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क्यों पाकिस्तान आगे बढ़कर बातचीत की पहल कर रहा है?

बात भारत और पाकिस्तान के रिश्तों की. 2014 में मोदी सरकार बनने के बाद से भारत और पाकिस्तान के रिश्तों में कई ट्विविस्ट आए. कभी पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को पीएम मोदी ने भारत बुलाया, तो एक शाम अचानक भारत के प्रधानमंत्री शादी में लाहौर पहुंच गए. जब लगा कि अब तो दोनों मुल्कों में अमन लौट आया तो फिर कहीं आतंकी हमला हो गया, फिर रिश्ते बिगड़ गए. हमलों और सर्जिकल स्ट्राइक के रास्ते बात युद्ध के मुहाने तक पहुंचकर लौटी.

जब पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ थे, तो चीज़ें थोड़ी बेहतर थी. लेकिन इमरान ख़ान के प्रधानमंत्री बनने के बाद रिश्ते और खराब होते गए. इतने ज़्यादा खराब हुए कि 2019 में भारत और पाकिस्तान ने अपने अपने हाईकमिश्नर वापस बुला लिए. और तब से हाई कमिश्नर्स की बहाली नहीं हुई है. धारा 370 हटाने के बाद पाकिस्तान ने भारत के खिलाफ अपनी रणनीति और आक्रामक करने की कोशिश, अंतर्राष्ट्रीय मंचों से कहा कि भारत कश्मीर में ज़ुल्म कर रहा है. दोनों देशों में बातचीत बंद रही और 2021 शुरू होने के बाद हमें पाकिस्तान से अच्छी अच्छी बातें सुनने को मिलती हैं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री और सेना प्रमुख अतीत को भूलकर भविष्य सुधारने की नसीहतें दे रहे हैं. आज से बातचीत का दौर दोनों देशों के बीच आधिकारिक तौर पर शुरू भी हो गया है. दिल्ली में आज से दो दिन की परमानेंट इंडस कमीशन की बैठक शुरू हो गई. दोनों देशों के इंडस कमिशनर यानी सिंधु नदी के कमिश्नर इस बैठक में हिस्सा ले रहे हैं. बैठक से अलग आज भारत में पाकिस्तान दूतावास के प्रभारी आफ़ताब हसन खान का भी बयान आया. उन्होंने भी दोनों देशों के बीच अच्छे संबंधों की कामना की.

अब विदेश मंत्री भी मिलेंगे?

एक खबर और आ रही है कि अब पहली बार भारतीय सेना पकिस्तान में युद्धाभ्यास के लिए जा सकती है. तो ये अचानक हवा कैसे पलटने लगी? क्यों अब पाकिस्तान आगे बढ़कर बातचीत की पहल कर रहा है? और जो भारत कहता था कि टॉक और टेररिज़्म एक साथ नहीं चलेगा, वो बातचीत के लिए किस शर्त पर राज़ी हुआ है? सारी बातें समझने की कोशिश करेंगे.

पहले थोड़ी सी बात मोदी सरकार की पाकिस्तान पॉलिसी की. मई 2014 में जब देश में सरकार बदली, नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बने तो विद्वानों में इस बात पर बहस चल रही थी कि अब अगले पांच साल में देश की नीतियां कैसी होंगी, किस तरह का बदलाव देखा जाएगा. और इन चर्चाओं के विदेश नीति वाले हिस्से में मोदी सरकार की पाकिस्तान पॉलिसी की बात हो रही थी. दो तरह की थ्योरी दी जा रही थी. एक अनुमान ये था कि मोदी सरकार में भारत और पाकिस्तान में तनाव ज़्यादा बढ़ेगा, क्योंकि प्रधानमंत्री ने चुनाव प्रचार में भी पाकिस्तान को खूब ललकारा था और कांग्रेस पर पाकिस्तान को लेकर सॉफ्ट होने का आरोप लगाया था.

