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अस्पतालों में पड़ी लाशों और जलती चिताओं से मुंह फेर कर सरकार बेशर्मी से कह रही है सब ठीक है!

2 लाख 739. कल एक दिन में देश में इतने कोरोना के मरीज़ आए हैं. एक हज़ार 38 लोगों की कोरोना से मौत हुई है. संख्या के हिसाब से मौतों का आंकड़ा छोटा लगता है लेकिन जो हाल हम देख रहे हैं वो कहीं ज़्यादा भयानक है. और ये कहना सही नहीं होगा कि कोरोना से लोगों की जान जा रही है. जान इसलिए जा रही है कि क्योंकि लोगों को अस्पताल में दाखिला नहीं मिल रहा है. इलाज नहीं मिल रहा है. दवा नहीं मिल रही है. हम गरूर करते हैं ये कहने में कि भारत दुनिया की 6 बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में आता है, या भारत का दुनिया में डंका बजता है. लेकिन जिस दौर से अभी भारत के लोग गुज़र रहे हैं वो हमारी सारी तरक्की पर धब्बा है. किस काम की वो तरक्की जो लोगों की जान बचाने के काम भी ना आए. और बहस ये भी नहीं है कि इस पार्टी की सरकार ठीक नहीं कर रही है या उस पार्टी की सरकार ठीक नहीं कर रही है. आप किस पार्टी के समर्थक हैं या किस पार्टी को वोट दिया है, इसे एक बार भूल जाइए. और अपनी आत्म चेतना के हिसाब से सोचिए. कि क्या किसी इंसान की जान से बढ़कर भी कुछ हो सकता है? और जब इस तरह से लोगों की जान जा रही हों तो उन्हें बचाने के लिए हमारी चुनी हुई सरकारों को जो करना चाहिए, क्या वो उतना कर रही हैं? हम क्यों सरकार बनाते हैं? क्यों टैक्स देते हैं? माचिस की डिब्बी से लेकर बिस्किट के पैकेट तक हर चीज़ पर हम टैक्स देते हैं. और इस पर ज़रा सा किसी को ऐतराज़ भी नहीं है. हम सरकार का खजाना इसलिए भरते हैं ताकि सरकार हमारा ख्याल रखे. हमारी कानून-व्यवस्था का, हमारी शिक्षा का ख्याल रखे. हमारे स्वास्थ्य का ख्याल रखे. हमारी जान की हिफाज़त करे. लेकिन क्या ऐसा हो रहा है? हालात देखकर नहीं लगता है.

देश में अभी कोरोना के एक्टिव मरीज करीब 14 लाख हैं. अब मान लेते हैं इनमें से करीब तीस फीसदी मरीज़ों को अस्पताल में भर्ती कराने की जरूरत पड़ती है. यानी करीब 4 लाख मरीज अस्पताल में भर्ती हैं. अब एक अरब 30 करोड़ वाले देश में 4 लाख मरीजों कोरोना मरीजों का आंकड़ा कोई बहुत बड़ा तो है नहीं. लेकिन इसके बावजूद हमारा स्वास्थ्य तंत्र चरमराया हुआ लगता है. और लगता तो ये भी है कि सरकारों को लोगों की जान बचाने कि लिए जितना करना चाहिए, उतना कर नहीं रही हैं. लोगों की जान बचाने से ज्यादा वो अपनी नाकामियां छिपाने में मेहनत करती दिखती हैं, हेडलाइंस मैनेज करने में लगी हैं. अस्पतालों में पड़ी लाशों और जलती चिताओं से मुंह फेरकर सरकार बेशर्मी से कह रही हैं सब ठीक है. लेकिन ठीक कुछ भी नहीं हैं. और स्थिति कितनी भयावह हो चुकी है, इसका अंदाज़ा आप यूं लगाइए कि जो रसूखदार लोग हैं वो भी अपनों को अस्पताल में भर्ती कराने के मोहताज हैं. आप जानते हैं कि देश में वीआईपी कल्चर है. अप्रोच से काम होते हैं. लेकिन अब अप्रोच भी कम पड़ जा रही हैं. और एक राज्य की बात नहीं है. हर राज्य का ये ही हाल है.

