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इस ऐक्टर को देखकर आप हंसते रहे, वो गज़ब का क्रांतिकारी था

उत्पल दत्त. वो बॉस, जो अपने चहेते एम्पलॉई से अपनी बेटी की शादी कराना चाहता है. क्योंकि वो ‘हीरा’ है. और वो बाप भी, जो अपने दोनों जुड़वां बेटों का नाम अशोक रख देता है. फिर दो और जुड़वां गोद ले लेता है और दोनों का नाम बहादुर रख देता है ताकि एरर का स्कोप बने और कॉमेडी हो सके, ‘अंगूर’ बन सके. थोक में ऐसी भूमिकाएं निभाने वाले उत्पल दत्त का असल प्यार नाटक था. खेलना बस नहीं, लिखना भी. और लिखना ऐसे कि उसमें से क्रांति का संदेश फूटकर निकले. और क्रांति महज़ कहने को नहीं, दत्त ने 77 पन्नों की एक थीसिस लिखी थी,  ‘भारतीय क्रांति और अर्थ-व्यवस्था के चरित्र का विवेचन’ नाम से.

ऐसी ही ढेर सारी बाते हैं वीर भारत तलवार की लिखी किताब ‘सामना- रामविलास शर्मा की विवेचन-पद्धति और मार्क्सवाद तथा निबन्ध’ में. प्रकाशकों की इजाज़त से हम इस किताब में छपे दत्त के एक लंबे साक्षातकार का एक हिस्सा आपको पढ़ा रहे हैं. पेश है –

***

‘कल्लोल’. यह नाम उनके एक प्रसिद्ध नाटक का है और यही नाम उनके उस घर का भी है, जिसके फाटक पर यह लिखा हुआ है. आगे छोटा-सा बगीचा है जिसे पार कर हम बरामदे पर आ गए और कॉलबेल पर उंगली रखी.

मैं सोच रहा था कि दरवाजा कौन खोलेगा…कि दरवाजा खुला.

वे उत्पल दत्त ही थे. भारी भरकम शरीर, लंबा उतना नहीं जितना कि चौड़ा. काफी भरा हुआ, चौड़ा मुंह, जिस पर मुस्कुराहट, मस्ती और आत्मीयता- सब कुछ एक ही साथ था और खूब ऊंचा ललाट. शरीर से उत्पल दत्त यही थे. उन्होंने हल्के नीले रंग का एक ढीला-ढीला पायजामा और वैसा ही ढीला कुर्ता पहन रखा था. अंदर एक बड़े कमरे में, मैं और मेरे एक मित्र, जो मुझे उन तक लाए थे, सोफे पर बैठ गए. पास ही एक छोटे सोफे पर उत्पल दत्त बैठे और उन्होंने वह कप होंठों से लगा लिया जो कि पहले से ही उनके हाथ में था.

‘पहले हम लोग एक-एक कप चाय पी लें, तब बातचीत अच्छी रहेगी.’ उन्होंने कहा और भीतर वाले कमरे में चले गए. कमरे से लौटते हुए वे गुस्से में ‘चाय, चाय कहां है? चाय लाओ.’ जोर से चिल्लाए. मुझे बड़ा आश्चर्य हुआ. वे फिर सहज होकर हंसने लगे और मेरे मित्र से बांग्ला में बोले- ‘तुम्हें याद है, जेल में वह बन्दी पागल रोज सुबह इसी तरह किया करता था.’ और वे हंस पड़े.

वीर भारत तलवार की लिखी किताब 'सामना' का कवर.
वीर भारत तलवार की लिखी किताब ‘सामना’ का कवर.

…तो मैं एक नाटककार से मिल रहा हूं, मुझे याद आ गया. कहां से शुरू किया जाए, मैंने सोचा. ‘आप हिन्दी तो समझ लेते होंगे. ‘जी हां, मैंने हिन्दी फिल्मों में काम किया है.’
‘ओह, मैं तो भूल ही गया था!’ मुझे कुछ शर्म महसूस हुई…’अच्छा तो हम हिन्दी में ही बातें करेंगे. आपको जहां दिक्कत हो वहां आप बांग्ला में बोलें. मैं बांग्ला समझ लेता हूं. उन्होंने यह स्वीकार कर लिया.

‘मैंने आपके अधिकांश नाटक नहीं देखे हैं,’ मैंने शुरू में ही कहा- ‘जमशेदपुर में दुर्गापूजा की रात आपकी एक ‘जात्रा’ देखी थी-‘राइफल’ और फिर बनारस में वहां की ‘इप्टा’ द्वारा खेला गया आपका नाटक ‘मृत्यूर अतीत’ देखा था. इसके अलावा मैंने आपके तीन-चार नाटकों के कथानक अपने मित्रों से सुने हैं. आपके श्रेष्ठ नाटकों को न देख पाया, इस अभाव को दूर करने के लिए कम-से-कम उन्हें पढ़ लेना चाहता हूं. क्या आपके नाटक पुस्तक रूप में भी प्रकाशित हुए हैं? खासकर हिन्दी भाषा में? यदि हुए हैं तो कहां से?’

उन्होंने मेरे इस ब्योरे, लेकिन महत्व के छोटे से सवाल का जवाब कुछ ही शब्दों में दे दिया, ‘मेरे नाटक पुस्तक-रूप में भी प्रकाशित हुए हैं. वे बांग्ला में भी हैं और हिन्दी में भी. हिन्दी में मेरे तीन नाटक, ‘कल्लोल’, ‘अंगारे’ और ‘वियतनाम’ प्रकाशित हुए हैं. ये किताबिस्तान, इलाहाबाद से प्रकाशित हुए हैं.’

मैंने अगला प्रश्न किया- ‘आप तो अपने लेखन में कम्युनिस्ट राजनीति के प्रति प्रतिबद्ध रहे हैं. एम. एल. (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) पार्टी से पहले बनी क्रांतिकारियों की समन्वय समिति में भी रहे थे, जिससे आपको कई राजनीतिक आरोप लगाकर निकाल दिया गया. आपने इन आरोपों को गैर-मार्क्सवादी बताते हुए उनके जवाब में एक लंबा लेख भी लिखा था. यह क्रांतिकारी राजनीति में आपका एक कड़वा अनुभव था. किंतु, भारत के बहुत से अच्छे क्रांतिकारियों से भी आपका संबंध रहा है. राजनीति के अच्छे पक्षों को भी आपने देखा है. आप एक ऐसे व्यक्ति हैं, जिन्हें भारत की क्रांतिकारी कम्युनिस्ट राजनीति के अच्छे और बुरे दोनों पक्षों का अनुभव है. इस अनुभव के आधार पर कृपया बतलाइए कि भारत में क्रांति का क्या भविष्य है?’

