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गजराज राव इंटरव्यू (भाग-1): वो एक दिन जिसने जिंदगी बदल दी

नेशनलिज़्म की बलपूर्ण अवधारणा कितनी सही? क्या देश प्रेम ज़ोर जबरदस्ती से करवाया जा सकता है?

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कमर्शियल सिनेमा में उन्हें अभिनेता के तौर पर अब जाकर ऐसी स्वीकार्यता मिली है. 24 साल उम्दा एक्टिंग करने के बावजूद अब जाकर. बीते साल आई फिल्म ‘बधाई हो’ में कौशिक जी के किरदार में. जबकि 1994 में जब शेखर कपूर की ‘बैंडिट क्वीन’ में असोक के रोल में वे पहली बार फिल्म स्क्रीन पर उतरे थे, तब भी ताकतवर थे. अगर उसके बाद वे कोई फिल्म नहीं भी करते तो भुलाए नहीं जाते. ख़ैर, उसके बाद गजराज राव ने बहुत अंतराल लेकर ही फिल्में कीं. लेकिन जितनी भी कीं उनके बारे में एक मजबूत राय बनी है.

उनका लघु परिचय ये है कि राजस्थान में जन्मे. दिल्ली में पले-बढ़े. यहीं थियेटर करने से शुरुआत की. एक्ट वन के आरंभिक सदस्यों में से एक रहे. 1988 से एक्टिंग करने लगे. थियेटर एक्टर्स के संघर्ष की कहानियां सुनते थे तो उससे बचने के लिए राइटिंग भी करने लगे. कई सीरियल्स के लिए लिखा. एंकर्स को स्क्रिप्ट लिखकर भी देते थे. बीच में गारमेंट एक्सपोर्ट कंपनी में भी कुछ महीने काम किया. दिल्ली में अखबारों में कॉलम लिखकर भी भेजते थे.

सोनी एंटरटेनमेंट का शो ‘भंवर’ उन्होंने ही लिखा जो असल जिंदगी के कोर्ट केसेज़ के बारे में था. फिल्मों के इतर वे विज्ञापन फिल्मों के निर्माण से भी जुड़े. शुरुआत हुई एड गुरु प्रदीप सरकार को असिस्ट करने से. फिर उनकी कंपनी अपोकलिप्सो फिल्मवर्क्स (1997) में एसोसिएट डायरेक्टर और स्क्रिप्ट राइटर हो गए. बाद में अपनी एड कंपनी चालू की ‘कोडरेड फिल्म्स.’ इसमें कई सारे प्रशंसित विज्ञापन डायरेक्ट किए.

जीतेंदर कौशिक के किरदार में गजराज राव. फिल्म में उनका पात्र रेलवे में काम करता है. उनके पिता भी असल में रेलवे में काम करते थे.
जीतेंदर कौशिक के किरदार में गजराज राव. फिल्म में उनका पात्र रेलवे में काम करता है. उनके पिता भी असल में रेलवे में काम करते थे.

अब तक ‘दिल से’, ‘ब्लैक फ्राइडे’, ‘अक्स’, ‘दिल पे मत ले यार’, ‘दिल है तुम्हारा’, ‘आमिर’, ‘तलवार’, ‘ब्लैकमेल’ जैसी फिल्मों में काम कर चुके हैं. बीते कुछ बरसों में ऑनलाइन वीडियोज़ में भी उन्हें बहुत सराहा गया है. ‘टेक कॉन्वर्जेशंस विद डैड’, ‘बैंग बाजा बारात’ और ‘फादर्स’ जैसी सीरीज में वे बहुत पसंद किए गए हैं. 2018 में रिलीज हुई ‘बधाई हो’ ने उनको व्यावसायिक तौर पर एक नई ऊंचाई दी. मतलब ये कि अब वो ऐसे स्पेस में हैं जहां डायरेक्टर और प्रोड्यूसर्स को यकीन है कि वे अकेले बूते फिल्म कैरी कर सकते हैं. उनका खुद का एक दर्शक वर्ग बन चुका है. जैसे संजय मिश्रा और पंकज त्रिपाठी का है.

