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जिसे मोदी ने 'विफलताओं का स्मारक' कहा था, कोरोना काल में वही सबसे ज्यादा काम आया

27 फरवरी 2015. संसद में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा,

मेरी राजनीतिक सूझबूझ कहती है कि मनरेगा कभी बंद मत करो. मैं ऐसी गलती नहीं कर सकता, क्योंकि, मनरेगा आपकी विफलताओं का जीता-जागता स्मारक है. आज़ादी के 60 साल बाद आपको लोगों को गड्ढे खोदने के लिए भेजना पड़ा. यह आपकी विफलताओं का स्मारक है और मैं गाजे-बाजे के साथ इस स्मारक का ढोल पीटता रहूंगा. दुनिया को बताऊंगा, ये गड्ढे जो तुम खोद रहे हो, ये उन 60 साल के पापों का परिणाम है. इसलिए मेरी राजनीतिक सूझबूझ पर आप शक मत कीजिए. मनरेगा रहेगा, आन-बान-शान के साथ रहेगा और गाजे-बाजे के साथ दुनिया में बताया जाएगा.

पीएम मोदी ने अपने भाषण में आगे कहा,

हां एक और बात ज़रूर है, क्योंकि मैं देशहित के लिए जीता हूं और इसमें (मनरेगा में) से देश का अधिक भला कैसे हो, उन गरीबों का भला कैसे हो, उसमें जो कुछ जोड़ना पड़ेगा, हम जोड़ेंगे. जो ताकत देनी पड़ेगी, देंगे.

ये 2015 की बात थी. उसके बाद से बहुत कुछ बदल गया है. मार्च 2020 में जब कोरोना की वजह से पूरे देश में लॉकडाउन लगा, तो लाखों प्रवासी मजदूरों को अपने गांव लौटना पड़ा. ऐसे में मनरेगा यानी महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना, ग्रामीण क्षेत्रों में इन मजदूरों के लिए बहुत बड़ा सहारा बनी.

इंडियन एक्सप्रेस की खबर के मुताबिक, वित्त वर्ष 2020-21 में मनरेगा के तहत 11 करोड़ से ज्यादा लोगों को काम मिला. आपको बता दें कि साल 2006-07 में मनरेगा की शुरुआत हुई थी. तब से कभी भी इतने लोगों ने मनरेगा में काम नहीं किया. अप्रैल के आंकड़ों के मुताबिक वित्त वर्ष 2020-21 में कुल 11.17 करोड़ लोगों ने मनरेगा में काम किया. वहीं 2019-20 में 7.88 करोड़ लोगों ने काम किया था. यानी इस साल 41 प्रतिशत ज्यादा लोगों ने मनरेगा में काम किया.

क्या कहते हैं आंकड़े?

साल 2013-14 से 2019-20 तक औसतन हर साल 6.21 से 7.88 करोड़ लोगों को मनरेगा में काम मिला, लेकिन कोरोना और लॉकडाउन के दौरान अतिरिक्त तीन करोड़ लोगों ने मनरेगा में काम किया. 2020-21 में 7.54 करोड़ ग्रामीण परिवारों को मनरेगा में रोजगार मिला. 2019-20 में 5.48 करोड़ परिवारों ने इस योजना में काम किया था. पिछले साल की तुलना में इस साल (2020-21) काम करने वाले परिवारों की संख्या 37 प्रतिशत ज्यादा है. इससे पहले साल 2010-11 में 5.5 करोड़ परिवारों ने इस स्कीम में काम किया था.

Villagers Work For Free In Banda
मनरेगा के तहत काम करते महिला-पुरुष (फाइल फोटो-PTI)

मार्च के अंतिम सप्ताह का आंकड़ा जुड़ने के बाद मनरेगा में काम करने वाले व्यक्तियों और परिवारों की संख्या में बदलाव हो सकता है. 2020-21 में ऐसे परिवारों की संख्या भी बढ़ी, जिन्हें मनरेगा के तहत 100 दिन का रोजगार मिला. ऐसे परिवारों की संख्या 68 लाख से ज्यादा रही. 2019-20 में 100 दिन रोजगार पाने वाले परिवारों की संख्या 40 लाख से थोड़ी ज्यादा थी. 2020-21 में लोगों को औसतन 51 दिन का रोजगार मिला. कोरोना महामारी के दौरान मनरेगा का खर्च भी बढ़ा. इस साल एक लाख 10 हजार करोड़ से ज्यादा खर्च हुआ. वहीं पिछले साल 68 हजार करोड़ खर्च हुआ था.

मनरेगा में 100 दिन का रोजगार सुनिश्चित किया जाता है. 2006-07 में जब मनरेगा की शुरुआत हुई, तो इसे अत्यंत पिछड़े 200 जिलों में लागू किया गया. अगले साल इस योजना से 130 और जिलों को जोड़ा गया. इसके बाद मनरेगा को पूरे देश में लागू कर दिया गया.