इस गंभीर प्रश्न पर उत्पल दत्त बहुत ज़ोरों से ठहाका लगाकर हंस पड़े- ‘क्रांति का कोई भविष्य नहीं है!’ यह उत्पल दत्त कह रहे हैं? मैंने ज़रा चौंककर पूछा, ‘आपका मतलब? क्या भारत में क्रांति नहीं होगी?’
‘कौन करेगा? ये बंगाली?’ इस बार मैं भी हंस पड़ा. कुछ देर हम लोग हंसते रहे. थोड़ी देर बाद मैंने फिर अपना प्रश्न उनकी ओर देखते हुए दृष्टि से व्यक्त किया. वे गंभीरता से बोले, ‘क्रांति तो भारत में होगी ही. ज़रूर होगी. कोई नहीं करेगा, कम्युनिस्ट पार्टी नहीं करेगी तो जनता खुद करेगी. क्रांति ज़रूर होगी, लेकिन,’ … वे कुछ देर रुक कर बोले ‘लेकिन भारत की कम्युनिस्ट पार्टी ने मार्क्सवाद-लेनिनवाद के बहुत से तत्त्वों को भुला दिया है.’ ‘वे तत्त्व कौन से हैं, जिन्हें भुला दिया गया है?’

‘भारत एक बहु-जातीय देश है,’- उन्होंने स्टालिन को उद्धृत करते हुए कहा- ‘यहां बहुत पहले से, आर्यों के आने के भी पहले से भिन्न-भिन्न जातियां रही हैं और आज भी हैं. उन सबकी अपनी विशिष्ट भाषा, रहन-सहन, वेश-भूषा और संस्कृति-सभ्यता है. साथ ही यह एक अर्द्ध-औपनिवेशिक देश है. अर्द्ध-औपनिवेशिक देश की क्रांति हमेशा राष्ट्रीय युद्ध के रूप में होती है, साम्राज्यवाद के विरुद्ध. स्टालिन ने बतलाया था कि किसान वर्ग को अन्य किसी प्रकार की क्रांति में नहीं खींचा जा सकता, केवल राष्ट्रीय युद्ध में ही किसान वर्ग को खींचा जा सकता है, और वह मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में. केवल मज़दूर वर्ग की कोई राष्ट्रीयता (जातीयता) नहीं होती है- दुनिया के समस्त मज़दूरों की संस्कृति-सभ्यता एक है. लेकिन किसान वर्गों की अपनी-अपनी विशिष्ट राष्ट्रीयता होती है. और भारत एक बहु-राष्ट्रीयता वाला देश है. इसलिए यहां का राष्ट्रीय युद्ध सभी जातियों का अपना-अपना राष्ट्रीय युद्ध होगा- उसका ‘रूप’ एक-दूसरे से भिन्न होगा, लेकिन इन सब भिन्न-भिन्न रूपों का ‘मूल तत्व’ एक ही होगा- वह होगा अंततोगत्वा एक जनवादी क्रांति. ऐसा इसलिए होगा, क्योंकि भिन्न-भिन्न जातीयता वाले किसान वर्गों का युद्ध मज़दूर वर्ग के नेतृत्व में होगा- और मज़दूर वर्ग की कोई राष्ट्रीयता नहीं होती। एक बहु-राष्ट्रीयता वाले देश के राष्ट्रीय युद्ध के इस रूप को, जो कि मार्क्सवाद-लेनिनवाद का बुनियादी तत्त्व है- यहां की कम्युनिस्ट पार्टी ने भुला दिया, बहुत शुरू से भुला दिया और अब भी वह उसे भूली हुई है.’

‘क्या और भी ऐसे तत्व हैं, जिन्हें भुला दिया गया है?’

‘और भी हैं’ वे बोले- ‘उदाहरण के लिए भारतीय पूंजीपति वर्ग के चरित्र को लीजिए. क्या भारतीय पूंजीपति वर्ग राष्ट्रीवादी है अथवा दलाल है? मैंने अभी हाल ही में भारतीय क्रांति और अर्थ-व्यवस्था के चरित्र का विवेचन अपने 77 पृष्ठों की एक लंबी थीसिस में किया है. थीसिस बांग्ला में है और उसे कोई छापने को तैयार नहीं है. एक चीज़ तो स्पष्ट है कि भारतीय पूंजीपति वर्ग विदेशी पूंजी पर आश्रित है, इसलिए यह आवश्यक रूप से उसका दलाल है. लेकिन कोई भी चित्र केवल सफेद या केवल काला नहीं होता. यह चित्र अपने में दो विरोधी रंगों को लिए हुए होता है. यही द्वंद्वाद भारतीय पूंजीपति वर्ग पर भी लागू होता है. भारतीय पूंजीपति वर्ग जहां एक ओर विदेशी पूंजी का दलाल है, वहीं उसका विरोधी भी है. वह उस पर आश्रित है और साथ ही अपनी मुक्ति के लिए और अपने विस्तार के लिए संघर्ष भी करता है. हमें इन दोनों पक्षों का ध्यान रखना चाहिए. उदाहरण के लिए…’ कहते हुए उन्होंने कई उदाहरण दिए कि कैसे किर्लोस्कर ने एक विदेशी बैंक को बाज़ार से हटाया और भारतीय पूंजीपतियों ने विदेशी साबुनों को बाज़ार से हटाया है, इत्यादि-इत्यादि.

मृणाल सेन डायरेक्टेड फिल्म 'भुवन शोम' के एक दृश्य में फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाले उत्पल दत्त.
मृणाल सेन डायरेक्टेड फिल्म ‘भुवन शोम’ के एक दृश्य में फिल्म में मुख्य किरदार निभाने वाले उत्पल दत्त.

बात चूंकि राजनीति की चल रही थी, इसलिए एक राजनीतिक प्रश्न मैंने और पूछ लिया, जो कि इन दिनों कम्युनिस्ट राजनीति का अत्यधिक विवादास्पद प्रश्न बना हुआ है.
‘इन दिनों चीनी कम्युनिस्ट पार्टी के रुख के बारे में आपके क्या विचार हैं?’

‘चीन की कम्युनिस्ट पार्टी कभी कुछ कहती है, कभी कुछ,’ उन्होंने कहा,- ‘एक बार उसने उत्तरी कोरिया के किम इल् सुंग को ‘मूर्ख’ कहा और दूसरी बार उसे एक ‘महान क्रांतिकारी नेता’ कहा.’ कहते हुए उन्होंने ‘पीकिंग रिव्यू’ की अंक-संख्या, तारीख़ तथा पूरी पंक्तियां उद्धृत कर दीं. उनकी स्मरण-शक्ति विलक्षण है. स्टालिन की रचनाएं और पंक्तियां तो जैसे उन्हें कंठस्थ हैं. अन्य राजनीतिक उक्तियां और विभिन्न प्रकार के आंकड़े भी उन्हें पूरी तरह से याद रहते हैं. इतना ही नहीं, आस्ट्रेलिया, अमेरिका, क्यूबा और कोरिया आदि की जिन पत्रिकाओं का वे हवाला देते थे, वे पत्रिकाएं भी इस देश में बहुत कम ही लोगों के पास आती होंगी.