आने वाला समय गजराज राव के लिए और भी एक्साइटिंग होने वाला है, क्योंकि वे अपनी पहली फिल्म भी डायरेक्ट करने वाले हैं. हमने उनसे विस्तृत बातचीत की. वे काफी चुस्त, समझदार, संतुलित और अनुभवी व्यक्ति प्रतीत हुए.

उनसे बातचीत का पहला भाग प्रस्तुत है. दूसरे, तीसरे, चौथे व पांचवें हिस्से के लिंक अंत में/सबसे नीचे देखें:

Q1. अभी क्या व्यस्तता है ‘बधाई हो’ के बाद?
‘बधाई हो’ के बाद मेरे पास बहुत सारी स्क्रिप्ट आई हैं, वो पढ़ रहा हूं. और मैं जो विज्ञापन फिल्में निर्देशित करता हूं अपने कंपनी में, कोडरेड फिल्म्स में, उसमें कुछ फिल्म्स का निर्देशन किया है.

Q2. विज्ञापन फिल्मों को डायरेक्ट करने वाली आपकी जो पहचान है, शायद लोगों को उसके बारे में सबसे कम पता है.
ये हमेशा से होता है. निर्देशक का जो चेहरा होता है वो उतना पब्लिक के सामने नहीं आ पाता है. जैसे नीरज पांडे हैं, वो इतने कद्दावर डायरेक्टर हैं लेकिन उनका चेहरा शायद बहुत कम लोग जानते होंगे. क्योंकि उनकी कोई फिल्म आती है तब शायद वो कुछ इंटरव्यूज़ देते हैं, उसके बाद वो अपने काम में लग जाते हैं. मेरे ख़याल से निर्देशक चाहे विज्ञापन में हो या फीचर फिल्म में, जो एक्टर्स होते हैं उनसे पब्लिक ज्यादा रिलेट करती है. उनसे राब्ता ज्यादा होता है पब्लिक का.

जैसे वो विज्ञापन फिल्म जो मुंबई पुलिस के लिए आपने बनाया था जिसमें एक नेत्रहीन सज्जन रेलगाड़ी में अपनी सीट के पास आकर छड़ी से सामान चैक कर रहे होते हैं..
हां हां.. ‘एक ही मिनट तो लगता है (चैक करने में)’..

Q3. अब तक कितनी एड फिल्में डायरेक्ट कर चुके हैं?
हज़ार करीब हो चुका होगा शायद.

Q4. लिखते भी आप ही हैं?
नहीं नहीं, लिखते तो ये एडवर्टाइजिंग एजेंसी के लोग हैं. जो विज्ञापन एजेंसियां होती हैं, जैसे ओग्लवी हो गई, लिंटास, या लियो बर्नेट इस तरह की एडवर्टाइजिंग एजेंसीज़ में क्रिएटिव राइटर्स होते हैं. जैसे नितेश तिवारी (दंगल, भूतनाथ रिटर्न्स, चिल्लर पार्टी) लियो बर्नेट नाम की एजेंसी में क्रिएटिव डायरेक्टर थे. राइटर थे. वो विज्ञापन फिल्में लिखा करते थे. और फिर वहां से उनके मन में आया तो उन्होंने फीचर फिल्म की स्टोरी लिखनी शुरू की और वो उस तरह से आगे बढ़े. ऐसे बहुत सारे लोग होते हैं. विज्ञापन एजेंसीज़ से हमें काम मिलता है. स्क्रिप्ट्स मिलती हैं और हमें फिर वो तय करना होता है कि कर पाएंगे या नहीं कर पाएंगे.

Q5. अपनी डायरेक्ट की विज्ञापन फिल्मों में एक-दो के बारे में बताएं जो आपको संतोषजनक लगीं?
चार महीने पहले हम लोगों ने एक फिल्म बनाई थी, ह्यूंडई के लिए. जिसके अंदर एक सिख परिवार है नॉर्थ इंडिया में और वहां पर जो बच्चा (बेटा) है, वो बेसिकली घर की पुरानी सेंट्रो को बेचना चाहता है और फादर साब राज़ी नहीं है उसके लिए. उसके (फिल्म) जो इमोशन निकलकर आए थे, वो करने में बहुत मेहनत लगी. आर्ट डायरेक्शन करते हुए हमको 10-15 साल पहले का पूरा पीरियड और माहौल क्रिएट करने में मेहनत लगी.

