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देश में कोयले की कमी और बिजली के संकट का पूरा सच ये है

मोबाइल फुल चार्ज कर लो, 4 तसला कोयला बचा है. सुबह से पच्चीस लोग ये मैसेज आपको भेज चुके होंगे. आप में से कई लोगों ने इसे हंसकर टाल दिया होगा. लेकिन कुछ होंगे जिन्होंने, इस जोक को उन खबरों से जोड़कर देखा होगा जिनमें कहा जा रहा है कि भारत के ताप विद्युत ग्रहों में कोयले का भंडार लगातार कम होता जा रहा है. सरकार भरोसा दिला रही है कि देश में कोयले की कोई कमी नहीं है, और न ही बिजली घरों को बंद होने दिया जाएगा. आप बीते सालों की खबरें टटोलेंगे तो आपको साल दर साल ये कहानी घटती मिलेगी. अखबार सरकार के ही आंकड़ों के आधार पर ये खबरें करने लगते हैं कि देश के इतने बिजली घरों के पास फलां दिनों तक का ही कोयला भंडार बाकी है. सरकार पहले इन खबरों को खारिज करती है, फिर जब हंगामा बढ़ने लगता है, तब तीन-चार बैठकें होती हैं. खबर छप जाती है – बिजली संकट पर ऊर्जा मंत्री ने की बैठक, अधिकारियों को दी सख्त हिदायत. और फिर कुछ दिनों बात सारी बातें नेपथ्य में चली जाती हैं.

कोयला भंडार और बिजली संकट जैसे विषय हमारे दिमाग से गायब होने लगते हैं. लेकिन फिर हमारे सामने देश के ऊर्जा मंत्री आरके सिंह का बयान आता है. जिसमें वो कह देते हैं कि इस साल स्थिति कहीं ज़्यादा गंभीर है. इंडियन एक्सप्रेस को दिए एक इंटरव्यू में आरके सिंह ने कहा है कि बिजली की मांग कुछ नीचे आने के बाद स्थिति कुछ सुधर सकती है लेकिन अनिश्चितता बनी रह सकती है. 40 से 50 हज़ार मेगावॉट क्षमता वाले बिजली घरों के पास 3-3 दिनों का कोयला भंडार बचा है. अगले पांच-छह महीने मुश्किल भरे हो सकते हैं.

हम जानते हैं कि दीवाली में बिजली की मांग छप्पर फाड़ देती है. तो क्या वाकई आपको दीवाली दीयों की रोशनी में ही मनानी पड़ सकती है? हम इस सवाल का जवाब देने की कोशिश करेंगे.

कोयले से आने वाली बिजली कितनी ज़रूरी है?

हम बचपन से निबंध में ये लिखते आ रहे हैं कि कोयला जलाने से प्रदूषण होता है. सरकार ऊर्जा के गैर पारंपरिक स्रोतों को बढ़ाव दे रही है. पानी से बिजली बन रही है. हवा से बिजली बन रही है. धूप से बिजली बन रही है. ज़मीन के अंदर से भाप निकलती है, उससे भी बिजली बन रही है. ये सारी बातें अपनी जगह सही हैं. लेकिन ये तथ्य है कि 2021 में भी हमें ज़्यादातर बिजली मिलती है कोयले से ही. भारत के पास अभी कुल 388 गीगावॉट बिजली बनाने की स्थापित क्षमता है. मतलब हम चाहें, तो इतनी बिजली हर घंटे बना सकते हैं. अब इसमें से करीब 209 गीगावॉट बिजली हमें ताप विद्युत गृहों से मिलती है. माने कोयले से.

अब ये ज़रूरी नहीं कि हमारे पास 388 गीगावॉट की क्षमता है तो हमें ज़रूरत भी उतने की ही पड़े. मौसम और दूसरे कारक, जैसे औद्योगिक गतिविधि की मांग के हिसाब से बिजली की मांग ऊपर और नीचे जाती रहती है. कोयला मंत्री ने कहा है कि फिलहाल भारत में मांग 170-180 गीगावॉट के आसपास है. ये 200 गीगावॉट के आसपास भी जा सकती है. तो फिलहाल भारत में सभी स्रोतों से होने वाला उत्पादन इसी मांग को ध्यान में रखते हुए किया जा रहा है. इस उत्पादन में कोयले की हिस्सेदारी 66.4 फीसदी है. इसका मतलब, हमें मिलने वाली दो तिहाई बिजली फिलहाल कोयले से ही आ रही है. इस तरह हम ये समझते हैं कि कोयले से आने वाली बिजली हमारे लिए बहुत बहुत ज़रूरी है.

