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फैज़ के नवासे ने जो कहा है उसे दोनों मुल्कों की हर दीवार पर चिपका देना चाहिए

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यह लेख  डेली ओ  से लिया गया है जिसे अली मदीह हाशमी ने अंग्रेज़ी में लिखा है . 

दी लल्लनटॉप के लिए हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.


थॉमस जेफर्सन ने लिखा है- ‘जब अन्याय ही क़ानून बन गया हो तो उसका प्रतिरोध हमारा कर्तव्य बन जाता है.’

2016 में होने वाले 18वें जियो मामी, मुम्बई फिल्म फेस्टिवल ने फैज़ अहमद फैज़ की लिखी फिल्म ‘जागो हुआ सवेरा’ दिखाने से इनकार कर दिया. जबकि फैज़ जितने पाकिस्तान के थे उतने ही हिन्दुस्तान के भी.

वैसे तो फैज़ का जन्म पाकिस्तान के सियालकोट के पास हुआ था. वहीं पले-बढ़े भी. पहली नौकरी उन्होंने अमृतसर के माओ कॉलेज में की. दूसरे विश्व युद्ध के दौरान ब्रिटिश इन्डियन आर्मी में भी रहे. श्रीनगर में उनकी शादी हुई. इस ज़मीन से उन्हें गहरी मुहब्बत थी. बेहद मुहब्बत. ये वही ज़मीन थी जिसे 1947 के बाद से भारत कहा जाने लगा. उनकी दोनों बेटियां भी यहीं पैदा हुईं.

वैसे तो फैज़ ने देश के विभाजन पर कभी अपनी कोई ख़ास राय नहीं रखी. लेकिन ‘द पाकिस्तान टाइम्स’ में उनके लिखे संपादकीय से हम साम्प्रदायिक हिंसा के बारे में उनके विचारों को जान पाते हैं.

एक जगह उन्होंने लिखा है- ‘मुसलमानों को उनका पाकिस्तान मिल गया. हिन्दुओं और सिक्खों को उनका पंजाब और बंगाल. लेकिन मैं अब तक ऐसे किसी हिन्दू, मुस्लिम या सिक्ख से नहीं मिला जो इस बंटवारे से बहुत खुश हो या इस बंटवारे से जिसे कोई उम्मीद हो. ये कैसा देश है जहां लोग अपनी आजादी की भी खुशियां नहीं मना पाते.’

फैज़ अहमद फैज़
फैज़ अहमद फैज़.

1947 के अगस्त में लिखी फैज़ की मशहूर कविता ‘सुबह-ए-आज़ादी’ में भी उन्होंने लगभग यही बात कही. धर्म और देशभक्ति के नाम पर हत्याओं का विरोध किया.

उसी साल दादाजी पर लिखी मेरी किताब (फैज़ की जीवनी) दिल्ली से प्रकाशित हुई थी. मैं पिछले तीन साल से इस किताब पर काम कर रहा था. और इसके विमोचन का इंतज़ार ही कर रहा था कि ऐन उसी वक़्त दोनों देशो के बीच के हालात कुछ ऐसे बिगड़े कि ये नहीं हो पाया. मुझे भी लगा कि जब तक स्थितियां सुधर न जाएं, तब तक इस बुक-लॉन्च को टाल ही दिया जाए.

पिछले हफ्ते कुआलालंपुर की एशिया-पैसिफिक इंस्टीट्यूट फॉर ब्रॉडकास्टिंग डेवेलपमेंट (AIBD) ने दिल्ली में मीडिया समिट का आयोजन किया. मेरी मां मुनीज़ा हाशमी (जानी मानी पत्रकार) इस समिट में आमंत्रित थीं. पिछले कुछ सालों से वे ऐसे समारोहों में मुख्य वक्ता के रूप में जाती रही हैं. तमाम औपचारिकताओं के साथ उन्हें इस समिट में बुलाया गया था.

उनके पास हिन्दुस्तान का ‘मल्टिपल एंट्री वीज़ा’ भी था. क्योंकि वो अक्सर अपने दोस्तों से मिलने या फैज़ फाउन्डेशन (लाहौर) के आयोजनों के लिए कलाकारों को आमंत्रित करने भी वहां आया-जाया करतीं.

मुनीज़ा हाशमी
मुनीज़ा हाशमी.