चाहे ह्यूमर हो, चाहे इमोशन हो, उसको पेपर पर जितना चाहे आप कर लें, लेकिन उसको ट्रांसलेट करना सिनेमा के लिए बहुत डिफिकल्ट होता है. उस मूमेंट में जिस एक्टर को आपने चूज़ किया है, उस दिन उनकी मनोस्थिति कैसी है, उस पर बहुत कुछ निर्भर करता है. कि वो अपना 100-200 प्रतिशत दे पा रहे हैं कि नहीं. एज़ अ डायरेक्टर, मैं अपना 100 परसेंट दे पा रहा हूं कि नहीं दे पा रहा हूं. जो कैमरामैन है, जो आर्ट डायरेक्टर हैं, जो मेकअप डिपार्टमेंट है. फ़र्ज़ कीजिए कि हम लोग एक लोकेशन पर शूट कर रहे हैं और वहां पर शादी हो रही है पड़ोस में. अब पूरा शोरगुल चल रहा है लेकिन जो कैरेक्टर है उसको बहुत ही कुछ इमोशनल सीन करना है तो बहुत पेचीदा हो जाता है कई बार. बहुत सारे कारक होते हैं किसी एक कम्युनिकेशन के अच्छा या बुरा होने में.

ये जो ह्यूंडई की फिल्म थी उसके अंदर मुझे लगता है कैमरामैन से लेकर म्यूजिक डायरेक्टर तक हमारी पूरी टीम का बहुत अच्छा योगदान रहा और उसके 200 मिलियन (20 करोड़) से ज्यादा यूट्यूब पर व्यूज़ हो चुके हैं. मेरे लिए वो बहुत इम्पॉर्टेंट फिल्म है.

उसी के साथ हमने एक और फिल्म की थी जिसमें अतुल कुलकर्णी थे. आर्मी बैकग्राउंड पर थी. इन दो फिल्मों का कह सकता हूं जिन पर हाल फिलहाल में मुझको गर्व है.

Q6. बहुत शुरू की कोई फिल्म जो बहुत अच्छी रही हो, 10-15 साल पहले?
जी, हमारी पहली ही फिल्म थी. जब हमने प्रोडक्शन हाउस बनाया था. तब शुरू के चार-पांच महीने हमारे पास काम नहीं था, और कोई हमें काम देता नहीं था ये बोल के कि आपकी शोरील नहीं है – जो जब विज्ञापनों की एजेंसीज़ में आप जाते हैं तो आपसे बोला जाता है कि भई आपने पहले कौन सी फिल्म बनाई है, जैसे दर्जी है उससे बोला जाता है कि पहले आपने कौन सी कमीज या शेरवानी बनाई है. अगर कोई दर्जी खाली सिलाई मशीन लेकर बैठ जाए और बोले कि मैंने कुछ बनाया नहीं है और आप मुझे अपने कपड़ा दीजिए तो बनाऊंगा तो ग्राहक उस पर जैसे संशय करेगा वैसा ही संशय विज्ञापन एजेंसी वाले हम पर करते थे कि भई इन्होंने कुछ बनाया तो है नहीं और ये कैसे बोल रहा है कि बना सकता है.

क्योंकि मैंने असिस्ट किया था प्रदीप सरकार जी (मर्दानी, हैलीकॉप्टर ईला, परिणीता) को, उसका अनुभव था मेरा. मैं किसी फिल्म इंस्टिट्यूट से नहीं हूं, न ही सिनेमा को लेकर मेरी कोई ट्रेनिंग हुई है लेकिन जो प्रदीप दा के यहां पर काम हुआ था, घिसाई बहुत हुई थी. तकरीबन चार-पांच साल. तकरीबन एक दर्जन म्यूजि़क वीडियो किए थे हमने. उसमें शुभा मुद्गल जी का ‘अब के सावन’ और यूफोरिया के वीडियो थे जो बनारस में शूट हुए थे. इसके अलावा कुछ 200-400 विज्ञापनों में असिस्ट किया था. तो वो एक अनुभव संसार था. लेकिन काम नहीं मिल रहा था. उस बीच में हमारे दो परिचित राइटर्स थे – मनीष भट्ट और रघु भट्ट. एक विज्ञापन एजेंसी में काम करते थे. उनको उम्मीद थी कि हम कुछ अच्छा करेंगे. उन्होंने हमें एक शॉर्ट स्टोरी जैसी दी कि भई इसे एक डीवी कैम, छोटे कैमरा में शूट कर सकते हैं कम खर्चे में. वो एड फिल्म नेशनल एंथम को लेकर थी.

