौका उनको गुरु ने दिलवाया था. सो सावित्रीबाई ने भी चौका मारा. बड़े ही धाकड़ अंदाज में अंबेडकर और संविधान पर अपनी बात रखी. सभा में बैठे लोगों की जमकर तालियां लूटीं थीं. ये कुछ-कुछ मायावती की शुरुआती कहानी की तरह ही है. एक भाषण की वजह से ही मायावती कांशीराम की नजरों में चढ़ी थीं. सो यहां सावित्रीबाई की मायावती ने जमकर तारीफ की. इसी के बाद उनके परिवार वाले, गांव वाले बोलने लगे कि मायावती सीएम बन सकती हैं तो सावित्रीबाई क्यों नहीं. इसी के बाद सावित्रीबाई बसपा में सक्रिय हो गईं. पढ़ाई भी करती रहीं. बहराइच के महिला डिग्री कॉलेज से ग्रेजुएशन किया.

तीन साल में कर दी बगावत, माया ने पार्टी से निकाल दिया

मध्यप्रदेश में कांशीराम भी अपना काडर तैयार करने में जुटे थे.
सावित्री बाई ने जिला पंचायत चुनाव में अपना एक उम्मीदवार खड़ा कर दिया. मायावती नाराज हो गईं और उन्होंने सावित्री बाई को पार्टी से निकाल दिया.

मगर 1998 में मायावती ने उन्हें पार्टी से निकाल दिया. कारण थे 1996 में हुए जिला पंचायत के चुनाव. इसमें बसपा ने मिहिपुरवा से एक उम्मीदवार खड़ा किया, लेकिन अक्षयवरनाथ कनौजिया ने इसका विरोध करते हुए सावित्री को निर्दल चुनाव लड़ाया. इसमें सावित्री ने रिकार्ड मतों से जीत हासिल की. हालांकि वो बीएसपी से जुड़ी रहीं. इसी दौरान लखनऊ में बसपा सुप्रीमो कांशीराम की अगुवाई में हुए एक आंदोलन और प्रदर्शन के दौरान सावित्री पर पीएसी ने जमकर लाठियां भांजी और इन्हें एक गोली भी लग गई. मगर लोकल बसपाइयों के मन में जिला पंचायत की हार की टीस थी. विरोध बढ़ा और मायावती ने अक्षयवरनाथ और सावित्रीबाई दोनों को बाहर का रास्ता दिखा दिया.

बसपा से बाहर हुईं तो बीजेपी में मिली एंट्री

बीएसपी से निकलने के बाद सावित्री बाई बीजेपी में शामिल हो गईं.
बीएसपी से निकलने के बाद सावित्री बाई बीजेपी में शामिल हो गईं.

बीएसपी से बाहर निकाले जाने के बाद सावित्री बाई फुले बीजेपी में शामिल हो गईं. 2001 में बहराइच से जिला पंचायत का चुनाव लड़ा और जीत हासिल की. जीत से हौसला बढ़ा और कोशिश की कि विधानसभा तक पहुंच सकें. 2002 और 2007 में नाकामयाब कोशिश के बाद कामयाबी हाथ लगी 2012 के विधानसभा चुनाव में. बहराइच की बलहा सीट से विधायक बन गईं. हालांकि 2005 और 2010 में वो जिला पंचायत सदस्य जरूर बनी रहीं. 2014 में एक बार फिर किस्मत चमकी. बहराइच की आरक्षित सीट से उन्हें बीजेपी ने लोकसभा का टिकट दे दिया. चुनाव हुआ जीतीं और वो भी 1 लाख से भी ज्यादा वोटों से.

सीधे मोदी से मांगा था लोकसभा का टिकट

जिस बहराइच से बीजेपी हारती आ रही थी, उस सीट पर बीजेपी को जिताने के लिए उम्मीदवार बनीं सावित्री बाई और उन्हें टिकट दिया नरेंद्र मोदी ने.
जिस बहराइच से बीजेपी हारती आ रही थी, उस सीट पर बीजेपी को जिताने के लिए उम्मीदवार बनीं सावित्री बाई और उन्हें टिकट दिया नरेंद्र मोदी ने.

उनको टिकट मिलने की कहानी भी दिलचस्प है. वो बताती हैं कि उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए टिकट सीधा नरेंद्र मोदी से मांगा था. नरेंद्र मोदी से वो पहली बार तब मिली थीं जब वो 2012 गुजरात विधानसभा चुनाव में जूनागढ़, राजकोट और सूरत प्रचार के लिए गई थीं. फिर जब लोकसभा चुनाव का समय आया तो उन्होंने मोदी के सामने लोकसभा चुनाव लड़ने की इच्छा जाहिर की, तो मोदी ने उनसे कहा – तुम बहराइच से क्यों, गुजरात आ जाओ, मैं तुम्हें वहां से भी लड़ा सकता हूं. लेकिन फुले कहती हैं कि उन्होंने अपनी जन्मभूमि बहराइच से ही लड़ने का अनुरोध किया. अनुरोध सुना भी गया. फला भी.

लेकिन फिर शुरू हुए बगावती तेवर

सावित्री बाई ने बगावती तेवर अपनाए और बीजेपी से इस्तीफा दे दिया.

सांसद बनने के एक साल के बाद ही 2015 में एनएचएआई के ठेकेदार ने सावित्रीबाई पर पैसा वसूलने का आरोप लगाया. हालांकि बाद में मामला सुलझ गया, लेकिन सावित्रीबाई ने बगावत शुरू कर दी. बीजेपी के बैनर से हटकर कार्यक्रम और सभाएं शुरू कीं. खुद का एक सखी संप्रदाय संगठन बना लिया, जो स्थानीय स्तर पर महिलाओं के हित में काम करता हैं. पार्टी विरोधी लाइन का नतीजा था कि बहराइच के ही बीजेपी कार्यकर्ता उनका पुतला फूंकने लगे. ऐसे में सावित्री बाई फुले की निगाह उस महागठबंधन की तरफ भी होगी, जिसकी खिचड़ी माया और अखिलेश के बीच पक रही है. बीजेपी से बगावत उन्हें इस महागठबंधन का हिस्सा बना सकती है.


 

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