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कोर्ट की अवमानना के वो मामले जब पत्रकार, मुख्यमंत्री, केंद्रीय मंत्री समेत कई लोग अदालत पहुंच गए

सुप्रीम कोर्ट ने वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण को अदालत की अवमानना का दोषी क़रार दिया है. अदालत आगामी 20 अगस्त को इस मामले में अपना फ़ैसला सुनाने वाली है. प्रशांत भूषण ने क्या किया था? दो ट्वीट किए थे. एक ट्वीट था मुख्य न्यायाधीश एसए बोबड़े की तस्वीर को लेकर, और दूसरा ट्वीट था भारत के लोकतंत्र के कथित अवसान में पूर्व न्यायाधीशों की भूमिका पर. यानी जजों की आलोचना. और अवमानना का मुक़दमा. आइए बताते हैं, ऐसे कुछ और मामलों के बारे में, जिनमें कोर्ट के कुछ फ़ैसलों पर या जजों पर भिन्न-भिन्न मौक़ों पर टिप्पणियां की गयीं और टिप्पणीकार पर अवमानना का मुक़दमा दर्ज हो गया.

जब कोर्ट ने मुख्यमंत्री से कहा, ‘आपको मार्क्स के बारे में कुछ नहीं पता’

साल 1967. केरल के मुख्यमंत्री और प्रमुख मार्क्सवादी नेता ईएमएस नम्बूदरिपाद. तत्कालीन त्रिवेंद्रम में प्रेस कॉन्फ़्रेन्स को सम्बोधित करते हुए नम्बूदरिपाद ने न्यायपालिका की संरचना पर बयान देना शुरू किया. विचारकों कार्ल मार्क्स और फ़्रेड्रिक एंगल्ज़ के हवाले से नम्बूदरिपाद ने न्यायपालिका को दमन का एक साधन बता दिया. जजों के चुनाव पर बात करते हुए मौजूदा ज्यूडिशियरी को मज़दूरों और ग़रीबों के खिलाफ़ करार दे दिया. 

केरल के मुख्यमंत्री और प्रमुख मार्क्सवादी नेता ईएमएस नम्बूदरिपाद
केरल के मुख्यमंत्री और प्रमुख मार्क्सवादी नेता ईएमएस नम्बूदरिपाद

केरल हाई कोर्ट के वक़ील टी नाम्बियार ने नम्बूदरिपाद के खिलाफ़ याचिका दायर की. याचिका मंज़ूर हो गयी. हाई कोर्ट ने नम्बूदरिपाद को अवमानना का दोषी पाया. 1 हज़ार रुपए जुर्माना या एक महीने के कारावास की सज़ा सुनाई. 

नम्बूदरिपाद इसके खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट गए. मामला CJI मोहम्मद हिदायतुल्ला की अध्यक्षता वाली बेंच के पास गया, जिसमें जस्टिस जीके मित्तर और एएन रे शामिल थे. सुनवाई के बाद चीफ जस्टिस हिदायतुल्ला ने भी नम्बूदरिपाद को अवमानना का दोषी पाया. लेकिन जुर्माने की राशि घटाकर 50 रुपए कर दी. उन्होंने अपने फ़ैसले में कहा कि नम्बूदरिपाद को मार्क्सवाद का कोई ज्ञान नहीं है. मार्क्स ने न्यायपालिका के खिलाफ़ कभी कोई बात नहीं कही. 

जब केंद्रीय क़ानून मंत्री पर अवमानना का केस हो गया

साल 1988. केंद्र में राजीव गांधी की कांग्रेस सरकार थी. क़ानून और विदेश मंत्री थे वीपी शिवशंकर. केंद्र में आने से पहले शिवशंकर हाई कोर्ट के जज रह चुके थे. बार काउन्सिल की एक मीटिंग में भाषण देते हुए उन्होंने ज्यूडिशियरी को बेहद अभिजात्य और ज़मींदारों का बचाव करने वाली संस्था बता दिया. कई और तीखी टिप्पणियां कीं. 

Vp Shiva Shankar
वीपी शिव शंकर

 इस पर सुप्रीम कोर्ट के वक़ील पीएन डौडा ने उनके खिलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर दी. कहा कि वीपी शिवशंकर के बयान से अदालत की गरिमा को ठेस पहुंची है. सुनवाई हुई. कोर्ट ने शिवशंकर को अवमानना का दोषी तो नहीं ठहराया, लेकिन कहा कि कुछ कड़वी बातें नहीं भी बोली जा सकती थीं. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वीपी शिवशंकर कोर्ट की कार्यप्रणाली और कोर्ट के स्वभाव का अध्ययन कर रहे थे. कोर्ट ने जजमेंट लिखते समय ये भी कहा कि अगर किसी मुद्दे पर न्यायपालिका और जजों की आलोचना हो रही है, तो हमें ख़ुद अपने भीतर भी झांककर देखने की ज़रूरत है. 