उनका कहना जारी था, ‘पिछले 15 वर्षों से चीन की कम्युनिस्ट पार्टी वामपंथी और दक्षिणपंथी भटकावों की शिकार हुई है. 1960 ई. से 1965 ई. तक चीन की पार्टी में दक्षिणपंथी भटकाव आया जिसके अंतर्गत ल्यूशाओची राष्ट्रपति बने रहे. सन् 65 से 70 तक पार्टी में वामपंथी भटकाव आया जब कि सांस्कृतिक क्रांति के दौरान उन्होंने विदेशी दूतावासों को क्षति पहुंचाई, ब्रिटिश दूतावास में तोड़-फोड़ की और सारी दुनिया से कटकर अकेले हो गए. यह वामपंथी भटकाव अपने पिछले वर्षों की दक्षिणपंथी ग़लतियों को सुधारने के क्रम में आया था. और अब सन् 70 से उन्होंने अपनी वामपंथी गलतियों को सुधारना शुरू किया है. ब्रिटिश दूतावास को क्षति पहुंचाने के लिए उन्होंने ब्रिटिश सरकार से क्षमा मांगी. इतना ही नहीं, जो क्षति हुई उसके लिए हर्जाना देना भी स्वीकार किया. लेकिन वामपंथी गलतियों को सुधारने के क्रम में वे इतने अधिक सिमटते गए कि दक्षिणपंथी भटकावों में जा फंसे हैं. लंका में विद्रोह के बाद उन्होंने लंका-सरकार को अपनी आर्थिक दशा में सुधार करने अथवा हथियार खरीदने के लिए कई लाख पौंड का कर्जा दिया. पूर्व बंगाल में विद्रोह में याहिया खां की सैनिक सरकार को समर्थन तथा पिंगपांग टूर्नामेंट से शुरू हुई राजनीति जो कि अब निक्सन की चीन यात्रा तक आ पहुंची है- यह सब उनके दक्षिणपंथी भटकावों के उदाहरण हैं.’

‘और रूस के संबंध में उनकी आलोचना?’

‘वे सोवियत संघ को सामाजिक साम्राज्यवादी कहते हैं. लेकिन मुझे यह बात पूरी तरह से सही नहीं लगती. यह सच है कि वहां कुछ तबकों में अय्याशी बढ़ी है, वहां अपराध होते हैं, फैशन बढ़ा है, नाइट क्लब खुल गए हैं तथा उत्पादन में कुछ तेजी-मंदी आई है, लेकिन केवल इन लक्षणों से ही यह सिद्ध नहीं हो पाता कि वहां पूंजीवाद की स्थापना फिर से हो चुकी है या वे सामाजिक साम्राज्यवादी हो गए हैं.’

‘लेकिन अल्बानिया की कम्युनिस्ट पार्टी भी तो यही कहती है? अल्बानिया की पार्टी ने ही सबसे पहले सोवियत संघ की आलोचना की थी, चीनी पार्टी ने उसके बाद की थी.’

‘हां, ठीक है. लेकिन अल्बानिया की कम्युनिस्ट पार्टी का चीनी पार्टी से आलोचना की नीति पर मतभेद है. यह इधर और भी उभरकर सामने आ गया है.’ उन्होंने फिर एक क्यूबाई पत्रिका का हवाला देते हुए उसकी पूरी पंक्तियां, जो उन्हें कंठस्थ थी, उद्धृत कर दीं, ‘अल्बानिया की कम्युनिस्ट पार्टी ने चीनी पार्टी को इस बात के लिए दोषी ठहराया है कि उसने पूर्वी यूरोप के देशों से अपना नाता तोड़कर खुद को अकेला कर लिया है.’

इस बीच डाकिया चिट्ठियां लेकर आया और वे उठकर चले गए. मालूम हुआ कि चिट्ठियां उनके यहां काफी संख्या में आती हैं. एक बार एक चिट्ठी आई जिस पर केवल इतना सा पता लिखा हुआ था- उत्पल दत्त, कलकत्ता. आधे करोड़ से भी अधिक जनसंख्या वाले इस बृहत्तर कलकत्ते में इतने से पते पर भी वह चिट्ठी उन तक पहुंच गई. केवल एक इस बात से अंदाज़ा किया जा सकता है कि कलकत्ते में उनकी ख्याति कितनी है.

वे लौटकर आए तो मैंने उनके नाटकों की चर्चा की. थोड़ी-सी भूमिका बांधते हुए मैंने कहा- ‘मोशाय, प्रत्येक भाषा में जिन नाटककारों ने अपने देश के साहित्य में अपनी श्रेष्ठ रचनाओं द्वारा कोई मौलिक योगदान दिया है, उनके संबंध में यह देखा गया है कि उनकी इन श्रेष्ठ रचनाओं के पीछे उनके देश की जातीय साहित्यिक परंपरा का हाथ रहा है. उनकी श्रेष्ठता निराधार नहीं थी. उसके पीछे उनकी परंपरा का कंधा था. आपके नाटकों का तत्व क्रांतिकारी है. वह कौन-सी परंपरा है, जिसने आपको इन क्रांतिकारी नाटकों के स्तर तक पहुंचाया? आपके इन क्रांतिकारी नाटकों का आधार क्या है?’

प्रश्न सुनकर कुछ देर तक वे मौन रहे, मानों इस प्रश्न में उन्हें अपने सारे जीवन से दो-चार होना था. और सचमुच वे अपने जीवन के सामने आ खड़े हुए. उन्होंने कहना शुरू किया- ‘मैं बी. ए. में पढ़ता था. शहर में एक विदेशी नाटक कंपनी आई हुई थी, ‘शेक्सपियराना इंटरनेशनल थिएटर कंपनी’. उसके डायरेक्टर थे जेफ़री केंडल. यह सन् 47 की बात है. मैंने पढ़ाई छोड़ दी और कंपनी में शामिल हो गया. कंपनी के साथ घूमना शुरू किया. वह जहां-जहां जाती वहां-वहां मैं भी जाता. इस तरह से भारत, पाकिस्तान घूमता हुआ मैं इंग्लैंड तक पहुंचा. उस थिएटर कंपनी में मैंने परदा खींचने की कला सीखी. जीवन में पहली बार मैं उस अंग्रेजी थिएटर कंपनी से अत्यधिक प्रभावित हुआ था. जब मैं लौटकर भारत आया तब मैंने स्वयं नाटक लिखना और उन्हें खेलना शुरू किया. कई वर्षों तक मैं अपने नाटक लिखकर खेलता रहा. लेकिन जब मैं उन्हें प्रेक्षागृह में खेलता था, तब मुझे उनसे एक असंतोष सा होता था. मंच पर मैं खड़ा होता था, तो मुझे लगता था कि जैसे मैं दर्शकों तक अपनी बात पहुंचा नहीं पा रहा हूं. मैं दर्शकों से जो कहना चाहता हूं, उसे वे समझ नहीं रहे हैं. दर्शकों के मुख और उनके भाव देखकर मुझे अनुभव होता था कि वे मेरी शैली, मेरी भाषा को समझ नहीं रहे हैं. यह बात मुझे निरंतर खलती रहती थी. यद्यपि मेरे कई बुद्धिजीवी मित्र मेरे नाटकों को देखकर वाह-वाह कर उठते थे, उसकी शैली की प्रशंसा करते थे. लेकिन वे बुद्धिजीवी थे, शिक्षित थे, जो अंग्रेज़ी भाषा और साहित्य के जानकार थे. साधारण लोग मेरे नाटकों को समझ नहीं पाते, यह मुझे हमेशा लगता था, क्योंकि मैं ब्रिटिश नाट्य शैली के प्रभाव में था जिसके संस्कारों से हमारे देश का साधारण जन-मानस बिलकुल अनजान था.

