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आर्मेनिया और अज़रबैजान के झगड़े की पूरी कहानी

दुश्मन के 30 टैंक तबाह कर दिए. तीन हेलिकॉप्टर्स मार गिराए. 12 एयर डिफेंस सिस्टम उड़ा दिए. ये, युद्ध का शब्दकोश है. और जब ये शब्द अख़बारों में रोज़ छपने लग जाए तो समझो दुनिया के किसी कोने में इंसानों की समझ पर गोले-बारूद का जोश भारी पड़ रहा है. दुनिया के दो मुल्क अघोषित रूप से जंग शुरू कर चुके हैं और उन दोनों के पीछे दो बड़े देश हैं. अगर ये जंग ना रुकी तो हज़ारों लोग मारे जाएंगे. और नुकसान हमारे देश भारत का भी होगा.

अमेरिकी जब युद्ध रोकने के लिए प्रदर्शन कर रहे थे

2003 ने जब अमेरिका ने इराक पर हमला किया था तो न्यूयॉर्क समेत अमेरिका के शहरों में रोज़ हज़ारों लोग जुटते थे. ये वो लोग थे तो युद्ध शुरू करने के लिए अपने ही देश की सरकार के खिलाफ आवाज़ बुलंद कर रहे थे. युद्ध रोकने की मांग कर रहे थे. युद्ध को लेकर अमेरिका की जॉर्ज बुश सरकार की वहां के कई अखबार भी कड़ी आचोलना कर रहे थे. विरोध होना भी चाहिए क्योंकि युद्ध में सिर्फ नुकसान ही होता है.

No War Protest In Us
अमेरिकी लोगों का एक बड़ा धरा इराक़ युद्ध के खिलाफ़ था. (एएफपी)

लोग इस बात को भूल चुके हैं…

अमेरिका वाले उन प्रदर्शनों की याद अब धुंधली पड़ी चुकी है लेकिन इसी साल जुलाई महीने में युद्ध को लेकर एक और देश में भयंकर प्रदर्शन हुए. जब पूरी दुनिया कोरोना के ख़ौफ में थी तो यूरेशिया के एक देश के हज़ारों लोग सड़कों पर जुट रहे थे. पिछले कई सालों में इस देश ने इतने भयानक प्रदर्शन नहीं देखे थे. प्रदर्शन इतने उग्र थे कि लोग देश की संसद में घुस गए थे. संसद भवन के अंदर कमरों के शीशे तोड़ दिए थे. इन लोगों को रोकने में पुलिस की वाटरकैनन और आंसू गैस वाले गोले भी बेअसर हो रहे थे.

Pro War Rally Baku Azerbaijan
अज़रबैजान के लोग आर्मेनिया से युद्ध को लेकर आंदोलन कर रहे थे. (एएफपी)

क्या मांग थी इन प्रदर्शनकारियों की?

युद्ध. ये लोग अपनी सरकार से मांग कर रहे थे कि जंग शुरू की जाए. सेना को युद्ध के लिए भेजा जाए. अपने पड़ोसी देश पर हमला करने की मांग ये प्रदर्शनकारी कर रहे थे. और ये सब कहां हो रहा था अज़रबैजान की राजधानी बाकू में.

वो अज़रबैजान जहां 2018 में उस वक्त की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज गई थीं तो उनकी ये फोटो बहुत चर्चित हुई थी. आपने भी पहले देखी होगी. अज़रबैजान के बाकू में एक मंदिर में सुषमा स्वराज प्रार्थना कर रही थी. और उस वक्त इस तस्वीर को जारी कर विदेश मंत्रालय ने बताया था सैकड़ों साल पुराने बाकू के मंदिर में भगवान गणेश की तारीफ लिखी है. लोगों को हैरानी हुई थी जिस मुस्लिम अज़रबैजान देश का नाम तक भारत के ज्यादातर लोग नहीं जानते वहां भगवान गणेश का इत्ता पुराना मंदिर कहां से आ गया. मंदिर का नाम आतिशदाह है. लेकिन आज हम उस मंदिर की बात नहीं करेंगे उस आग की बात करेंगे जो अज़रबैजान की सीमा पर लगी है.

