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इन्वेस्टमेंट के ये आठ तरीके आपकी दिवाली को और ‘हैप्पी’ बना देंगे

होली को रंगों से, ईद को चांद से और क्रिसमस को सैंटा से टैग कर सकते हैं तो दिवाली को धन-समृद्धि और लक्ष्मी से. दिवाली से दो दिन पहले धनतेरस आता है, और धनतेरस के तो नाम में ही ‘धन’ है. धार्मिक मान्यताओं से शुरू हुआ धनतेरस फाइनेंस के लिहाज से इसलिए पॉइंट ऑफ़ डिस्कशन बन जाता है क्यूंकि इस मौके पर हमारे देश में गोल्ड आर्टिकल्स और चांदी के बर्तन, सिक्कों वगैरह की खरीदारी जम के होती है. कमाई की सोच रखने वाले लोग यहां भी नहीं चूकते. ऑनलाइन/ऑफलाइन किसी न किसी तरीके से गोल्ड में खूब इन्वेस्ट करते हैं. हालांकि ये सिर्फ़ मेटल्स की बात नहीं है, कुछ लोग नया मकान ख़रीदने या नए शेयर्स ख़रीदने के लिए भी धनतेरस और दिवाली वाले दिनों को चुनते हैं.

और इसीलिये फेस्टिव सीज़न के बीच हम लेकर आए हैं इन्वेस्टमेंट का एक ऐसा लिस्टिकल, जिसमें फटाफट आपको बताएंगे कि एक आम आदमी कैसे और कहां-कहां इन्वेस्टमेंट कर सकता है. इन्वेस्टमेंट के ये कुछ प्लेटफ़ॉर्म पारंपरिक हैं और कुछ नए या ग़ैर पारंपरिक. आप अपने रिस्क एपेटाइट, उम्र और फ़ाइनेंशियल टार्गेट्स के बेसिस पर इनमें से एक या ज्यादा तरीकों से इन्वेस्टमेंट कर सकते हैं. लास्ट में हम आपको पोर्टफ़ोलियो डायवर्सीफ़िकेशन के बारे में भी बताएंगे. लेकिन फ़िलहाल इन्वेस्टमेंट के इन ऑप्शंस पर बात शुरू करते हैं.

# फिक्स्ड डिपाजिट:

इसके बारे में ज़्यादातर लोगों को पता है. लेकिन फिर भी एक लाइन में रिवीज़न करें तो इस इन्वेस्टमेंट के तरीके में आप बैंक में एकमुश्त रुपये जमा करते हैं. एक निश्चित समय के लिए. जैसे कुछ दिनों, महीनों या सालों के लिए. और जब ये निश्चित समय यानी FD का टैन्योर ख़त्म हो जाता है तो आपको आपके पैसे तो वापस मिलते ही हैं, साथ ही कुछ इंटरेस्ट भी मिलता है. आपके कैपिटल यानी मूलधन पर मिलने वाला ये ब्याज़ FD के टैन्योर, जमा की गई रकम और कई बार आपकी उम्र और जेंडर पर भी निर्भर करता है. उम्र और जेंडर पर ऐसे कि कई बैंक वरिष्ठ नागरिकों या/और महिलाओं को कम्पेरेटिवली ज्यादा इंटरेस्ट देते हैं.

फिक्स डिपाजिट एक सेफ़ इंवेस्टमेंट माना जाता है (फोटो सोर्स-आजतक)
फिक्स डिपाजिट एक सेफ़ इंवेस्टमेंट माना जाता है (फोटो सोर्स-आजतक)

#फिक्स्ड डिपॉजिट का फ़ायदा:

कुछ जो सबसे सेफ़ इन्वेस्टमेंट्स हैं उनमें FD का नाम आता है. इसमें आपके मूलधन के डूबने की संभावना न के बराबर होती है. साथ ही तय समय पर पैसे न मिलने या ब्याज़ का भुगतान न होने जैसे मामले भी न के बराबर ही देखने को मिलते हैं. FD करवाने पर आप लिक्विडिटी वाला बॉक्स भी चेक करते हो. क्यूंकि अगर आपने FD करवाई तो आपने अपने पैसे को किसी दूसरे एसेट में नहीं परिवर्तित किया. जैसे शेयर्स या सोने में इन्वेस्टमेंट करने पर करते. इसलिए आप जब चाहें अपने पैसे FD से निकाल सकते हैं. टैन्योर पूरा होने से पहले भी. बस आपको छोटी सी पेनल्टी देनी पड़ती है. इतनी छोटी कि आप FD तुड़वाने से पहले सोचते भी नहीं कि कितने पैसे कट जाएंगे.