एक और बात आप हमें कई बार गीगावॉट कहते सुनेंगे. 1 गीगावॉट होता है 1 हज़ार मेगावॉट के बराबर. और एक मेगावॉट का मतलब होता है एक अरब वॉट. माने अगर आपके पास एक मेगावॉट बिजली का स्रोत है, तो आप उससे 100 वॉट वाले 1 करोड़ बल्ब जला सकते हैं. जो गणना हमने बल्ब के लिए की, वही आप पंखे, फ्रिज, कूलर वगैरह के लिए भी कर सकते हैं.

क्या हम कोयले की कमी से जूझ रहे हैं?

भारत आज जितने कोयले की खपत करता है, उसके हिसाब से देखें तो हमारे पास इतना कोयला है जो एक सदी तक हमारा साथ दे सकता है. फिर दुनिया में दूसरी जगह भी कोयला है, वहां से भी खरीदा जा सकता है. तो ये संकट कोयले की कमी का नहीं है. ये संकट है कोयले की आपूर्ति में कमी का. अगर ये समझ जाएं, तो ये पूरा संकट समझ आ जाएगा और ये भी कि इसका ज़िम्मेदार कौन है.

पावर जनरेशन के संदर्भ में देखें तो आपके पास कोयला ज़मीन में कितना है, उससे फर्क नहीं पड़ता. फर्क पड़ता है इस बात से, कि आपके पास कितना कोयला ऐसा है, जिसकी खुदाई शुरू हो चुकी है. फिर उसमें से कितना कोयला आप बिजली घर के पास पहुंचा चुके हैं. और ये कोयला दो तरह से भारत मे बिजली घरों तक पहुंचता है. पहला – हमारे देश की खदानों से, जिनमें से ज़्यादातर या तो कोल इंडिया चलाती है या फिर कोल इंडिया द्वारा निजी कंपनियों को लीज़ पर दे दी गई हैं. दूसरा है आयात – जहाज़ से कोयला बंदरगाहों पर पहुंचता है. वहां से मालगाड़ी पर लादकर बिजली घर आता है. इन दोनों तरीकों से जो कोयला बिजली घर पहुंच चुका होता है, उसी के आधार पर ये कहा जाता है इतने दिन का कोयला बाकी है.

Coal
ये संकट कोयले की कमी का नहीं है. ये संकट है कोयले की आपूर्ति में कमी का. (सांकेतिक फोटो- PTI)

कितना कम कोयला, वाकई कम होता है?

बिजली घरों में कोयले के न्यूनतम स्टॉक को लेकर कोई कानून या नियम नहीं है. लेकिन सरकार सुझाव की भाषा में ज़रूर कहती है कि हर बिजली घर को 14 दिन का कोयला भंडार अपने पास रखना चाहिए. अब ये स्वाभाविक ही है कि हर पावर प्लांट अपने यहां 14 दिन का भंडार लगातार बनाए रखे. ये कभी-कभी 14 दिन से नीचे भी हो सकता है. हम आपको सरकार द्वारा जारी डेटा बताएं, उससे पहले ये ज़रूरी है कि आपको ये समझाएं कि सरकार के डेटा को समझना कैसे है. सरकार 134 ताप विद्युत गृहों के यहां कोल स्टॉक की लगातार मॉनिटरिंग करती है और इनके रोज़ाना स्टॉक की जानकारी सार्वजनिक की जाती है. ये जानकारी मौजूद होती है नेशनल पावर पोर्टल पर अपलोड होने वाली डेली कोल रिपोर्ट्स में. जब हमने पोर्टल से जानकारी चाही, तो वहां 7 अक्टूबर तक के आंकड़े मौजूद थे.

