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भारत एक सेक्युलर मुल्क है फिर विधानसभा में नमाज़ के लिए कमरा क्यों!

# राज्य धर्म के मामले में पूरी तरह तटस्थ है. वो किसी भी धर्म के साथ नहीं है और राज्य का कोई धर्म नहीं है. राज्य प्रत्येक धर्म को समान रूप से संरक्षण प्रदान करता है. वो किसी भी धर्म में हस्तक्षेप नहीं करता है.

# झारखंड विधानसभा भवन (Jharkhand Assembly). कमरा संख्या  TW-348. इस कमरे को नमाज़ कक्ष (Namaz Room) बनाया गया है. यहां मुस्लिम विधायक और अन्य मुस्लिम कर्मचारी नमाज़ पढ़ सकेंगे. ये आदेश विधानसभा अध्यक्ष रविंद्रनाथ महतो की तरफ़ से विधानसभा सचिवालय ने जारी किया है.

ऊपर दिए गए दोनों तथ्यों को ध्यान से पढ़िए और सोचिए कि क्या ये दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं. पहला तथ्य उस संविधान की भावना प्रकट करता है जिससे देश चलता है. दूसरा तथ्य भारत के एक राज्य का किसी धर्म विशेष के लिए खास व्यवस्था करने से जुड़ा है. भारत का संविधान बार-बार हर तरीके से ये बात समझाता है कि राज्य का कोई धर्म नहीं है. संविधान की इस भावना को सुप्रीम कोर्ट वक्त-वक्त पर फैसले देकर मजबूत करता है. लुब्बेलुबाब ये कि राज्य को धर्म के मामले में हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. ऐसे में एक राज्य की विधानसभा कैसे किसी खास धर्म के लिए कमरा आरक्षित कर सकती है?

फिर सवाल ये भी उठता है कि सिर्फ एक ही धर्म के लिए ऐसी व्यवस्था क्यों हो? विधानसभा में हनुमान मंदिर और देवी के उपासक अपना मंदिर भी चाहेंगे. कुछ विधानसभाएं ऐसी होंगी जहां गुरुद्वारे और चर्च के लिए जगह देने की मांग होगी. संविधान और तर्क दोनों का तकाज़ा यही है कि नमाज़ के लिए कमरा अलॉट करके एक गलत और असंवैधानिक उदाहरण न पेश किया जाए. इस तरह के फैसलों से हो सकता है राज्य सरकारों के राजनीतिक हितों की दीवार मजबूत हो, लेकिन संविधान की नींव कमजोर होती है.

भारत का संविधान कहता है कि राज्य ‘पंथनिरपेक्ष’ है. भारत के संविधान के अनुच्छेद 25 से लेकर 28 तक सभी नागरिकों को धर्म की स्वतंत्रता का मौलिक अधिकार दिया गया है.

Bjp Mlas Protest In Ranchi
झारखंड विधानसभा में नमाज के लिए अलग से कमरा दिए जाने का विरोध करते बीजेपी के विधायक. (तस्वीर- पीटीआई)

पंथनिरपेक्ष मतलब एक ऐसा राज्य जो किसी खास धर्म के साथ नहीं जुड़ा हुआ. राज्य का कोई धर्म नहीं है. राज्य का पंथनिरपेक्ष स्वरूप का कोई रहस्यवाद नहीं है. ये न तो ईश्वर विरोधी है और न ही ईश्वर को समर्थित है. इस मामले में ये बिल्कुल तटस्थ है. ये प्रभु के चरणों में अर्पित भक्तों, भगवान-ईश्वर-अल्लाह की अवधारण पर शंका करने वालों और नास्तिक, सभी को समान मानता है. संविधान ने ईश्वर के संबंध में किसी राज्य को धर्म विशेष के लिए अधिकार और स्थान नहीं दिया है. संविधान में ये बात सुनिश्चित की गई है कि धर्म के आधार पर किसी के विरुद्ध भेदभाव न किया जाए.