अब भी अवमानना के कई मुक़दमों में वीपी शिवशंकर केस के जजमेंट को बारहा कोट किया जाता है.

जजों का रिपोर्ट कार्ड छापा, तो माफ़ी भी छापनी पड़ी

साल 2001. ‘वाह इंडिया’ नाम की एक पत्रिका हुआ करती थी. मधु त्रेहान इसकी सम्पादक थीं. अपने अप्रैल के दूसरे अंक में वाह इंडिया ने दिल्ली हाई कोर्ट के मौजूदा 32 जजों का रिपोर्ट कार्ड प्रकाशित किया. इस रिपोर्ट कार्ड को दिल्ली हाईकोर्ट के 50 वरिष्ठ वकीलों से किए गए प्रश्नों के आधार पर तैयार किया गया था. इसमें जजों के व्यक्तिगत बर्ताव, क़ानून की समझ, उनके द्वारा दिए गए फ़ैसलों की क्वालिटी, नियमबद्धता और दलीलों को लेकर सहजता जैसे सवाल थे. सभी कैटेगरी में जजों को नम्बर दिए गए थे.

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मधु त्रेहान (साभार : मीडियारम्बल)

 बार काउन्सिल ऑफ़ इंडिया ने सम्पादक मधु त्रेहान, प्रकाशक राहुल मिश्रा, रिपोर्टर निकुंज गर्ग, सब-एडिटर सचिन पाराशर और क्रिएटिव डायरेक्टर मनीषा सेठी के खिलाफ़ अवमानना की याचिका दायर कर दी. 

दिल्ली हाई कोर्ट ने आदेश दिया कि DCP (क्राइम) इस पत्रिका की सारी अनबिकी प्रतियों को ज़ब्त कर लें. यह भी कहा कि कोई भी इस लेख को दोबारा किसी भी रूप में प्रकाशित नहीं कर सकता. ना ही इस केस से जुड़ी किसी जानकारी को कभी प्रकाशित किया जा सकता है. 

कोर्ट के इस आदेश के बाद कई नामी पत्रकारों ने हाई कोर्ट में याचिका दायर की. कहा कि वो भले ही ‘वाह इंडिया’ द्वारा छापे गए लेख से कोई इत्तेफ़ाक न रखते हों, लेकिन अदालत की कार्रवाई और आदेश को रिपोर्ट करने या उस पर कमेंट करने का अधिकार उन्हें होना चाहिए. ख़बरें बताती हैं कि इसके बाद कोर्ट ने मीडिया रिपोर्टिंग पर रोक का ऑर्डर वापस ले लिया. 

मामले में फ़ैसला सुनाते हुए कोर्ट ने पहले ‘वाह इंडिया’ के लोगों को बिना शर्त माफ़ीनामा लिखने का आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि ‘वाह इंडिया’ पांच प्रमुख राष्ट्रीय अख़बारों में अपनी माफ़ी प्रकाशित करवाए, जिसके बाद इस केस को बंद कर दिया जाएगा. 

कोर्ट ने लेखिका से कहा, आपको कोर्ट या क़ानून की कोई जानकारी नहीं है

साल 2002. लेखिका अरुंधति रॉय. उन्होंने पत्रिका आउटलुक में एक लेख लिखा. इसमें अरुंधति रॉय ने सुप्रीम कोर्ट के उस फ़ैसले की आलोचना की थी, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने नर्मदा नदी पर बने सरदार सरोवर बांध में पानी की लिमिट बढ़ाने की मंज़ूरी दी थी. इस मामले पर सुप्रीम कोर्ट में अवमानना की शिकायत की गयी. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कोर्ट के कंधे इतने चौड़े हैं कि ऐसे कमेंट्स को जाने दिया जाए. 

लेखिका अरुंधति रॉय

लेकिन इसके बाद अरुंधति रॉय और दूसरे सामाजिक कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के बाहर धरना दिया. LiveLaw में प्रकाशित ख़बर के मुताबिक़, इस धरने में लोगों ने जजों के खिलाफ़ नारे लगाए. अवमानना का मुक़दमा दर्ज हो गया. 

