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बरेली के बाजार में गिरकर धमाल मचाने वाला झुमका आया कहां से था?

गांव गए थे कुछ साल पहले. मेरे मामा की शादी थी. बारात से पहले का दिन था. हल्दी चढ़ रही थी. ढोलक की धम-धम के साथ चम्मच पीटने की आवाज़ सीधे कान के छेद में घुस रही थी. टन-टन-टन-टन. दूर की नानी उल्टे हाथ से ताली बजा रही थीं. दूर की ऐसे कि मेरी मम्मी उनको चाची बुलाती हैं. तो नानी ही लगी न मेरी. उनके हाथ में लगा मेहंदी का गोल ठप्पा एकदम भूरा हो गया था. वो ताली बजाए जाएं और हमें घूरे जाएं. हम जीन्स पहनकर पालथी मार नहीं पा रहे थे. बैठना वहीं था.

अचानक उन दूर की नानी ने दूर से ही इशारा किया. हमें लगा पानी मगाएंगी. पहले भी कई नानियों ने मंगाया था. हम सारी नानी-मामियों को पार करते हुए रस्सी पर चलने के जैसे बचते-बचाते उनके पास पहुंचे. बोली, ‘तुम फलानी की बिटेवा हौ?’ हमने कहा, हां. पानी ला देइ का नानी? वो बोली, ‘नाही, झुमका काहे नहीं पहिने हौ?’ शोर बहुत था. औरतें खाली गा-बजा थोड़ी रही थीं. पंचौरा भी तो चल रहा था.

हमें समझ नहीं आया कि नानी ने क्या बोला. पूछा, ‘क्या’? नानी फिर बोलीं, ‘अरे झुमका नहीं दीन अम्मा, पहिने खातिर?’ मेरे हाथ कान पर गए. हम मुस्करा दिए. नानी बड़ी सीरियस हो गईं. बोलीं, ‘नंगे कान नहीं रहा जात है सादी-बियाह मा, जाओ झुमका पहिनो कौनो.’ हम कान पकड़े-पकड़े भीड़ से निकल आए. वो घूरती रहीं कि हम पहनने जा रहे हैं या नहीं. झुमका तो मेरे पास था नहीं. बैग से टॉप्स निकाला और पहन लिया. वो देखकर खुश हो गईं.

बचपन से जीन्स-टीशर्ट या ‘लड़कों वाले कपड़े’ पहनने की आदत रही. झुमका तो दूर बिंदी-लिप्स्टिक भी नहीं खरीदते थे. नानी का झुमके पर जो इसरार था वो मेरे लिए नया था. नानी को झुमका ही पता होगा न? टॉप्स या डैंगलर तो हम लोग बोलते हैं. वैसे ये झुमका आया कहां से. कुछ शब्द की अपनी आवाज़ें होती हैं. झुमका भी कुछ वैसा ही है.

तुमको पता है, बरेली में किसका झुमका गिरा था?

ढपली लिए साधना बताती हैं कि ‘झुमका गिरा रे, बरेली के बाज़ार में’. लेकिन उनके दोनों कानों में झुमका जस का तस लटक रहा होता है. तो झुमका गिरा किसका. असल में झुमका गिरा था तेजी बच्चन का. कहानी शुरू हुई थी हरिवंशराय बच्चन और तेजी बच्चन की नज़दीकियों से. ये दोनों लोग बरेली में थे. एक शादी अटेंड करने गए थे. सब लोग चाहते थे कि दोनों शादी कर लें. किसी ने इनसे यही बात कह दी तो तेजी बच्चन ने कहा कि मेरा झुमका तो बरेली के बाज़ार में गिर गया. वो अपने दिल की बात कर रही थी जो वो रायसाहब पर हार गई थीं.

गाना भी देख ही लीजिए:

इस वाकये से राज मेहंदी अली खान साहब भी वाक़िफ़ थे. जब वो ‘मेरा साया’ के लिए गीत लिख रहे थे तब अचानक यह किस्सा उन्हें याद आ गया और उन्होंने साधना के झुमके को बरेली में ही गिरा दिया. इसके बाद बरेली जाने वाला हर शख्स ये जानने में लग गया कि झुमका गिरा कहां. झुमका तो मिलता नहीं था और न ही इस सवाल का जवाब. फिर 15 साल बाद बरेली विकास प्राधिकरण ने बरेली के परसाखेड़ा तिराहे पर लाखों की कीमत से एक विशाल झुमका लगाने की सोच ली. फरवरी, 2017 में जब पीएम मोदी किसान कल्याण रैली में बरेली पहुंचे तो बोले, ‘हम बरेली तो नहीं आए लेकिन यह ज़रूर सुना है कि ‘झुमका यहीं गिरा था’.’

फिल्मों में झुमके की लटकन

कितनी ही बार फिल्म के हीरो ने हिरोइन के झुमके चुराए होंगे. फिर अकेले में उन झुमको के साथ आहें भरी होंगी. झुमकों पर खूब गाने लिखे गए. शादियों में बन्ना-बन्नी गाया जाता है. ‘बन्नो तेरी अंखियां सुरमेदानी, बन्नो तेरा मुखड़ा लाख का रे, बन्नो तेरा कंगन है हज़ारी…’ इसमें झुमका भी लाख का बताया जाता है. रफ़ी साहब ने भी गाया है, ‘कान में झुमका, चाल में ठुमका, कमर पे चोटी लटके’. हेमा मालिनी-धर्मेंद्र की फ़िल्म जुगनू में भी झुमका गिरता है. बहुत गिरता है ये झुमका. इसके अलावा भोजपुरी का ‘झुमका झुलानिया भले दे दिह, दिल न कौनौ सउतिन के दिहा’ और कुमाऊंनी का ‘कान में डबल झुमका, हिटन में त्यरो ठुमका’ गाना अपने इलाके में खूब गाया जाता है.