लेकिन कांफ्रेंस की उस शाम मां का फोन आया. बहुत परेशान लगीं. उन्होंने उसी होटल से फोन किया था जहां वह समिट होने वाला था. पहुंचने पर उन्हें बताया गया कि उनका रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया गया है. यही नहीं बल्कि उनके होटल की बुकिंग भी रद्द कर दी गई थी. उन्हें कांफ्रेंस में शामिल होने और डेलिगेट्स के साथ डिनर करने से भी मना किया जा रहा था. कार्यक्रम के संचालकों में से एक दोस्त ने किसी दूसरे होटल में उनके रहने की व्यवस्था की.

पूरी बात जानकर मैं बहुत गुस्से में था. लेकिन तभी मेरे छोटे भाई ने मुझे फैज़ की याद दिलाई कि वे इस हालत में कैसे रिएक्ट करते. ज़ाहिर है कि वे गुस्सा तो बिलकुल नहीं करते. कुछ मीटिंग्स वगैरह के बाद मां दिल्ली से लौट आईं. उन्होंने आपने साथ हुए दुर्व्यवहार की कोई चर्चा नहीं की. मां की सारी समझदारी के बावज़ूद कुछ मीडिया चैनलों ने इस बात को पकड़ लिया. उन्हें एक मुद्दा मिल गया. उन्होंने मुझसे इस बारे में फैज़ के परिवार और उनके फाउन्डेशन के नज़रिए को जानना चाहा. सबसे पहली बात तो ये कि इस तरह किसी मेहमान को बुलाकर उसे बोलने न दिया जाना या उसे समारोह का हिस्सा न बनने देना, जैसी बातें भारतीयों या पाकिस्तानियों की बड़ी जनसंख्या का प्रतिनिधित्व नहीं करतीं. मतलब आम जनता का इस तरह की बातों से कोई लेना-देना नहीं होता. कुछेक की हरकतों के लिए किसी देश की जनता को जिम्मेवार नहीं ठहराया जा सकता.

ना ही भारत आम लोगों के व्यवहार में हमारे लिए कोई दुश्मनी दिखाई देती है. मेरे ही साथ कई बार ऐसा हुआ है. दिल्ली के टैक्सी ड्राइवर या दुकानदार जैसे ही जानते कि मैं लाहौर से आया हूं वे मुझसे किराया लेने से इंकार कर देते. बल्कि बहुत सम्मान के साथ मुझे खाना खिलाते, अपने दादा-परदादा की कहानियां भी सुनाते. जैसे मैं लाहौर से भारत आता रहता था वैसे ही भारत से भी लोग लाहौर आया करते. लाहौर के स्थानीय लोगों के साथ उनके भी अनुभव कुछ ऐसे ही होते जैसे भारतीयों के साथ मेरे अनुभव.

फैज़ ने कहा भी है कि ‘शांति सबकी साझी विरासत है.’ 1965 में फैज़ पर भी पाकिस्तानी राष्ट्र गीत लिखने का दबाव बनाया गया था. जिसे लिखने से फैज़ ने इन्कार कर दिया था. बल्कि इसकी जगह उन्होंने देश के लिए अपनी जान न्योछावर कर देने वाले पाकिस्तानी और भारतीय सिपाहियों के लिए ‘सिपाही का मर्सिया’ लिखना पसंद किया.

लेनिन शांति पुरस्कार के अवसर पर फैज़ ने कहा था- इंसानियत की सबसे खूबसूरत और पहली शर्त है- शांति.

“शांति और स्वतंत्रता. ये सबसे सुंदर और सबसे रोशन चीज़, सबसे सुंदर भाव हैं. खेतों में लगे अनाज और युक्लिप्टस के पेड़ों को छूकर चलने वाली हवा जितना कोमल. किसी नई नवेली दुल्हन का घूंघट है ये. ये बच्चों के मुलायम हाथ हैं. किसी कवि की कलम और चित्रकार की कूची है. बुद्धिमानी और जागरूकता, सत्य और न्याय, बहादुरी और साहस, करुणा जैसी सुंदर भावनाओं को भी यही सुनिश्चित करती है. यही हम इंसानों को जानवरों से अलग करता है.”

दोनों तरफ फैली नफरत और लड़ाई के अंदेशों के बावजूद हम भारत के शांतिप्रिय और तरक्कीपसंद लोगों से सिर्फ़ यही कहना चाहते हैं-

तुम खौफ़-ओ-ख़तर से डर गुज़रो/ जो होना है सो होना है.

ग़र हंसना है तो हंसना है/ ग़र रोना है तो रोना है

तुम अपनी करनी कर गुजरो/ जो होगा देखा जाएगा.


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