‘मैंने नाटक लिखना और खेलना बंद कर दिया. मैंने बंगला जाति की नाट्य-परंपरा की ओर मुड़ना आवश्यक समझा. यह लगभग सन् 55 की बात है. मैंने बंगला जातीय नाट्य-परंपरा का अध्ययन करना शुरू कर दिया. दीनबंधु मित्र, मधुसूदन दत्त, गिरीश घोष, शिरोध प्रसाद, विद्याविनोद तथा डी. एल. राय इत्यादि को मैंने खूब ध्यानपूर्वक पढ़ा. इनको पढ़ने के बाद मैंने इनके नाटकों का अनुकरण करते हुए नाटक लिखने का अभ्यास किय जैसे कि दीनबंधु मित्र के नाटक ‘नील दर्पण’ और अमृतलाल बसु के नाटक ‘हीरक चूर्ण’ का मैंने अनुकरण करते हुए नाटक लिखा और अभ्यास करने के बाद उन्हें फाड़ दिया.

‘इसके बाद मैंने फिर नाटक लिखना और खेलना प्रारंभ किया. इस बार मुझपर ब्रिटिश नाट्यशैली का प्रभाव कुछ कम हुआ, हालांकि वह पूरी तरह से अभी गया नहीं. इस बार मैं पहले की तुलना में कुछ संतुष्ट था. लेकिन असंतोष अब भी था.

‘मैंने विदेश-यात्रा शुरू की. खासकर जर्मनी की. जर्मनी में सन् 60, सन् 64 और सन् 68, तीन बार गया. वहां मैंने ब्रेख्ट की नाट्य-संस्था ‘बर्लिन एसेम्बल’ में काम करना शुरू किया. ‘बर्लिन-एसेम्बल’ नाट्यशैली का मुझ पर एक निश्चित प्रभाव पड़ा.

‘वहां से लौटकर मैं अपने नाटक लिखता और खेलता रहा. लेकिन मुझे अब भी असंतोष था. मेरे नाटक जनता के हृदय में घर नहीं कर पा रहे हैं, यह बात मुझे महसूस होती रहती थी. तब यह देखने के लिए कि खुद जनता अपने नाटक कैसे करती है, मैंने नाटक लिखना बंद कर दिया और सन् 68 में बंगाल और उड़ीसा के गांवों में ‘जात्रा’ करने वाली जात्रा-पार्टियों में शामिल हो गया। उनके साथ ‘जात्रा’करते हुए मैं गांव-गांव में घूमता रहा। इन ‘जात्राओं’ से मैंने बहुत कुछ सीखा है. संबोधन और प्रेषणीयता की ‘जात्रा’ में अद्भुत शक्ति होती है.

‘गांवों से लौटकर मैंने जात्रा लिखना शुरू कर दिया और अब भी ‘जात्रा’ लिखता और करता हूं.’ ‘अब आपको अपने नाटकों से संतोष है?’ ‘नहीं, मुझे अभी पूरा संतोष नहीं है’ अब भी लगता है कि मुझे बहुत-कुछ सीखना है. लेकिन अब मैं स्थिर हो गया हूं घर, सुविधा तथा प्रतिष्ठा ने मेरे असंतोष को निष्क्रिय बना दिया है.

‘मैंने यह नहीं पूछा कि तब आप घर, सुविधा और प्रतिष्ठा को छोड़ क्यों नहीं देते? मैंने एक दूसरा प्रश्न उठाया, ‘गांव वाले जो ‘जात्रा’ खेलते हैं, उसमें तो कई स्थलों पर नाच और गानें भी होते हैं. क्या आप भी अपनी ‘जात्राओं’ में नाच-गाने रखते हैं?’

‘मेरी ‘जात्राओं’ में भी नाच और गाने उसी तरह होते हैं, जैसे गांव वालों की ‘जात्रा’ में होते हैं. मेरे ‘जालियांवाला बाग’, ‘नील रक्त’, ‘दिल्ली चलो’, ‘भूली नाई प्रिया’ (जो कि रोमियों-जूलियट का रूपांतर है) और ‘सुन रे मालिक’ – इन सभी में गाने भी हैं और नाच भी.’

‘इनकी आवश्यकता क्या है?’

‘इनकी आवश्यकता बहुत है. बहुत-सी स्थितियां भाषा से परे होती हैं. उनकी जो तीव्रता है, उसे केवल भाषा पूरी तरह से व्यक्त नहीं कर पाती. संगीत और नृत्य उस तीव्रता और भावावेश को भाषा की तुलना में कहीं अधिक महसूस करा देते हैं. मैं आपको एक उदाहरण दूं. मैंने गांव में एक ‘जात्रा’ देखी थी, ‘कुरुक्षेत्र’. इस ‘जात्रा’ में एक महत्त्वपूर्ण प्रसंग आता है; इसके नायक कर्ण की मृत्यु का. सारी ‘जात्रा’ में कर्ण और अर्जुन की जो प्रतिद्वन्द्विता है और कर्ण का जो वीरत्व है, उसका चरम उत्कर्ष है अर्जुन के हाथों कर्ण की अन्यायपूर्ण हत्या में. इस प्रसंग में जो भावावेश है, जो व्यग्रता और मार्मिकता है, उसे दृश्य के रूप में मंच पर दिखलाकर संवादों के माध्यम से व्यक्त करना बहुत ही अधूरा-सा होता. उसकी जगह एक सामूहिक नृत्य-गान के माध्यम से इस दृश्य को सूचित किया गया था और उसकी भावना को व्यक्त किया गया था.’