दूसरी धारा में ये कहने वाले लोग थे कि मोदी सरकार के दौरान पाकिस्तान से रिश्ते अच्छे होंगे, क्योंकि सरकार के पास पूर्ण बहुमत भी है और पाकिस्तान पर सॉफ्ट होने वाले राजनीतिक आरोप का दबाव भी नहीं रहेगा. लेकिन मोदी सरकार में जो पाकिस्तान नीति रही उसे अंग्रेजी में कहते हैं, फ्लिप फ्लॉप पॉलिसी. यानी कुछ भी स्थाई नहीं.

लेकिन मोदी काल में पटरी उतरी कहां?

2014 में पीएम मोदी ने अपने शपथग्रहण कार्यक्रम में सार्क देशों के प्रमुखों को बुलाया था, जिसमें पाकिस्तान से प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ शामिल हुए. उसके बाद बिना किसी बदलाव के पाकिस्तान के साथ भारत के खट्टे मीट्ठे रिश्ते चलते रहे. प्रधानमंत्री बनने के डेढ़ साल बाद नरेंद्र मोदी दिसंबर 2015 में अचानक पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की नातिन की शादी समारोह में हिस्सा लाहौर पहुंच जाते हैं. दोनों प्रधानमंत्रियों में खूब गलबहियां होती हैं. ऐसा लगा कि पीएम मोदी और नवाज़ शरीफ भी वाजपेयी और मुशर्रफ वाली नीति पर ही चल रहे हैं. लेकिन फिर एक हफ्ते बाद ही भारत के पठानकोट एयरबेस पर हमला हो जाता है. फिर से दोनों देशों की सरकारों के बीच विश्वास में कमी दिखती है. दूरियां बढ़ने लगती हैं. हालांकि कुछ महीनों बाद बातचीत फिर पटरी पर लौटती है. 2016 में ही रूस के ऊफा में हुए शंघाई सहयोग संगठन की बैठक के दौरान पीएम मोदी और नवाज़ शरीफ द्विपक्षीय बैठक करते हैं… जुलाई में दोनों नेता मिलते हैं और दो महीने बाद ही सितंबर में उरी में सेना के बेस पर हमला हो जाता है. इसके जवाब में भारत सर्जिकल स्ट्राइक करता है. सहरद पर गोली-बारी बढ़ जाती है. बात ये भी आई कि नवाज़ शरीफ तो भारत से अच्छे रिश्ते बनाना चाहते थे, लेकिन आर्मी स्टैबलिशमेंट का उनको साथ नहीं मिला. सेना भारत से अच्छे संबंध बनाने या सरहदपार आतंकवाद रोकने के पक्ष में नहीं थी. अगस्त 2018 में पाकिस्तान में आम चुनावों में नवाज़ शरीफ की पार्टी हार जाती है. इमरान ख़ान सत्ता में लौटते हैं. चुनाव में प्रचार में इमरान ख़ान नवाज़ शरीफ को मोदी का यार कहते हैं. भारत और पीएम मोदी के बारे तीखी बातें करते हैं. लेकिन पीएम बनने के महीने भर बाद ही बातचीत का न्योता इमरान ख़ान की तरफ से आता है. न्यूयॉर्क में भारत की विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और पाकिस्तान के विदेश मंत्री शाह महमूद कुरैशी के बीच बातचीत तय होती है. लेकिन फिर ऐन वक्त वक्त पर ये बातचीत रद्द हो जाती है. फरवरी 2019 में जम्मू कश्मीर के पुलवामा में आतंकी हमला होता है. पाकिस्तान के आतंकी संगठन जैश ए मोहम्मद का हमले में नाम आता है उसके बाद बालाकोट सर्जिकल स्ट्राइक होती है. दोनों देशों के लड़ाकू विमानों की डॉगफाइट होती है, विंग कमांडर अभिनंदन को पाकिस्तान पकड़ता है फिर छोड़ देता है. दोनों तरफ से युद्ध की धमकियां दी जाती हैं और इन सब के बीच भारत और पाकिस्तान दोनों अपने हाई कमिश्नर्स को वापस बुला लेते हैं. इसके बाद 5 अगस्त 2019 को भारत जम्मू कश्मीर से धारा 370 हटा देता है. और फिर पाकिस्तान नए सिरे से धमकियां देने लगता है. सीमापार गोली-बारी यानी सीज़फायर का उल्लंघन भी बढ़ जाता है.