बात देश के सबसे बड़ी आबादी वाली राज्य उत्तर प्रदेश की

69 साल के एक रिटायर्ड जज रमेश चंद्र. लखनऊ के गोमती नगर में रहते हैं. उन्हें और उनकी पत्नी को कोरोना हुआ. तबीयत ज़्यादा खराब हुई तो एबुलेंस के लिए अस्पताल फोन किया. एंबुलेंस नहीं मिली. ना ही कोई दवा देने आया. उन्होंने प्रशासन के दिए नंबर पर पचासों दफा फोन किया. लेकिन कुछ नहीं हुआ. मदद के इंतजार में उनकी पत्नी ज़िंदगी की जंग हार गई. रिटायर्ज जज खुद भी कोरोना पॉजिटिव थे. घर में पत्नी की लाश पड़ी थी लेकिन कोई उठाने वाला तक नहीं था. आखिर में उन्होंने एक चिट्ठी लिखकर सोशल मीडिया पर साझा की. कई घंटों में बाद जज की पत्नी की लाश उठाई गई.

आप इस आदमी की मनोस्थिति के बारे में सोचिए. ये जज रहे हैं. उस ओहदे पर रहे हैं कि एक हस्ताक्षर से कइयों को जेल या बेल दी होगी, या प्रशासन के किसी नियम को बदला, रोका होगा.

लेकिन अपने तमाम कोशिशों के बाद भी वो खुद को और अपनी पत्नी को अस्पताल में भर्ती नहीं करवा पाते. पत्नी के लिए एंबुलेंस का इंतजार करते हैं, लेकिन एबुलेंस से पहले मौत पहुंच जाती है.

उत्तर प्रदेश से ऐसी और भी कहानियां आ रही हैं. जहां कोई आईएएस भी अपने लिए अस्पताल का बेड नहीं ले पाता, तो कहीं बेड के इंतजार में बुज़ुर्ग की मौत हो जा रही है. और उत्तर प्रदेश की सरकार इस हकीकत को ढांपने में लगी है. कल लखनऊ के भैसाकुंड में एक साथ जलती चित्ताओं का वीडियो वायरल हुआ था. आज लखनऊ नगर निगम ने वहां टीन शेड लगाना शुरू कर दिया, बैरीकेडिंग और फेंसिंग हो रही है. ताकि किसी को जलती लाशों का वीडियो ही ना दिखे.

Brajesh Pathak
उत्तर प्रदेश के कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक. (तस्वीर: फेसबुक)

और उदाहरण सुनिए. कुछ दिन पहले लखनऊ के कानून मंत्री ब्रजेश पाठक ने स्वास्थ्य विभाग को चिट्ठी लिखी थी. इसमें लिखा था कि स्वास्थ्य सुविधाओं का हाल ठीक नहीं है. अब यूपी के मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने साथी मंत्री बृजेश पाठक की चिट्ठी को इमोशनल आउटबर्स्ट बता दिया. और कहा है कि कि लखनऊ या उत्तर प्रदेश के किसी जनपद में ऐसी स्थिति नहीं है कि लोगों को बेड नहीं मिल पा रहा है. आप सोचिए सरकार के मंत्रियों को अपनी झूठ पर कितना भरोसा है. कितनी बेशर्मी से उस वीडियो और तस्वीरों को झुठला दे रहे हैं जिनमें बेड के अभाव में लोगों की मौत हो रही है.

और बात सिर्फ यूपी की नहीं है. देश की राजधानी दिल्ली की बात कर लेते हैं. देश के नामी कवि हैं – डॉ कुमार विश्वास. उन्होंने एक ट्वीट किया.

ये हाल है. अपने तमाम अप्रोच का इस्तेमाल कर भी कुमार विश्वास बेड का इंतजाम नहीं कर पाए. खैर, इस ट्वीट के बाद नोएडा के अस्पताल में बेड का इंतजाम हो पाया.

दिल्ली में बेड्स की कमी पर मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल कहते हैं अभी 5000 बेड्स खाली हैं. बेड्स की कमी नहीं है ,बस मर्जी के मुताबिक अस्पतालों में बेड्स नहीं मिल रहे हैं. इसलिए लोग किसी खास अस्पताल में भर्ती की ज़िद ना करें.


विडियो- योगी के कैबिनेट मंत्री ब्रजेश पाठक ने UP में बढ़ते कोरोना वायरस के बारे में क्या कहा?

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