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उत्तराखंड का नया CM जो कभी संघ की शाखा में जाने के नाम पर चारपाई के नीचे छुप जाता था

मैं केंद्रीय नेतृत्व का धन्यवाद करना चाहूंगा, जिन्होंने मुझे यह जिम्मेदारी सौंपी है. मैं गांव से आया हुआ एक छोटा सा कार्यकर्ता हूं. मैंने इसकी कभी कल्पना भी नहीं की थी. जनता के विश्वास पर खरा उतरने की पूरी कोशिश करूंगा. अब तक मुख्यमंत्री जी ने प्रदेश के लिए जो काम किए हैं, उसे हम आगे बढ़ाएंगे. मैं संघ के लिए काम करता था. कभी भी राजनीति में आने का नहीं सोचा था. अटल बिहारी वाजपेयी से प्रेरणा लेकर आगे बढ़ा. मैं त्रिवेंद्र सिंह रावत के साथ लंबे वक्त तक काम करता रहा हूं. पहले संघ में बतौर प्रचारक भी काम किया और उसके बाद पार्टी और सरकार के स्तर पर साथ में काम किया है. अभी भी उनके मार्गदर्शन में आगे काम करते रहेंगे.

ये कहना है तीरथ सिंह रावत का, जिन्होंने उत्तराखंड के नए मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली है. त्रिवेंद्र सिंह रावत के इस्तीफे के बाद मुख्यमंत्री के चेहरे को लेकर कई नाम चल रहे थे. कभी धन सिंह रावत का नाम मीडिया में चला, तो कभी केंद्रीय मंत्री रमेश पोखरियाल का, लेकिन बाजी मारी तीरथ सिंह ने. कैसे छुपे रूस्तम साबित हुए तीरथ सिंह रावत? किन कारणों से उनके नाम पर मोहर लगी. क्या है इसाइड स्टोरी? जानेंगे.

साल 2019 का सांसदी चुनाव

साल 2019. बीजेपी दूसरी बार सत्ता पाने के लिए जी जान से जुटी थी. उस समय तीरथ सिंह रावत बीजेपी के राष्ट्रीय महासचिव थे. उन्हें हिमाचल प्रदेश का प्रभारी बनाया गया था. जब उनका खुद का सांसदी का टिकट तय हुआ, तो उस समय वो हिमाचल प्रदेश में बीजेपी की जीत की रणनीति बना रहे थे. तीरथ सिंह रावत को राजनीति में भुवन चंद्र खंडूरी का शिष्य माना जाता है. रावत को पौड़ी गढ़वाल से सांसदी का टिकट मिला. सामने थे दो बार के मुख्यमंत्री रहे भुवन चंद्र खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी. मनीष कांग्रेस के टिकट से मैदान में थे. उत्तराखंड में इस लड़ाई को ‘चेला’ वर्सेस चेला की लड़ाई कहा गया. कुमाऊंनी में चेला लड़के को कहते हैं. और दूसरे चेले का मतलब होता है शिष्य. राजनीतिक हलको में इस बात की चर्चा रही कि खंडूरी अपने किस चेले को आशीर्वाद देंगे.

1991 में पहली बार सांसद बनने के बाद से खंडूरी पांच बार बीजेपी के सांसद रहे. चूंकि लड़ाई बीसी खंडूरी के बेटे और चेले में रही, इसलिए खंडूरी फ़ैक्टर महत्वपूर्ण माना गया. हालांकि चुनाव के दौरान खंडूरी चुप रहे. उनकी तबीयत ऐसी नहीं थी कि वह किसी के लिए प्रचार करते. चुनाव हुआ. नतीजे आए. तीरथ सिंह रावत को पांच लाख से ज्यादा वोट मिले, जबकि उनके प्रतिद्वंदी कांग्रेस के उम्मीदवार और खंडूरी के बेटे मनीष खंडूरी को दो लाख के करीब वोट मिले.

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संसद में विक्ट्री साइन दिखाते तीरथ सिंह रावत (फाइल फोटो-PTI)

गुरु-शिष्य के अटूट रिश्ते की पटकथा

साल 1996 के लोकसभा चुनाव में प्रचार के दौरान तीरथ सिंह रावत बीसी खंडूरी के साथ रहे. उस समय अलग उत्तराखंड राज्य की मांग को लेकर आंदोलनकारी चुनाव प्रक्रिया में भाग लेने वाले हर नेता का विरोध कर रहे थे. तीरथ इस पूरे चुनाव में खंडूरी के साथ साए की तरह मौजूद रहे. गुरु-शिष्य के अटूट रिश्ते की पटकथा यहीं से तैयार हुई. वर्ष 1991 में जब पहली बार खंडूरी को गढ़वाल सीट से बीजेपी का टिकट मिला, उस वक्त तीरथ बीजेपी में नहीं थे. उस वक्त उनके पास अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद के राष्ट्रीय मंत्री की जिम्मेदारी थी. तीरथ ने खंडूरी के लिए इस चुनाव में भी मेहनत की. इसके बाद हुए हर चुनाव में तीरथ सिंह रावत ही खंडूरी के चुनाव संयोजक रहे.