Sushma Swaraj Ateshgah Fire Temple
जब भारतीय पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज अज़रबैजान के आतिशदाह मंदिर पहुंची थी.

कहां है अज़रबैजान?

कैस्पियन सागर के तट पर बसा देश. जिसके उत्तर में रूस है और दक्षिण में ईरान. पश्चिम में आर्मेनिया है. और झगड़ा भी यहीं है. अज़रबैजान और आर्मेनिया युद्ध की दहलीज़ पर हैं. अब तक 24 लोगों की मौत हो चुकी है. आर्मेनिया ने कहा है कि हमने अज़रबैजान के 3 टैंक्स तबाह कर दिए. 2 हेलिकॉप्टर्स को मार गिराया और ड्रोन को मार गिराया. आर्मेनिया का रक्षा मंत्रालय के मुताबिक तो अज़रबैजान के 200 जवानों के मरने की भी बात कही गई. उधर अज़रबैजान भी कह रहा है कि हमने आर्मेनिया के 12 एयर डिफेंस सिस्टम तबाह कर दिए हैं.

इस गितनी से युद्ध अभी बड़ा नहीं लगता है लेकिन जिन्हें इन देशों के इतिहास का इल्म है वो जानते हैं कि युद्ध रोकना क्यों जरूरी है.

Armenia And Azerbaijan In World Map
दुनिया के नक़्शे पर अज़रबैजान और आर्मेनिया. (गूगल मैप्स)

पिछली बार कब भिड़े थे अज़रबैजान और आर्मेनिया?

पिछले बार जब अज़रबैजान और आर्मेनिया आपस में भिड़े थे तो युद्ध 2 साल तक चला था. 10 लाख लोग बेघर हो गए थे. दोनों तरफ के 30 हजार लोग मारे गए थे. वैसे हालात ना हों इसलिए दुनिया का हर बड़ा देश अपील कर रहा है कि हिंसा रोकी जाए. यूएन के सेक्रेटरी जनरल एंटोनियो गुटेरेस ने झगड़े ने गंभीर चिंता जताते हुए दोनों देशों को फायरिंग बंद करने के लिए कहा है. रूस ने फायरिंग रोकने के लिए कहा है. अमेरिका भी ऐसा ही कह रहा है. फ्रांस-जर्मनी भी दोनों देशों को बातचीत के लिए कहा है. अज़रबैजान का पड़ोसी ईरान भी कह रहा है झगड़ा नहीं सुलझा रहा तो चौधरी हम बन जाते हैं. सिर्फ तुर्की ही एक ऐसा देश है जो इस झगड़े में भी घी डाल रहा है, क्यों ऐसा रहा है वो भी बताएंगे.

अज़रबैजान और आर्मेनिया युद्ध क्यों चाहते हैं?

मामला भारत-पाकिस्तान और कश्मीर जैसा है. बिल्कुल वैसा ही है. आर्मेनिया ईसाई बहुल देश है और अज़रबैजान मुस्लिम बहुल. 100 साल पहले. यानी पहले विश्वयुद्ध के वक्त ये पूरा इलाका एक ही देश था और ट्रांस-कॉकेशियन फेडरेशन का हिस्सा था. 1918 में पहला विश्वयुद्ध खत्म हुआ तो तीन देश बना दिए गए. कौन से – आर्मेनिया, अज़रबैजान और जॉर्जिया.

अब एक तरफ वर्ल्ड वॉर खत्म हो रहा था और उधर रूस में बॉल्शेविक क्रांति हो रही थी. 1920 के दशक में जोसेफ स्टालिन ने अज़रबैजान और जॉर्जिया को भी सोवियत संघ यानी USSR में शामिल कर लिया और दोनों देशों की नई सरहद खींची गई. बस झगड़ा यहीं से शुरू हुआ. दोनों देशों के बीच एक पहाड़ी इलाका है. नाम है नगोरनो काराबाख.