उसे हमने डीवी कैमरा में नहीं शूट करके प्रॉपर बड़े कैमरा में, अच्छे सेटअप के साथ, थोड़ा उधार लेकर शूट किया ताकि कहानी लोगों तक अच्छे तरीके से पहुंच पाए. उसके अंदर शुभा मुद्गल जी ने ‘जन गण मन’ गाया. शांतनु मोइत्रा जी से हम परिचित थे, उन्होंने उसका संगीत दिया. उसके अंदर नटराजन सुब्रमण्यम जो बहुत अच्छे सिनेमैटोग्राफर थे वो आए साथ में हमारे. ये वो फिल्म थी जिसके अंदर आपको याद हो तीन बच्चे सड़क किनारे जो जूते गांठने का काम करते हैं वो बैठे हैं. और सुरेंद्र राजन जी, जो बड़े सीनियर थियेटर आर्टिस्ट हैं और सिनेमा आर्टिस्ट हैं जो ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में भी थे, अगर याद हो आपको – ‘रुलाएगा पगले’..

वो खड़े होते हैं, सैल्यूट करते हैं..
जी जी. बारिश हो रही है सड़क पर और उसी समय रेडियो में नेशनल एंथम बजता है. ये लोग खड़े हो जाते हैं. कुछ शॉट्स के बाद हम रियलाइज़ करते हैं कि ये बुजुर्ग जो खड़े हैं ये विकलांग हैं. इसके बावजूद खड़े हो गए हैं. बच्चे भी उनकी देखा-देखी खड़े हो जाते हैं और कुछ लोग हैं जो बारिश से बचने के लिए भाग-दौड़ कर रहे हैं, रुक नहीं रहे हैं. बड़ा अच्छा उसके अंदर मैजिक हो गया था. अंत में वॉयसओवर आता है कि “राष्ट्रगान के सम्मान में शर्म कैसी. राष्ट्रगान का सम्मान देश का सम्मान.”

इसके लिए हम अलग-अलग लोगों से पूछ रहे थे कि कौन सी अच्छी वॉयस इसके लिए हमको मिल जाए. संयोग से हमें अमिताभ बच्चन जी के साथ 10 मिनट का टाइम मिला. उन्होंने फिल्म देखी, अपनी वैनिटी में. तब वो अपनी किसी शूटिंग में थे. उन्होंने बिना किसी लाग लपेट के बोला कि “बहुत अद्भुत ये आपने विज्ञापन बनाया है और मैं इसके अंदर आवाज़ देना चाहता हूं.” उनकी किसी फिल्म की डबिंग थी, तो हमारा खर्चा बचाने के लिए उन्होंने इतना उपकार किया कि हमको वहीं बुला लिया. बोला – “आप वहां पर आइए, एक घंटा मैं आपको देता हूं. आप उसकी डबिंग कीजिए.” तो हिंदी और अंग्रेजी दोनों वॉयसओवर उन्होंने किए.

अमिताभ बच्चन के साथ गजराज राव का वो गठजोड़ आज भी जारी है.
अमिताभ बच्चन के साथ गजराज राव का वो गठजोड़ आज भी जारी है.