कितने लोगों को रोजगार मिला?

2013-14 से 2019-20 तक: 6.21 से 7.88 करोड़ रोजगार हर साल

2020-21 में 7.54 करोड़ परिवारों को रोजगार मिला

2019-20 में 5.48 करोड़ परिवारों को रोजगार मिला

2010-11 में 5.5 करोड़ परिवारों को रोजगार मिला

100 दिन काम मिला

2020-21: 68 लाख
2019-20: 40 लाख

मनरेगा का खर्च

2020-21-1.10 लाख करोड़
2019-20-68 हजार करोड़

एक्सपर्ट क्या कहते हैं?

इंडिया टुडे हिन्दी के एडिटर अंशुमान तिवारी का कहना है,

सरकार को मनरेगा जैसी स्कीम की जरूरत बार-बार महसूस हुई. केवल कोविड के दौरान ही नहीं. जब कभी किसी गांव में बाढ़ आई या कोई अन्य विपदा आई, इस स्कीम की जरूरत महसूस हुई. 2015 में मनरेगा को लेकर राजनीति से प्रेरित होकर टिप्पणी की गई थी, लेकिन सरकार 2015 के बाद से मनरेगा को पैसा दे रही है, मनरेगा में खर्च भी बढ़ाया जा रहा है. मनरेगा के पुनर्गठन की बात भी चल रही है.

अंशुमान तिवारी ने आगे बताया,

कोविड के दौरान मनरेगा ही ऐसी स्किम थी जिसने ग्रामीण अर्थव्यवस्था को संभाला. 11 करोड़ लोगों को काम मिला.मनरेगा ने ही सरकार को इस बात के लिए प्रेरित किया कि वह कोविड में एक ऐसी प्रधानमंत्री रोजगार योजना लेकर आए, जो उन राज्यों के लिए, उन जिलों के लिए थी जहां सबसे ज्यादा माइग्रेंट लेबर वापस गए थे. दो स्कीम हैं जो स्थाई बेरोजगारी को अड्रेस कर सकती हैं, रूलर एरिया में और थोड़ा बहुत अर्बन एरिया में. क्राइसिस के दौरान सपोर्ट देने के लिए मनरेगा ने अपनी उपयोगिता साबित की है. लेकिन क्या सरकार शहरी इलाकों में कोई ऐसी स्कीम लेकर आएगी. इसकी भी मांग लंबे समय से हो रही है.

मनरेगा नहीं होता तो संकट कितना बड़ा था?

कोरोना की वजह से सरकार ने देश में लॉकडाउन लगाया. एक बहुत बड़ी आबादी को मजबूरी में गांवों की ओर लौटना पड़ा. क्योंकि काम धंधे बंद हो गए थे. अगर मनरेगा नहीं होता तो कोरोना और लॉकडाउन के दौरान ग्रामीण क्षेत्रों में बेरोजगारी का क्या हाल होता. इस सवाल के जवाब में सीनियर पत्रकार और एक्सपर्ट ने नाम ना छापने की शर्त पर बताया,

अगर मनरेगा नहीं होता तो गांव में जो छिपी हुई बेरोजगारी है, वो और ज्यादा बढ़ जाती. हमें पता ही नहीं चलता कि कितने लोगों को काम मिला, कितने लोगों को नहीं. और दूसरी बात ये है कि सामाजिक असमानता और ज्यादा होती.

मनरेगा को यूपीए सरकार की विफलता बताने वाली मोदी सरकार ने मनरेगा में कई बदलाव किए. एक्सपर्ट का कहना है कि पहले मनरेगा में क्या होता था कि एक ही गांव में, एक खेत से मिट्टी उठाकर दूसरे खेत में डाल दिया जाता था, उसके भी पैसे मिलते थे. वो भी रोजगार था, लेकिन जो बड़ा बदलवा हुआ वो ये हुआ कि अगर मनरेगा में 100 रुपए खर्च हो रहा है, तो उसका रिटर्न क्या दिख रहा है. 2014 के बाद मनरेगा में जो सबसे बड़ा बदलाव हुआ वो यही हुआ कि जो पैसा खर्च हो रहा है, उसका रिर्टन क्या मिल रहा है इस पर काम हुआ.

वरिष्ठ पत्रकार का कहना है कि इसी वजह से गांव देहात में हमने जितने भी कंस्ट्रक्शन के काम देखे हैं, चाहे वो स्कूल बनाने की बात हो या सड़क बनाने की बात हो, मनरेगा के तहत हो रहा है. ये डिमांड ड्रिवन स्कीम है. अगर किसी परिवार में योग्य व्यक्ति को रोजगार की जरूरत है, तो उसे मना नहीं किया जा सकता.


अर्थात: #Modi_rojgar_do के नारे के बीच बेरोजगारी पर भारत को इन देशों से सीख लेनी चाहिए

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