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अपनी ही करंसी क्यों गिराती हैं सरकारें ? कमजोर रुपये के फायदे भी जानें

डॉलर के मुकाबले रुपया बुधवार, 15 दिसंबर को पिछले डेढ़ साल के सबसे निचले स्तर तक गिर गया. यानी एक डॉलर की कीमत 76 रुपये के पार. आपने लोगों को यह कहते भी सुना होगा कि सरकार कुछ करती क्यों नहीं? इसकी सीधी जिम्मेदारी रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया (RBI) पर आती है. लेकिन कहा यह भी जा रहा है कि सेंट्रल बैंक खुद नहीं चाहता कि रुपये की गिरावट थमे. बल्कि वह तो दिसंबर के अंत तक देसी करंसी को 76.50 रुपये के लेवल तक गिरते देखना चाहता है. वह ऐसा क्यों करेगा भला ? लेकिन ऐसा होता है. दुनिया भर की सरकारें और उनके केंद्रीय बैंक कई बार जान-बूझकर भी अपनी करंसी विदेशी मुद्रा के मुकाबले कमजोर रखते हैं. ऐसा कुछ समय के लिए ही होता है. लेकिन कई बार हालात ऐसे बन जाते हैं कि यह मजबूरी लंबी खिंच जाती है और चाहकर भी करंसी ऊपर नहीं आ पाती. जैसा तुर्की और कई अन्य देशों में देखने को मिल रहा है.

तो क्या अपना रिजर्व बैंक भी रुपये को चढ़ते नहीं देखना चाहता ? इसके जवाब और इससे जुड़ी तमाम कड़ियां सुलझाने से पहले हम एक अच्छी खबर सुनाते हैं. भारत का निर्यात 1 से 14 दिसंबर के बीच 44.41 फीसदी बढ़कर 16.46 अरब डॉलर पर पहुंच गया। इसमें बड़ा योगदान कमजोर रुपये का भी रहा. एक्सपोर्ट बढ़ने से व्यापार घाटे को काबू करने में भी थोड़ी मदद मिली. यानी गिरता रुपया हमेशा बुरी खबर लेकर नहीं आता. यहीं से हम उन तमाम पहेलियों को सुलझाते चलेंगे, जो किसी भी देश में गिरती करंसी और बढ़ती महंगाई के इर्द-गिर्द घूमती हैं.

गिरता रुपया कैसे बढ़ाता है एक्सपोर्ट ?

मान लीजिए भारत से कोई व्यापारी अमेरिका को लेदर-बैग एक्सपोर्ट करता है. भारतीय मुद्रा का मूल्य 70 रुपये प्रति डॉलर मानकर चलिए। एक बैग की कीमत 1000 रुपये है. अमेरिकी इम्पोर्टर 500 बैग का ऑर्डर देता है और प्रति बैग 1000 रुपये के हिसाब से करीब 7,142 डॉलर का भुगतान कर देता है. सिलसिला चलता रहता है. एक दिन अचानक वह अमेरिकी इम्पोर्टर भारतीय एक्सपोर्टर से कहता है- ‘ यही बैग मुझे इंडोनेशिया में सस्ता पड़ रहा है. तुम दाम घटाओ’. भारतीय एक्सपोर्टर अपनी लागत और मजबूरियों का हवाला देकर दाम घटाने से इनकार कर देता है. अमेरिकी व्यापारी भारत से माल मंगाना बंद कर देता है. कुछ समय बाद पता चलता है कि रुपये का मूल्य गिरकर 75 रुपये प्रति डॉलर हो गया है. तब वही अमेरिकी व्यापारी भारतीय निर्यातक से फिर माल मंगाना शुरू कर देता है. दाम पुराना ही है, लेकिन अमेरिकी व्यापारी को यह सौदा अब करीब 35,714 रुपये सस्ता पड़ता है. उसे हर कंसाइनमेंट पर 7,142 डॉलर की जगह 6,666 डॉलर ही देने पड़ते हैं. यानी पहले जितना खर्च में ही वह 35 बैग अतिरिक्त मंगा सकता है. रुपया कमजोर बना रहता है और कई अन्य अमेरिकी इम्पोर्टर भी भारतीय एक्सपोर्टर्स को ऑर्डर देने लगते हैं. बाहर से आने वाले महंगे डॉलर पर भारतीय निर्यातक को जो नुकसान हो रहा था, उसकी भरपाई व्यापार बढ़ने से हो जाती है. लेकिन एक्सपोर्ट की मात्रा बढ़ने से पूरी इकनॉमी में असका असर दिखता है. देश का कुल निर्यात बढ़ने लगता है.