‘इधर कुछ वर्षों से कुछ नाटककारों ने रंगमंच पर अपनी व्यक्तिगत प्रतिभा के बल पर कुछ नए-नए प्रयोग किए हैं. उदाहरण के लिए नाटकों को ‘कट्स’ के माध्यम से दिखलाना या मंच पर एक ही समय एक साथ अलग-अलग दृश्य दिखलाते रहना तथा इसी प्रकार की अन्य शैलियां, जैसे कि बादल सरकार के ‘एवं इंद्रजीत’ में है. इन आधुनिक शैलियों के प्रति आपके क्या विचार हैं?

उत्पल दत्त एक लंबी सांस भरकर सहसा उठ खड़े हुए. उन्होंने मेरी ओर देखा, खूब ध्यान से, तीखी नज़रों से देखा और उनका मुंह गुस्से से तमतमाता चला गया. मैं घबरा गया. गुस्से से उनका मुंह लाल हो गया था, उनके नथुने फड़क रहे थे और फड़कने के लिए तैयार होठों को उन्होंने खूब ज़ोरों से भींच लिया था. इस स्थिति के लिए मैं बिलकुल तैयार नहीं था. वे सहसा उठ खड़े हुए और उस बड़े कमरे में लंबे-लंबे कदम भरते हुए तेज़ी से चहलकदमी करने लगे. उनकी सांसें ज़ोर-ज़ोर से चल रही थीं. कुछ देर तक मैं स्तब्ध रहा.

अचानक मैं मुस्कुरा उठा. दरअसल मैं हंसना भी चाहता था, खूब हंसना चाहता था। लेकिन उनके इस रौद्र रूप की उपस्थिति में हंस सकना संभव नहीं था। मुझे भुवनसोम साहब की याद आ गई- जिन्हें कुछ अजीबोगरीब आदतें थीं। फिल्म देखते समय मैं काफी हंसा था, लेकिन उत्पल दत्त अपने वास्तविक जीवन में भी ऐसा ही करते हैं- यह पहली बार देखा और जाना।

कुछ देर चहलक़दमी करने के बाद वे सोफ़े पर आ गए और फड़कती हुई ज़ोर की आवाज में बोले- प्रतिक्रियावादी! ये सब प्रतिक्रियावादी हैं! बादल सरकार प्रतिक्रियावादी है। उसके प्रयोग बेसिर-पैर के हैं। उसकी शिल्प-शैलियों और उसके कथ्य में क्या संगति है? मुझे उसकी शैली और उसके कथ्य में कोई संगति नहीं दिखलाई पड़ती।”

‘क्या ऐसा नहीं को सकता कि उनकी शैली स्वयं ही एक कथ्य हो, उनके नाटकों का रूप (फार्म) स्वयं ही एक बात लिए हुए हो?’

‘मेरी समझ में नहीं आता. मैं नहीं समझ पाता कि उनकी शैली में कौन-सा कथ्य है. …और, वे मूर्ख जिन्हें अपने नए प्रयोग और नई शैलियां कहते हैं, वे कहीं से भी नई नहीं हैं. उनकी एक सौ साल पुरानी परंपरा है. ये नाटककार और बादल सरकार जिन नई शैलियों और नए प्रयोगों का दावा करते हैं वे सारी शैलियां और प्रयोग निर्माता-निर्देशक एरविन पिस्काटर के नाटकों में मिल जाएंगे. बादल सरकार जिन शैलियों को नई समझता है, उनमें से कई-एक पिस्काटर के ‘श्वेग’ नाटक में मिल जाएंगी. पिस्काटर महान प्रयोगकर्ता था. उसने यूरोप में एपिक स्टाइल थिएटर को जन्म दिया था. उसके नए प्रयोगों के सामने ये लोग बौने हैं. लेकिन पिस्काटर और बादल सरकार के प्रयोगों में बहुत बड़ा फर्क है. पिस्काटर के प्रयोग और उसके कथ्य में एक संगति है, उसका एक निश्चित अभिप्राय है, बादल सरकार के प्रयोग और कथ्य में कोई संगति नहीं है वे अभिप्राय शून्य हैं. बादल सरकार…प्रतिक्रियावादी हैं!’

‘अन्य नाटककारों के संबंध में आपके क्या विचार हैं?’

‘बहुत से नाटककार हैं जो बहुत सशक्त नाटक लिखते और खेलते हैं, साथ ही प्रगतिशील भी हैं. मैं सबसे पहले महाराष्ट्रीयन नाटककार विजय तेंदुलकर का नाम लूंगा. ‘शान्तता, कोर्ट चालू आहे’ तथा ‘गिधाड़े’ उनके महान नाटक हैं. तेंदुलकर बहुत शक्तिशाली नाटककार हैं, लेकिन मेरा उनसे एक मतभेद है. मैं वर्तमान सामाजिक व्यवस्था की आलोचना और विरोध करने के साथ-साथ इस समाज के विरुद्ध सशास्त्र क्रान्ति का आवाहन भी करता हूं. विजय तेंदुलकर सामाजिक व्यवस्था की आलोचना और विरोध तो करते हैं, लेकिन कोई आवाहन नहीं देते. यहां मेरा गहरा मतभेद है.

ऋषिकेश मुखर्जी डायरेक्टेड फिल्म 'गोलमाल' के एक दृश्य में अमोल पालेकर के साथ उत्पल दत्त.
ऋषिकेश मुखर्जी डायरेक्टेड फिल्म ‘गोलमाल’ के एक दृश्य में अमोल पालेकर के साथ उत्पल दत्त.

‘क्या समाज की आलोचना प्रस्तुत कर देना भी आपमें एक बात नहीं है?’

‘नहीं, यह अपने-आपमें कोई बात नहीं है। समाज की आलोचना आप क्यों करते हैं? किसलिए ? अगर क्रान्ति का आवाहन नहीं देते हैं, तो फिर समाज की आलोचना क्यों करते हैं?’

‘क्रान्ति का आवाहन क्या कलात्मक होगा?’

‘क्यों नहीं होगा? अगर समाज की आलोचना और विरोध कलात्मक हो सकता है तो क्रान्ति का आवाहन भी कलात्मक क्यों नहीं हो सकता?’

‘क्रान्ति का आवाहन न करने का एक कारण और भी हो सकता है. शासक वर्ग का भय.’

‘यदि भय है तो फिर आप यह सब क्यों करते हैं? यह सब छोड़कर आप भी बादल सरकार बन जाओ!’

उनके स्वर में अद्भुत दृढ़ता थी. कोई भी व्यक्ति उनकी इस दृढ़ता से प्रभावित हो सकता था.

‘हां, तो आप आधुनिक नाटककारों के सम्बन्ध में बता रहे थे,’ —मैंने बात ज़ारी रखने की कोशिश की.

