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सुप्रीम कोर्ट का फैसला इन नेताओं के लिए बन सकता है मुसीबत, फिर से खुल सकते हैं बंद मुकदमे

राज्य सरकारों को अब सांसदों और विधायकों पर चल रहे क्रिमिनल केस वापस लेने के लिए हाई कोर्ट की मंजूरी लेनी होगी. आपराधिक मामलों में सजा पाने वाले सांसदों और विधायकों को हमेशा के लिए चुनाव लड़ने से रोकने के लिए दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने ये बात कही. चीफ जस्टिस एनवी रमना की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय बेंच ने सितंबर 2020 के बाद सांसदों-विधायकों के वापस लिए गए केस दोबारा खोलने को भी कहा है.

सुप्रीम कोर्ट ने अजीत बनाम केरल सरकार केस में आए फैसले का हवाला देते हुए सभी स्टेट हाई कोर्ट से अपील की है कि वे सितंबर 2020 और उसके बाद सांसदों-विधायकों के खिलाफ वापस लिए गए सभी मामलों की फिर से जांच करें. CJI ने सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को पेंडिंग केस और निपटाए गए केस का चार्ट पेश करने का आदेश भी दिया है.

सुप्रीम कोर्ट ने न्यायमित्र (एमिकस क्यूरी) विजय हंसारिया की रिपोर्ट पर ये बड़ा कदम उठाया है. रिपोर्ट में बताया गया है कि राज्य सरकारें आपराधिक रिकॉर्ड वाले विधायकों पर चले मामलों को वापस लेना चाहती हैं. विजय हंसारिया की रिपोर्ट के मुताबिक, यूपी सरकार मुजफ्फरनगर दंगों के आरोपी बीजेपी विधायकों के खिलाफ दायर 76 मामले वापस लेना चाहती है. कर्नाटक सरकार विधायकों के खिलाफ 61 मामलों को वापस लेना चाहती है. उतराखंड और महाराष्ट्र सरकार भी इसी तरह केस वापस लेना चाहती हैं. लेकिन सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद इस सिलसिले में राज्य सरकारों और विधायकों की मुश्किलें बढ़ सकती हैं.

इस स्टोरी में हम ये जानने की कोशिश करेंगे कि सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई में जिन राज्यों का जिक्र हुआ, वहां किन-किन नेताओं के खिलाफ बंद मुकदमे फिर से खुल सकते हैं. ये भी जानेंगे कि इन नेताओं पर केस क्या हैं और उन्हें बंद करने की वजह क्या बताई गई थी. शुरुआत यूपी से करते हैं.

यूपी का क्या मामला है?

उत्तर प्रदेश की योगी आदित्यनाथ सरकार ने इसी साल मुजफ्फरनगर दंगे के 40 आरोपियों पर से केस वापस ले लिए थे. इनमें योगी सरकार के मंत्री सुरेश राणा, बीजेपी विधायक संगीत सोम, बीजेपी नेता भारतेंदु सिंह और साध्वी प्राची जैसे नेता शामिल हैं. इन लोगों पर आरोप था कि इन्होंने मुज़फ्फरनगर के नंगला मंदौड़ इलाके में एक सभा कर दूसरे धर्म के लोगों के खिलाफ भड़काऊ भाषण दिए, जिससे दंगा भड़का. दिसंबर 2020 में यूपी सरकार ने बीजेपी नेताओं के खिलाफ दर्ज केस वापस लेने की सिफारिश की थी. सरकारी वक़ील राजीव शर्मा ने बताया था कि विशेष अदालत ने याचिका को स्वीकार करते हुए केस वापस लेने की सहमति दी थी.

वहीं मार्च में ही यूपी के कानून मंत्री बृजेश पाठक ने विधानसभा में कहा था,

1 अप्रैल 2017 से 20 जुलाई 2020 तक 670 मुकदमे वापस लेने की संस्तुतियां जनहित में की गई हैं. ये मुकदमे राजनेताओं और राजनीति कार्यकर्ताओं से संबंधित हैं.

संगीत सोम के साथ सुरेश राणा
संगीत सोम के साथ सुरेश राणा (फाइल फोटो)

वहीं, राज्यमंत्री कपिल देव अग्रवाल ने कहा था कि दंगे के समय यूपी में समाजवादी पार्टी की सरकार थी. कपिल देव अग्रवाल ने आरोप लगाते हुए कहा कि तत्कालीन सपा सरकार ने राजनीतिक बदले के लिए भाजपा नेताओं और हिंदू संगठनों के पदाधिकारियों पर केस दर्ज कराया था, जो फर्जी मुकदमे थे.

गौरतलब है कि 2013 में हुए मुजफ्फरनगर दंगों में 62 लोगों की जान चली गई थी और हजारों लोग बेघर हो गए थे. इस मामले में शीखेड़ा थाना इंचार्ज ने खुद ही नोटिस लेकर संगीत सोम, कपिल देव अग्रवाल, सुरेश राणा, साध्वी प्राची और दूसरे लोगों पर भड़काऊ भाषण देने और समुदाय विशेष के खिलाफ भड़काने के आरोप के तहत केस दर्ज कराया था.

2017 में यूपी में योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में बीजेपी की सरकार बनी. इसके बाद सीएम योगी आदित्यनाथ के खिलाफ 20 साल से भी पुराना केस वापस लेने का फैसला उनकी सरकार ने किया था. ये मुकदमा 27 मई, 1995 को गोरखपुर के पीपीगंज थाने में दर्ज किया गया था. इसमें योगी आदित्यनाथ सहित 13 लोगों पर आईपीसी की धारा 188 लगाई गई थी. मामले में उनके खिलाफ गैर-जमानती वारंट का ऑर्डर भी हुआ था.

