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देवेन वर्मा, 'अंगूर' का बहादुर जिसकी मासूमियत से इश्क हो जाता था

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90 के दशक के किसी एक साल के किसी एक शुक्रवार की रात. एंटरटेनमेंट के एकमात्र ज़रिए दूरदर्शन पर पिच्चर आ रही थी. अपनी उम्र यही कोई 10-12 साल रही होगी. जुम्मे की रात उस दौर में वाकई काबिलेज़िक्र रात हुआ करती थी. जैसी भी अच्छी-बुरी फिल्म डीडी-1 दिखाता था, उसे पाबंदी से देखने की प्रथा थी. ऐसी कसरत से तो जुमे की नमाज़ भी न पढ़ी जाती थी.

हां, तो मैं बता रहा था कि ऐसी ही एक जुम्मे की रात को पिच्चर आ रही थी टीवी पर. शशि कपूर की ‘चोरी मेरा काम’. देख डाली. मज़ेदार थी. आगे चल के भूल भी गया फिल्म को. उसकी कहानी को, बाकी के किरदारों को. बस दो लोग याद रहे. एक तो हीरो शशि कपूर, जो बचपन से पसंद थे और एक पारसी किरदार, जिसे पूरी फिल्म में शशि कपूर ‘न की हुई हत्या’ का डर दिखा-दिखा कर अपना उल्लू सीधा करता रहता है. वो पूरा ट्रैक ही याद रह गया हमेशा के लिए. फर्जी मरी हुई हीरोइन को खंडहर में दफनाते शशि कपूर और उस एक्टर का चेहरा, वो मुकम्मल सीन यादों में कहीं अटक के रह गया. ये बहुत बाद में जाकर पता चला कि उस एक्टर का नाम देवेन वर्मा है.

देवेन वर्मा को तीन बार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला.
देवेन वर्मा को तीन बार फिल्म फेयर अवॉर्ड मिला.

‘चोरी मेरा काम’ में उनका किया ये रोल ख़ास था, ये आगे चल के साबित भी हुआ. इस रोल के लिए उन्हें फिल्मफेयर अवॉर्ड मिला.

कैसे आए थे फिल्म लाइन में?

देवेन वर्मा का जन्म 23 अक्टूबर 1937 को गुजरात के कच्छ में हुआ था. उनके पिता का चांदी का बिज़नेस था. इसके साथ उन्होंने फिल्म डिस्ट्रीब्यूशन का काम हाथ में ले लिया. वर्मा परिवार का फिल्मों से ये पहला एनकाउंटर था. पुणे से कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही देवेन स्टेज शोज़ में हिस्सा लेने लगे थे. वो मिमिक्री बहुत बढ़िया किया करते थे. एक बार ऐसे ही वो एक परफॉरमेंस दे रहे थे कि दर्शकों में बैठे बी. आर. चोपड़ा को भा गए. उन्होंने देवेन को अपनी फिल्म ‘धर्मपुत्र’ के लिए साइन कर लिया. एक महीना काम करने के 600 रुपए मिले.

'धर्मपुत्र' फिल्म के एक सीन में देवेन वर्मा.
‘धर्मपुत्र’ फिल्म के एक सीन में देवेन वर्मा.

‘धर्मपुत्र’ को बाद में भले ही क्लासिक का दर्जा मिला हो, उस वक़्त वो बुरी तरह फ्लॉप हो गई थी. लेकिन देवेन का सिलसिला चल निकला था.

एक वक़्त में 16 फिल्मों का काम करने का रिकॉर्ड

1975 में ‘चोरी मेरा काम’ देवेन के करियर का टर्निंग पॉइंट साबित हुई. फिल्मफेयर अवॉर्ड ने उनके लिए नए रास्ते खोल दिए. उनके दरवाजों पर बड़े-बड़े प्रोड्यूसरों की गाड़ियां आ के रुकने लगी. ऑफर्स की झड़ी लग गई.

