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इज़रायल का एक वायुसेना अधिकारी, जिसके बारे में 35 साल से कुछ नहीं पता फिर भी तलाश जारी है

मिसिंग इन ऐक्शन. इसका मतलब होता है – लड़ाई के दौरान गायब हुआ वो सैनिक, जिसके ज़िंदा होने या मरने की पुष्टि होनी बाकी हो. रॉन एराड का नाम पिछले 35 सालों से इसी लिस्ट में शामिल है. अक्टूबर 1986 में लेबनान में फ़िलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन (PLO) के ठिकाने पर बमबारी करते समय उनका फ़ाइटर जेट क्रैश कर गया था. रॉन एराड इज़रायल की वायुसेना में अफ़सर थे. एराड के साथ मिशन पर यिहाई एविराम भी आए थे. वो ड्राइविंग सीट पर बैठे थे. जैसे ही जेट क्रैश हुआ, दोनों ने ख़ुद को प्लेन से इजेक्ट कर लिया. वे दोनों दुश्मन के इलाके में सुरक्षित उतर गए. दुर्घटना की ख़बर मिलते ही बैकअप हेलिकॉप्टर उनके बचाव के लिए आया. एविराम को तो वहां से तुरंत निकाल लिया गया. मगर रॉन एराड का कहीं कोई अता-पता नहीं था.

एराड तो नहीं मिले, पर कुछ समय बाद लेबनान से एक चिट्ठी मिली. इसका मज़मून ये था कि तुम्हारा एक सैनिक हमारे क़ब्ज़े में है. अगर उसकी सलामती चाहते हो तो हमारी शर्तें मान लो. इस चिट्ठी ने साफ़ कर दिया था कि रॉन एराड का अपहरण हो चुका है. आख़िर, रॉन एराड का अपहरण किसने किया? लेबनान में उतरने के बाद उनके साथ क्या हुआ था? 35 साल बीतने के बाद भी इज़रायल उनका पता क्यों नहीं लगा पाया? और, ये कहानी आज क्यों सुना रहे हैं? सब विस्तार से बताएंगे.

रॉन एराड का अपहरण किसने किया था?

पहला सवाल. लेबनान में उतरने के बाद रॉन एराड का अपहरण किसने किया था? जब काफ़ी जांच पड़ताल के बाद भी एराड का पता नहीं चला, तो इज़रायल ने मान लिया कि उनकी मौत हो चुकी है. हालांकि, इसकी पुष्टि करने लायक सबूत उनके पास नहीं थे. कुछ महीनों के बाद एराड की ख़बर गुम होने लगी थी. तभी लेबनान से एक लिफाफा आया. इसमें रॉन एराड की हैंडराइटिंग में लिखी एक चिट्ठी थी. साथ में उनकी कुछ तस्वीरें भी थीं.

इस चिट्ठी का एक हिस्सा पढ़िए-

मुझे उम्मीद है कि हम एक-दूसरे को फिर से देख पाएंगे. यौम कपूर नजदीक है. मैं तुम्हारे साथ सबकी सलामती की दुआएं मांगना चाहता हूं. भरोसा रखो कि ईश्वर राजनेताओं को सही फ़ैसला लेने में मदद करेंगे. हौसला मत हारना. अच्छे दिन आएंगे. मैं उस दिन का इंतज़ार करूंगा.

इस चिट्ठी के बाद रॉन एराड की चर्चा फिर से शुरू हो गई. इज़रायल के अलावा इंटरनैशनल मीडिया ने भी उनकी ख़बर को प्रमुखता से छापा. उनकी रिहाई के लिए कैंपेन चलने लगे. इससे इज़रायल सरकार पर दबाव बना. तब तक ये बात मालूम चल चुकी थी कि एराड को लेबनान के शिया चरमपंथी गुट अमाल मूवमेंट ने उठाया था. इज़रायल ने अमाल के साथ बातचीत शुरू की.

अमाल की अपनी शर्त थी. उसका कहना था रॉन एराड के बदले में 200 लेबनानी और 450 फ़िलिस्तीनी क़ैदियों को रिहा करना होगा. इसके अलावा, लगभग 22 करोड़ रुपये की फिरौती भी देनी होगी. इज़रायल ने ये शर्त मानने से मना कर दिया. जैसे ही समझौता टूटा, वैसे ही रॉन एराड की चिट्ठी आनी बंद हो गई. उनके बारे में किसी भी तरह की जानकारी बाहर नहीं आ रही थी. लेकिन इज़रायल पीछा छोड़ने के मूड में नहीं था. उसने अमाल को उसी की भाषा में जवाब देने का मन बना लिया था.