Nagorny Karabakh
पहाड़ी इलाका नगोरनो काराबाख. (एएफपी)

4,400 वर्ग किलोमीटर में फैला इलाका. परंपरागत रूप से यहां ईसाई धर्म मानने वाले आर्मेनियन मूल के लोग रहते हैं. कुछ तादाद में तुर्की मूल के मुस्लिम भी हैं. जोसेफ स्टालिन ने एक बदमाशी कर दी. आर्मेनियाई मूल के लोगों का इलाका नगोरनो काराबाख को मुस्लिम बहुल अज़रबैजान के साथ मिला दिया.

लेकिन स्टालिन ने ऐसा क्यों किया?

इसके लेकर दो बात हैं. एक मत तो ये है कि स्टालिन चाहता था कि छोटे देश आपसी झगड़े में उलझे रहे हैं और USSR की सत्ता को चुनौती ना दें. दूसरा मत ये है कि नगोरनो काराबाख तुर्क मूल के अज़रबैजान देश को देकर स्टालिन तुर्की को खुश करना चाहता था. ताकि तुर्की के USSR में शामिल होने की संभावना बढ़े. वजह जो भी रही होगी लेकिन ये बंटवारा करके स्टालिन ने एक झगड़े की मजबूत नींव रख दी थी. उसी वक्त आर्मेनिया ने विरोध शुरू कर दिया. आर्मेनिया का मानना था कि नगोरना-काराबाख वाला इलाका उनकी सीमा में होना चाहिए था. तो 1923 में ही स्टालिन ने नगोरना काराबाख को स्वायत्त इलाका बना दिया लेकिन ये रहा अजरबैजान की सीमा में ही.

Joseph Stalin
सोवियत संघ के प्रमुख जोसेफ स्टालिन (एएफपी)

स्वायत्त इलाका बनने के बाद क्या हुआ?

यानी नगोरना काराबाख अज़रबैजान का एक स्वायत्त इलाका बन गया जिसमें 94 फीसदी लोग आर्मेनियाई मूल के थे. स्वायत्त इलाका बनाने के बाद भी झगड़ा चलता रहा. लेकिन युद्ध तक नहीं पहुंचा क्योंकि दोनों ही देश USSR का हिस्सा थे. लेकिन जैसे जैसे USSR कमज़ोर होता गया आर्मेनिया और अज़रबैजान का झगड़ा और बढ़ता गया.

1985 के बाद ये लगभग तय हो गया था कि अब USSR ज्यादा दिन नहीं चलेगा. तो 1988 में नगोरना काराबाख इलाके की विधानसभा ने एक प्रस्ताव पास किया. प्रस्ताव ये कि वो आर्मेनिया में मिलना चाहते हैं. इस बात से अज़रबैजान को शॉक लगा. उसे लगा कि आर्मेनिया ही नगोरना-काराबाख में अलगाववाद भड़का रहा है. और ये बात भी सही थी. दूसरी बात ये थी कि नगोरना काराबाख के ईसाई एक मुस्लिम बहुल देश के अधीन नहीं रहना चाहते थे. 1991 में सोवियत संघ के विघटित होते ही इस इलाके ने खुद को आज़ाद घोषित कर दिया.

युद्ध हुआ, हज़ारों मरे और लाखों बेघर

हालांकि दुनिया ने इस इलाके को आज़ाद नहीं माना. और फिर 1992 में युद्ध शुरू हो गया. ये युद्ध 2 साल तक चलता रहा. 30 हजार लोगों की इसमें मौत हुई थी. धार्मिक आधार पर लोगों का कत्लेआम हुआ. लाखों लोगों ने इलाका छोड़ दिया. बाद में रूस के दखल से दोनों देशों के बीच सुलह हुई. सीजफायर हो गया. और युद्धबंदी में तो ये होता है कि जिसके पास जो इलाका है वो उसके पास ही रहेगा. तो नगोरना-काराबाख अज़रबैजान से आज़ाद हो गया, खुद को एक आज़ाद मुल्क घोषित भी कर दिया था, लेकिन दुनिया के किसी देश ने मान्यता नहीं दी. और असल में वहां आर्मेनिया का दखल रहा.