फिक्स्ड डिपाजिट में सीधे पैसा ही इन्वेस्ट किया जाता है इसलिए लिक्विडिटी रहती है (प्रतीकात्मक तस्वीर-आजतक )
फिक्स्ड डिपाजिट में सीधे पैसा ही इन्वेस्ट किया जाता है इसलिए लिक्विडिटी रहती है (प्रतीकात्मक तस्वीर-आजतक )

#फिक्स्ड डिपॉजिट का नुक़सान :

इन्वेस्टमेंट की क्लास का पहला फ़ॉर्मूला हमेशा याद रखिए कि रिस्क रिटर्न्स के समानुपाती होता है. मतलब जितना ज़्यादा रिस्क उतना ज़्यादा रिटर्न. तो अगर FD एक लोवेस्ट रिस्क इन्वेस्टमेंट है तो ज़ाहिर है कि इसमें रिटर्न भी कम ही मिलता है. और यही FD का सबसे बड़ा ड्रॉबैक है.

नोट: हमने जो रेट ऑफ़ इंट्रेस्ट, पेनल्टी, वरिष्ठ नागरिकों को मिलने वाला अधिक ब्याज़ जैसी चीज़ें बताई हैं, वो बैंक टू बैंक वैरी करता है. इसलिए आपको FD करवाने से पहले अपनी रिसर्च पूरी कर लेनी चाहिए. कहां से करवाएं, कितना ब्याज़ मिलेगा, प्री मेच्योर FD तुड़वाने में कितनी पेनल्टी देनी पड़ेगी, वग़ैरह-वगैरह.

# इन्वेस्टमेंट इन प्रॉपर्टी:

अक्सर आपने सुना होगा कि आपके बगल वाले शर्मा जी ने दिवाली पर घर लिया यानी इन्वेस्टमेंट इन प्रॉपर्टी, आप भी अपनी दिवाली और भविष्य को बेहतर बनाने के लिए प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट कर सकते हैं.

कैसे करें प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट?

प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करने के लिए किसी रॉकेट साइंस की ज़रुरत नहीं है, आप अपनी जेब और ज़रूरत के हिसाब से अपने बजट में आने वाले डुप्लेक्स, फ्लैट, प्लाट या जमीन खरीद सकते हैं.

दाम बढ़ने के अलावा रेंटल इनकम भी प्रॉपर्टी में इंवेस्टमेंट का एक साइड बेनिफिट है (फोटो सोर्स - आज तक)
दाम बढ़ने के अलावा रेंटल इनकम भी प्रॉपर्टी में इंवेस्टमेंट का एक साइड बेनिफिट है (प्रतीकात्मक तस्वीर – आज तक)

# प्रॉपर्टी में इन्वेस्टमेंट के फायदे :

प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करके आप रेगुलर इनकम भी जेनेरेट कर सकते हैं. दरअसल प्रॉपर्टी की वैल्यू वक़्त के साथ बढ़ती ही है. यानी कि फायदा. आप आगे जाकर उस प्रॉपर्टी को बेहतर दामों में बेच सकते हैं, ज़मीन की खरीद-फ़रोख्त करने वाले लोग यही करते हैं. दूसरा तरीका है रेंटल इनकम यानी आप अपनी प्रॉपर्टी को रेंट पर भी दे सकते हैं. अगर स्टेबिलिटी की बात करें तो प्रॉपर्टी में इन्वेस्टमेंट सबसे स्टेबल और सेफ़ माना जाता है यानी नुकसान का कोई डर नहीं, आपको शेयर मार्केट की तरह रोज़ दामों का उतार-चढ़ाव देखने की भी जरूरत नहीं, प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट करने पर लिवरेज का फायदा भी ले सकते हैं. यानी कम पैसों में ज्यादा वैल्यू का सामान लेना और आपको एकमुश्त पूरी पेमेंट करने की भी ज़रूरत नहीं है.

# प्रॉपर्टी में इन्वेस्टमेंट के नुकसान :

कोई भी प्रॉपर्टी खरीदने से पहले आपको उस प्रॉपर्टी की पूरी डिटेल्स पता कर लेनी चाहिए, वरना आने वाले वक़्त में आप कानूनी झंझट में पड़ सकते हैं. प्रॉपर्टी ली है तो आपको टाइम-टू-टाइम अपनी प्रॉपर्टी के मेंटेनेंस पर भी खर्च करना पड़ सकता है. इसे नुक्सान तो नहीं कहेंगे लेकिन एक दिक्कत ये भी है कि प्रॉपर्टी एक लिक्विड एसेट नहीं है, यानी आप इसे आसानी से कैश में कन्वर्ट नहीं कर सकते. कभी कोई मेडिकल कंडीशन आ जाए तो एकदम से प्रॉपर्टी बेचकर कैश का बन्दोबस्त कर पाना ज़रा मुश्किल होता है, मॉर्गेज लोनिंग की प्रक्रिया भी इतनी आसान नहीं है.

