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इंसास राइफल जिससे सेना ने हाथ जोड़ लिए, वो अब UP पुलिस के हाथ में नज़र आएगी

‘करगिल में उन्होंने हमारे बच्चों की आंख में गोलियां मारी थीं, अगर वो ऊपर से कंकड़ भी फेंकते तो जवानों के हेलमेट पर खटाक की तेज़ आवाज़ होती थी, क्योंकि वो पहले से ऊपर चढ़कर बैठे थे….’

ये वाक्य किसी लोक कथा का हिस्सा लगता है. करगिल की लड़ाई देख चुका कोई भी सेना अधिकारी गाहे-बगाहे ये कहता मिल ही जाता है. इसकी वजह थी उंचाई. जिसका नुकसान भारतीय सेना को शुरुआत में हुआ. नुकसान और भी हुए. उनकी एक वजह थी इंसास रायफ़ल. INSAS माने Indian Small Arms System. 25 हज़ार करोड़ रुपए और बीस साल ख़र्च करके बनाया हुआ भारतीय हथियार. इसे बनाया था Armament Research and Development Establishment (ARDE) ने, जो कि Defence Research and Development Organisation (DRDO) का ही एक हिस्सा थी.

साल 1994 में ये रायफल पहली बार तैयार हुई ये फ़ील्ड टेस्टिंग के लिए. इसकी सारी ख़ूबियों और ख़राबियों पर एक शब्द भारी था. भारतीय. पहली बार सेना स्वदेशी रायफ़ल से कोई जंग लड़ने वाली थी. खांटी देसी हथियार. सबको लगा कि इस बार तोड़ के रख देंगे दुश्मन को. 1998 की 26 जनवरी परेड में पहली बार देश ने मूंछे ताने कदमताल करते जवानों के हाथ में ये रायफ़ल देखी. INSAS अब सेना के परिवार का हिस्सा थी.

आज INSAS की बात क्यों? क्योंकि उत्तर प्रदेश पुलिस ‘थ्री नॉट थ्री’ रायफ़लों की विदाई कर रही है. अब यूपी पुलिस के हाथों में होंगी INSAS रायफ़लें. वही INSAS जो 26 जनवरी, 1998 को सेना के हाथों में आईं थीं.

इन्सास रायफ़लें असल में DRDO की सेवाओं पर एक सवालिया निशान बन गई थीं
इन्सास रायफ़लें असल में DRDO की सेवाओं पर एक सवालिया निशान बन गई थीं

# और फिर आया इम्तेहान

INSAS रायफ़लें अभी सेना ने थामी ही थीं. साल आ गया 1999. और आया एक धधकता इम्तेहान. करगिल. इस युद्ध में स्वदेशी रायफ़ल ने ताल ठोंकी लेकिन कई मुश्किलों ने धर लिया. वापस आई शिकायतें. वो भी एक नहीं ढेरों. सबसे पहले दिक्कत आई रेंज की. इस रायफ़ल की रेंज कम थी. गोली दूर तक नहीं जा पाती थी. 5.56 mm के कारतूस से जवान ख़ुश नहीं थे. इससे पहले जवान इस्तेमाल करते थे 7.62 mm के कारतूस. ये दुश्मन का ज़्यादा नुकसान करते थे. चलते युद्ध में ये शिकायत INSAS पर भारी पड़ी. रायफ़ल का ऑटोमेटिक सिस्टम लगातार गड़बड़ हुआ. इसमें गोली चलाने के तीन विकल्प थे. सिंगल बर्स्ट जिसमें हर बार गोली चलाने के लिए ट्रिगर दबाना पड़ता था. दूसरा ऑप्शन था ट्रिपल बर्स्ट. इसमें एक बार ट्रिगर दबाने पर तीन गोलियां फ़ायर होती थीं. और तीसरा विकल्प था फ़ुल ऑटोमैटिक. जब तक ट्रिगर दबा रहेगा फ़ायर होता रहेगा. जवानों को सबसे ज़्यादा ज़रूरत होती थी ट्रिपल बर्स्ट की. लेकिन रायफ़ल के साथ ये दिक्कत थी कि इसका ट्रिपल बर्स्ट दबाने पर भी INSAS फ़ुल ऑटोमैटिक मोड पर काम करने लगी. इससे जवान झुंझला जाते थे. युद्ध में फ़ुल ऑटोमेटिक ऑप्शन बेहद कम इस्तेमाल किया जाता है. इसके नुकसान दो होते हैं. पहला कि गोलियां नाहक बर्बाद होती हैं. दूसरा कि गोलियां रिकॉयल की वजह से निशाने पर नहीं लगतीं. रिकॉयल माने कि गोली का झटका.

