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अगर गाड़ी ही नहीं चलेगी तो लॉकडाउन से बाहर कैसे निकलेंगे?

लॉकडाउन अपने तीसरे चरण में है. और इस लॉकडाउन के देश के अलग-अलग सेक्टर पर प्रभाव पड़ रहे हैं. इस ख़बर में हम ट्रांसपोर्ट सेक्टर की बात करेंगे. लॉकडाउन की वजह से क्या हुआ? छूट से क्या हासिल हुआ? क्या-क्या हासिल होने की उम्मीद है? सिलसिलेवार देखते हैं. छोटे खिलाड़ी से बड़े खिलाड़ी की ओर देखते हैं. और आख़िर में ये भी कि सरकार क्या कहती है.

आपको तकलीफ़ क्या है?

बनारस के 57 वर्षीय विपिन जायसवाल टेम्पो चलाते हैं. बनारस ठहरा रेड ज़ोन. पब्लिक ट्रांसपोर्ट एकदम बंद. सारे ऑटो अपने-अपने इलाक़ों में, मालिकों के घरों में. चलाने वाले खलिहर हो गए. विपिन जायसवाल बताते हैं,

“पिछले 20 साल से ऑटो चला रहा हूं. लेकिन कभी भी इतने लम्बे समय तक के लिए काम बंद नहीं किया. एक महीने से भी ज़्यादा समय बीत गया है. कुछ भी हासिल नहीं हुआ है. पहले था कि एक दिन में गिरती हालत में 300-400 रुपए बचा लेते थे. अच्छा दिन रहा तो 800 से 1200 रुपए तक बच जाते हैं. अब तो जितना कुछ बच बचाकर रखा था. सब खप गया. अब फिर से कमाने-धमाने की ज़रूरत है.”

यानी हैंड टू माउथ. रोज़ कमाने और रोज़ खाने वाला मामला है. कुछ है तो खपखपा गया है. 

लॉकडाउन में फंसो लोगों की आवाजाही के लिए केंद्र सरकार ने कुछ शर्तों के साथ इजाजत दी है. (सांकेतिक फोटो-पीटीआई)
लॉकडाउन में फंसो लोगों की आवाजाही के लिए केंद्र सरकार ने कुछ शर्तों के साथ इजाजत दी है. (सांकेतिक फोटो-पीटीआई)

तकलीफ़ है तो बचने के लिए क्या कर रहे हैं?

अव्वल तो ट्रांसपोर्ट ऐसा भंगुर सेक्टर है कि बचने के लिए बहुत कुछ किया नहीं जा सकता है. जानकार कहते हैं कि इस समय किसी दूसरे धंधे की ओर जाया भी नहीं जा सकता. न कोई नया काम शुरू किया जा सकता है. इसलिए दिन काटना ही एक विकल्प है. लेकिन फिर भी 4 मई से लॉकडाउन में छूट मिलनी शुरू हुई है. छूट से क्या हुआ? और क्या कोई सर्वाइवल स्ट्रैटेजी है? पिछले 8 सालों से ग़ाज़ियाबाद में टूरिस्ट ट्रांसपोर्ट सेक्टर में 38 वर्षीय सतीश गुप्ता काम करते हैं. छोटी कार चलाते हैं. साझा करते हैं,

“40-45 दिन से काम तो एकदम बंद था. अब लॉकडाउन में कुछ ढील हुई है तो कैब चलनी शुरू हुई है. ओला और ऊबर दोनों की सेवाएं शुरू हुई हैं. लेकिन लोगों को जाना कहां है? वो लोग घरों में हैं. इसलिए राइड नहीं आ रही है. बड़ी बुकिंग या टूरिस्टों का आना जाना तो छोड़ ही दीजिए. तो हम चुप मारकर बैठे हुए हैं. इंतज़ार कर रहे हैं कि कब थोड़ी और ढील मिले तो काम आगे बढ़े. गांव जाना आख़िरी विकल्प है. 18 मई तक भी नहीं सुधरी हालत तो चले ही जायेंगे.”