जैसे ही कोविड ने पैर पसारने शुरू किए थे. सबसे पहला सेक्टर जो पैन्डेमिक से बुरी तरह प्रभावित होना शुरू हुआ वो था इंफ्रास्ट्रक्चर. जाहिर सी बात है कि किसी भी क्राइसिस के वक़्त, वो चाहे पर्सनल हो या सोशल, हम सभी आम लोग सेविंग मोड में चले जाते हैं, न कि प्रॉपर्टी खरीदने लगते हैं. और फिर रिकवरी आने के बाद भी जो सेक्टर सबसे बाद में रिवाइव होता है, वो है इंफ्रास्ट्रक्चर यानी आप चीज़ों के तुरंत ठीक होते ही प्रॉपर्टी नहीं लेने लगते.

# रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REIT):

प्रॉपर्टी ख़रीदने के झंझावात से ज़रा बाहर आइए. हम आपके लिए एक नया इन्वेस्टमेंट आइडिया लाये हैं, रियल एस्टेट में इन्वेस्ट करने का ये तरीका ज़रा नया है.

हाल ही में हमारे यहां रिट (REIT) ने रियल एस्टेट इन्वेस्टर्स का ध्यान अपनी तरफ़ खींचा है. क्या है ये रिट (REIT)? मान लीजिए आपके पास 20,000 रुपए हैं, इतने रुपयों में क्या दिल्ली के किसी प्राइम लोकेशन पर बिना किसी झंझट के आप प्रॉपर्टी लेकर रेंटल इनकम कमा सकते हैं? जी हां, रिट (REIT) के जरिये आप ये कर सकते हैं. रिट(REIT) को आप म्यूचुअल फण्ड से भी समझ सकते हैं. जिस तरह आप डायरेक्ट इक्विटी में इन्वेस्ट न करके म्यूचुअल फण्ड के थ्रू करते हैं, वैसे ही प्रॉपर्टी में आप रिट (REIT) के जरिये इन्वेस्ट कर सकते हैं. प्रॉपर्टी से जुड़े सारे झंझटों को ट्रस्ट संभालता है और कुछ पैसा ‘ऐज़ अ चार्ज’ काट कर मंथली रेंटल आपको देता है, वो भी बिना किसी लफड़े के. रिट में सेबी की गाइडलाइन्स के हिसाब से टोटल इन्वेस्टमेंट का 80% पैसा कमर्शियल प्रॉपर्टी यानी जिनसे रेंट मिलने को है उन प्रॉपर्टीज में लगाना होता है.

रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REIT) के जरिए कम पैसों में भी प्रॉपर्टी के हिस्सेदार बन सकते हैं (फोटो सोर्स-आज तक)
रियल एस्टेट इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट (REIT) के जरिए कम पैसों में भी प्रॉपर्टी के हिस्सेदार बन सकते हैं (फोटो सोर्स-आज तक)

# रिट (REIT) के फायदे :

उदाहरण के लिए आपके पास 10 लाख रुपए हैं. सवाल वही है, क्या आप इतने रुपयों में किसी प्राइम लोकेशन में या अलग-अलग शहरों में प्रॉपर्टी ले सकते हैं? रिट (REIT) के जरिये आप अलग-अलग शहरों में एक से ज्यादा प्रॉपर्टीज में हिस्सेदारी ले सकते हैं और रेंटल इनकम गेन कर सकते हैं. यानी इक्विटी की तरह आप यहां भी डायवर्सिफिकेशन का फायदा ले सकते हैं.

डायवर्सिफिकेशन क्या है ये हम इस स्टोरी के आख़िर में अलग से बताएंगे.

रिट के जरिये किसी भी प्राइम लोकेशन की प्रॉपर्टी में हिस्सेदार बनना कोई पचड़े में पड़ने वाला काम नहीं है. ब्रोकर, किराएदार, रजिस्ट्री वगैरह के सारे झंझट आपके बिहाफ़ पर ट्रस्ट निपटाता है. रिट के थ्रू आप 8 से 10% तक गेन एक्सपेक्ट कर सकते हैं. भारत में मेनली तीन टाइप के रिट हैं- ब्रुकफ़ील्ड इंडिया रियल एस्टेट ट्रस्ट, एम्बेसी रिट, माइंड स्पेस रिट.

# रिट (REIT) के नुकसान :

रिट (REIT) में आपको नुकसान समझने के लिए प्रॉपर्टी के नुकसान समझने होंगे. यानी जो नुकसान प्रॉपर्टी खरीदने में हैं वही आपको रिट में हो सकते हैं. जैसे किसी क्राइसिस के वक़्त प्रॉपर्टी के रेट्स का गिरना, उस वक़्त अगर आप अपनी प्रॉपर्टी बेचना चाहें तो आपको नुकसान हो सकता है. दूसरा ये भी है कि अभी हमारे यहां रिट के बारे में लोगों को ज्यादा मालूमात नहीं है. हमारे यहां अगर देखें तो तो 3-4 रिट्स ही हैं जो काम कर रही हैं और चूंकि इनके बारे में लोगों को पता नहीं है तो लोग चाहते हुए भी इसका फायदा नहीं उठा पाते हैं.