Armenia Azerbaijan 1990 War
1992 युद्ध में हज़ारों लोग मरे और लाखों बेघर हुए. (एएफपी)

अब 1994 में तो मामला शांत हो गया लेकिन अज़रबैजान ने इस ख्वाहिश को दम तोड़ने नहीं दिया कि एक दिन दोबारा नगोरना-काराबाख पर कब्जा करेंगे. आधिकारिक रूप से भी नगोरना-काराबाख अज़रबैजान का ही हिस्सा है. तो आर्मेनिया समर्थित नगोरना-काराबाख के जवानों और अज़रबैजान के सैनिकों के बीच फायरिंग और हिंसा होती रहती है. 2016 में हुई हिंसा में 110 लोग मारे गए थे. इसी साल जुलाई में 16 लोग मारे गए थे.

अब यहां आता है तुर्की और उसके राष्ट्रपति अर्दोगन का रोल. अर्दोगन जो पिछले कई सालों से दुनिया के हर झगड़े में टांग अड़ाते हैं उन्होंने इन दोनों देशों की दुश्मनी भी सुलगा दी. अर्दोगन ने अज़रबैजान का समर्थन कर दिया और कह दिया कि हर तरफ अज़रबैजान की मदद करेंगे. जुलाई में युद्ध की चाहत वाले प्रदर्शनों के पीछे भी तुर्की का ही समर्थन माना गया. खुले तौर पर तुर्की मुस्लिम बहुल अज़रबैजान के साथ है और आर्मेनिया भी अकेला नहीं है. आर्मेनिया के साथ रूस है. तो असल में अज़रबैजान और आर्मेनिया वाले झगड़े में तुर्की और रूस का झगड़ा है.

Turkey President Recep Tayyip Erdogan
तुर्की के राष्ट्रपति अर्दोगन (एपी)

तो इस झगड़े में हम कहां हैं, भारत किसकी तरफ है?

भारत का अज़रबैजान और आर्मेनिया दोनों के साथ ही अच्छा रिश्ता है. चीन के बीआरआई की तरफ ही हमने भी एक रूट प्लान किया है. रूस से लेकर ईरान के चाबहार तक और फिर वहां से मुंबई तक. और ये रूट अज़रबैजान होकर गुज़रता है. तो युद्ध होता है तो हमारा भी नुकसान है. दूसरी तरफ तुर्की तो हमारे खिलाफ है. तो तुर्की के दुश्मन हमारे साथ हैं. कश्मीर मुद्दे पर आर्मेनिया पूरी तरह से भारत के साथ है. पिछले साल पीएम मोदी ने आर्मेनिया के पीएम निकोल पाश्नियान से मुलाकात भी की थी. और इससे जाहिर ही है कि पाकिस्तान किस तरफ होगा. पाकिस्तान अज़रबैजान का समर्थन कर रहा है, हालांकि शांति चाहते हैं वाली टोन में.

Narenndra Modi With Nikol Pashinyan
पीएम मोदी के साथ आर्मेनिया के पीएम निकोल पाश्नियान (पीटीआई)

कैस्पियन सागर से गैस और तेल की पाइपलाइन यूरोप की तरफ जाती है वो कॉरिडोर जहां तनाव बढ़ रहा है उससे ज्यादा दूर नही है. अगर युद्ध हुआ तो वो कॉरिडोर भी तबाह हो सकता है. इससे तेल और गैस का बाज़ार ऊपर नीचे तो होगा ही. तो सबसे हित में है कि युद्ध ना हो. ये थी आर्मेनिया और अज़रबैजान के झगड़े की पूरी कहानी.


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