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इजिप्ट के मर्द कान में छेद कराकर टॉप्स पहनते थे.

हिस्ट्री में इयररिंग

इयररिंग यानी कान का गहना खोजने इतिहास में जाएं तो तकरीबन सात हज़ार साल पहले की बात करनी होगी. उस समय मिस्र के मर्द कान में टॉप्स पहनते थे. ये उनका अपनी ऊंची हैसियत बयां करने का तरीका था. मल्लब कित्ते ‘काबिल’ हैं ये बताने के लिए. इसके बाद ग्रीस और रोम की अमीर औरतें भी इयररिंग पहनती थीं. इसमें पुखराज, लाल और नीले रंग की मणि लगी रहती थी. छोटे-छोटे होते थे ज़्यादा लटकन नहीं रहती थी.

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पुरानी मूर्तियों में भी कानों में कुंडल दिखते हैं.

साथ ही अजंता-एलोरा में जो मूर्तियां हैं उनके कान में भी एक गहना दिखता है. उसे कुंडल कहते हैं. कुंडल औरत-मर्द दोनों पहनते थे. हिन्दू देवी-देवताओं के उल्लेख में कुंडल का ज़िक्र रहता है कि किसी देवता के कानों में कुंडल कैसे शोभायमान है टाइप. इससे उनकी खूबसूरती का बखान किया जाता था. इसी कुंडल का रूप बदलते-बदलते झुमका बन गया. हालांकि इसकी बनावट में ज़रा फर्क दिखता है. कुंडल ज़्यादातर गोल होते थे जबकि झुमके के कई आकार हो सकते हैं और इसमें लटकन होना ज़रूरी है. वरना काहे का झुमका.

फूलों का झुमका

मेरे नाना ने मेरी मां के लिए उनकी शादी में फूलों के गहने बनवाए थे. सब आंख बड़ी करके देख रहे थे. खैर संस्कृत के लिट्रेचर में भी अक्सर फूलों के गहने या कर्णफूल का ज़िक्र आता है. सोचिए, फूल से झुमके बनाए जाते थे. सुंदर के सुंदर और खुशबूदार भी. अब तो सोने-चांदी से भी फूल के आकार का टॉप्स बनाकर उसको कर्णफूल कहते हैं.

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झुमके के झुमके और महके भी.

धर्म में भी लटकता है ये

कभी सुना है, ‘पैर बड़ा गंवार का, सिर बड़ा सरदार का’? ये सब कहावत हैं जो हमारे बड़े-बुजुर्गों ने अपने मन से गढ़ लीं. किसी के पीछे की कहानी पता चलती है तो किसी की अपने आप गढ़ लेनी होती है. ऐसे ही कहते हैं कि लम्बे कान अच्छे माने जाते हैं. अब ये न पूछना कैसे अच्छे. तो कान को लंबा करने में ये झुमके काफी असर दिखाते हैं. कई दिन तक भारी झुमके पहने रहो तो लगता है कान लटकने लगा. भगवान बुद्ध के कान लंबे थे. कान से मेरा मतलब पूरा कान नहीं बल्कि कान के नीचे का हिस्सा, जो गुलगुला होता है न वो. बुद्ध भी कान में कुंडल पहनते थे.

हिंदू धर्म में तो बाकायदा इसके लिए संस्कार घोषित है. कर्णवेध संस्कार. हिंदुओं के 16 संस्कारों में से एक है ये. इसमें कान छेदा जाता है. ज़्यादातर ये कारनामा लड़कियों के साथ होता है लेकिन कुछ लोग लड़कों के भी कान छेदते हैं. हालांकि उनके लिए ये सिर्फ एक कस्टम होता है. बाद में लड़कों के कान का सुराख बंद हो जाता है क्योंकि वो कुंडल, बाली या झुमका नहीं पहनते.

सेहत से भी जुड़ा है मामला

औरतों की इज़्ज़त से तो हर छोटी-बड़ी चीज़ जुड़ी रहती है. फिर ये तो गहनों का मसला है. तो पहले ये झुमका, बाली पहनना औरतों की इज़्ज़त से जुड़ा मामला था. वो औरत की समृद्धि को दिखाता था. फिर इसे सुंदरता और सेहत से भी जोड़कर देखा जाने लगा. जितने लंबे कान, औरत उतनी ही सेहतमंद. कान को पूरे शरीर का अहम हिस्सा माना जाता है. कुछ शोध की मानें तो देखने की शक्ति पर भी कान का असर रहता है. यानी कान का जो गुलगुला हिस्सा है न, उसे दबाने से देखने की ताकत बढ़ती है. एक्युपेंचर टाइप. साथ ही इससे दिमाग भी तेज़ होता है. अगली बार कोई कान खींचे तो उसे कहना कि गुलगुला वाला हिस्सा ही खींचे. कुछ सेहत ही सुधरेगी.

खैर अब जगह-जगह कई तरह के झुमके बिकते हैं. लड़कियां तो सही जगह ढूंढ ही लेती हैं. लड़कों के लिए बता दें कि लखनऊ में अमीनाबाद, पटना में खेतान मार्केट, जयपुर में गौरव टॉवर, मुंबई में फैशन स्ट्रीट और दिल्ली में जनपथ जैसे बाज़ारों में बढ़िया झुमके मिलते हैं वो भी सस्ते में. और अच्छी जगह जानते हो तो हमें भी बताना.


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