नोट: रिट को अपनी टोटल रेंटल इनकम का 90% हिस्सा डिविडेंड की तरह बांटना होता है ताकि इन्वेस्टर्स को उनका रिटर्न टाइम से मिलता रहे. रिट में आपको प्रॉपर्टी पर हुए कैपिटल एप्रीसिएशन यानी प्रॉपर्टी की बढ़ी हुई वैल्यू का भी बेनिफिट मिलता है.

#बॉन्ड्स :

सरकार की स्कीम में इन्वेस्ट करने का एक तरीका हम और आपको बताते हैं. ये तरीका है बॉन्ड्स के जरिए, बॉन्ड्स यानी आसान भाषा में सरकार को आपके द्वारा दिया गया लोन. जिस पर सरकार आपको इंटरेस्ट देती है. बॉन्ड्स कई तरह के होते हैं जिनपर आपको एक फिक्स्ड टाइम तक फिक्स्ड रेट पर इंटरेस्ट मिलता है. उसके बाद आपके बॉन्ड्स MATURE हो जाते हैं और पैसा आपको वापस कर दिया जाता है. आपको बता दें शेयर मार्केट की तरह बॉन्ड मार्केट भी एक काफी बड़ा मार्केट है जिसका दुनिया की बड़ी इकॉनमीज़ को चलाने में अच्छा ख़ासा रोल रहता है. आप बॉन्ड, प्राइवेट कम्पनीज़ के भी ले सकते हैं, जिन पर आपको थोड़ा बेहतर इंटरेस्ट मिलने की उम्मीद रहती है.

सरकारी बॉन्ड्स (प्रतीकात्मक तस्वीर -इंडिया टुडे)
सरकारी बॉन्ड्स (प्रतीकात्मक तस्वीर -इंडिया टुडे)

# बॉन्ड्स के फायदे:

ये एक सेफ केटेगरी में आने वाला इन्वेस्टमेंट है. बॉन्ड्स में आपको टैक्स बेनेफिट भी मिलते हैं और एक तय समय के लिए आपका पैसा फिक्स हो जाता है. इसके अलावा ये एक लिक्विड इन्वेस्टमेंट है, मतलब आप समझ गये होंगे कि जरूरत पड़ने पर आप अपने बॉन्ड्स को बेचकर आसानी से कैश का जुगाड़ कर सकते हैं.

# बॉन्ड्स के नुकसान:

बाकी मार्केट को देखते हुए बॉन्ड्स आपको आपके पैसे पर कम इंटरेस्ट देता है. हमने आपको इन्वेस्टमेंट का एक बेसिक रूल जो शुरू में बताया था, वो आपको याद होगा- हाई रिस्क-हाई रिटर्न, लो रिस्क-लो रिटर्न. शायद यही वजह है कि बॉन्ड्स इन्वेस्टर्स का नंबर, शेयर मार्केट के इन्वेस्टर्स के कम्पैरिज़न में काफ़ी कम है.

# गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड्स:

आपने लोगों को दिवाली में सोना खरीदते जरूर देखा होगा. आज हम आपको सोना खरीदने की नयी व्यवस्था से परिचित करवाएंगे. आप सोने में पैसा गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड्स के जरिये से भी लगा सकते हैं. क्या होते हैं गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड्स यानी सरकारी गोल्ड बॉन्ड्स? इस स्कीम में आप अपना पैसा सरकार को देते हैं ‘ऐज़ अ लोन’. और सरकार आपके पैसे पर इंटरेस्ट देती है जो कि 2.5% पर-एनम का फिक्स्ड रिटर्न है. इस स्कीम में आप अगले 8 सालों के लिए पैसा लगाते हैं और सरकार 8 साल बाद आपका पैसा बढ़ाकर वापस करती है, इसमें आप चाहें तो 5 साल के बाद पैसा निकाल सकते हैं. और ये बढ़ा हुआ पैसा यानी लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन टैक्स फ्री होता है. मतलब बढ़ी हुई वैल्यू पर आपको सरकार को टैक्स देने की जरूरत नहीं है.