सबसे बड़ी दिक्कत थी इन रायफ़लों की बैरल. इस दिक्कत ने सेना को बड़ी उलझन में डाल दिया था
सबसे बड़ी दिक्कत थी इन रायफ़लों की बैरल. इस दिक्कत ने सेना को बड़ी उलझन में डाल दिया था

इसके बाद दिक्कत हुई गोलियां भरने वाली मैगज़ीन की. इस ऑटोमेटिक रायफ़ल में गोलियां भरने की मैगजीन बनी थी पॉलीमर से. यानी मज़बूत प्लास्टिक. बनाने वालों ने ये सोचकर प्लास्टिक का इस्तेमाल किया कि इससे रायफ़ल का वज़न कम रहेगा. लेकिन करगिल का युद्ध ज़्यादातर लड़ा जा रहा था ठंडे इलाकों में. और कई जगहों पर तापमान इतना कम हो जाता था कि पॉलीमर से बनी मैगजीन चटक कर टूट जाती थीं. INSAS रायफ़लों ने जवानों को बुरी तरह निराश किया. जंग पर निकले जवान की रायफ़ल उसे हर मोर्चे पर धोखा दे रही थी. नई नवेली रायफ़लें अक्सर जाम होने लगीं. ये प्रयोग करने का समय था नहीं. लेकिन नई रायफ़लों के साथ यही हो रहा था.

शिकायतें DRDO पहुंचने लगीं. रायफ़लें वापस कारखानों में पहुंचने लगीं. स्वदेशी का गर्व फ़ीका पड़ने लगा. कहा जाता है कि करगिल के वक़्त कुछ जगहों पर जवानों ने मरम्मत होकर वापस पहुंची रायफ़लों को लेने से ही मना कर दिया. 15 साल की मेहनत के बाद तैयार हुई इन रायफ़लों की वापसी तय मानी जाने लगी.

भारत साल 2012 में भी डिफ़ेंस रिसर्च पर 7 हज़ार करोड़ रुपए ख़र्च कर रहा था. 39 ऑर्डिनेंस के कारखाने थे. लेकिन करगिल ख़त्म होने के बाद भारत ने लाइट मशीन गन और स्नाइपर रायफ़लों के लिए अंतरराष्ट्रीय टेंडर निकाला. पांच विदेशी कंपनियों ने बोली लगाई . American Colt, Italian Beretta, Swiss Sig Sauer, Czech Ceska, और Israeli Weapons Industry (IWI). और तब सामने आई विदेशों की बनी हुई multi-caliber assault rifle (MCAR). इसमें दो बैरल्स होती थीं जिनसे 5.56 mm और 7.62  mm दोनों का काम लिया जा सकता था. साथ में हुआ एक करार transfer of technology का.

लाइट वेट बनाने के चक्कर में इन रायफ़लों के साथ बड़ा खेल कर दिया गया
लाइट वेट बनाने के चक्कर में इन रायफ़लों के साथ बड़ा खेल कर दिया गया