‘विजय तेंदुलकर के अलावा,’ वे बोले- ‘महाराष्ट्र में अन्य भी कई अच्छे नाटककार हैं. वास्तव में आज के महाराष्ट्रीयन थिएटर से मैं बहुत प्रभावित हूं. मेरी दृष्टि में आज का महाराष्ट्रीयन थिएटर एक महान जनवादी थिएटर है. जो नए लोग रंगमंच के क्षेत्रा में आए हैं उनमें भी काफी उत्साह, मौलिकता और जिज्ञासा है. उदाहरण के लिए सत्यदेव दुबे, गिरीश करनाड तथा ओम शिवपुरी इत्यादि. ये सब लोग अत्यंत जिज्ञासु और उत्साही हैं. ये लोग हर चीज़ के प्रति प्रश्न उठाते हैं, हर चीज़ को एक आलोचनात्मक दृष्टि से देखते हैं. इनमें रूढ़िवादिता बिलकुल नहीं है. इनका दृष्टिकोण प्रगतिशील है. इनमें से कई लोगों से मेरा व्यक्तिगत परिचय भी है और दिल्ली-बंबई में उनसे मुलाक़ात भी होती है.’

वे फिर खड़े हो गए. सांसें उनकी फिर तेज़ हो गईं. होंठ उनके फिर भिंच गए और नथुने फिर फड़कने लगे. हालांकि उनके इस स्वभाव से मैं परिचित हो चुका था. लेकिन, फिर भी मैं असुविधा का अनुभव करने लगा. उन्हें मेरी असुविधा का कोई ख्याल नहीं था. यह उनकी मजबूरी थी. अभिनय उनके स्वभाव का अंग बन गया है और वे उसे शायद दिन-भर करते रहते हैं. चौड़े शरीर वाले उत्पल दत्त फिर अपने कमरे में लंबे डग भरते हुए इस कोने से उस कोने तक तेजी से चलने लगे. अचानक वे मुड़े और घर के भीतर जाते हुए बोलते गए- ‘हम चाय पीएंगे, चाय!’

लौटते समय वे शान्त थे. होंठों पर मुस्कुराहट थी और दो मोटे होंठों के बीच उनके बड़े-बड़े सफेद दांत चमक रहे थे. चाय की प्यालियां उन्होंने हमें थमा दीं. मेरे मित्र ने धूम्रपान करने की इच्छा व्यक्त की और वे बड़े शौक से भीतर से सिगारों का एक बिलकुल नया डिब्बा उठा लाए. ये सिगार, मैंने सोचा, ये भी शायद उन्होंने ‘भुवनसोम’ से ही शुरू किया हो या हो सकता है कि भुवनसोम में उन्हीं से लिया गया हो. इतने शानदार सिगारों का लोभ होने पर भी सुबह से कुछ भी न खाए होने के कारण मैं उनका सिगार नहीं पी सका. उम्मीद थी कि उत्पल दत्त कुछ बढ़िया जलपान कराएंगे, लेकिन लगा कि उन्हें अपने मेहमानों को कुछ खिलाने-पिलाने का ख्याल ही नहीं रहता.

चाय पीते हुए मैं सोच रहा था, मोशाय को भारत सरकार ने अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया था और इन्होंने पुरस्कार लेना अस्वीकार कर दिया था. एम. एल. पार्टी बनने से पहले चारु मजुमदार ग्रुप के मुखपत्र ‘देशव्रती’ में पुरस्कार लौटाते हुए उन्होंने भारत सरकार के नाम एक लंबी कविता लिखी थी ‘शहंशाह! तुम्हारा पुरस्कार तुम्हें वापस दिया. दिल्ली-सुलतान की यह आदत हो गई है कि जैसे हड्डी का एक टुकड़ा डालने पर कुत्ता वफादार बन जाता है, उसी प्रकार दिल्ली के शहंशाह जिसे पुरस्कार दे, वह बड़ी खुशी के साथ अपने-आपको उसके हाथ बेच दे. लेकिन आपकी गद्दी और इनाम से जिनका दिल भर जाता है, मैं उनमें नहीं हूं. मैंने तय किया है कि मैं आपकी इस आदत को एक धक्का पहुंचाऊं. मैं एक गरीब आदमी हूं. गरीबों का दुःख देखता हूं और उनके दुःख की कहानी लिखता हूं. आप मुझे इस खुशकिस्मती से वंचित मत कीजिए!… इत्यादि-इत्यादि.’ बड़ी लंबी और आग उगलती हुई कविता थी वह. इच्छा हुई कि मैं उनकी इसी रग पर उंगली रख कर देखूं, क्या उसकी धड़कनें अब भी वैसी ही हैं?

‘कामरेड, इधर आपको प्रतिष्ठित वर्ग ने भी सम्मानित करना शुरू किया है. ‘दिनमान’ जैसे कम्युनिस्ट विरोधी पत्र ने आपके बारे में एक पृष्ठ सचित्र छापा था. कुछ विदेशी बुर्जुआ पत्रिकाओं में भी आपकी प्रशंसा प्रकाशित हुई थी. स्वयं भारत सरकार ने आपको अकादमी पुरस्कार देकर सम्मानित किया था. एक कलाकार अपनी कला के माध्यम से जिस महान उद्देश्य की सेवा करता है, उसी के लिए सम्मानित किया जाता है. आपका क्या ख्याल है, भारत सरकार ने आपको पुरस्कार देकर सम्मानित क्यों किया? क्या भारत सरकार आपके नाटकों के उद्देश्य और उनमें व्यक्त क्रान्ति के विचारों से सहमत थी?’

‘जस्ट बार्गेनिंग!’ कुछ कड़वाहट के साथ वे बोले, ‘उन्होंने मुझसे सौदेबाज़ी करने के लिए मुझे पुरस्कृत किया था. भारत सरकार ने मुझे दो बार अकादमी पुरस्कार दिया—एक बार सन् 64 में जिसे मैंने ले लिया था और दूसरी बार सन् 66 में, जिसे मैंने लौटा दिया था.’

‘ऐसा क्यों?’

‘इसलिए कि सन् 64 में हम लोग खुद बहुत स्पष्ट नहीं थे. उस समय तक हम संशोधनवाद से पूरी तरह से मुक्त नहीं हो सके थे. हम अभी भी अपने अंतर्विरोधों से लड़ रहे थे—’दिनमान’ का संपादक जिसने हमारे लिए एक पृष्ठ छापा, हमारी इस उलझन को नहीं समझ सकता है. लेकिन सन् 66 में हम संशोधनवाद से मुक्ति पा चुके थे, अब हम उसके विरुद्ध खड़े थे. शासक वर्ग और प्रतिष्ठान हमारे प्रति कैसा रवैया अपनाता है, इसका सबसे अच्छा उदाहरण ‘न्यूयार्क टाइम्स है ‘न्यूयार्क टाइम्स’ ने मेरे बारे में तीन बार लिखा. पहली बार सन् 62 में उसने मेरे बारे में लिखा, ‘ग्रेटेस्ट राइज़िंग प्लेराईट आफ दि ईस्ट.’

