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असली बाहुबली फिल्म वाला नहीं, ये है!

मकसद सिर्फ इतना सा है कि आपके दिमाग में बाहुबली की एक और तस्वीर नत्थी कर दी जाए, ताकि अगली बार जब आप बाहुबली सुनें, तो सिर्फ शिवलिंग उठाए हुए प्रभाष के बारे में सोच कर ही ना रह जाएं.

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कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा? कश्मीर में तनाव की स्थिति और नक्सली हमले के बीच यही एक चीज राष्ट्रीय चिंता का विषय है. जिसे पता है, वो बता नहीं रहा है और जो नहीं जान रहा है, वो पिछड़ जाने की हीनता का शिकार होता जा रहा है.

शब्द महज शब्द नहीं होते हैं, बल्कि वो छवियों का पुलिंदा होते हैं. मसलन जब आप “सेब” सुनते हैं तो आपके दिमाग में पर्टिकुलर तस्वीर बनती है. आप सेब के नाम पर संतरे को याद नहीं करते हैं. एक शब्द के साथ कई तस्वीरें जुड़ी हो सकती हैं. जैसे कि राहुल नाम से आपको राहुल द्रविड़ भी याद आ सकते हैं और साथ काम कर रहा कोई राहुल वर्मा भी. ज्यादा टटोलने पर साथ पढ़ा हुआ कोई राहुल गुप्ता भी. हमारा दिमाग इसी तरह से काम करता है. वो उन तस्वीरों को पहले पेश करता है, जिनसे हमारा सबसे ज्यादा साबका पड़ता हो.

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इस दौर में जब चारों ओर बाहुबली शब्द की बमबारी हो रही है, हम आपको एक और बाहुबली की कहानी सुना रहे हैं. मकसद सिर्फ इतना सा है कि आपके दिमाग में बाहुबली की एक और तस्वीर नत्थी कर दी जाए, ताकि अगली बार जब आप बाहुबली सुनें तो सिर्फ शिवलिंग उठाए हुए प्रभाष के बारे में सोच कर ही ना रह जाएं.

जैन मिथक के अनुसार अयोध्या पर इक्ष्वाकु वंश का राज हुआ करता था. इस वंश के एक राजा हुए ऋषभ देव. उनमें वैराग पैदा हुआ और अपना राजपाट सौ बेटों को सौंप कर वो चल दिए कैवल्य की साधना में. उनका सबसे बड़ा बेटा था भरत. जैन मानते हैं कि यही वो भरत हैं, जिनकी वजह से इस देश का नाम भारत पड़ा. राज्य के बंटवारे में भरत को मिला अयोध्या का राज और उनके छोटे भाई बाहुबली को मिला अस्माका का राज. यह अस्माका पड़ता है दक्षिण भारत में. इसकी राजधानी हुआ करती थी पोदनपुर.

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एक दिन भरत अपने दरबार में बैठे हुए थे. उन्हें एक के बाद एक तीन शुभ समाचार मिले. सबसे पहले माली ने आ कर बताया कि उनके पिता ऋषभदेव की साधना सफल हुई है. ऋतुचक्र अनुकूल हो गया है. लहलहाते पेड़ इस बात की गवाही दे रहे हैं. दूसरा शुभ समाचार मिला आयुधशाला से. नौरत्नों के जरिए उन्हें चमत्कारी चक्र की प्राप्ति हुई है. तीसरा समाचार मिला रानीवास से कि उन्हें बेटा हुआ है.

अब चक्र मिलने से भरत चक्रेश माने चक्र के मालिक तो हो गए, चक्रवर्ती नहीं. भरत ने अपने इस दिव्य चक्र को सभी दिशाओं में भेजा, ताकि वो छह खंड पृथ्वी को जीत कर खुद को चक्रवर्ती घोषित कर सकें. कहते हैं कि सब जगह जीत दर्ज करके लौटा यह चक्र अयोध्या के द्वार पर रुक गया. इस घटना की पड़ताल हुई तो पता लगा कि उनके ही भाई बाहुबली ने चक्र के सामने सिर झुकाने से इनकार कर दिया था. अब भरत को तो चक्रवर्ती बनना ही था. घोड़ों पर काठी कसी जाने लगी. भालों और तलवारों को पैना किया गया. अयोध्या की सेना चल पड़ी पोदनपुर.
दोनों भाई आमने-सामने हो गए. उनके पिता द्वारा स्थापित जैन परंपरा का मूल सिद्धांत ‘अहिंसा’ ही खतरे में पड़ गया. तो अपने मंत्रियों की सलाह से दोनों ने ऐसा रास्ता निकाला जिसमें बिना रक्तपात के फैसला हो सके. तो तय यह हुआ कि भरत और बाहुबली में तीन किस्म के युद्ध होंगे. पहला दृष्टि युद्ध, दूसरा जल युद्ध और तीसरा मल्ल युद्ध.

तो हुआ यह कि बाहुबली तीनों युद्धों में भरत पर भारी पड़े. इससे भरत क्रोधित हो गए. उनका चक्रवर्ती बनने का सपना चूर-चूर हो गया. ऐसे में उन्होंने अपना सबसे भरोसेमंद हथियार मंगवाया, चक्र. लेकिन चक्र को पता लग गया भाई-भाई वाला मामला है. उसने बाहुबली के चारों तरफ तीन चक्कर काटे और वापस चला गया.

इधर बाहुबली को अपने ही बड़े भाई पर हाथ उठाने पर पछतावा होने लगा. उन्होंने सभी भौतिक सुख छोड़ कर जंगल का रास्ता लिया. अपना राजपाट भाई भरत को सौंप दिया. इस तरह युद्ध हार कर भी भरत चक्रवर्ती सम्राट बन गए. जैन मिथकों के हिसाब से भरत इस दुनिया के पहले चक्रवर्ती थे.

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हो सकता है ये महज एक कहानी हो लेकिन कर्नाटक के श्रवणबेलगोला में 57 फीट की मूर्ति एकदम असली है. एक पत्थर से बनी यह अपने आप में अनोखी मूर्ति है. मान्यताओं के मुताबिक, वर्ष 983 में यहां के गंग शासक रचमल्ल के शासनकाल में चामुण्डराय नामक मंत्री ने बाहुबली की इस विशाल प्रतिमा का निर्माण करवाया था. मूर्ति के एक तरफ पाषाण में गहरे अक्षरों में खुदा हुआ है, ‘‘चावुंडराजे करवियले, गंगराजे सुत्ताले कर वियले.’’ यह मराठी भाषा है अर्थात् इस मूर्ति का निर्माण चामुण्डराय ने करवाया है और इसके चारों तरफ की प्रदक्षिणा गंगराज ने बनवाई है.

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