इस रोज़ 134 में से 110 ताप विद्युत गृहों के पास कोयले का स्टॉक क्रिटिकल या सुपर क्रिटिकल स्थिति में था. एक अक्टूबर को ये स्थिति 104 ताप विद्युत गृहों में थी. इसका मतलब 1 हफ्ते में स्थिति खराब हुई है. क्रिटिकल से आप समझ सकते हैं चिंताजनक स्थिति. और सुपर क्रिटिकल को बेहद चिंताजनक कहा जा सकता है. वैसे दर्शक जान लें कि ये अनुवाद हमने आपकी समझ की आसानी के लिए किया है. सरकार इस शब्दावली का इस्तेमाल नहीं करती है और न ही इसका मतलब ये होता है कि 110 प्लांट बंद होने वाले हैं. इससे बस ये मालूम चलता है कि इन कारखानों के पास उतना कोयला नहीं है, जितना होना चाहिए.

16 बिजली घरों के पास एक दिन का भी कोयला नहीं

अब कितना कम, ये हम आपको और तफसील से बताते हैं. 7 अक्टूबर की डेली कोल रिपोर्ट के मुताबिक क्रिटिकल और सूपर क्रिटिकल स्टॉक वाले 110 संयंत्रों में से 16 बिजली घरों के पास एक भी दिन का कोयला नहीं था. 30 बिजली घरों के पास 1 दिन का कोयला था. 18 बिजली घरों के पास 2 दिन का कोयला था. 19 के पास 3 दिन का था. 9 के पास 4 दिन का था. 6 के पास 5 दिन का था. 10 के पास 6 दिन का था. सिर्फ 2 ऐसे थे, जिनके पास 7 या 8 दिन का कोयला था.

इसे ऐसे भी समझ सकते हैं कि भारत में 136 गीगावॉट से भी अधिक बिजली बनाने वाले बिजली घरों के पास ज़रूरत से कम कोयला था. और 16 हज़ार 880 मेगावॉट बना सकने वाले बिजली घरों के पास तो कोयला ही नहीं था. अगर कोयला मंत्री के बयान पर जाएं कि 200 गीगावॉट की मांग हो सकती है. तो बिना पावर एक्सपर्ट हुए समझा जा सकता है कि 136 गीगावॉट बना रहे बिजली संयंत्रों के पास ज़रूरत से कम कोयला होने का मतलब क्या होता है. माने स्थिति वाकई क्रिटिकल और सूपर क्रिटिकल है. या सेक्रेड गेम्स की भाषा में कहें तो देश संकट में है.

ये कमी आई कैसे?

इसके कई कारण हैं. हम पहले ही बता चुके हैं कि सभी पावर प्लांट्स 14 दिन का स्टॉक रखें, ये ज़रूरी नहीं है. फिर मॉनसून के वक्त चूंकि बारिश होती है, उससे कोयले के उत्पादन पर असर पड़ता है. क्योंकि बारिश का पानी खदानों में भरने लगता है. खदानें बारिश में भी काम करती हैं, लेकिन वो गर्मी या बारिश जितना उत्पादन नहीं कर पातीं. इसीलिए मॉनसून और मॉनसून के तुरंत बाद अक्सर बिजली घरों के पास कोयले का स्टॉक कुछ कम होता है. लेकिन ये बहुत कम न होने पाए, इसके लिए आम तौर पर सरकारें अप्रैल और मई में कोयले का उत्पादन बढ़ाने लगती है. और ये उत्पादन ये देखते हुए बढ़ाया जाता है कि मॉनसून और उसके बाद के महीनों में कितनी बिजली की ज़रूरत पड़ेगी. इस हिसाब से कोयला उत्पादन की योजना बनाई जाती है. इस बार सरकार ये करने में चूक गई.

इस साल एक नई चीज़ ये हुई कि भारत के जिन इलाकों में ज़्यादातर कोयला खदानें हैं, वहां सितंबर के महीने में खूब बारिश हुई. मिसाल के लिए पूर्वी मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और झारखंड. इससे ये हुआ कि कोयले की सप्लाई में जो सुधार सितंबर में ही आना शुरू होना चाहिए था, उसमें देर हो गई.