सोवरीन गोल्ड बॉन्ड्स (प्रतीकात्मक तस्वीर-इंडिया टुडे)
सोवरीन गोल्ड बॉन्ड्स (प्रतीकात्मक तस्वीर-इंडिया टुडे)

#गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड्स के फायदे:

सरकारी स्कीम होने के नाते ये एक सेफ़ इन्वेस्टमेंट है यानी आपके पैसे डूबने का कोई रिस्क नहीं, इसमें आपको रिटर्न दो तरीके से मिलता है, पहला है, ‘इंटरेस्ट’ जो एक फिक्स्ड रेट से मिलता है और दूसरा है सोने के रेट में बढ़त, बोले तो कैपिटल एप्रीसिएशन. जिस पर आपको टैक्स बेनिफिट मिलता है यानी ये टैक्स फ्री रहता है. इस स्कीम में आपका पैसा एक फिक्स्ड टाइम के लिए सेफ़ भी हो जाता है, और आपको घर में रखे हुए सोने से कहीं ज्यादा रिटर्न भी मिलता है.

# गोल्ड सॉवरेन बॉन्ड्स के नुकसान:

सरकारी स्कीम होने के नाते नुकसान तो सिर्फ कम इंटरेस्ट रेट का है यानी सरकार आपके पैसे को सेफ्टी तो देती है लेकिन इंटरेस्ट बाकी मार्केट के मुकाबले काफ़ी कम रहता है. इसके अलावा गोल्ड बॉन्ड्स में नुकसान जैसा कुछ नहीं है.

नोट: 2022 में आरबीआई द्वारा इशू होने वाले गोल्ड बॉन्ड्स के लिए इसबार 25 अक्टूबर से 29 अक्टूबर तक विंडो खुली थी. इसे ‘2021-22 सीरीज़ सेवेन’ कहा गया. उम्मीद है आपने इस विंडो से खरीदारी की ही होगी. नहीं की तो दूसरी विंडो 29 नवम्बर से 3 दिसंबर तक खुलेगी. ये विंडो हमेशा 5 दिन की होती है. और एक साल में 4 से 5 बार खुलती है. 

पढ़ें: इस दिवाली-धनतेरस पर गोल्ड ले रहे? सर्राफ़ा व्यापारियों की ये बातें बहुत काम आएंगी

#शेयर:

शेयर मार्केट में इन्वेस्टमेंट पुराना लेकिन इफेक्टिव तरीका है, बशर्ते आपको इन्वेस्ट करने के लिए खूब सारा ज्ञान होना चाहिए वरना आपका नुकसान भी हो सकता है. किसी भी लिस्टेड कंपनी यानी वो कंपनी जो शेयर मार्केट में लिस्टेड है, आप उसके बारे में थोड़ा रिसर्च करके उस कंपनी के शेयर में पैसा लगा सकते हैं, बदले में आपको क्या मिलेगा ? डिविडेंड यानी कंपनी के प्रॉफिट में कुछ हिस्सेदारी प्लस शेयर पर आने वाला रिटर्न.

शेयर मार्केट की रिसर्च आपको अच्छे रिटर्न्स दिला सकती है (फोटो रिप्रजेंटेशन इंडिया टुडे)
शेयर मार्केट की रिसर्च आपको अच्छे रिटर्न्स दिला सकती है (फोटो रिप्रजेंटेशन इंडिया टुडे)

# शेयर के फायदे:

शेयर में इन्वेस्ट करने का सबसे बड़ा फायदा है बेहतर रिटर्न. आप शेयर मार्केट में किसी भी और इन्वेस्टमेंट से बेहतर रिटर्न ले सकते हैं. हम क्रिप्टो की बात नहीं करेंगे, वहां तो हज़ारों गुना रिटर्न मिल सकता है. एक बिटकॉइन से एक पिज़्ज़ा खरीदा गया था. न खरीदा जाता तो उसकी कीमत करोड़ों में होती. क्रिप्टोकरेंसी की पूरी कहानी जानने के लिए आप हमारी एक सीरीज देखिएगा. सीरीज का नाम है – एक नया पैसा.

शेयर में इन्वेस्ट करने से आपको डिविडेंड इनकम का भी फायदा होता है, इसके साथ ही आप एक साथ कई कंपनी के शेयर्स में इन्वेस्ट कर सकते हैं. यानी डायवर्सिफिकेशन भी कर सकते हैं. इसके साथ ही ये लिक्विड एसेट होते हैं तो आप जब चाहें एक माउस क्लिक से अपने शेयर्स बेचकर अपना पैसा वापस ले सकते हैं. शेयर मार्केट में आप अपने कम्फर्ट और माली हालत के हिसाब से लॉन्ग टर्म, शॉर्ट टर्म या फिर जितने वक़्त के लिए आप चाहें इन्वेस्ट कर सकते हैं.

# शेयर के नुकसान :

शेयर मार्केट में फायदे के साथ सबसे बड़ा नुकसान ये है कि ये हाइली रिस्की एसेट है. बोले तो रिस्क ज्यादा है. और जब रिस्क ज्यादा तो रिवॉर्ड भी ज्यादा. लेकिन आपकी रिस्क एपेटाइट ठीक-ठाक होनी चाहिए. इसके अलावा आपको इन्वेस्ट करने से पहले कंपनी और शेयर मार्केट का खूब सारा ज्ञान होना भी ज़रूरी है, वरना अक्सर आपके पैसे के नुकसान की सम्भावना बनी रहती है.