उसके बाद अड़चन ये आई कि दो मिनट की फिल्म थी तो न्यूज़ चैनल चलाने को राज़ी नहीं थे. हमसे डिमांड की जाती कि 15-20 सेकेंड में कुछ कर दीजिए तो हम लोग चला देंगे, 30 सेकेंड कर दीजिए. तो उसमें गया कुछेक महीना. हम बड़े निराश हो गए थे कि ये फिल्म इतनी अच्छी बन गई है, सुंदर बन गई है लेकिन जब तक आप टीवी पर उसको नहीं दिखाएंगे तब तक बात नहीं, क्योंकि तब तक यूट्यूब का प्रचलन नहीं हुआ था. ये साधन नहीं था जो आज के युवाओं के पास है. उनके पास टैलेंट है. आप कुछ बनाना चाहते हैं तो आप मजबूर नहीं है. आप मोबाइल सेलफोन में शूट करके यूट्यूब पर चला दीजिए. और अगर उसके अंदर कुछ गुण होंगे तो आपको काम आगे मिलेगा. हमने उस वक्त हर जगह अपनी टेप, सीडी भेजी थी. हमारी खुशकिस्मती से दिबांग, जो एक पत्रकार हैं उस समय एनडीटीवी में थे, उनके हाथ हमारी सीडी पड़ गई. और उन्होंने डॉ. प्रणय रॉय और उनकी पत्नी राधिका जी को दिखाया. ये 12 अगस्त की बात है. उन्होंने देखकर बोला कि ये अभी मंगवाइए और हम लोगों ने टेप भिजवाया. 15 अगस्त के दिन भाई साहब, पूरा दिन वो फिल्म एनडीटीवी हिंदी और एनडीटीवी अंग्रेजी पे चली है. समझ लीजिए उस एक दिन ने हमारी जिंदगी पलट दी.

क्योंकि तब तमाम एजेंसीज़ को भी हमने दिखाई थी फिल्म लेकिन क्योंकि उसके अंदर कोई प्रोडक्ट नहीं था, हम किसी चीज को बेच नहीं रहे थे, उसमें कोई पिज्जा या बाइक नहीं थी. हमसे बोला गया कि आप इसमें पिज्जा डाल दीजिए या इसमें एंड में किसी बाइक का कॉन्ट्रीब्यूशन दे दीजिए. उसके लिए हम राजी नहीं हुए क्योंकि उस फिल्म की प्योरिटी खत्म हो जाती. मजबूर तो थे हम लोग, उहा-पोह में थे कि क्या करें. संयोग से ऐसा नहीं हुआ और एनडीटीवी ने बिना किसी प्रोडक्ट के ये फिल्म चलाई. थोड़ा मुश्किल होता है कि दो मिनट के कॉन्टेंट को आप चलाएंगे पूरा दिन. ख़ैर, कह सकते हैं कि उस फिल्म ने हमें रोज़ी-रोटी दी.

उस फिल्म की इतनी चर्चा हुई कि हमें अलग अलग विज्ञापन एजेंसियों से काम मिलना शुरू हुआ. वो फिल्म देखने के बाद ओग्लवी से पीयूष पांडे, उन्होंने हमको काम दिया. नितेश तिवारी जो थे, उन्होंने हमको काम के लिए बुलाया. एवरेस्ट एक एजेंसी थी वहां से मिलिंद धायमड़े जिन्होंने ‘तू है मेरा संडे’ फिल्म बनाई है, उन्होंने हमें काम दिया. इस फिल्म के बाद क्या हुआ कि हम लोगों को थोड़ा आसरा मिला. बड़ा अच्छा रिजल्ट रहा. लोगों को भी पसंद आई. आमतौर पर जब आप पब्लिक सर्विस अनाउंसमेंट बनाते हैं तो बड़ी बोझिल हो जाती है, या उसके अंदर .. क्या बोला जाता है अंग्रेजी का शब्द है.. pretentious (आडंबर भरी) हो जाती है. हमारे लिए खुशकिस्मती थी कि हम लोग इससे बच पाए. और हमने जो क्रिएट किया उसमें बड़ा नेचुरली निकलकर आया.

तकरीबन एक दो साल बाद एक और कॉन्सेप्ट दिया रघु जी, मनीष जी ने, कि एक अंध विद्यालय में बच्चे जो हैं होली खेलते हैं. उसमें भी सुरेंद्र राजन जी ही थे क्योंकि उनके अलावा वॉर्डन का रोल कोई और कर नहीं सकता था. वो फिल्म बनी. उसके अंत में जाकर पता चलता है कि हॉस्टल के बच्चे जो खेल रहे हैं होली इन सभी की नेत्रदृष्टि नहीं है. इसके लिए भी बच्चन जी ने हमारी फिल्म में वॉयसओवर दिया. इस तरह कुछ महत्वपूर्ण काम हुए. क्योंकि क्या होता है कि विज्ञापन से आप प्रोडक्ट बेचते हैं, बाजार को आगे बढ़ाते हैं, उसके साथ-साथ कुछ-कुछ ऐसे काम करते रहने चाहिए जो एक गंगा स्नान जैसा होता है.