विद्यार्थी परिषद के जमाने से तीरथ के करीबी रहे पौड़ी जिला बीजेपी के वरिष्ठ उपाध्यक्ष विकास कुकरेती का कहना है कि तीरथ सिंह रावत के जीवन पर बीसी खंडूरी की गहरी छाप रही है. उनके राजनीतिक कैरियर को खंडूरी ने ही आगे बढ़ाया और तीरथ सिंह रावत भी उनके साथ हर स्थिति में चट्टान की तरह खडे़ रहे हैं.

संघ प्रचारक से ABVP तक का सफर

तीरथ सिंह रावत पौड़ी के एक गांव में पैदा हुए. छह भाई-बहनों में सबसे छोटे. शुरुआती पढ़ाई जगाधरी (यमुनानगर) में हुई. यहां उनके पिता रेलवे में पोस्टेड थे. न्यूज 18 से बातचीत में तीरथ सिंह ने बताया था कि उन्हें हाईस्कूल की पढ़ाई के लिए नौ-दस किलोमीटर दूर जाना पड़ता था, क्योंकि नजदीक के स्कूल में साइंस नहीं थी. उन्हें नौ बजे तक स्कूल पहुंचने के लिए सुबह पांच-साढ़े पांच बजे निकलना पड़ता था. हाई स्कूल करने के बाद इलाक़े के एकमात्र इंटर कॉलेज में पढ़ने के लिए तीरथ जहरीखाल गए. यहां वो हॉस्टल में रहे. वह NCC में अंडर अफ़सर भी रहे. इसी दौरान वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संपर्क में आए. तीरथ ने संघ में पहले स्वयंसेवक और फिर प्रचारक के रूप में काम किया. प्रचारक के रूप में ही तीरथ श्रीनगर स्थित हेमवती नंदन बहुगुणा गढ़वाल विश्वविद्यालय पहुंचे. युवाओं के बीच उनकी पैठ और सांगठनिक क्षमता को देखते हुए उन्हें ABVP भेज दिया.

एबीवीपी के संगठन मंत्री (उत्तराखंड) के साथ ही संगठन के राष्ट्रीय सचिव रहते हुए वह गढ़वाल विश्वविद्यालय छात्र संघ अध्यक्ष बने. उन्होंने 11-12 साल संघ प्रचारक और एबीवीपी के संगठन मंत्री के रूप में काम किया.

शिक्षा मंत्री रह चुके हैं

ये बात 1995-96 की है. उस समय उत्तराखंड नहीं बना था. बीजेपी में छात्र संघर्ष मोर्चा का गठन हो रहा था. उत्तर प्रदेश के वर्तमान डिप्टी सीएम दिनेश शर्मा इसके अध्यक्ष बनाए गए. चार लोगों को उपाध्यक्ष बनाया गया. इनमें से एक थे तीरथ सिंह. उन्हें पश्चिमी उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड का प्रभार मिला. 1997 में उत्तर प्रदेश में विधान परिषद के चुनाव हुए तो बीजेपी ने उन्हें गढ़वाल क्षेत्र से MLC चुनाव में उतार दिया. वह जीत गए. MLC के तौर पर वह विधान परिषद की कई समितियों के सदस्य और याचिका समिति के अध्यक्ष भी रहे.

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बुधवार, 10 मार्च को सीएम पद के नाम के ऐलान के बाद कार्यर्ताओं से घिरे तीरथ सिंह रावत. (फोटो-पीटीआई)

राम जन्मभूमि आंदोलन में तीरथ सिंह रावत महीने जेल में रहे. उत्तराखंड आंदोलन में उन्होंने छात्र संघर्ष मोर्चे के तहत रामपुर तिराहे से एक संघर्ष यात्रा पौड़ी कैंट के लिए शुरू की. यूपी की मुलायम सरकार ने इसे रोकने के लिए फ़ोर्स लगाई तो साथियों के साथ वह भेस बदलकर पौड़ी कैंट पहुंचे और यात्रा समाप्त की.

साल 2000 में जब उत्तराखंड बना तो राज्य की अंतरिम सरकार में रावत को शिक्षा मंत्री बनाया गया. लेकिन इसके बाद 2002 में हुए राज्य के पहले विधानसभा चुनाव में वह पौड़ी से चुनाव हार गए. अंतरिम सरकार में मंत्री रह चुके रावत फिर कभी मंत्री नहीं बन पाए. लेकिन इस दौरान वह संगठन में काफी एक्टिव रहे.

तीरथ की शादी त्रिवेंद्र ने करवाई?