कर्नाटक

कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की अगुवाई वाली सरकार ने मंत्रियो सहित कई नेताओं के खिलाफ दर्ज मुकदमे वापस लेने का आदेश दिया था. स्क्रॉल की 3 सितंबर, 2020 की एक खबर के मुताबिक, बीजेपी सरकार ने पार्टी के सांसदों, विधायकों और अन्य जनप्रतिनिधियों के खिलाफ दर्ज 62 मुकदमे वापस लेने का फैसला किया था. कर्नाटक के मौजूदा सीएम बसवराज बोम्मई उस समय राज्य के गृह मंत्री थे. उन्हीं की अगुवाई में गठित कमेटी की सिफारिश पर ये फैसला लिया गया था.

जिन मामलों को वापस लेने का फैसला किया गया था उनमें तत्कालीन कानून मंत्री जेसी मधुस्वामी और टूरिस्ट मंत्री सीटी रवि के खिलाफ दर्ज केस भी शामिल थे. इन दोनों पर सेक्शन 143 (अवैध तरीके से इकट्ठा होने) और 147 (दंगा) के तहत मामला दर्ज था, जो 2015 में मैसूर जिले के हुनसुर शहर में दो समुदायों के छात्रों के बीच हुई हाथापाई से संबंधित था.

Bs Yediyurappa Karnataka
बीजेपी नेता और कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री बी एस येदियुरप्पा (फाइल फोटो- PTI)

कथित तौर पर वापस लिए गए मामलों में कर्नाटक के कृषि मंत्री बीसी पाटिल के खिलाफ दर्ज एक मामला भी शामिल था. हालांकि कर्नाटक हाई कोर्ट ने केस वापस लेने के तत्कालीन सरकार के फैसले पर रोक लगा दी थी.

उत्तराखंड

न्यायमित्र ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि उत्तराखंड में मौजूदा विधायक राजकुमार ठुकराल के खिलाफ हत्या का मामला वापस लेने के लिए आवेदन दिया गया है.  हालांकि ये मामला निचली अदालत में लंबित है. दो अक्टूबर, 2011 को रुद्रपुर में सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे थे, जिसमें चार लोगों की हत्या कर दी गई थी और कई लोग घायल हो गए थे. 2012 में कांग्रेस सरकार के सत्ता में आने के बाद मामले की जांच सीबी-सीआईडी को सौंप दी गई थी, जिसने विधायक ठुकराल सहित कई लोगों के खिलाफ गंभीर मामलों में केस दर्ज किए थे.

बीजेपी का आरोप रहा कि ठुकराल का करियर बर्बाद करने की नीयत से राजनीतिक साजिश के तहत उन्हें दंगों के सात महीने बाद आरोपी बनाया गया, जबकि पहली जांच में उनके खिलाफ कोई मामला नहीं था. ठुकराल के खिलाफ मामला वापस लेने के लिए तत्कालीन कांग्रेस सरकार पर दबाव बनाने की कोशिश बीजेपी की तरफ से की गई थी. इस सिलसिले में फरवरी 2014 में बीजेपी विधायकों ने विधानसभा की कार्यवाही ठप करवा दी थी.

राज्य में बीजेपी के सत्ता में आने के बाद विधायक राजकुमार ठुकराल के खिलाफ केस वापस लेने के लिए सरकार ने अर्जी दाखिल की, जो निचली अदालत में लंबित है.

महाराष्ट्र

सुप्रीम कोर्ट में बताया गया कि महाराष्ट्र सरकार ने भी 31 दिसंबर 2019 से पहले नेताओं और विधायकों पर हुए केस वापस लेने की तैयारी की है. इसके लिए टाइम्स ऑफ इंडिया की एक रिपोर्ट का हवाला दिया गया है. कहा गया कि 14 मार्च 2016 को तत्कालीन महाराष्ट्र सरकार ने एक आदेश जारी किया था, जिसमें मई 2005 से नवंबर 2014 के बीच दर्ज इसी तरह के मामलों को वापस लेने की अनुमति दी गई थी.

किस कानून के तहत केस वापस लेती हैं राज्य सरकारें?

CRPC की धारा-321 के तहत राज्य सरकारों को केस वापस लेने का अधिकार दिया गया है. इस बारे में और जानकारी के लिए हमने बात की क्रिमिनल लॉयर एडवोकेट मनमोहन सिंह से. उन्होंने बताया,

नॉर्मल केस में दो लोग केस लड़ते हैं. जैसे मान लीजिए सिविल केस है तो वो A और B के बीच लड़ा जाता है. लेकिन क्रिमिनल मामलों में एक पार्टी आरोपी होता है, लेकिन विक्टिम की तरफ से सरकार लड़ती है. सरकार चाहे तो उस केस के प्रोसिक्यूशन को कभी भी ड्रॉप कर सकती है. सरकारी वकील इस बारे में एप्लिकेशन फाइल करता है. लेकिन ये कोर्ट देखता है कि केस ड्रॉप करने लायक बनता है कि नहीं. हालांकि सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले कहते हैं कि हर केस को वापस नहीं लिया जा सकता. अगर गंभीर अपराधिक मामला है तो केस वापस नहीं लिया जा सकता.

मंगलवार 10 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अगर कोई आवेदन सीआरपीसी की धारा 321 के तहत किया जाता है, तो न्यायालय ये आंकलन करने के लिए बाध्य हैं कि क्या प्रथम दृष्टया मामला बनता है या नहीं और उसके पास आवेदन खारिज करने का अधिकार है. वहीं, नेताओं के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि उनके खिलाफ दर्ज केस हाई कोर्ट की अनुमति के बाद ही वापस हों.


मुज़फ्फरनगर दंगे मामले में BJP नेता सुरेश राणा और संगीत सोम सहित 40 लोगों पर से केस हट गया!

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