व्यापार घाटे का करंसी कनेक्शन

जब कोई देश बाहर से ज्यादा माल मंगाए और कम माल बाहर भेजे, तब व्यापार घाटे (Trade Deficit) की नौबत आ जाती है. आर्थिक भाषा में इसे नकारात्मक व्यापार संतुलन ( Negative Trade Balance) भी कहते हैं. घरेलू करंसी कमजोर होने से इस मोर्चे पर राहत मिलती है. मसलन, विदेशी करंसी महंगी होगी तो उनके लिए भारत का माल सस्ता होगा और भारतीयों के लिए विदेशी माल महंगा हो जाएगा. यानी इम्पोर्ट के मुकाबले एक्सपोर्ट बढ़ेगा. सरकारी खजाने के मोर्चे पर इससे चालू खाते (Current Account) की सेहत सुधरेगी. यह बात अलग है कि जब देश में बाहरी सामान पर निर्भरता बहुत ज्यादा हो, तो इम्पोर्ट बिल एक सीमा से कम नहीं हो सकता. मसलन, भारत अपनी जरूरत का 83% कच्चा तेल बाहर से आयात करता है. इसके अलावा मोबाइल फोन, खाने का तेल, दलहन, सोना-चांदी, रसायन और उर्वरक का भी बड़े पैमाने पर आयात होता है. रुपया कमजोर होने से ये चीजें देश में महंगी हो जाती हैं. लेकिन दूसरी तरफ भारत से बड़े पैमाने पर कल-पुर्जे, चाय, कॉफी, चावल, मसाले, समुद्री उत्पाद, मीट जैसे सामान का निर्यात होता है. ऐसे में रुपया कमजोर होने से एक्सपोर्ट ऑर्डर बढ़ जाता है. ज्यादा निर्यात यानी ज्यादा डॉलर. ऊपर से महंगा डॉलर अंदर आकर ज्यादा रुपया बन जाता है.

RBI कैसे करता है मनी कंट्रोल ?

भारत में रुपये का मूल्य सरकार तय नहीं करती. यह पूरी तरह फॉरेन एक्सचेंज मार्केट के हवाले होता है. डिमांड और सप्लाई की हालत इसकी कीमत तय करती है. हालांकि साल 1975 तक करंसी रेट में सरकार का दखल खूब हुआ करता था. जैसा कि चीन सहित दुनिया के कई देशों में अब भी होता है. फिर आरबीआई रुपये को गिराने या चढ़ाने में कैसे कारगर हो सकता है? यह सब कुछ इनडायरेक्ट होता है. मसलन, मौजूदा हालात को ले लें, तो पिछले कई महीनों से RBI बड़े पैमाने पर डॉलर की खरीदारी कर रहा है. वह जितना ज्यादा डॉलर खरीदेगा, रुपये पर दबाव बनता जाएगा. वह गिरेगा. आरबीआई के कुल ऐसेटे्स में विदेशी मुद्रा की हिस्सेदारी करीब तीन चौथाई होती है. दिसंबर के शुरू में भारत का विदेशी मुद्रा भंडार 636.9 अरब डॉलर था. विदेशी मुद्रा भंडार में एक्सपोर्ट, बाहर से शेयरों और म्यूचुअल फंड में निवेश, पर्यटन सहित कई स्रोतों से इजाफा होता है. लेकिन जब आरबीआई बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा खरीदने लगता है तो इसे भंडार में कृत्रिम इजाफे के तौर पर देखा जाता है और देसी करंसी कमजोर पड़ती जाती है. आरबीआई यह भंडार हमेशा के लिए जमा नहीं रखता. मुफीद मौका पाकर बेचता भी है. आखिर उसकी कोशिश भी आर्थिक गतिविधियों, महंगाई और पैसे के प्रवाह को संतुलित रखने की होती है. आरबीआई जब विदेशी मुद्रा की बिकवाली शुरू करता है, तब रुपया मजबूत होने लगता है. फॉरेक्स एक्सपर्ट्स का कहना है कि अगर आरबीआई ने अभी खजाने में जमा डॉलर बेचना शुरू नहीं किया तो दिसंबर के अंत तक रुपया 77 के स्तर को पार कर जाएगा.