शेयर्स में निवेश करने पर मार्केट के उतार-चढ़ाव पर नजार बनाए रखना ज़रूरी होता है (प्रतीकात्मक तस्वीर इंडिया टुडे)
शेयर्स में निवेश करने पर मार्केट के उतार-चढ़ाव पर नजार बनाए रखना ज़रूरी होता है (प्रतीकात्मक तस्वीर इंडिया टुडे)

# म्यूचुअल फंड :

जैसे हमने आपको पहले रिट (REIT) के बारे में बताया कि कैसे आप कम पैसे में डायरेक्ट प्रॉपर्टी न लेकर रिट के थ्रू प्रॉपर्टी में इन्वेस्ट कर सकते हैं. उसी तरह आप म्यूचुअल फण्ड के थ्रू शेयर मार्केट में इन्वेस्ट कर सकते हैं. कई म्यूचुअल फण्ड लोगों के थोड़े-थोड़े पैसों को इकट्ठा करके एक बड़ा अमाउंट बनाते हैं और फिर उस अमाउंट को अलग-अलग कम्पनीज़ के शेयर या डिफरेंट बॉन्ड्स में लगा देते हैं. और फिर रिटर्न आने पर ये यूनिट-होल्डर यानी जिसने म्यूचुअल फण्ड में पैसा लगाया है उसको रिटर्न के साथ उसका पैसा वापस कर देते हैं.

जैसे इक्विटी में निवेश करने का साइड वे म्यूचुअल फण्ड है, वैसे ही प्रॉपर्टी में निवेश करने के लिए REIT है (फ़ोटो सोर्स - आजतक )
जैसे इक्विटी में निवेश करने का साइड वे म्यूचुअल फण्ड है, वैसे ही प्रॉपर्टी में निवेश करने के लिए REIT है (फ़ोटो सोर्स – आजतक )

# म्यूचुअल फण्ड के फायदे:

म्यूचुअल फण्ड में निवेश करने का सबसे बड़ा फायदा ये है कि आपको पैसे लगाने के बाद शेयर मार्केट की तरह रोज़ उसे देखना नहीं पड़ता यानी आपको ये जाने की भी ज़रूरत नहीं कि आपका पैसा किस कम्पनी में लगा है. हालांकि अपनी जिज्ञासा के लिए के आप सर्च-रिसर्च कर सकते हैं. म्यूचुअल फण्ड में एक बार पैसा लगा दिया तो कुछ करने की ज़रूरत नहीं है, फिक्स्ड टाइम पर आपका रिटर्न आपको मिल जाएगा. अगर आप शेयर मार्केट के जानकार नहीं हैं तो भी म्यूचुअल फण्ड के थ्रू आप शेयर मार्केट से पैसा कमा सकते हैं.

# म्यूचुअल फण्ड के नुकसान :

म्यूचुअल फण्ड में निवेश से पहले आपको कई तरह के म्यूचुअल फंड्स को जांच परख लेना चाहिए कि आपकी रिस्क एपेटाइट क्या है. उसी हिसाब से इन्वेस्टमेंट के लिए म्यूचुअल फण्ड का चुनाव करना चाहिए. इसके अलावा म्यूचुअल फण्ड में ‘लॉक इन पीरियड’ भी होता है. इस दौरान आप इन्वेस्टमेंट को कैश में कन्वर्ट नहीं करा सकते यानी उस फिक्स्ड टाइम के बाद ही आपको आपका पैसा वापस मिलेगा. और अगर आप इस पीरियड के पहले ही विड्रॉल करते हैं तो आपको आपका पैसा कुछ अमाउंट काटकर ही वापस दिया जायेगा.

म्यूचुअल फण्ड एक कम जोखिम वाला निवेश माना जाता है (संकेतात्मक तस्वीर - इंडिया टुडे)
म्यूचुअल फण्ड एक कम जोखिम वाला निवेश माना जाता है (संकेतात्मक तस्वीर – इंडिया टुडे)

# क्रिप्टो में इन्वेस्टमेंट:

आजकल इन्वेस्टमेंट करने का एक नया तरीका है वर्चुअल करेंसी. यानी क्रिप्टोकरेंसी. विस्तृत जानकारी के लिए हम आपको बता ही चुके हैं कि हमारी लेटेस्ट सीरीज़ ‘एक नया पैसा’ देख सकते हैं. फ़िलहाल के लिए आइये शॉर्ट में जानते हैं कैसे आप क्रिप्टो के थ्रू भी इन्वेस्टमेंट कर सकते हैं और बेहतर रिटर्न पा सकते हैं.