‘सन् 66 में लिखा—चाइनीज़ एजेंट!’

‘और सन् 70 में लिखा ‘टायर्ड ओल्ड हार्स हू इज़ नो लौंगर ए फोर्स.’

‘लेकिन’,—उन्होंने कहना जारी रखा—’बड़ा सवाल पुरस्कार लेने या न लेने का नहीं है. बड़ा सवाल यह है कि पुरस्कार लेने के बाद क्या कलाकार की मनोवृत्ति में, उसके लेखन में कुछ फर्क पड़ जाता है? क्या पुरस्कार ने सचमुच उसके लेखन को प्रभावित और निर्धारित करना शुरू कर दिया है?’

‘सन् 64 में मैंने पुरस्कार ले लिया था, लेकिन क्या उसने मेरे नाटकों में क्रान्ति के स्वर को मंद कर दिया? नहीं, बल्कि इसके विपरीत मैं अपने नाटकों में और भी ज़ोरों से क्रान्ति का आवाहन करने लगा. सन् 66 में मैंने पुरस्कार लौटा दिया और तब भी मैं अपने नाटकों में क्रान्ति के लिए ही आवाहन करता रहा…और, जीवन के अंतिम क्षण तक करता रहूंगा, करता ही रहूंगा.’

‘मैंने ‘भुवनसोम’ में काम करने के लिए ‘भारत पुरस्कार’ स्वीकार किया, क्योंकि वह सरकार ने नहीं, बल्कि फिल्म कला से संबंधित लोगों ने दिया था.’

‘मि. उत्पल दत्त, अभी आप ने बताया कि ‘न्यूयार्क टाइम्स’ में आपके प्रति किस प्रकार की बातें समय-समय पर निकली हैं. कृपया बतलाइए कि क्या आपके नाटक विदेशी भाषा में भी अनूदित हुए हैं?’

‘जी हां,’ उन्होंने कहा, ‘मेरे कुछ नाटकों का अनुवाद विदेशी भाषाओं में भी हुआ है. ‘कल्लोल’ का अनुवाद रूसी में, ‘अंगारे’ का अनुवाद फ्रेंच और अंग्रेजी में तथा ‘अजेय वियतनाम’ का अनुवाद जर्मनी भाषा में हुआ है. पूर्वी जर्मनी में यह नाटक ‘उलबेसिगबारेज़ वियतनाम’ के नाम से प्रदर्शित भी हुआ था, जिसकी एक खास बात यह थी कि,’ उन्होंने मुस्कुराते हुए बतलाया, ‘इस नाटक के युद्ध-सम्बन्धी दृश्य को प्रस्तुत करने में वियतनाम से दो गोरिल्ला सैनिक सलाह देने के लिए आए थे.’

फिर उन्होंने भीतर कमरे से लाकर मुझे ‘उलबेसिगबारेज़ वियतनाम’ का एक लांग प्लेट रेकार्ड भी दिखलाया जो जर्मनी भाषा में ही था.

मैं जानता था कि बंगाल में और खासकर कलकत्ते में वे कितने ख्याति प्राप्त व्यक्ति हैं. बंगाल के कुछ ग्रामीण अंचलों में तथा औद्योगिक मज़दूर वर्गों एवं वामपंथी बुद्धिजीवियों के बीच उनकी लोकप्रियता गहरी और व्यापक है. कलकत्ते में (और शायद पूरे भारत में भी) आज तक जो नाटक सबसे अधिक बार खेला गया है, वह शिशिर भादुड़ी के श्रीरंगम थिएटर का ‘सीता’ नाटक है, जो चौदह सौ बार लगातार खेला गया था. उसके बाद उत्पल दत्त का ‘कल्लोल’ ग्यारह सौ बार तथा ‘अंगारे’ आठ सौ बार लगातार खेला गया. इन नाटकों ने वहां वामपंथी विचारधारा वालों के बीच एक नई लहर पैदा कर दी. मैंने पूछा, ‘बंगाल प्रान्त कुछ ऐतिहासिक कारणों से राजनीतिक और लोकतांत्रिक चेतना की दृष्टि से शायद भारत के अन्य प्रान्तों से कुछ आगे है. बिहार और उत्तरप्रदेश अब भी जातिवादी राजनीति के घेरे से बाहर नहीं निकल पाए हैं. आप अपने नाटक केवल बंगाल में ही क्यों खेलते हैं? उत्तर प्रदेश या बिहार में भी क्यों नहीं खेलते? क्या आपको हिन्दी भाषा की कठिनाई है’

‘नहीं, मुझे हिन्दी भाषा की कठिनाई नहीं है’ वे हंसते हुए बोले, ‘लेकिन मैं तो यहां बांग्ला में ही अपना काम पूरी तरह से नहीं निभा पाता हूं तो उत्तर प्रदेश कैसे जाऊं?’ कुछ देर सोचकर उन्होंने कहा, ‘वहां जो लोग ऐसा चाहते हैं, उन्हें खुद मेरे नाटक खेलने चाहिए।.’

‘आपका मतलब है कि ऐसे लोग जो कुछ अभिनय जानते हों, कुछ मंचकला जानते हों और आपके नाटकों में दिलचस्पी रखते हों, स्वयं आपके नाटक खेल लें?’

‘जी हां,’ वे बोले, ‘एक बात और है, और वह बहुत ज़रूरी है. वह है, राजनीति. जो लोग मेरे नाटकों को खेलना चाहते हों, वे अभिनय बहुत अच्छा जानें या न जानें, मंच सजाना उनको आता हो या न आता हो, किंतु उस राजनीति में उनका विश्वास होना ज़रूरी है. खाली विश्वास ही नहीं,’ वे मुस्कुराते हुए बोले- ‘दृढ़ विश्वास!’

—’आपने नाटकों के अलावा फिल्मों में भी काम किया है. क्या फिल्मों में काम करते वक्त भी आपको वैसा ही आनन्द आता है जैसा कि नाटकों में काम करते वक्त?’

‘नहीं, बिल्कुल नहीं. फ़िल्मों में काम करते हुए मुझे बिलकुल आनन्द नहीं आता. उनकी कहानियों में कोई दम नहीं होता. फ़िल्मों में मैं केवल पैसों के लिए काम करता हूं ताकि मैं अपना थिएटर चला सकूं.’

‘इन दिनों आप क्या कर रहे हैं?’