# भूल चूक लेनी देनी

सेना का INSAS रायफ़लों से मोहभंग हो गया. अब इन लाखों रायफ़लों का क्या किया जाए. ये बड़ा सवाल था सरकार के सामने. पैसा तो ख़र्चा हुआ था. और लंबी दूरी के मैदानों में या उंचाई पर रायफ़ल काम नहीं करेगी ये भी तय हो चुका था. भारतीय ऑर्डिनेंस फैक्ट्रियां अभी और इंसास रायफ़लें बनाते रहना चाहते थे. वजह थी पैसा. जो सरकार के पास था ही. राज्य सरकारों के पास भी था. तब ज़्यादातर राज्यों की पुलिस फ़ोर्स इस्तेमाल करती थी थ्री नॉट थ्री रायफ़लें. अंग्रेज़ों के ज़माने की बनी हुई. साथ में थे CRPF जैसे अर्ध-सैनिक बल. अब INSAS रायफ़लें पहुंची अर्ध-सैनिक बलों के पास. लेकिन यहां भी मामला आसान नहीं था. CRPF के ज़िम्मे भी माओवाद जैसी ख़ूनी लड़ाइयां थीं. उन्हें पहले से INSAS रायफ़लों के फेल हो जाने की ख़बर थी. सरकार के कहने पर CRPF ने INSAS को अपनाया तो लेकिन यहां भी बेमेल जोड़ी वाली बात निकली. CRPF ने भी जल्दी ही इन रायफ़लों से पल्ला झाड़ लिया. सरकार ने पहले मान मनव्वल की, फिर दावा करने लगी कि इन्हीं रायफ़लों से करगिल की जंग जीती गई थी. इन्हें CRPF इस्तेमाल करने से मना कैसे कर सकती थी.

CRPF ने सरकार के इस दावे का भी जवाब दिया था कि उसकी लड़ाई सरहद की लड़ाई नहीं है. गुरिल्ला माओवादियों से है. भौगोलिक और बाक़ी कारणों से CRPF ने हाथ पीछे खींच लिए. INSAS फिर रह गई अकेली.

INSAS असल में एक रायफ़ल नहीं थी बल्कि एक पूरा रायफ़ल परिवार था, और पूरा का पूरा ही सवालों के घेरे में
INSAS असल में एक रायफ़ल नहीं थी बल्कि एक पूरा रायफ़ल परिवार था, और पूरा का पूरा ही सवालों के घेरे में

# हारे का सहारा, पड़ोसी बेचारा

सरकार ने चिपका दी लाखों रायफ़लें पड़ोसी मुल्क नेपाल को. गैंग्स ऑफ़ वासेपुर देखी है? उसमें कैसे सरदार खान देसी कट्टा लेकर दुकान पर पहुंचता है और बमकते हुए कहता है ‘ई का बवासीर बना दिए हो भाई’. बस वही हुआ नेपाल के साथ. सरदार खान था नेपाल. भारत ने चौचक मात्रा में इंसास रायफ़लें बेच दीं नेपाल को. INSAS रायफ़लों का इकलौता विदेशी ग्राहक नेपाल. कुछ दिनों में ही नेपाल रसीद लेकर वापस आ गया. कि भईया नहीं चाहिए आपकी INSAS रायफ़लें. वापस ले लो. और तब भारत ने रसीद के नीचे छोटा वाला स्टार दिखाकर कहा ‘भूल चूक लेनी देनी, बिका हुआ माल वापस नहीं होगा’. मतलब नेपाल वापस करना चाहता था रायफ़लों का स्टॉक. लेकिन भारत ने लेने से साफ़ मना कर दिया. भारत का जवाब था कि ‘आपके लोगों को ये रायफ़लें इस्तेमाल करने का सही तरीका नहीं आता. हम अपनी टेक्निकल टीम भेजेंगे जो इन रायफ़लों की ट्रेनिंग देगी.’ नेपाल बार-बार नाराज़ होता रहा लेकिन भारत ने INSAS वापस नहीं ली,तो नहीं ही ली.

दिक्कत तब बढ़ी जब नेपाली सेना के 43 जवान माओवादियों से लड़ाई में शहीद हो गए. नेपाल ने तब खुलकर INSAS रायफ़लों को substandard कहा.  8 अगस्त, 2011 को भारत के रक्षा राज्य मंत्री पल्लम राजू ने संसद में जवाब दिया कि दिक्कतों का पता लगाया जा रहा है. बाद में सरकार ने लीपापोती की और अंत में रिपोर्ट पेश कर दी कि सारी दिक्कतें नेपाल के साथ सुलझा ली गई हैं. इसी के बाद CRPF जो कि तब भी थोड़ा बहुत इंसास रायफ़लों को इस्तेमाल कर रही थी उसने नवंबर, 2014 को इससे पूरी तरह पल्ला झाड़ लिया. DGP सीआरपीएफ दिलीप त्रिवेदी ने कहा ‘INSAS रायफ़लें AK-47 की तुलना में बहुत ज़्यादा जाम होती हैं’. दिसंबर, 2014 में संसदीय समिति ने रिपोर्ट पेश की जिसमें कहा कि एक हाई क्वालिटी रायफ़ल की ज़रूरत तो है.