विंग कमांडर अभिनंदन (एएनआई)
विंग कमांडर अभिनंदन (एएनआई)

ऐसा लगता है कि अब दोनों देश इतने दूर निकल आए हैं कि रिश्तों में सुधार होने में बहुत कोशिश और बहुत वक्त लगेगा. लेकिन फरवरी 2021 में दोनों देशों की सेनाओं के बॉर्डर कमांडर सीमापार फायरिंग रोकने का ऐलान करते हैं, 2003 के सीज़फायर करार को लागू करने का ऐलान करते हैं. पाकिस्तान की तरफ से भारत के अनुकूल कई बयान आते हैं. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री को कोरोना होता है तो पीएम मोदी भी ट्वीट कर स्वस्थ होने की कामना करते हैं. तो कैसे हुआ. जवाब है बैक चैनल डायलॉग से. पर्दे के पीछे दोनों देशों में बातचीत चल रही थी. और बातचीत करवा कौन रहा था- संयुक्त अरब अमीरात. खबरें ऐसी ही आ रही हैं. अंतर्राष्ट्रीय न्यूज़ ब्लूमबर्ग ने सोमवार को एक ख़बर छापी. इसके मुताबिक भारत जब भारत और पाकिस्तान के बॉर्डर कमांडर्स ने पिछले महीने साझा बयान में सीज़फायर के 2003 वाले करार को मानने की बात कही, उसके 24 घंटे बाद, संयुक्त अरब अमीरात के विदेश मंत्री शेख अब्दुल्ला बिन ज़ाएद अल नहायन भारत आए थे. ये बस एक दिन का दौरा था. ब्लूमबर्ग की खबरों के मुताबिक ये दौरा भी भारत-पाकिस्तान की डील से ही जुड़ा था. यूएई की कोशिश से सीज़फायर हुआ है और इसके अलगे चरण में अब दोनों देश हाईकमिश्नर्स की बहाली भी करेंगे.

और क्या वजहें हैं?

यूएई की मध्यस्तता के अलावा अंतर्राष्ट्रीय मामलों के जानकार इन दोनों देशों के डायलॉग की टेबल पर आने की कुछ और वजह भी मानते हैं. हम अपने अनुभव से जानते हैं कि इस तरह की बातचीत पहले भी हुई हैं. लेकिन ज़्यादा वक्त तक नहीं चली. अक्सर पाकिस्तान के बारे में कहा जाता है कि वहां सरकार अगर भारत से रिश्ते सुधारना भी चाहे तो सेना नहीं मानती. सेना और आतंकवाद का ISI से मोह नहीं छूटता. लेकिन इस बार बातचीत को लेकर पाकिस्तानी सेना और सरकार दोनों एक पाले में दिखती हैं. इस लिहाज से इस बातचीत से कितनी उम्मीदें रखनी चाहिए, और क्या कश्मीर में आतंकवाद को पाक सेना से जो सहयोग मिलता है, वो बंद हो जाएगा?

पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा राज्य के पाब्बी में बने एंटी टेररिज़्म सेंटर में शंघाई समूह देशों की सैन्य एक्सरसाइज़ होनी है. खबरें हैं कि भारत भी इस अभ्यास में हिस्सा ले सकता है. अगर ऐसा होता है तो पहली बार भारत की सेना पाकिस्तान में अभ्यास के लिए जाएगी. हम भी उम्मीद करते हैं दुश्मनी की दीवारें कमज़ोर होंगी, दोनों देशों में अमन और मजबूत होगा.


वीडियो- क्या 2003 के संघर्षविराम समझौते को एक बार फिर मानना चाहता है पाकिस्तान?

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