‘इन दिनों मैं अपने नाटक ‘जय बांग्ला’ का रिहर्सल पूरा कर रहा हूं. यह जल्दी ही प्रदर्शित किया जाएगा. इसके अलावा इस वर्ष ‘पार्टी कम्यून’ की शतवार्षिकी है. इसलिए मैंने ब्रेख्ट के एक नाटक ‘डी टागे डेयर कम्यूने’ (कम्यून के दिन) का अनुवाद बांग्ला में ‘पार्टी कम्यून’ के नाम से किया है. मेरा ग्रुप इस नाटक को खेलकर कम्यून के शहीदों के प्रति अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करेगा. इसके अलावा मैं कई फ़िल्मों में भी काम कर रहा हूं.’

दोपहर का एक बज रहा था. समय का यह एहसास मुझे था, इसलिए नहीं कि उनकी बातों से मैं ऊब चला था. ऐसा तो बिलकुल नहीं था, बल्कि मैं सोच रहा था कि मैं उनका अधिक समय न ले लूं. एक सवाल जो मैं शुरू से उनसे पूछना चाह रहा था, उसे अब और नहीं टाल सका और अंत में मैंने पूछ ही लिया ‘एक नए लेखक को क्या करना चाहिए?’

‘यह मैं कैसे कह सकता हूं?’ उन्होंने हंसते हुए और बडे़ ज़ोरों से सिर हिलाते हुए कहा.

‘फिर भी, आप व्यक्तिगत रूप से इस बारे में क्या सोचते हैं?’

वे कुछ देर तक सोचने के बाद बोले—’देखिए, पढ़ने को तो बहुत-से लोग बहुत-सी चीजें पढ़ते हैं. अपनी-अपनी रुचि के अनुसार लोग अलग-अलग लेखकों की किताबें पढ़ते हैं, उनसे प्रेरणा ग्रहण करते हैं, उनसे लिखने की शैलियां सीखते हैं. मैं नए लेखकों को पढ़ने के सम्बन्ध में कुछ नहीं कहूंगा, वे अपनी रुचि के अनुसार जितना पढ़ना चाहें, पढ़ें. लेकिन जो चीज़ किसी व्यक्ति को एक अच्छा लेखक बनाती है, वह किताबें नहीं हैं. वह मनुष्य की ज़िन्दगी का ज्ञान और अनुभव है, जो किसी को एक अच्छा लेखक बनाता है. हमें समाज की, लोगों के जीवन की गहरी और विस्तृत जानकारी हासिल करनी चाहिए. और, सबसे बड़ी बात यह है कि मेहनतकश जनता के साथ काम करना चाहिए, उन्हीं की जैसी ज़िंदगी बितानी चाहिए. उन्हीं के बीच रहकर एक लेखक मनुष्यों के जीवन का भीतरी अनुभव प्राप्त करता है, मनुष्य-चरित्र के विधि रूपों और मनोग्रंथियों का सच्चा ज्ञान प्राप्त करता है.’

'सामना' का कवर और साथ में उसके लेखक वीर भारत तलवार.
‘सामना’ का कवर और साथ में उसके लेखक वीर भारत तलवार.

‘इस ज्ञान और अनुभव के बिना आज तक कोई भी लेखक बड़ा नहीं बना, न आगे ही बन सकता है. मेरे आदर्श लेखक जैक लंडन, वाल्ट विट्मैन तथा हेमिंग्वे हैं. उन्होंने रेलवे, खदानों से लेकर सेना और स्टील-प्लांटों तक में काम किया था. अपनी काफी उम्र तक मेहनतकश वर्गों के साथ मिलकर काम कर चुकने के बाद उन्होंने अपनी लेखनी उठाई थी. जैकलंडन की एक कहानी है. रेलवे स्टेशन पर रेल के डिब्बों को आपस में जोड़ने वाला एक आदमी है. वह रेल के डिब्बों को एक-दूसरे के साथ जोड़ने का काम करता है.

एक दिन की बात है. वह रेल के एक डिब्बे को दूसरे के साथ जोड़ रहा था. इंजन डिब्बों को लेकर आता है और पहले से खड़े डिब्बों को आकर आहिस्ते से धक्का मारता है. आदमी दोनों डिब्बों के बीच खड़ा रहता है और उनकी चेन उठाकर उन्हें जोड़ने की कोशिश करता है, लेकिन पहली बार में उन्हें जोड़ नहीं पाता. इंजन पीछे सरक गए डिब्बे को फिर धक्का मारता है. आदमी इस बार चेन उठाकर जोड़ने लगता है, लेकिन फिर नहीं जोड़ पाता. इंजन तीसरी बार अर्थात् आखिरी बार उन्हें फिर धक्का मारता है. आदमी इस बार उन्हें जोड़ देता है, लेकिन वह जल्दी से बाहर नहीं निकल पाता और वह डिब्बों के बीच दब जाता है. आगे और पीछे उसके पेट को तवे के आकार की प्लेटें दबा देती हैं और वह उनमें फंस जाता है. थोड़ी ही देर बाद उसके दोस्त वहां जमा हो जाते हैं और उसको इस हालत में देखकर उनकी आंखें फटी-सी रह जाती हैं. दोस्त चाहते हैं कि चेन खोलकर प्लेटों को एक-दूसरे से अलग कर दिया जाए. लेकिन ऐसा करने के बाद वह आदमी किस रूप में उन्हें मिलेगा, उसका शरीर दो हिस्सों में बंट चुका होगा या वह दुहरा होकर नीचे लटक जाएगा, इसकी कल्पना-मात्र से ही वे डर जाते हैं और प्लेटों को नहीं हटाते हैं. यह आदमी मरने से पहले अपनी बीवी से मिलना चाहता है और एक दोस्त उसकी बीवी को खबर करने के लिए जाता है. इस बीच वह दोस्तों से एक सिगरेट लेकर पीता है. उसके दोस्त देखते हैं कि सिगरेट का धुआं उसकी कमर के पास उसके पेट और अंतड़ियों से बाहर निकल रहा है.’

कहते कहते वे ठहर गए. हम स्तब्ध थे. कुछ देर तक सन्नाटा रहा. वे फिर बोले—’यह कहानी आदमी कल्पना से नहीं लिख सकता. कहानी के लेखक ने निश्चित रूप से यह अपनी आंखों से देखा होगा.’

वे फिर चुप हो गए.

उनकी इस अंतिम टिप्पणी का अर्थ हम समझ रहे थे—ज़िन्दगी को अपनी आंखों से देखना होगा.

वक्त काफी हो गया था. हम जाने के लिए उठे तो वे हमें दरवाजे तक छोड़ने के लिए आए.

‘धन्यवाद, मोशाय! इस मुलाकात के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद!’


आप ये पूरी बातचीत पढ़ सकते हैं:

किताब का नाम: सामना- रामविलास शर्मा की विवेचन-पद्धति और मार्क्सवाद तथा निबन्ध 
लेखक: वीर भारत तलवार 
प्रकाशक: वाणी प्रकाशन
कीमत: 695 रुपए


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