क्रिप्टोकरेंसी को 2009 में लॉन्च किया गया था. शुरुआत हुई थी पहली क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन से. हालांकि आज करीब 5,000 से ज्यादा क्रिप्टोकरेंसी एक्जिस्ट करती हैं. बिटकॉइन के अलावा और कुछ फ़ेमस क्रिप्टोकरेंसीज़ हैं: लाइटकॉइन, रिप्पल, लिब्रा, डॉजकॉइन, ईथर आदि-आदि. अब आप इसे अपनी जेब में नहीं रख सकते क्यूंकि ये वर्चुअल करेंसी हैं, नोट या सिक्कों की तरह छू-पकड़ नहीं सकते. लेकिन इसको आप डिजिटल वॉलेट में जरूर रख सकते हैं. कॉइन-स्विच, कुबेर जैसे प्लेटफॉर्म्स पर आप इन क्रिप्टो-करेंसीज़ को आसानी से खरीद-बेच सकते हैं.

2009 में पहली क्रिप्टोकरेंसी बिटकॉइन की शुरुआत हुई थी
2009 में पहली क्रिप्टोकरेंसी, बिटकॉइन की शुरुआत हुई थी.

# क्रिप्टो के फायदे:

ये एक हाइली-लिक्विड करेंसी है, यानी आपको जब पैसों की ज़रूरत हो या आपको लगे कि अभी बेचने में फायदा है तो आप इसे आसानी से बेच सकते हैं. क्रिप्टो में मिलने वाले रिटर्न भी बाकी इन्वेस्टमेंट से कहीं ज्यादा होते हैं. शायद यही वजह है इसकी पॉपुलैरिटी की. हालांकि कई देशों में अभी क्रिप्टो को पूरी तरह मान्यता नहीं मिली है, फिर भी कई बड़ी कंपनियों ने अपने प्रोडक्ट और सर्विसेज़ के लिए क्रिप्टो में पेमेंट लेना शुरू कर दिया है.

लैस्ज़लो हेनेक्ज़ (Laszlo Hanyecz) जिन्होंने एक बिटकॉइन से दो पिज़्ज़ा मंगाए थे, आज एक बिटकॉइन की कीमत 46 लाख रूपए से ज्यादा है (फोटो सोर्स - ट्विटर)
लैस्ज़लो हेनेक्ज़ (Laszlo Hanyecz), जिन्होंने एक बिटकॉइन से दो पिज़्ज़ा मंगाए थे, आज एक बिटकॉइन की कीमत 46 लाख रूपए से ज्यादा है (फोटो सोर्स – ट्विटर)

# क्रिप्टो के नुकसान :

आपको पता है कि ट्रेडिशनल करेंसी, जैसे डॉलर या यूरो या रुपया वगैरह, अपने-अपने देशों की सरकारों और बाकी फाइनेंशियल रेगुलेटर, जैसे कि RBI वगैरह के अधीन होती हैं. यानी सरकार और सेंट्रल बैंक की रेगुलेशन के हिसाब से चलती हैं. लेकिन क्रिप्टो के साथ सबसे बड़ी दिक्कत ये है कि इस पर किसी सरकार या अथॉरिटी का कोई कंट्रोल नहीं है. क्रिप्टो का संसार डीसेंट्रलाइज्ड सिस्टम पर चलता है. ऐसे में क्रिप्टो-इन्वेस्टमेंट में रिस्क और फ्रॉड होने की पॉसिबिलिटी रहती है. दूसरा पेंच ये है कि क्रिप्टोकरेंसीज़ कोई कमोडिटी नहीं है, माने न सोना, न चांदी और न गेहूं या दूसरा कोई अनाज. सल्पाई और डिमांड का खेला हालांकि इनमें भी है. लेकिन चूंकि ये कोई कमोडिटी नहीं हैं तो इनके प्राइस पूरी तरह इन्वेस्टर्स के सेंटीमेंट्स पर चलते हैं. ऐसे में रातोंरात कोई इन्वेस्टर करोड़ों कमा भी सकता है और गवां भी सकता है. यानी कह सकते हैं कि क्रिप्टो एक हाइली रिस्की इन्वेस्टमेंट है.


दिवाली का यानी फ़ेस्टिवल सीज़न है. और इस मौक़े पर हमने आपको इन्वेस्टमेंट के इतने तरीके बताए. लेकिन इन तरीकों के अलावा भी इन्वेस्टमेंट करने के बहुत से तरीके हैं. जैसे इन्वेस्टमेंट इन गवर्नमेंट सिक्योरिटीज. उदाहरण के लिए किसान विकास पत्र, पोस्ट ऑफिस सेविंग स्कीम, नेशनल सेविंग सर्टिफिकेट. इसके अलावा आप गोल्ड इक्विटी ट्रेडेड फण्ड, इंफ्रास्ट्रक्चर फंड्स में भी पैसे लगा सकते हैं.