रुपये को कंट्रोल करने का दूसरा और पारंपरिक टूल है ब्याज दरें बढ़ाना. आरबीआई अपने पॉलिसी रेट (Repo, Reverse repo, CRR) में जैसे ही इजाफा करेगा, ब्याज दरें बढ़ेंगी. फिर करंसी की किल्लत होगी. रुपये की डिमांड बढ़ेगी. यह डिमांड वैसे तो देखने में घरेलू लगती है, लेकिन बाहर से आने वाले निवेश के चलते यह फॉरेन एक्सचेंज मार्केट में भी रुपये को मजबूती देती है.करंसी मार्केट के जानकारों की मानें तो रुपये के 76.50 के स्तर तक जाते ही आरबीआई हरकत में आ जाएगा और इसे थामने के उपाय करेगा. अब आप यह भी समझ गए होंगे कि आरबीआई जैसी स्वायत्त संस्था की कमान किसी को सौंपने से पहले सरकारें इतनी कसरत क्यों करती हैं. माना जाता है कि ज्यादातर देशों में रिजर्व बैंक के गवर्नर सरकार के इशारे पर ही पॉलिसी रेट तय करते हैं. भारत में भी आरबीआई गवर्नर की नियुक्ति में राजनीतिक दखल की चर्चा हमेशा होती रहती है.

Rbigov
आरबीआई गवर्नर शक्तिकांत दास

चीन से तुर्की तक करंसी कंट्रोल

अपनी करंसी का मूल्य घटाकर ग्लोबल ट्रेड में कैसे खेला जाता है, इसकी सबसे बड़ी मिसाल चीन है. पचास साल पहले ग्लोबल ट्रेड में महज 1% हिस्सेदारी रखने वाला चीन आज दुनिया का सबसे बड़ा एक्सपोर्टर है. ग्लोबल ट्रेड में अमेरिका (8.1 %) और जर्मनी (7.8%) के मुकाबले चीन की हिस्सेदारी (15%) यानी करीब दो गुना है. पीपल्स बैंक ऑफ चाइना (PBOC) चीन में मनी सप्लाई को कंट्रोल करता है. यह सरकार का ही अंग माना जाता है. पिछले कुछ वर्षों में चीन की व्यापार नीति का यह अहम टूल रहा है कि डॉलर के मुकाबले अपनी मुद्रा युआन का मूल्य घटाए रखा जाए. इससे उसे अपना एक्सपोर्ट बढ़ाने में खासी मदद मिली. ‘दुनिया की फैक्टरी’ का तमगा हासिल कर चुके चीन का बुनियादी ढांचा इतना मजबूत है कि वह कम लागत पर ज्यादा से ज्यादा उत्पादन कर सकता है. ऐसे में बेहद कम मार्जिन पर माल बेचते हुए भी बंपर वॉल्यूम के दम पर वह लगातार दुनिया के बाजारों में माल उतार सकता है. उसके निर्यात के मुकाबले आयात कम है. ऐसे में करंसी की कमजोरी का उसे उतना नुकसान नहीं होता, जितना अतिरिक्त एक्सपोर्ट के रूप में फायदा मिल जाता है. पीपल्स बैंक ऑफ चाइना युआन को कॉम्पिटिटिव यानी सस्ता बनाए रखने के लिए ब्याज दरों में कटौती जैसे पारंपरिक टूल भी आजमाता है.
तुर्की की करंसी लीरा में इस साल डॉलर के मुकाबले 45 फीसदी की गिरावट देखी गई है. वहां महंगाई और बेरोजगारी चरम पर है. लेकिन प्रेसिडेंट रेचेप तैय्यब अर्दोआन ब्याज दरें कम से कम रखने की अपनी नीति पर अड़े हुए हैं. ऐसे ही दुनिया के कई देश आर्थिक हालात सुधारने खासकर निर्यात बढ़ाने या व्यापार घाटा कम करने के लिए करंसी गिराने का सहारा लेते हैं. कुछ सरकारें अपने कर्ज पर ब्याज भुगतान कम से कम करने के लिए भी इस टैक्टिस का सहारा लेती हैं.


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