केस के दौरान अपने हलफनामे में अरुंधति रॉय ने सुप्रीम कोर्ट के जजों से व्यस्त होने की बात कही और कथित तौर पर कहा कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है, और इस पर CJI ने ध्यान नहीं दिया.

अरुंधति की ओर से दिया गया ये बयान संभवत: कोर्ट को रास नहीं आया. इस मामले में कोर्ट ने कहा कि वीपी शिवशंकर अपने ज्ञान के आधार पर कोर्ट की आलोचना कर रहे थे, जबकि अरुंधति रॉय को कोर्ट और क़ानून का कोई ज्ञान नहीं है. कोर्ट ने अरुंधति रॉय को 1 दिन के कारावास की सज़ा सुनाई थी.

शंकर गुहा नियोगी के दोस्त राजेंद्र सायल का मामला

शंकर गुहा नियोगी. मज़दूर नेता और छत्तीसगढ़ मुक्ति मोर्चा के संस्थापक. साल 1991 में नियोगी की हत्या हो गयी. हत्या का मामला लम्बे समय तक चला. निचली अदालत ने अभियुक्तों को सज़ा सुनाई. मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने फ़ैसला पलट दिया. आरोपी बरी हो गए. साल 1998. नियोगी के दोस्त राजेंद्र सायल ने नियोगी की स्मृति में आयोजित एक रैली में कथित तौर पर कहा कि नियोगी की मौत पर दिया गया फ़ैसला rubbish है, यानी बकवास है. इसके बाद सायल के हवाले से एक इंटरव्यू भी हितवाद में 4 जुलाई 1998 को प्रकाशित हुआ. इसमें जज की निष्पक्षता पर सवाल उठाते सायल के बयान लिखे गए. 

Rajendra Sai
राजेंद्र सायल

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट बार असोसिएशन ने अख़बार हितवाद के सम्पादक, रिपोर्टर और प्रकाशक समेत राजेंद्र सायल के खिलाफ़ अवमानना का मुक़दमा दर्ज करवा दिया. मामला शुरू होते ही हितवाद के मैनेजमेंट ने कोर्ट से माफ़ी माँग ली. अदालत ने माफ़ी दे दी. राजेंद्र सायल ने भी माफ़ी मांगी. कहा कि उन्होंने अख़बार को कोई इंटरव्यू नहीं दिया. सुनवाई हुई. कोर्ट ने सायल को अवमानना का दोषी माना और 7 दिन के कारावास की सज़ा सुना दी.

मार्क्सवादी नेता एमवी जयराजन को भेजा जेल

सीपीएम के नेता एमवी जयराजन. जून 2010 में एक केरल के कन्नूर में एक जनसभा में बोल रहे थे. उससे कुछ वक्त पहले ही केरल हाई कोर्ट ने आदेश दिया था कि किसी भी तरह की भीड़ का जमावड़ा या सड़कों पर प्रदर्शन न हो. रिपोर्ट्स बताती हैं कि बोलते-बोलते जयराजन ने आदेश देने वाले दोनों जजों को फ़ूल्स यानी बेवक़ूफ़ कह दिया. 

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एमवी जयराजन

मामला केरल हाई कोर्ट में गया. अपने भाषण में जयराजन ने ये भी कहा था कि जज ‘शीशे के मकानों में रहते हैं’, और ‘उनके फ़ैसले की क़ीमत घास बराबर है’. कोर्ट को जयराजन के इन बयानों पर कोई आपत्ति नहीं थी. लेकिन ‘बेवक़ूफ़’ वाली बात से न्यायपालिका के खिलाफ़ भावनाएं भड़क सकती हैं. कोर्ट ने कहा,

“जज अपेक्षा करते हैं कि उनके फ़ैसलों की तथ्यपरक और सच्ची आलोचना हो या उस पर बातचीत हो, लेकिन अपेक्षाकृत निरक्षर श्रोताओं को न्यायपालिका के खिलाफ़ भड़काने को नज़रंदाज नहीं किया जा सकता.

कोर्ट ने जयराजन को 2 हज़ार रुपये का जुर्माना और 6 महीने की जेल की सज़ा सुनाई. ऑर्डर पास करने के तुरंत बाद पुलिस उन्हें तिरुवनंतपुरम सेंट्रल जेल लेकर चली गयी.


लल्लनटॉप वीडियो : प्रशांत भूषण पर केस का पूरा मामला

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