लेकिन इस पूरी ज्ञानधारा में एक चीज़ छूट रही है. हमने एक शब्द का ज़िक्र बीच में बार-बार किया है – डायवर्सिफिकेशन. इसे भी समझ लेते हैं.

# डायवर्सिफिकेशन:

आपने अंग्रेजी में एक कहावत सुनी होगी, ‘डोंट पुट आल योर एग्स इन वन बास्केट’. हिन्दी में समझें तो सारे लड्डू एक ही टोकरी में नहीं रखने चाहिए. लेकिन क्यूं? वजह ये है कि अगर गलती से वो टोकरी गिर गयी या चोरी हो गयी तो आप खाली हाथ रह जायेंगे. इसीलिए थोड़े-थोड़े लड्डू अलग-अलग टोकरी में रखना ज्यादा सेफ़ है. पुराने वक़्त में लोग जब ज्यादा रकम लेकर दूर का सफ़र करते थे तो रकम एक ही जेब में नहीं रखते थे. चोर-पॉकेट जानते हैं? बड़ी रकम उसमें रखते थे, चिल्लर ऊपर वाली में. ताकि कोई जेबकतरा अगर एक जेब पर हाथ साफ़ कर भी दे तो भी दूसरी जेब का माल बचा रहे. बस इसी कहानी को ‘डायवर्सिफिकेशन’ कहते हैं. और यही मामला इंवेस्टमेंट का भी है.

देखिए, आपको हमने ऊपर सभी तरह के इन्वेस्टमेंट के फ़ायदे और नुक़सान बताए. कोई भी इन्वेस्टमेंट ऐसा नहीं है जिसमें सिर्फ़ फ़ायदा ही फ़ायदा हो या सिर्फ़ नुक़सान ही नुक़सान हो. किसी में सिक्योरिटी ज़्यादा तो किसी में रिटर्न. तो आपको करना क्या है? सिंपल है. एक से अधिक जगहों पर अपने पैसों को इंवेस्ट करना है. जिससे रिटर्न भी सुनिश्चित हों और सुरक्षा भी.

डायवर्सिफिकेशन कितना और कैसे किया जाना चाहिए, ये कई फ़ैक्टर्स पर निर्भर करता है. जैसे अगर आप युवा हैं, तो जानकार कहते हैं कि आपको इक्विटी और म्यूचल फंड जैसी रिस्की मग़र अच्छे रिटर्न देने वाली जगहों पर ज़्यादा और FD जैसी सेफ़ जगहों पर कम इंवेस्ट करना चाहिए. उम्र की तरह ही आपकी आय, आपके जेंडर, आपके रिस्क एपेटाइट जैसी कई ऐसी चीज़ें हैं जिनका डायवर्सिफिकेशन के दौरान ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है. और सबसे ज़रूरी है एक्सपर्ट की राय.     

वैसे कभी-कभी ओवर-डायवर्सिफिकेशन से नुक़सान भी होते हैं. ओवर-डायवर्सिफिकेशन मतलब ज़रूरत से ज़्यादा टोकरियों में अपने लड्डू रखना. एक नुक़सान तो यही कि हर टोकरी तो ट्रैक करना पड़ेगा. दूसरा ये कि जितना ज़्या दाडायवर्सिफिकेशन करेंगे रिटर्न्स में उत्तरोत्तर कमी आती रहेगी. तीसरा हर इन्वेस्टमेंट के अपने टैक्स, टैक्स रिबेट्स और चार्जेज़ होंगे. यूं आपके चार्जेज़ बढ़ेंगे. ये चार्जेज़ ऐसे ही हैं जैसे सोने के गहने में सोने की बनवाई. मतलब जो गए तो गए. उनका सोने के वास्तविक मूल्य में कोई योगदान नहीं और रिटर्न भी नहीं.

 

ओवर-डाइवर्सीफ़िकेशन फ़ायदे की जगह नुकसान भी पहुंचा सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-इंडिया टुडे)
ओवर-डाइवर्सीफ़िकेशन फ़ायदे की जगह नुकसान भी पहुंचा सकता है. (प्रतीकात्मक तस्वीर-इंडिया टुडे)

तो अंत में यही कहेंगे कि जीवन में जादू जैसा कुछ होता हो या न होता हो, चमत्कारी बाबा और अलादीन का जिन काम आएं या न आएं, लेकिन सही जानकारियां और आपकी समझदारी तरक्की के रास्ते पर गाइड का रोल ज़रूर अदा करते हैं. सो जानकारियों भरे और लिस्टिकल लेकर हम लाते रहेंगे. शुभ दीपावली.


(ये स्टोरी हमारे यहां इंटर्नशिप कर रहीं सुरभि ने लिखी है.)


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