देवेन का नेचर ऐसा था कि वो किसी को कभी ‘ना’ नहीं कह पाए. इस चक्कर में ढेर सारी फ़िल्में साइन कर लीं. एक वक़्त तो ऐसा आया कि देवेन एक ही वक़्त में 16 फिल्मों के लिए शूटिंग कर रहे थे. रेडिफ.कॉम के लिए पैटसी एन ने देवेन वर्मा का 2013 में एक इंटरव्यू लिया था. उस इंटरव्यू में देवेन बताते हैं,

“एक वक़्त तो ऐसा आया कि मैंने रातभर इस्माइल श्रॉफ की ‘आहिस्ता आहिस्ता’ की शूटिंग मुंबई में की. फिर अल सुबह फ्लाइट पकड़कर हैदराबाद गया ,जहां जीतेंद्र की ‘प्यासा सावन’ की शूटिंग थी. चार बजे वहां से निपटकर यश चोपड़ा की ‘सिलसिला’ के लिए दिल्ली पहुंचा और वहां से फिर मुंबई वापस इस्माइल श्रॉफ की फिल्म के लिए.”

‘अंगूर’ सिर्फ अशोक की नहीं, बहादुर की भी फिल्म है

गुलज़ार की बनाई ‘अंगूर’ भारतीय सिनेमा की धरोहरों में शामिल है. टाइमलेस क्लासिक है. और देवेन वर्मा का शायद सबसे बेहतरीन काम भी. संजीव कुमार के नौकर बहादुर के जुड़वा किरदार में उन्होंने जो रंग बिखेरे हैं, उसे हिंदी सिनेमा के शैदाइयों में बहुत सम्मान हासिल है. अपने मालिक के हर सियाह-सफेद हरकत में शामिल बहादुर, मासूमियत का ज़िंदा मुजस्समा है. घनघोर आज्ञाकारी नौकर. मालिक ने जो कहा है, वो करना ही है. भले ही कुछ हो जाए. दो मालिकों के परस्परविरोधी निर्देशों का पालन करते दोनों ही बहादुरों का जबर कन्फ्यूजन देवेन ने बेहद आला तरीके से परदे पर पेश किया. उनकी मासूमियत से इश्क हो जाता था.

संजीव कुमार के साथ 'अंगूर' में.
संजीव कुमार के साथ ‘अंगूर’ में.

‘अंगूर’ से जुड़े कुछ और किस्से

‘अंगूर’ भले ही बंपर हिट रही हो लेकिन इससे पहले सेम स्क्रिप्ट बुरी तरह फेल हो चुकी थी. पैट्सी को देवेन ने बताया कि 1968 में डायरेक्टर देबू सेन इस फिल्म को बना चुके थे. ‘दो दूनी चार’ के नाम से. स्क्रिप्ट गुलज़ार ने ही लिखी थी. वो फिल्म बुरी तरफ फ्लॉप हुई थी. लेकिन गुलज़ार को चैन न आया. उन्होंने इसे एक चैलेंज की तरफ लिया. इसके फ्लॉप होने का दर्द बरसो तक दिल से लगाए रखा और वक़्त आने पर ‘अंगूर’ बना दी. पहली वाली स्क्रिप्ट के फ्लॉप होने के 14 साल बाद.

ओरिजिनल 'अंगूर' ये वाली फिल्म थी.
ओरिजिनल ‘अंगूर’ ये वाली फिल्म थी.

‘अंगूर’ की शूटिंग ख़त्म होने के बाद का एक वाकया बड़ा दिलचस्प है. ‘अंगूर’ में बहादुर के दोनों किरदारों के कपड़े भी सेम हैं. पूरी फिल्म शूट हो गई और डबिंग भी हो गई. गलती से देवेन ने दोनों किरदारों द्वारा बोले गए ‘सा’ शब्द का दो अलग तरह से उच्चारण किया. छोटी सी गलती थी, किसी का ध्यान नहीं गया उस तरफ. डबिंग ख़त्म होने के बाद देवेन अमेरिका चले गए. फिल्म रिलीज़ होने ही वाली थी कि ये गलती गुलज़ार की पकड़ में आ गई. उन्होंने तुरंत देवेन को एक ट्रंक कॉल की और फ़ौरन न्यूयॉर्क से वापस बुलाया. फिर पूरी रात बैठकर दोबारा डबिंग की.