हमारी नहीं मानते तो विषय के जानकारों की सुन लीजिए. लोकसभा के पूर्व सेक्रेट्री जनरल पीडीटी आचारी विधानसभा में नमाज़ के कमरे को असंवैधानिक मानते हैं. दैनिक जागरण अखबार ने उनके हवाले से लिखा है,

“मैंने ऐसा पहले कभी देखा, सुना नहीं. विधानसभा एक सेक्युलर बॉडी (पंथनिरपेक्ष संस्था) है. उसका धर्म से कोई लेना-देना नहीं है. उसमें धार्मिक गतिविधि की बॉडी नहीं होनी चाहिए. भारत पंथनिरपेक्ष राष्ट्र है. राष्ट्र का कोई धर्म नहीं होता.”

ऐसी ही बात संविधान के विशेषज्ञ सुभाष कश्यप भी कहते हैं. वो इस बात को मानते हैं कि नमाज़ के लिए कमरा देना भले ही विधानसभा स्पीकर का विशेषाधिकार है, लेकिन सदन स्पीकर से बड़ा होता है. वो कहते हैं,

“झारखंड विधानसभा में नमाज के लिए नमाज कक्ष आवंटित करना अनुचित और औचित्य के विरुद्ध है. ये संविधान की भावना के खिलाफ है.”

बच्चों को पढ़ाया, लेकिन खुद भूल गए

संविधान की भावना को समझना इतना मुश्किल भी नहीं. बचपन से ही नागरिक शास्त्र पढ़ा कर देश और देश को चलाने वाले संविधान का ककहरा सिखाने की कोशिश शुरू होती है. NCERT की किताब में नागरिक शास्त्र की किताब में पंथनिरपेक्षता और राज्य को बहुत आसान किस्से के जरिए समझाया गया है. चैप्टर का नाम है ‘धर्म निरपेक्षता की समझ.’

कहानी सीमापुरी के एक सरकारी स्कूल की है. स्कूल में पढ़ने वाली मासूम बच्ची अपने टीचर से कह रही है,

“अगले महीने एक बहुत बड़ा त्योहार आ रहा है. हमने कभी अपने स्कूल में इस त्योहार को क्यों नहीं मनाया. क्या इस बार मनाएं?”

टीचर मुस्कुराते हुए जवाब देता है,

“नहीं रेखा. ऐसा नहीं हो सकता. हमारा सरकारी स्कूल है. हम किसी एक धर्म को महत्व नहीं दे सकते. निजी स्कूल जो चाहे करें. सरकारी स्कूल अपनी चारदीवारी के भीतर कोई भी धार्मिक आयोजन नहीं कर सकते.”

(पूरा चैप्टर यहां पर क्लिककरके पढ़ सकते हैं.)

Ncert Book Civics
एनसीईआरटी की किताब में एक कहानी के जरिए सरकार और पंथनिरपेक्षता को बखूबी समझाया गया है.
(फोटो-NCERT)

सरकारी मतलब धर्म से अलग

एक बात और, संविधान में सभी धर्मों को बराबर मानने और किसी खास धर्म से जुड़ाव का फॉर्मूला सिर्फ विधानसभा या सरकारी स्कूलों तक सीमित नहीं है. किसी भी सरकारी कार्यालय या परिसर में किसी भी तरह के धार्मिक आयोजन और प्रतीकों का लगाया जाना भी संविधान की पंथनिरपेक्ष भावना के खिलाफ है. मतलब अगर किसी थाने या पुलिस लाइन में माता का जगराता हो रहा है, तो वो भी उतना ही गलत है जितना किसी सरकारी ऑफिस में इफ्तार पार्टी का किया जाना. अगर किसी को ऐसा आयोजन करना है तो प्राइवेट जगह किराए पर लेकर खुशी-खुशी कर सकता है. संविधान तो किसी सरकारी अधिकारी को पदासीन हैसियत से किसी धार्मिक अनुष्ठान में शामिल होने का भी निषेध करता है.

कुल मिलाकर बात इतनी सी है कि देश का संविधान सभी को अपने धर्म और आस्था की छूट देता है. विधानसभा का कोई सदस्य अगर सदन के चलते वक्त भी नमाज़ पढ़ना चाहे तो विधानसभा अध्यक्ष से अवकाश लेकर पास की मस्जिद में नमाज़ पढ़ने जा सकता है. ऐसा ही काम हिंदू, सिख या ईसाई सदस्य भी अपनी प्रार्थना के लिए कर सकते हैं. लेकिन किसी खास धर्म के लिए विधानसभा में एक खास जगह मुहैया कराना पूरी तरह से संविधान की भावना पर चोट करता है.


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