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सूट बूट पहना के बिठा देने से कोई पत्रकार नहीं हो जाता: मकालू

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vineet singh विनीत दी लल्लनटॉप के रीडर और पक्के वाले दोस्त हैं. बलिया से हैं. जहां से चंद्रशेखर प्रधानमंत्री बने थे. उन्हीं ने देवस्थली विद्यापीठ स्कूल खोला था जिस स्कूल में पढ़े हैं विनीत. पढ़ लिख के पथरा हुए तो चले गए बंबई. वहां टाटा कंपनी में कोई बड़ी जिम्मेदारी वाला काम संभाल रहे हैं. अपनी पोस्ट का नाम अंग्रेजी में बताया है. लेकिन वो इत्ता लंबा था कि हम भूल गए. दोबारा पूछ के कॉपी पेस्ट कर देंगे. उन्होंने लल्लन के लिए बड़े मजे की चीजें लिखी हैं. हमको पढ़के मजा आया, आप भी पढ़िए.


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आज सुबह मेरा दोस्त मकालू मिल गया. हैरान और परेशान. खुद में ही कुछ बडबडाए जा रहा था. उसे देखकर हमेशा की तरह मैंने कट लेने की कोशिश की क्योंकि उसके अटपटे और बेतुके सवाल कौन झेले. लेकिन हर बार की तरह ही उसने मुझे आज भी धर-दबोचा. और पूछ पड़ा- गुरू सुबह-सुबह टीवी पर न्यूज देखकर जरूर देख कर आए होगे?

मैंने कहा – बिल्कुल. रोज दिन की शुरुआत खबरों और प्राणायाम से ही करता हूं.

मकालू ने बोला- बहुत बढ़िया. अच्छा ये बताओ. ये जर्नलिस्ट और टीवी एंकर में क्या फर्क होता है? कभी सोचा है?

मैंने कहा – मकालू बस इसीलिए तुमसे मिलने में घबराहट होती है. बचपन में जैसे ट्रांसलेशन पूछने वाले रिश्तेदारों को देखते ही मैं कट लेता था वैसे ही तुमसे भी कट लेता हूं. खैर टीवी एंकर खुद एक जर्नलिस्ट होता है. इन दोनों में कोई फर्क नहीं होता है.

मकालू मुझ पर झल्लाते हुए बोला- गुरु तुम्हारा दोष नहीं है. दरअसल तुम भी उस पढ़े-लिखे अनपढों की फौज का हिस्सा हो. जो चीजों के बीच अच्छे-बुरे का फर्क नहीं कर पाते. बस रोज सुबह-शाम टीवी खोल कर बैठ जाते हैं. गंभीर भाव भंगिमा के साथ एंकर ने जो भी ज्ञान ठेल दिया. उसी को सच मानकर एक दूसरे से लड़ पड़ते हैं. अपना दिमाग ही नहीं लगाते बिलकुल भी. उन्हें किसी ने ये नहीं बताया कि समाचार सिर्फ सूचना का माध्यम होता है. हमारी सोच का नहीं.

मुझे गुस्सा आ गया- मैंने कहा पहली बात तो तुम थोड़ा तमीज से बात करो और दूसरे अगर इतने ज्ञानी हो तो खुद ही अंतर बता दो?

मकालू को किसी के गुस्से से ना आज तक फर्क पड़ा है और ना आज पड़ा. बोला- गुरु एंकर और जर्नलिस्ट में वही फर्क होता है जो साधु और संत में होता है.

मैंने कहा – कभी-कभी सीधी बात भी कर लिया करो. मुझे बिल्कुल भी समझ में नहीं आया.

मकालू ने समझाने की कोशिश की – साधु होना एक वेशभूषा है जबकि संत होना एक अवस्था है.

मैं अब और ज्यादा कन्फ्यूज हो गया था और साथ ही मेरा धैर्य भी जवाब दे रहा था- साधारण भाषा में समझा सकते हो तो ठीक वरना रहने दो.

मकालू ने गहरी सांस लेकर कहा – “गुरु अगर किसी ने दाढ़ी बढ़ा कर. गेरूआ कपड़ा पहन लिया. कंठी माला पहन लिया. तो बस वो दिखने लगा किसी साधु की तरह. लेकिन ये बिल्कुल भी जरूरी नही की वो संत भी हो.”

जैसे??- मैंने पूछा.

जैसे “स्वामी ओम”. वो एक साधु की वेशभूषा में रहता जरूर है लेकिन वो संत नहीं है. संत थे ए. पी. जे. अब्दुल कलाम. गांधी जी वगैरह वगैरह.

लेकिन इसका जर्नलिस्ट और टीवी एंकर से क्या लेना देना?

मकालू बोला- गुरु ध्यान से सुनना. टीवी पर किसी भी ठीक ठाक आदमी या औरत को सूट-बूट में माइक लगाकर खबर पढ़ने बिठा दो तो वो बन गया एंकर. लेकिन जर्नलिस्ट या पत्रकार होना सत्ता से निर्भीक होकर सवाल पूछने की एक साहसिक विधा है. बल्कि ये एक ऐसी अवस्था है जहां आप राज्यसभा का सदस्य होने या पद्म पुरस्कारों के लालच में सत्ता के चापलूस नहीं बने रहते बल्कि तटस्थ होकर कड़वे सवाल पूछने की हिम्मत रखते हैं.

हम्म्म्म्म !!

आज पहली बार मकालू की बात से मैं थोड़ा सहमत हुआ. आज पहली बार हम दोनों में से किसी ने गुस्से में “वाकआउट” नहीं किया .

अब मैं अपने पसंदीदा एंकर को थोड़े अलग निगाह से समाचार पढते और ज्ञान देते हुए देखने लगा हूं.


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