ट्रक खड़े हैं. ड्राइवरो को तनख़्वाह नहीं. और मालिक ट्रकों की पार्किंग का पैसा चुकाए जा रहे हैं. (फ़ोटो : रॉटर्ज़)
ट्रक खड़े हैं. ड्राइवरो को तनख़्वाह नहीं. और मालिक ट्रकों की पार्किंग का पैसा चुकाए जा रहे हैं. (फ़ोटो : reuters)

राजस्थान के अजमेर के रहने वाले गोवर्धन चौधरी ट्रांस्पोर्ट का काम करते हैं. 4 ट्रक हैं. 4 ट्रकों की एक दिन की पार्किंग की फ़ीस 600. लॉकडाउन में ट्रक तो चले नहीं. लिहाज़ा 30 हज़ार रुपयों से भी ज़्यादा की पार्किंग चुका दी. अब माल ढुलाई नहीं तो कमाई भी नहीं. समस्या ये 4 ट्रकों के 4 ड्राइवरों को हर महीने 20 हज़ार रुपए कैसे दें? रास्ता निकाला. बताते हैं,

“हमने चारों को अपने घर रहने के लिए बुला लिया. कमाई है नहीं तो तनख़्वाह कहां से दें? इसलिए हम उन्हें खाना खिलाते हैं. यहीं रखते हैं. और उन्हें ख़र्च की ज़रूरत होती है तो हज़ार-पांच हज़ार की मदद कर देते हैं. ऐसे ही काम चल रहा है.”

ग़ाज़ियाबाद में सतगुरु ट्रांसपोर्ट चलाने वाले मनप्रीत सिंह लवली बताते हैं कि उन्होंने अपने यहां काम करने वाले 7 लोगों को मार्च महीने की तनख़्वाह ही दी. अप्रैल की नहीं दे सके. ढुलाई वाला ट्रांसपोर्ट पिट गया है. मज़दूर और वर्कर अपने घर चले गए हैं. फ़ैक्टरी में काम धंधा शुरू कैसे हो? और काम शुरू नहीं होगा तो ढुलाई किस चीज़ की करेंगे?

सिर्फ़ प्राइवेट सेक्टर में दिक़्क़त है?

नहीं. लॉकडाउन में छूट मिली है. बसें चलाने की इजाज़त मिली है. 50 प्रतिशत क्षमता के साथ. बस डिपो में भी 50 प्रतिशत कर्मचारी ही रह सकते हैं. ऐसे में ये बातें सामने आ रही हैं कि इस सेक्टर में जो भी कर्मचारी परमानेंट एम्प्लॉई हैं, उन्हें ही बुलाया जा रहा है. जबकि संविदा या रोज़ाना के मेहनताने पर काम करने वाले कर्मचारी इस समय घर पर हैं. बनारस के चौधरी चरण सिंह टर्मिनल पर काम करने वाले दो कर्मचारियों की लल्लनटॉप से बात हुई. दोनों ने कहा कि नौकरी बचानी है, नाम नहीं बता सकते. सबसे पहेल 42 साल के परमानेंट कर्मचारी से बात हुई. उन्होंने कहा,

“काम पर तो लौटने को कुछ कहा नहीं गया है. लेकिन सुन रहे हैं कि अगर ऑरेंज और ग्रीन ज़ोन में जायेंगे, तो ही शुरू होगा. अभी ऐसे में पैसे की दिक़्क़त नहीं है. तनख़्वाह तो आ रही है. लेकिन अब कटौती हो रही है. लोग कह रहे हैं कि 20-30 परसेंट सैलरी काटेंगे. राहत कोष में भी देने के लिए काटेंगे. ऐसे में तो दिक़्क़त होगी न.”

और एक कर्मचारी रोज़ाना बनारस टू इलाहाबाद की बसें चलाते हैं. संविदा यानी कॉंट्रैक्ट कर काम करते हैं. संविदा की मियाद ख़त्म होने वाली है. नवीनीकरण किया जाएगा या नहीं? और कब किया जाएगा? इसको लेकर बहुत जानकारी नहीं है.

“अब हमारी ज़रूरत ही नहीं होगी तो संविदा को क्यों रीन्यू करेंगे?”