कोयले के आयात को लेकर भी ऐसी ही चीज़ हुई है. भारत में ऐसे बिजली घर हैं, जो आयातित कोयले पर निर्भर हैं. जैसे गुजरात में मूंद्रा पोर्ट के पास टाटा और अडाणी के बिजली घर. लेकिन इस तरह के बिजली घर तभी सुचारू तरीके से चल सकते हैं जब इन्हें सस्ता कोयला मिले. लॉकडाउन खत्म होने के बाद चीन में बिजली की मांग बढ़ी है. और कोयले की भी. तो चीन दुनियाभर से कोयला खरीद रहा है. और चूंकि चीन अमीर मुल्क है, वो इसे अच्छी खासी कीमत पर खरीद रहा है – पिछले दिनों के औसत से चार गुना. भारत जैसे देश इतने शॉर्ट नोटिस पर और इतने ऊंचे दाम पर कोयला खरीद नहीं सकते. नहीं सकते से ज़्यादा ये मामला नहीं खरीदना चाहते वाला है. क्योंकि अपने पास पइसा कम है. यही चीज़ गैस को लेकर भी है. भारत में कई बिजली घर ऐसे हैं, जो गैस से चलाए जा सकते हैं. लेकिन चूंकि नैचुरल गैस की कीमतें भी आसमान पर हैं, हम इन्हें चलाने से बचते हैं. तो इस तरह हमारे पास कोयला कम हुआ, हम बाहर से उसे खरीदने की स्थिति में नहीं रहे और हम गैस से चलने वाले बिजली घर भी चलाना नहीं चाहते.

सरकार क्या कर रही है?

दरअसल इस सवाल का जवाब तो हमारे पास भी नहीं है. हम भी यही सोच रहे हैं कि सरकार क्या कर रही है. हमने जो स्टॉक के आंकड़े बताए, वो 7 अक्टूबर के हैं. और आज है 11 अक्टूबर. भारत जितने बड़े देश में कोने कोने में पसरे पावर प्लांट्स के स्टॉक्स से आंकड़े जुटाना एक जटिल काम है. और ये समझने वाली बात है कि आपको 11 तारीख के आंकड़े 11 तारीख को नहीं मिल सकते. कुछ विलंब होगा. लेकिन जब पूरे देश में इस बात को लेकर असहजता है, लोग पूछ रहे हैं कि कहीं बत्ती गुल तो नहीं हो जाएगी, तो क्या सरकार का ये दायित्व नहीं है कि वो लोगों में भरोसा पैदा करने के लिए थोड़ी तेज़ी से रिपोर्ट अपडेट करे. ताकि लोग उन्हें देखकर संतुष्ट हो सकें.

सरकार ने 10 अक्टूबर को ज़रूर एक प्रेस रिलीज़ निकालकर कहा कि देश के बिजली घरों में 75 लाख टन कोयला मौजूद है, जो 4 दिनों के लिए काफी है. कोल इंडिया के पास भी 400 लाख टन कोयला मौजूद है. सरकार ये भी कह रही है कि इस साल कोयले से बिजली का उत्पादन 24 फिसदी बढ़ गया है. सरकार ने ये माना है कि रोज़ाना 18.5 लाख टन कोयले की ज़रूरत है, लेकिन पहुंच रहा है 17.5 लाख टन. लेकिन इसका कारण मॉनसून है. सरकार ये भी कह रही है कि कोल इंडिया 14 लाख टन कोयला रोज़ाना सप्लाई कर रही थी. ये बढ़कर 15 लाख टन हो गया है. और इस महीने के अंत तक 16 लाख टन हो जाएगा. दूसरे स्रोतों से 3 लाख टन और कोयला मिलेगा. तो सरकार के गणित के हिसाब से 18.5 लाख टन की ज़रूरत है और वो इस महीने के अंत तक 19 लाख टन सप्लाई करने की स्थिति में होगी. वैसे हम दर्शकों को ये भी बताना चाहते हैं कि दीवाली के आसपास बिजली की मांग भी ऊपर जाती है. सवाल है कि क्या तब 18.5 लाख टन वाले आंकड़े में संशोधन की ज़रूरत पड़ जाएगी? वैसे सरकार ने कोयला कंपनियों को उत्पादन बढ़ाने को भी कह दिया है. ऊर्जा मंत्री कह रहे हैं कि वो कोयला खदानों की अनुमति के लिए पर्यावरण मंत्रालय से बात कर रहे हैं. तो सरकार कोयले के बेहतर मैनेजमेंट की बात कर रही है. लेकिन क्या सरकार वाकई कोयले की बेहतर मैनेजर है? इस पर दिल्ली स्कूल ऑफ इकॉनमिक्स के असिस्टेंट प्रोफेसर मनीष कुमार कहते हैं कि –