हालांकि इसके अलावा भी फिल्म में इक्का-दुक्का गलतियां रह ही गईं. जैसे एक बहादुर ने अपनी शर्ट की आस्तीनें मोड़ी हैं, तो दूसरे वाले ने नहीं. लेकिन इन गलतियों पर खामोशी अख्तियार कर ली गई क्योंकि तब तक फिल्म रिलीज़ हो चुकी थी.

'गोलमाल' में अमोल पालेकर के साथ.
‘गोलमाल’ में अमोल पालेकर के साथ.

अवॉर्ड मिले भी और खो भी दिए

देवेन वर्मा को तीन बार फिल्म फेयर अवॉर्ड से नवाज़ा गया. ये फ़िल्में थी ‘चोरी मेरा काम’, ‘चोर के घर चोर’ और ‘अंगूर’. हालांकि ये ट्रॉफियां उनके पास ज़्यादा समय तक टिक न सकीं. देवेन की पत्नी के फेफड़ों में कुछ विकार पैदा हुआ और डॉक्टरों ने उनको मुंबई की आबोहवा से दूर रहने की सलाह दी. वर्मा दंपत्ति चेन्नई रहने चले गए. दो साल बार जब वो मुंबई लौट रहे थे, तो उस वक़्त उनका वो बैग खो गया जिसमें ये ट्रॉफियां रखी हुई थी.

जब साली की मौत पर शोक संदेश रिसीव करने पड़े

देवेन वर्मा की शादी मशहूर एक्टर अशोक कुमार की बेटी रूपा गांगुली से हुई थी. ये एक प्रेम-विवाह था, जिसके लिए अशोक कुमार को मनाने में देवेन की दो साल की मेहनत लगी थी. रूपा ने कभी फिल्मों में काम नहीं किया. अशोक कुमार की एक और बेटी थी. प्रीति गांगुली. उन्होंने काफी फिल्मों में काम किया है. 2 दिसंबर 2012 को उनकी दिल का दौरा पड़ने से मौत हो गई.

प्रीति गांगुली.
प्रीति गांगुली.

मीडिया में आया कि अशोक कुमार की बेटी का इंतेकाल हो गया. लोगों ने देवेन वर्मा को शोक संदेश भेज दिए. देवेन को ख़ास तौर से ये क्लियर करना पड़ा कि उन्होंने छोटी बेटी से शादी की थी, जिन्होंने कभी फिल्मों में काम नहीं किया.

बहुत लंबा चला करियर

देवेन ने 47 साल तक फिल्म इंडस्ट्री में काम किया. अपने ससुर अशोक कुमार की मौत के बाद वो रिटायर हुए. ‘मेरे यार की शादी है’ फिल्म के लिए उन्होंने आख़िरी बार कैमरे का सामना किया था. रिटायरमेंट की वजह पूछने पर बताते थे कि नई पीढ़ी की साथ कम्फर्ट लेवल मैच नहीं कर पा रहे थे.

देवेन ने न सिर्फ फिल्मों में काम किया, बल्कि फ़िल्में बनाई भी. उन्होंने कुल 8 फ़िल्में बनाई. उनमें से कुछ खुद डायरेक्ट की. बड़े-बड़े कलाकारों के साथ काम किया. उनकी बनाई ‘बड़ा कबूतर’ (1973) में अशोक कुमार थे. 1978 में अमिताभ बच्चन के साथ उन्होंने ‘बेशरम’ बनाई. 1989 में मिथुन के साथ ‘दाना-पानी’.

अमिताभ को लेकर 'बेशरम' बनाई.
अमिताभ को लेकर ‘बेशरम’ बनाई.

देवेन वर्मा ने 2 दिसंबर 2014 को इस दुनिया को अलविदा कह दिया. ठीक दो साल पहले वो अपनी साली की मृत्यु से उपजे कन्फ्यूजन को क्लियर कर रहे थे. दो साल बाद उसी तारीख को उन्होंने भी दुनिया छोड़ दी. वजह भी वही थी. दिल का दौरा. देवेन को दूसरी दुनिया में अगर किसी ने ये इत्तेफ़ाक बताया होगा तो यकीनन उन्होंने इस पर कोई जोक मारते हुए ठहाका लगाया होगा. ज़िंदादिली देवेन वर्मा का दूसरा नाम जो था.


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