1989 का ऑपरेशन

28 जुलाई 1989 की बात है. लेबनान के जिबशित गांव में तड़के सुबह कुछ हेलिकॉप्टर्स उतरे. उनमें दो दर्ज़न से अधिक इज़रायली कमांडो बैठे हुए थे. हेलिकॉप्टर लैंड होते ही कमांडोज़ ने अपना काम शुरू कर दिया. उनके निशाने पर हेज़बुल्लाह का एक लीडर था. शेख़ अब्दुल करीम ओबैद. उन्होंने उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया. अंदर से पहचान बताने के लिए कहा गया. इज़रायली अपने साथ एक अरबी बोलने वाले को लेकर आए थे. जैसे ही बाहर से अरबी सुनाई पड़ी, दरवाज़ा खुल गया.

जब तक अंदर मौजूद लोगों को संभलने का मौका मिलता, इज़रायली सैनिकों ने सबको काबू में कर लिया था. जब ओबैद की पत्नी ने शोर मचाया तो उसे दूसरे कमरे में बंद कर दिया गया. पूरा ऑपरेशन कुछ ही मिनटों में खत्म हो गया. उन्हें ओबैद मिल चुका था. जैसे ही इज़रायली सैनिक बाहर निकलने लगे, बगल के घर से एक व्यक्ति ने शोर मचाने की कोशिश की. उसे वहीं पर गोली मार दी गई.

इसके बाद तो हंगामा मच गया. अमाल के लड़ाके गांव में जुटने लगे. मस्जिदों से ऐलान होने लगा कि इज़रायली सैनिकों को बाहर नहीं जाने देना है. लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी. शेख़ ओबैद को उठाकर इज़रायल लाया जा चुका था. इज़रायल को उम्मीद थी कि शेख़ ओबैद उन्हें रॉन एराड के बारे में जानकारी देगा. वैसे उसकी तलाश कुछ और मामलों में भी थी. अगर वो एराड का पता नहीं बताता तो दूसरा ऑप्शन भी तैयार रखा गया था. इज़रायल ओबैद के बदले में एराड को छुड़ाने का मन बना चुका था.

दोनों प्लान फेल

बाद में ये दोनों प्लान फ़ेल हो गए. ओबैद ने कोई जानकारी देने से मना कर दिया. वहीं, लेबनान के चरमपंथी गुटों ने भी उसमें कोई दिलचस्पी नहीं दिखाई. शेख़ ओबैद को 15 सालों तक बिना किसी चार्ज़ के जेल में बंद रखा गया. हालांकि, शेख़ ओबैद इकलौता नहीं था, जिसे रॉन एराड की रिहाई के लिए किडनैप किया गया था. एक दूसरा आदमी भी था. उसका नाम था, मुस्तफ़ा दिरानी.

मई 1994 में इज़रायल में एक स्पेशल कैबिनेट मीटिंग हुई. उस समय के प्रधानमंत्री यित्हाक राबिन के सामने एक प्रस्ताव लाया गया. राबिन ने पूछा, क्या हमारे पास कोई और ऑप्शन नहीं है?

जवाब मिला, ये हमारी आख़िरी उम्मीद है.

राबिन ने इसके बाद कोई सवाल नहीं पूछा. उन्होंने चुपचाप प्रस्ताव पर दस्तखत कर दिए. इस मीटिंग के कुछ दिनों बाद दो इज़रायली हेलिकॉप्टर्स लेबनान में दाखिल हुए. उन्हें दिरानी के बारे में पक्की टिप मिली थी. वे सीधे उसके घर पहुंचे और उसे उठाकर इज़रायल ले आए. पूरे ऑपरेशन के दौरान एक भी गोली नहीं चली थी.

जब इस ऑपरेशन की ख़बर बाहर आई तो इज़रायल की ख़ूब आलोचना हुई. ओबैद मामले में पहले ही उनकी भद्द पिट चुकी थी. आलोचनाओं के बीच सरकार ने दिरानी की किडनैपिंग को सही ठहराया. विदेश मंत्री शिमोन पेरेज़ ने कहा कि इज़रायल ने सभी कूटनैतिक उपाय अपनाकर देख लिए. लेकिन हम कैप्टन एराड को छुड़ाने में नाकाम रहे.