“1972-73 के दौरान उस समय की सरकार ने देश की सभी कोयला खदानों का राष्ट्रीयकरण कर दिया था. इसको डी-नेशनलाइज़ किया गया है 2018 में. 2018 के बाद यहां भी प्राइवेट सेक्टर्स की एंट्री हुई. पिछले साल लगभग 50 कोल ब्लॉक का ऑक्शन हुआ. इनमें 40 से 45 प्राइवेट सेक्टर के पास गए. बाद में ये पता चला कि जो माइनिंग की क्षमता प्राइवेट सेक्टर्स का है, उसका वो एक तिहाई भी नहीं कर पाए. तो इस कमी का एक कारण ये नीतिगत परिवर्तन भी है. नवीनीकृत ऊर्जा पर निर्भरता की बात लॉन्ग टर्म में ठीक है, लेकिन छोटे टर्म में नहीं.”

वैसे आज गृह मंत्री अमित शाह की ने ऊर्जा मंत्री RK Singh, कोयला मंत्री प्रहलाद जोशी, कोयला मंत्रालय के सचिव, ऊर्जा मंत्रालय के सचिव और NTPC के आला अधिकारियों के साथ एक बैठक की. चर्चा आसन्न बिजली संकट पर ही हुई. सरकार बार बार ज़ोर देकर कह रही है कि बिजली का संकट नहीं है. लेकिन फिर हमारे सामने आती हैं खबरें, जिनमें देश के अलग अलग हिस्सों में बत्ती गुल होने की बात है. पंजाब में पंजाब स्टेट पावर कॉर्पोरेशन लिमिटेड ने कोयले की कमी के चलते बिजली उत्पादन कम किया है. 13 अक्टूबर तक 3 घंटे तक की बिजली कटौती का ऐलान किया है. केरल के ऊर्जा मंत्री ने के कृष्णकुट्टी ने 10 अक्टूबर को कहा कि 4 बिजली घर बंद किए हैं. लोड शेडिंग की नौबत आ सकती है. राजस्थान में घंटे घंटे भर की लोड शेडिंग की जा रही है. दिल्ली में Tata Power Distribution Ltd (TPDDL) ने कहा 10 अक्टूब को कहा कि लोड शेडिंग करने की ज़रूरत पड़ सकती है, क्योंकि जहां से कंपनी बिजली खरीदती है, वहां कोयले का स्टॉक कम होता जा रहा है.

तो तस्वीर इतनी भी रंगीन नहीं, जितनी सरकार आपको दिखा रही है. भाजपा के ही समर्थन से बिजली बना रहे, मतलब सरकार चला रहे नीतीश कुमार कह रहे हैं कि बिहार में है बिजली संकट मगर वैकल्पिक व्यवस्था से सरकार मांग पूरी कर रही है. पहले एनटीपीसी और अन्य निजी कंपनियों से बिजली की जितनी आपूर्ति बिहार को होती थी उसमें कमी आई है.

तो मॉरल ऑफ द स्टोरी क्या रहा? ये, कि देश में बिजली उत्पादन ठप तो नहीं हुआ. लेकिन प्रभावित ज़रूर हुआ है. सरकार के सामने जो चुनौती आई है, वो हवा हवाई नहीं है. मॉनसून, लॉकडाउन खत्म होने पर औद्योगिक गतिविधि में तेज़ी और अंतरराष्ट्रीय कीमतों पर काबू नहीं किया जा सकता. लेकिन ऐसी स्थितियों का अंदाज़ा लगाने और उनसे निपटने के लिए योजना बनाना भी सरकार का ही काम है. इसीलिए इतने मंत्रालय हैं, इतने बाबू और विशेषज्ञ हैं. अगर बावजूद इसके हम हमेशा क्राइसिस क्राइसिस ही खेलते रहें, तो दिक्कत है. और ज़रूरी है कि इस दिक्कत को स्वीकारा जाए.


बिजली घरों में कोयले की क़िल्लत पर क्या बोले ऊर्जा मंत्री?

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