आंकड़े और बतोलेबाज़ी

ट्रांसपोर्ट सेक्टर का छक्का घुमाने के लिए सरकार पर दबाव है. लेकिन आने वाले समय में यात्राएं इतनी मुस्तैदी से होंगी या नहीं, इस पर संदेह गहरा है. सोशल डिसटेंसिंग का पालन करने और संक्रमण को बचाने के लिए कम लोग यात्राएं करेंगे, ऐसी सम्भावना जताई जा रही है. ऐसे में जानकारों का मानना है कि ट्रांसपोर्ट की सरकारी और ग़ैरसरकारी एज़ेंसियां कामगारों को नौकरी पर रखने की नीति में बदलाव करेंगी. XLRI जमशेदपुर के प्रोफेसर केआर श्याम सुंदर अपने हिंदू बिज़नेसलाइन में छपे लेख में कहते हैं,

“जिस तरह से तमाम एजेंसियों को नुक़सान हो रहा है, इस नुक़सान की भरपाई पूरे वर्कफ़ोर्स को एक साथ काम पर बुलाकर पूरी नहीं होगी. क्योंकि कम्पनियों के पास पैसा ही नहीं है. लिहाज़ा बाज़ार सुधरने पर कंपनियां ऐसे कामगारों की भर्ती करेंगी, जो एक तरफ़ तमाम तरीक़े के प्रॉडक्ट्स का उत्पादन भी कर सकें, और दूसरी तरफ़ माल ढुलाई में भी सहयोग कर सकें.”

ऐसा होता है तो उत्पादन से लेकर ढुलाई के बीच के कई लोगों की जीविका पर संकट आ सकता है. जानकार ये भी कहते हैं कि सरकारी प्रयोजनों में मामला थोड़ा ज़्यादा डिजिटल हो सकता है. टिकट वग़ैरह के लिए बसों में कंडक्टर शायद आने वाले समय में न दिखें. 50 परसेंट कपैसिटी पर ही काम करना है, तो सिंगल विंडो सिस्टम लाया जा सकता है. ऐसे में यहां पर भी बीच के लोगों की ज़रूरत ख़त्म हो जाएगी.

माँग है कि सॉफ़्ट लोन दिया जाए. आसान क़िस्तों और कम ब्याज दरों पर. तस्वीर चेन्नई के पोर्ट पर खड़ी कारों की. (PTI)

लेकिन एजेंसियों ने सरकार से इस सेक्टर में भी राहत पैकेज की बात की है. ऑल इंडिया मोटर ट्रांसपोर्ट कांग्रेस (AIMTC) ने कहा है कि ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री को कम ब्याज दरों पर सरकार से लोन की ज़रूरत है. 2-3 परसेंट की दरों पर. क्योंकि लॉकडाउन के शुरुआती 15 दिनों में ही इस सेक्टर को अच्छा ख़ासा नुक़सान हो गया था. AIMTC के सचिव नवीन गुप्ता मनी कंट्रोल से बातचीत में बताते हैं,

“ट्रक चलाने वाली इंडस्ट्री को ही लॉकडाउन के शुरुआती 15 दिनों में 35,200 करोड़ रुपयों का नुक़सान हो गया था.”

गृह मंत्रालय ने ख़ाली या भरे हुए ट्रकों को चलाने की अनुमति तो दे दी थी, लेकिन बक़ौल AIMTC, बुकिंग ऑफ़िस, गोदाम, फ़ैक्टरी को खोलने के आदेश बहुत साफ़ नहीं थे. बाद में आदेश आए. तब नुक़सान कुछ और बड़ा हो चुका था. मज़दूर काम न होने की सूरत में अपने घर जा चुके हैं. तो गोदाम या फ़ैक्टरी में एक तो काम नहीं है. और पुराना माल बना हुआ है तो लोडिंग के लिए मज़दूर नहीं हैं.

सरकार का क्या कहना है?

गृह मंत्रालय द्वारा नयी जारी की गयी गाइडलाइन में बसों, ट्रकों और कैब सर्विसों के लिए कुछ बातें हैं. कहा गया है कि सीमित क्षमता और दूरी में सबका संचालन हो सकता है. लेकिन सबकुछ फ़्लो में आने में तो अभी समय लगेगा.

लेकिन ख़बरों की मानें तो सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी ने कुछ राहत की बात बताई है. 6 मई को बसों और कार संचालकों की एक ऑनलाइन मीटिंग में नितिन गडकरी ने कहा कि जल्द ही ट्रांसपोर्ट सेक्टर को थोड़ी हिदायत और थोड़े नए नियमों के साथ शुरू किया जाएगा. यानी गाड़ियां फिर से चलेंगी. कुछ दूरी, कुछ सफ़ाई, कुछ बचाव के साथ.


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