सरकार का स्टैंड

सरकार ने आधिकारिक बयान में माना कि दिरानी को किडनैप करना सही तरीका नहीं है. लेकिन समय की कमी के चलते ये कदम उठाना पड़ा. इस बयान में एक लाइन और थी. क्या?

‘हम रॉन एराड को ट्रैक करने में पीछे रह गए. लेकिन हमें उम्मीद है कि मुस्तफ़ा दिरानी से हमें काम की जानकारी मिल जाएगी.’

तो क्या इज़रायल को काम की जानकारी मिली? इसका जवाब हां में भी है और नहीं में भी. मुस्तफ़ा दिरानी को इज़रायल की कुख्यात ‘कैम्प 1391’ में रखा गया. 2003 से पहले इस जेल के बारे में बहुत कम लोग जानते थे. ये जेल मैप और हवाई फ़ोटोग्राफ़्स में भी नहीं दिखती थी.

दिरानी से यहीं पर पांच हफ़्तों तक पूछताछ की गई. मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, पूछताछ में उसने रॉन एराड को किडनैप करने की बात कबूूल ली. दिरानी उस समय अमाल मूवमेंट में सिक्योरिटी का काम देखता था. बाद में वो अमाल से अलग हो गया. उसने अपना गुट बना लिया था. दिरानी ने बताया कि उसने एराड को पहले हेज़बुल्लाह को दिया. फिर वहां से उसे ईरान के रेवॉल्युशनरी गार्ड्स को बेच दिया गया. ईरान के ‘रेवॉल्युशनरी गार्ड्स’ हेज़बुल्लाह के लड़ाकों को ट्रेनिंग देने के लिए लेबनान आए हुए थे. ख़बर चली कि एराड को ईरान की जेल में बंद रखा गया है. उसे किसी से मिलने नहीं दिया जा रहा है. ईरान और हेज़बुल्लाह, दोनों ने एराड के बारे में किसी तरह की जानकारी होने से इनकार कर दिया.

हेज़बुल्लाह और इज़रायल की डील

फिर आया साल 2004 का. हेज़बुल्लाह और इज़रायल के बीच एक डील हुई. इसके तहत, हेज़बुल्लाह तीन इज़रायली सैनिकों की लाशें और एक बिजनेसमैन को लौटाने वाला था. इसके बदले में इज़रायल ने अपनी जेल में बंद चार सौ क़ैदियों को रिहा करने के लिए राज़ी था. इसमें शेख़ ओबैद और मुस्तफ़ा दिरानी का नाम भी था. इससे ठीक पहले दिरानी को तेल अवीव की एक अदालत में पेश किया गया. अदालत में दिरानी ने इज़रायली सैनिकों पर नंगा करके टॉर्चर करने, बेहोश होने तक पीटने और बलात्कार करने जैसे संगीन आरोप लगाए. उसने ये भी कहा कि रॉन एराड बस एक रात के लिए उसके पास थे. इसके बाद उनके साथ क्या हुआ, इस बारे में उसे कोई जानकारी नहीं है. मतलब ये कि दिरानी अपने पुराने बयान से मुकर गया था.

जनवरी 2004 में दिरानी रिहा हो गया. इज़रायल की जांच का पहिया फिर से शून्य पर अटक चुका था. वे जहां से चले थे, उससे आगे के बारे में उन्हें कोई जानकारी नहीं थी. इस डील को लेकर इज़रायल के राष्ट्रपति एरियल शेरॉन की ज़बरदस्त आलोचना हुई. इस डील में रॉन एराड का कोई नामोनिशान नहीं था. उनकी फ़ैमिली और उनके दोस्तों ने सरकार पर एराड को भुला देने का इल्ज़ाम लगाया. शेरॉन ने अपना बचाव किया. उन्होंने कहा कि हेज़बुल्लाह ने एराड के बारे में इंटरनल जांच चलाने का वादा किया है.

जनवरी 2006 में हेज़बोल्लाह के सरगना हसन नसरल्लाह ने एक इंटरव्यू दिया. रॉन एराड के सवाल पर उसने कहा कि मेरा एनालिसिस कहता है कि उसकी मौत हो चुकी है. नसरल्लाह की थ्योरी ये थी कि एराड किडनैपर्स के चंगुल से तो भाग निकले, लेकिन पहाड़ों में फंसकर उनकी जान चली गई. इसके बाद से उनका कोई अता-पता नहीं चला.