कहते हैं कि पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ही तीरथ सिंह रावत को संघ की शाखा में लाए. आजतक से ख़ास बातचीत में त्रिवेंद्र रावत ने बताया कि तीरथ संघ की शाखा में चार साल छोटे थे. जब वे सुबह जल्दी नहीं उठते थे और चारपाई के नीचे छुप जाते थे, तो प्यार से डांट डपटकर शाखा ले जाता था. त्रिवेंद्र सिंह रावत ने बताया कि मैं उनके साथ संगठन मंत्री रहा. मेरे साथ वह प्रचारक रहे. कहते हैं कि तीरथ सिंह रावत की शादी कराने में भी त्रिवेंद्र सिंह रावत की अहम भूमिका रही. तीरथ सिंह रावत की पत्नी डॉ रश्मि त्यागी उनकी अखिल भारतीय परिषद की पुरानी सहयोगी हैं. तीरथ सिंह रावत ने MLC बनने के बाद शादी की. उनकी पत्नी देहरादून स्थित डीएवी कॉलेज के साइकोलॉजी विभाग में असिस्टेंट प्रोफ़ेसर हैं.

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तीरथ सिंह को त्रिवेंद्र सिंह रावत (नीले कपड़े में ) का करीबी माना जाता है. (फोटो-PTI)

बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष रह चुके हैं

साल 2013 में तीरथ रावत को बीजेपी का प्रदेश अध्यक्ष बनाया गया. 2015 तक वह इस पद पर रहे. 2013 में जब उन्हें पार्टी ने प्रदेश की जिम्मेदारी दी थी, तो भुवन चंद्र खंडूरी ने ही उनके नाम की सिफारिश की थी. तब भी वह त्रिवेंद्र रावत के सामने खड़े थे. तब पार्टी हाईकमान ने दोनों नेताओं को टकराव की स्थिति से बचने के लिए अपना-अपना नाम वापस लेने को कहा था. तीरथ को तब अधिकांश विधायकों का समर्थन मिला था, जिसमें भुवन चंद्र खंडूरी और रमेश पोखरियाल जैसे दिग्गजों का समर्थन भी था. वहीं, तब पार्टी प्रदेश अध्यक्ष की दौड़ में शामिल त्रिवेंद्र रावत को दूसरे नेताओं का समर्थन मिला था.

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पूर्व मंत्री त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ही तीरथ के नाम का ऐलान किया. (फोटो-PTI)

तीरथ 2012 से 2017 तक चौबट्टाखाल निर्वाचन क्षेत्र से विधायक रहे. लेकिन 2017 के चुनाव में सतपाल महाराज कांग्रेस छोड़कर बीजेपी में आ गए. उन्हें टिकट देने के लिए तीरथ का टिकट काट दिया गया. मीडिया में खबरें आईं कि इसके बाद वह पार्टी नेतृत्व से नाराज हो गए. कहने वाले कहते हैं कि उनकी नाराजगी दूर करने के लिए उन्हें 2017 में ही बीजेपी का राष्ट्रीय सचिव बनाया गया. साल 2019 के लोकसभा चुनाव में हिमाचल प्रदेश के प्रभारी बनाए गए. पार्टी ने चारों सीटें जीतीं.

सीएम क्यों बनाए गए?

इसका सीधा जवाब तो बीजेपी आलाकमान ही दे सकता है. लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में कहा जा रहा है कि जातीय और क्षेत्रीय समीकरण को ध्यान में रहते हुए तीरथ को सीएम बनाया गया है. तीरथ के पास संगठन और सरकार दोनों का अनुभव है.

न्यूज 18 के साथ काम कर चुके पत्रकार राजेश डोबरियाल जो तीरथ सिंह रावत को करीब से जानते हैं, उन्होंंने लल्लनटॉप से बातचीत में बताया कि ये बीच का रास्ता है. त्रिवेंद्र सिंह रावत ने ही तीरथ के नाम की सिफारिश की होगी. क्योंकि जाने वाले सीएम से ये पूछा जाता रहा है कि उनकी पसंद कौन हैं. तीरथ कम बोलने वाले शांत नेता है. वह बगावती तेवर भी नहीं दिखाते. जमीन से जुड़े आदमी है.

पत्रकार राजेश डोबरियाल का कहना है कि तीरथ के कंधों पर अगले चुनाव की जिम्मेदारी है. उनके पास एक साल का समय है. उत्तराखंड के अधिकारियों के बारे में एक आम धारण है कि वह किसी की नहीं सुनते हैं. और ये सत्ता पक्ष और विपक्ष दोनों के नेताओं की शिकायत रही है. कांग्रेस के हरीश रावत के समय भी यही समस्य रही. ये मुद्दा विधानसभा में भी उठ चुका है. ऐसे में तीरथ के सामने ये चुनौती है कि एक साल के अंदर वह तेज गति से काम करें और बीजेपी को 2022 में सत्ता दिलाएं. तीरथ के सामने कुमाऊं और गढ़वाल के बीच बैलेंस बनाए रखने की भी चुनौती होगी. कहा जा रहा है कि त्रिवेंद्र रावत की कुर्सी जाने के पीछे ये भी एक वजह रही है. साथ ही उन्हें बीजेपी के विधायकों को भी साध कर चलना होगा.


उत्तराखंड के CM त्रिवेंद्र सिंह रावत की किस गलती से उनकी कुर्सी खतरे में आ गई?

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