Q7. नेशनलिज़्म के संदर्भ में पूछना चाहूंगा कि दस-पंद्रह साल पहले आपने एड बनाया कि देश के लिए प्रेम होना चाहिए कि बरसात में भी खड़े हो गए सैल्यूट करने. आज एक बलपूर्वक थोपी जा रही धारणा है. कि आपको राष्ट्र की इज्जत करनी चाहिए, आप करते नहीं थे, ऐसे ही थे सारे और हम आपको बताते हैं. चारों तरफ से यही है आज. आप इसे कैसे देखते हैं?
मुझे लगता है जबरदस्ती नहीं होनी चाहिए. क्योंकि मन से प्रेम होना बहुत जरूरी है. उसके लिए जो कम्युनिकेशन है या जो भी आप बनाएं, गीत बनाएं.. जैसे ‘मेरे देश की धरती सोना उगले, उगले हीरा मोती..’ वो तो मेरे लिए बचपन की फिल्म है. शायद मिड सेवेंटीज़ की होगी वो (उपकार, 1967), मैं 10-15 साल का था फिर भी रोंगटे खड़े हो जाते थे मेरे. आज भी उस गीत को सुनता हूं तो मन में भूचाल आता है. कृति ऐसी होनी चाहिए कि आपका मन अपने आप करे कि मुझे ये बात बहुत सही लगी, जबरदस्ती थोपकर आप किसी से कुछ करवा नहीं सकते. वो थोड़े समय के लिए लोग ऐसा सोच लेंगे लेकिन मेरे ख़याल से वो मन से होना बहुत जरूरी है. या जैसे ‘रोजा’ (1992) में गाना था रहमान साहब वाला, जो झंडा जब जलता है और अरविंद स्वामी पकड़ते हैं (भारत हमको जान से प्यारा है). ऐसे ऐसे गीत हैं. मुझे लगता है कि कम्युनिकेशन ऐसा होना चाहिए कि एकदम उद्वेलित कर दे इंसान को, उसकी इतनी प्योरिटी होनी चाहिए.

Q8. सेंसर बोर्ड (CBFC) फिल्मों के शुरू में एड डालता है धूम्रपान और कैंसर के प्रति जागरूकता के लिए. एक एड आता था जिसमें कैंसर पेशेंट मुकेश मर जाता है. कॉमेडी करने वाले या वो लोग जो सेंसर बोर्ड की आलोचना करना चाहते हैं वो इस मैसेज की मजाक उड़ाते हैं. फिल्म डायरेक्टर कहते हैं कि ये क्यों दिखाते हो, हमारा आर्ट बाधित होता है. वूडी एलन ने 2013 में अपनी फिल्म ‘ब्लू जैस्मिन’ यहां रिलीज करने से मना कर दी क्योंकि सेंसर ने उन्हें फिल्म में स्वास्थ्य संबंधी डिस्क्लेमर लगाने के लिए बोला गया था. आप इसे किस स्तर पर देखते हैं?
बड़ा जटिल है ये, क्योंकि सिनेमा देखने वाली जो ऑडियंस है उसकी उम्र अलग अलग है. जैसे मैं जब 20 साल का था और मुझसे कुछ चीजें बोली जाती थीं तो मुझे बड़ी अटपटी लगती थीं और अखरती थीं लेकिन आज 40 पार करने के बाद, वही चीजें मुझे लगती हैं कि सही बात है वो. उम्र का दायरा होता है, उम्र पर डिपेंड करता है. मुझे लगता है कि सब तरह की राय प्लेटफॉर्म पर सामने रहनी चाहिए. सिनेमा के अंदर जो ये विज्ञापन दिखाए जाते हैं वो भी जरूरी हैं और जो ह्यूमरिस्ट हैं वो भी जरूरी हैं. दोनों चीजों में मुझे कोई एतराज नहीं है. लोग समझदार होते हैं और वो अपनी राय बना लेते हैं, इसलिए दोनों पक्ष सामने होंगे तो उनके लिए और सरल व अच्छा रहेगा.

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