इज़रायल का सीक्रेट मिशन

एराड की फ़ैमिली ने इस दावे को खारिज कर दिया. इजरायल में ये बात मानने के लिए कोई भी तैयार नहीं था. 2004 में इज़रायल डिफ़ेंस फ़ोर्सेज़ (IDF) की खुफिया ब्रांच ने एक सीक्रेट कमीशन बनाया. कमीशन ने सभी उपलब्ध बयानों और सबूतों की जांच के बाद निष्कर्ष दिया कि 1995 में रॉन एराड की मौत हो चुकी है. मौत की वजह क्या बताई गई? इस बारे में कहा गया कि बीमार पड़ने पर एराड को इलाज मुहैया नहीं कराया गया. जिसके चलते उनकी मौत हो गई. उनकी लाश को बेका घाटी में ही कहीं पर दफ़ना दिया गया. इस रिपोर्ट को पब्लिश होने में पांच साल लग गए.

2009 में जब रिपोर्ट बाहर आई तब इज़रायल के प्रधानमंत्री थे, बेंजामिन नेतन्याहू. उन्होंने बयान दिया कि जब तक हमें पुख़्ता सबूत नहीं मिल जाते, हम एराड को ज़िंदा मानते रहेंगे. और, उसे वापस घर लाने की कोशिश करते रहेंगे. फिर 2016 का साल आया. मोसाद और IDF के जॉइंट इन्वेस्टिगेशन में एक नई थ्योरी सामने आई. इसमें कहा गया कि एराद की मौत 1988 में ही हो गई थी.

इनमें से कौन सी रिपोर्ट और कौन सा दावा सही है, ये ठीक-ठीक बता पाना नामुमिकन है. हालांकि, एक बात जो साफ़-साफ़ समझ में आती है, वो ये कि रॉन एराड के साथ क्या हुआ, इस पर पुख़्ता जानकारी किसी के पास नहीं है.

रॉन एराड की कहानी आज क्यों सुना रहे हैं?

दरअसल, 04 अक्टूबर 2021 को इज़रायल की संसद का विंटर सेशन शुरू हुआ. पहले दिन प्रधानमंत्री नफ़्ताली बेनेट ने एक चौंकाने वाली जानकारी दी. उन्होंने बताया कि रॉन एराड को तलाशने का मिशन जारी है. बकौल बेनेट, मोसाद ने सितंबर में कुछ खुफिया ऑपरेशंस को अंजाम दिया और इससे रॉन एराड के बारे में कुछ नई जानकारियां मिली हैं. हालांकि, बेनेट ने इन ऑपरेशंस के बारे में और जानकारी देने से मना कर दिया.

भले ही बेनेट ने जानकारी पर पर्दा डाल दिया हो, लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स में कुछ चौंकाने वाली ख़बर पता चली है. सऊदी अख़बार अल अरबिया की रिपोर्ट के अनुसार, मोसाद के कुछ एजेंट्स ने लेबनान के एक गांव में ऑपरेशन चलाया. मोसाद एजेंट्स अपने साथ एक क़ब्र से डीएनए सैंपल भी निकाल कर ले गए. हालांकि, अभी तक उस डीएनए सैंपल का टेस्ट रिजल्ट सामने नहीं आया है.

एक और मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, मोसाद ने सीरिया में एक ईरानी जनरल को किडनैप किया. फिर उसे उठाकर अफ़्रीकी महाद्वीप में ही किसी अज्ञात जगह पर ले गए. जनरल को पूछताछ के बाद छोड़ दिया गया. क्या पूछताछ हुई और मोसाद को रॉन एराड के बारे में क्या जानकारियां मिली हैं, इस बारे में फिलहाल कयास ही लगाए जा सकते हैं.

हालांकि, मोसाद के एक सीनियर अधिकारी ने दावा किया है कि मिशन पूरी तरह से सफ़ल रहा. आने वाले दिनों में रॉन एराड के बारे में कुछ पुख़्ता सबूत मिले हैं. ये कब तक बाहर आता है, ये देखने वाली बात होगी. रॉन एराड ने लेबनान से भेजी एक चिट्ठी में अपनी पत्नी से घर बनाने के लिए कहा था. उनका घर अब बनकर तैयार हो चुका है. रॉन की फ़ैमिली ने शपथ खाई है कि वे उनके बिना उस घर में एक पल भी नहीं रहेंगे. वो घर आज तक खाली पड़ा है.


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