रायफ़लों के साथ सबसे बुनियादी ज़रुरत होती है दूर तक मार. यही INSAS के साथ नहीं थी.
रायफ़लों के साथ सबसे बुनियादी ज़रूरत होती है दूर तक मार. यही INSAS में नहीं थी.

साल 2015 में दिल्ली हाईकोर्ट में एक रिटायर्ड लेफ्टिनेंट कर्नल ने जनहित याचिका दायर की. उनका दावा था कि ख़राब रायफ़लों की वजह से सैनिक अपनी जान गंवा रहे हैं. साल 2015 के अप्रैल महीने में कोर्ट ने रक्षा मंत्रालय को जवाब देने के लिए कहा. जवाब में रक्षा मंत्रालय ने कहा कि INSAS रायफ़लों पर ये आरोप नहीं लगाया जा सकता. पूरी रिसर्च और ट्रायल के बाद इसे सेना में शामिल किया गया था. शामिल होने के बाद इस रायफ़ल में तीन बड़े सुधार किए गए हैं. नवंबर, 2015 में कोर्ट ने जनहित याचिका ये कहते हुए खारिज़ कर दी कि INSAS रायफ़लों में ख़राबी के पर्याप्त सबूत नहीं मिले हैं.

अप्रैल, 2015 में भारत सरकार ने CRPF की कुछ INSAS रायफ़लों को AK 47 से बदल दिया. साल 2017 में घोषणा हुई कि INSAS रायफ़लों को रिटायर किया जाएगा. इनकी जगह रूस की बनी AK 203 लेंगी, जिन्हें भारत में ही बनाया जाएगा.

इन्सास रायफ़ल ने शुरुआत से ही कथनी और करनी का फ़र्क बनाए रखा
इन्सास रायफ़ल ने शुरुआत से ही कथनी और करनी का फ़र्क बनाए रखा

# अब यूपी पुलिस की बारी

INSAS ने अपनी चुनौतियों से कितना इंसाफ़ किया ये आपने जान-समझ लिया होगा. राज्यों की पुलिस में धीरे-धीरे इन रायफ़लों को खपाया जाता रहा है. इसकी शुरुआत जम्मू कश्मीर पुलिस से हुई. उसके बाद कई राज्यों की पुलिस की स्पेशल सेल्स को ये रायफ़लें थमाई गईं. इस 26 जनवरी को माने 2020 के गणतंत्र दिवस के दिन INSAS रायफ़लों की उम्र हो जाएगी 22 साल. अब उत्तर प्रदेश के अपराधी और माफ़ियाओं से जंग लेने 22 साल बाद उत्तर प्रदेश पहुंच रही है INSAS रायफ़ल.

बर्तानिया हुकूमत के दौर से चली आ रही थ्री नॉट थ्री रायफ़ल अब उत्तर प्रदेश पुलिस का साथ छोड़ रही है. हालांकि इसके कारतूस बरसों पहले ही बनना बंद हो चुके थे
बर्तानिया हुकूमत के दौर से चली आ रही थ्री नॉट थ्री रायफ़ल अब उत्तर प्रदेश पुलिस का साथ छोड़ रही है. हालांकि इसके कारतूस बरसों पहले ही बनना बंद हो चुके थे

ब्रिटिश हुकूमत के वक़्त की 303 बोर रायफ़ल जिसे थ्री नॉट थ्री कहा अंग्रेज़ों ने ही, ये रायफ़लें अलविदा कह रही हैं. इतिहास बनने जा रही हैं. उत्तर प्रदेश पुलिस 26 जनवरी की परेड के दिन INSAS रायफ़लों को अपने परिवार में शामिल करेगी. मुंह से ठांय-ठांय करने वाली उत्तर प्रदेश पुलिस को INSAS शायद ही निराश करे. जिस थ्री नॉट थ्री के कारतूस बरसों पहले बनने बंद हो गए उन रायफ़लों के भरोसे उत्तर प्रदेश पुलिस ने बरसों तक माफ़ियाओं से टक्कर ली है. INSAS ज़ाहिर तौर पर उत्तर प्रदेश के लिए नया इंसाफ़ लाएगी.


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